<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>VEDA VICHAR</title>
	<atom:link href="https://vedavichar.com/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://vedavichar.com/</link>
	<description>VICHAR FROM GITA &#124; VEDA &#124; UPNISHAD</description>
	<lastBuildDate>Fri, 24 Apr 2020 08:08:39 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=6.1.1</generator>

<image>
	<url>https://vedavichar.com/wp-content/uploads/2020/04/cropped-DSC_6324-32x32.jpg</url>
	<title>VEDA VICHAR</title>
	<link>https://vedavichar.com/</link>
	<width>32</width>
	<height>32</height>
</image> 
	<item>
		<title>GITA</title>
		<link>https://vedavichar.com/gita/</link>
					<comments>https://vedavichar.com/gita/#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Acharya Vrujlal]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 07 Oct 2019 11:45:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[GITA]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://vedavichar.com/?p=6084</guid>

					<description><![CDATA[<p>GITAJI. GITA एतान्न हन्तुमिच्छामि ध्नोतिऽपि मधुसूदन। अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतो: किं नो महीकृते।। 1/35 एवमुक्त्वार्जुन: संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्। विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानस:।। 1/47 क्लैब्यं मा स्म ग़म: पार्थ नैतत्त्वय्युपपध्यते। क्षुद्रं ह्रदयदौर्बल्यं...</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com/gita/">GITA</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com">VEDA VICHAR</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>GITAJI.<br />
GITA<br />
एतान्न हन्तुमिच्छामि ध्नोतिऽपि मधुसूदन।<br />
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतो: किं नो महीकृते।। 1/35<br />
एवमुक्त्वार्जुन: संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।<br />
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानस:।। 1/47<br />
क्लैब्यं मा स्म ग़म: पार्थ नैतत्त्वय्युपपध्यते।<br />
क्षुद्रं ह्रदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।2/3<br />
गुरुनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके। 2/5<br />
कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव: पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता:।<br />
यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रुहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।। 2/7<br />
(कायरतारुप दोषसे उपहत हुए स्वभाव वाला तथा घर्मके विषयमें मोहितचित्त हुआ मैं आपसे पूछता हुँ की जो मेरे लिये निश्चित कल्याणकारक हो वह कहिये; क्योंकि मैं आपका शिष्य आपके शरण आया हुँ मुझको शिक्षा दीजिये।)<br />
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह।2/9<br />
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।<br />
न चैव न भविष्याम: सर्वे वयमत: परम्।। (Gita-2/12)<br />
(न तो ऐसा ही है कि किसी कालमें मैं न था अथवा तु नहीं (था) अथवा ये राजालोग नहीं (थे) और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे)(Gita-2/12)।<br />
(It is not that there was a time when I didn’t exist, nor you (didn’t exist), nor all these kings (didn’t exist); nor it is that in future we shall not be.) Gita-2/12).<br />
देहिनोअस्मिन्था देहे कौमारं यैवनं जरा ।<br />
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ।।2/13<br />
(जैसे जीवकी इस देहमें बालपन, जवानी (और) वृद्धावस्था(होती है) वैसे ही अन्य शरीरकी प्राप्ति होती है; उस विषयमेंधीर पुरुष मोहित नहीं होता)<br />
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु:खदा:।<br />
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।। (Gita-2/14).<br />
(हे कौन्तेय! (बाहर की दुनिया के) स्मर्शजन्य तमाम भोगों द्वैत पैदा करनेवाले, आने-जानेवाले तथा क्षणिक है; इसलिए हे भारत तू उनसे परे हो जा।) (Gita-2/14).<br />
(O Konteya! All the pleasant feelings of senses (of outer world) are cause of creating duality, are transitory and impermanent; therefore O Bharat! You transcend them.) (Gita-2/14).<br />
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।<br />
समदु:खसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते।। (Gita-2/15)<br />
[हे पुरुष श्रेष्ठ! समत्वमें स्थित जिस विवेकी पुरुषको ये (स्मर्शजन्य भोगों) विचलित नहीं कर रहे है, वह अवश्य ही अमृतत्व को प्राप्त होता है।] (Gita-2/15)<br />
[O best among the men! The erudite that is established in equanimity, whom these (pleasant feelings of senses) are not distracting, indeed avails to the immortality.](Gita-2/15).<br />
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।<br />
उभयोरपि दृष्टोअन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदशिॅ गभि:।।2/16 (असत्यका तो अस्तित्व नहीं है और सत्यका<br />
अन-अस्तित्व नहीं है। (इस प्रकार) इन दोनोंका ही तत्त्व तत्त्वज्ञानी पुरुषोंद्वारा देखा गया है)<br />
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सवॅमिदं ततम्।<br />
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति।। 2/17.<br />
(नाशरहित तो तू उसको जान, जीससे सम्पूर्ण जगत व्याप्तहै। इस अविनाशीका विनाश करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है।)<br />
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ता: शरीरिण:।<br />
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत।। 2/18.<br />
(और इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरुप, आत्माके ये सबशरीर नाशवान है। इसलिये हे भारत तुं युद्ध कर।)<br />
न जायते म्रियते वा कदाचित् नायं भूत्वा भविता वा न भूय:।<br />
अजो नित्य: शाश्वतोअयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।। 2/20.<br />
(यह आत्मा किसी कालमें भी न तो जन्मता है और न मरता हैतथा न (यह) उत्पन्न होकर फिर होनेवाला है। क्योंकि यहअजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन आत्मा; शरीरके मारेजानेपर भी(यह आत्मा) नहीं मारा जाता)<br />
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।<br />
कथं स पुरुष: पार्थ कं घातयति हन्ति कम्।। 2/21.<br />
(हे अर्जुन! जो पुरुष इस (आत्मा)को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अक्षर जानता है, वह पुरुष कैसे किसकोमरवाता है (और) कैसे किसको मारता है?)<br />
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोपराणि।<br />
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।।-2/22<br />
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रृवं जन्म मृतस्य च।<br />
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमहॅसि।। 2/27.<br />
(क्योंकि जन्मे हुएकी मृत्यु निश्चित है और मरे हुएका जन्मनिश्चित है। इससे (भी इस) बिना उपायवाले विषयमें तूझेशोक नही करना चाहिये।)<br />
(Death is certain for all that are born and birth for all that dies.<br />
Therefore you should not be distressed for what is unavoidable). अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।<br />
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।। 2/28<br />
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।<br />
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते।। 2/31<br />
(तथा अपने धर्मको देखकर भी तूझे भागना नहीं चाहिये, क्योंकि क्षत्रियके लिये धर्मयुद्धसे बढ़कर अन्य कोइ कल्याणकारी नहीं है।)<br />
संभावितस्य चाकीतिॅमॅरणादतिरिच्यते। 2/34<br />
(माननीय पुरुषके लिये अपकीर्ति मरणसे (भी) बढ़कर है।)<br />
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्। 2/35.<br />
(और जिन लोकोंमें तू बहुत सम्मानित हुआ है (उसमें अब) हल्का पड़ेगा ।)<br />
स्वल्पमप्यस्य धमॅस्य त्रायते महतो भयात्।2/40.<br />
(यह धर्मका थोड़ासा भी (आचरण) (जन्म-मृत्युरुप) महानभयसे रक्षा कर लेता है।)<br />
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्ति अविपचित:। 2/42.<br />
(वे अविवेकीजन इस प्रकारकी जो दिखावारुप वाणी (हैउस) को कहा करते है।)<br />
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।<br />
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।।(Gita-2/45).<br />
[(क्यों कि) वेदों, साधक में तीनों गुणों के बढ़ावादेनेवाले भोगों की प्राप्ति के साधनों को विषय बनानेवाले है, (इसलिये) हे अर्जुन! तुम (वेदों से विमुख होकर) तीनों गुणों से पार, द्वन्द्वरहित, अपने स्वरुपमें स्थित, योग और क्षेम को न चाहनेवाला और आत्मवान् हो जाओ।)(Gita-2/45).<br />
[(O Arjun, since Vedas are dealing with the means that avail objects of enjoyment promoting Three Gunas in the seeker, (therefore) O Arjun, (after flinching the Vedas,) become one who has transcendedThree Gunas, who is nondualistic, established in his Pure Being, not desiring livelihood and one who has priority only for divinity) (Gita-2/45).<br />
कमॅण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।<br />
मा कमॅफलहेतुर्भूर्मा ते संगोअस्त्वकमॅणिॅ।। (Gita-2/47)।<br />
(तेरा वास्ता केवल कर्म से जूड़ा हुआ है, (कर्म के) परिणाम में कभी नहीं।जो अपने कर्म के परिणाम के द्वारा उकसाया जाता है, वह तुम मत हो; (और) न तेरी स्थिति कर्म न करने के पक्ष में हो।)।(Gita-2/47)।<br />
(Your concern is connected only with the action, never in the result (of action). Don’t be one who is actuated by the result of his acts; (and) let not it be so, wherein you are united with not doing the action.)(Gita-2/47).<br />
समत्वं योग उच्यते। (Gita-2/48).<br />
(समत्व के आचरण को जीना ही परमात्मा के साथ एक होना है।) (Gita-2/48).<br />
(The assimilation of Equanimity as a mode of life itself is to be one with Parmatma). (Gita-2/48).<br />
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय।<br />
बुद्धो शरणमन्विच्छ कृपणा: फलहेतव:। 2/49<br />
(ज्ञानयोगसे कर्मयोग अत्यंत ही निम्न श्रेणीका है। इसलिये हे धनंजय तू ज्ञानयोगमें रक्षाका उपाय ढूँढ ( अर्थात ज्ञानयोगका आश्रयकर) क्योंकि फलके हेतु बननेवाले अत्यंत दीन है।)<br />
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कखते।<br />
तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम्।।(Gita-2/50)।<br />
[समत्वयोग आत्मसात किया व्यक्ति इस जन्म (के जीवन के) दरमियाँ हि (अपने में निर्दन्द्व समझ पैदा हो जाने के कारण) पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है।समत्वयोग (में डटे रहने की यह निर्दन्द्व समझ पैदा कर लेना हि) कर्म में कुशलता (माना जाता) है; इसलिये (तू अवश्य हि) समत्वयोग में संयोजित हो जा।](Gita-2/50)।<br />
[The person assimilated in Samtva Yoga, (because of nondualistic understanding being born in him) abandons both, the righteous act and the evil act during (life span of) this birth itself. (Bearing the nondualistic understanding of standing firm) in Samatva Yoga (is believed to be) the acuteness of sensation in action; therefore (you must) get connected with Samatva Yoga]. (Gita-2/50)<br />
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।<br />
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।।(Gita-2/53).<br />
(जब तेरी (बुद्धि) हंमेशा वेदों के मत की अवहेलना करने में स्थिर हो जायेगी, तब बुद्धि का (यह) निरंतर सामंजस्य, तुझे ज्ञानयोग को प्राप्त करायेगा।)(Gita-2/53)।<br />
(When your (intellect) will permanently become unchanging in disregarding the doctrine of the Vedas, then the intellect (thus) becoming constantly harmonious, will avail you to Gyanyoga.) (Gita-2/53).<br />
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पाथॅ मनोगतान्।<br />
आत्मन्येवात्मना तुष्ट: स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।। 2/55.<br />
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन:।<br />
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते।। 2/59<br />
((इन्द्रियोंके द्वारा) विषयोंको ग्रहण न करनेवाले पुरुषके (भी केवल) विषयों (तो) निवृत हो जाते है, (परंतु उनमें रहने वाली) आसक्ति निवृत नहीं होती। इस (स्थितप्रज्ञ पुरुष) की तो आसक्ति भी परमात्माका साक्षात्कार करके निवृत हो जाती है।)<br />
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चित:।<br />
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मन:।। (Gita-2/60)<br />
(हे अर्जुन! यह घोर कष्ट देनेवाली इन्द्रियाँ तप करते हुए बुद्धिमान पुरुषके मनको भी अत्याग्रहपूर्वक हर लेती है।)(Gita-2/60)<br />
(O Arjun! These tormenting senses, importunately bewitches a man of wisdom also even though he is penancing.) (Gita-2/60).<br />
ध्यायतो विषयान्पुंस: संगस्तेषूपजायते।<br />
संगात्संजायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते।। 2/62<br />
(विषयोंका चिंतन करनेवाले पुरुषकी उन विषयोंमें आसक्ति हो जाती है, आसक्तिसे (उन विषयोंकी) कामना उत्पन्न होती है और कामना(में विघ्न पड़ने) से क्रोध उत्पन्न होता है।)<br />
क्रोधाद्भवति संम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम:।<br />
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।। 2/63<br />
(क्रोधसे अत्यंत मूढ़भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़भावसे स्मृतिमें भ्रम हो जाता है, स्मृति भ्रम हो जानेसे बुद्धि अर्थात ज्ञान शक्तिका नाश हो जाता है और बुद्धिनाश हो जानेसे (वह पुरुषका भी) नाश हो जाता है।)<br />
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।<br />
आत्मवश्यैविॅधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।2/64<br />
(वायुर्नावमिवाम्भसि 2/67<br />
या निशा सवॅभूतानां तस्यां जागतिॅ संयमि।<br />
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनै:।। 2/69<br />
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठंसमुद्रमाप: प्रविशन्ति यद्वत्।<br />
यद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।2/70<br />
विहाय कामान्य: सर्वान्पुंमांश्चरति नि:स्पृह:। निर्ममो निरहंकार: स शान्तिमधिगछच्छति।। (Gita-2/71).<br />
(जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर; ममतारहित, अहंकाररहित, कामनारहित वर्तता है, वह शान्ति को उपलब्ध हो जाता है।)(Gita-2/71).<br />
(The man who acts in general without having a desire, without a sense of ownership, without an ego, without a covetousness; avails to a peace).(Gita-2/71).<br />
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।<br />
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।।3/1<br />
लोकेऽस्मिन्द्विविद्यानिष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानध।<br />
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।। 3/3<br />
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत।<br />
कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।। (Gita-3/5)<br />
(नि:संदेह किसीभी कालमें कोईभी क्षण बिना कर्म किये हुए (तू) नहीं रह सकता, प्रकृतिजनित गुणों द्वारा अवश हुए सर्व मनुष्यों कर्म किया हि करते है।)(Gita-3/5)<br />
(Certainly, no any moment in any time (you) can remain without doing an action, all the men, made helpless by the Gunas born of the Nature, are indeed doing the actions.)(Gita-3/5).<br />
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।<br />
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचार: स उच्यते।। (Gita-3/6).<br />
(जो (मनुष्य बाहर से तो) कर्मेन्द्रियाों को संयमित कर लेता है, लेकिन मनसे (कल्पना करके) इन्द्रियों के विषयों की मज़ा लूंटता रहता है; वह महामूढ़ है और (उसका संयम आदि) वर्तन दम्भ कहा जाता है।)(Gita-3/6).<br />
(One who restrains the sense organs of actions (from outside), but (imagining) by the mind indulges into the subjects of sense organs, he is the most idiot and (his restraining etc) behaviour is called hypocrisy.).(Gita-3/6).<br />
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।<br />
हत्वापि च इमॉंल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते।। (Gita-18/17)<br />
(जिस पुरुषको (कर्मों में कर्तापनके) अहंकार का भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि (उस कर्मोंमें द्वन्द्वात्मकभाव बनाकर) लिपायमान नहीं होती है, वहपुरुष इन सब लोकोंको मारकर भी (वास्तवमें) न तो किसी को मारता है और न हीं (उस कर्मों के परिणाम से) बँधता है।)(Gita-18/17). (One who doesn’t have an attribute of ego (of doership in the deeds) and whose intelligence is not entangled(by begetting a dualistic liaison in the deeds), though he kills all the men in all the worlds, (actually) he neither kills nor he is bound (by the outcome of those deeds.) (Gita-18/17).<br />
कमॅ ज्याय: हि अकमॅण:। 3/8<br />
(अकमॅसे कमॅ बेहतर है)<br />
यज्ञार्थात्कमॅणोअन्यत्र लोकोअयं कमॅबन्धन:।<br />
तदथॅं कमॅ कौन्तेय मुक्तसंग: समाचर।। 3/9<br />
&#8220;Work, in this world, if not done for common good, then it is bondage. That is why O Arjun! You perform your duty without any attachment and that too aiming to satisfy the needs of System&#8221;.<br />
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव:।<br />
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते।। (Gita-3/17)<br />
(परंतु जो मनुष्य आत्मामें ही रमण करनेवाला और आत्मामें ही तृप्त तथा आत्मामें ही संतुष्ट हो जाता है, तो उसका कोई कार्य नहीं दिखता है।)(Gita-3/17)<br />
(But if a man remains self delighted, gets self satiated and becomes self satisfied, then for him there exists no work). (Gita-3/17)<br />
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।<br />
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदथॅव्यपाश्रय:। ।3/18<br />
(उसका इस विश्वमें न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन है और न कर्मोंके न करनेसे ही। तथा संपूर्ण प्राणियोंमें इसका स्वाथॅका कोइ संबंध होता नहिं है) 3/18<br />
(What on earth, he has interest in works done or undone? Because he has no selfish motive behind his relations with beings and things.)<br />
यद्यदाचरति श्रेष्ठ: तत्तदेवेतरोजन:।<br />
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवतॅते।।3/21<br />
(Whatever a great man does, that others will also do. Whatever standard he sets, the same the world will follow.)<br />
सक्ता: कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।<br />
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्त्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्।। 3/25<br />
(हे भारत कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार (कर्म) करते है, आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार (कर्म) करे।)<br />
(As the ignorant acts from attachment to work, the wise however should act, but in the spirit of detachment; with a desire to maintain the universal order.)<br />
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम्।<br />
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त समाचरन्।3/26.<br />
(परमात्मामें स्थित विद्वानको चाहियेकि वह कर्मोमें आसक्तिवाले अज्ञानियोंकी बुद्धिमें भ्रम अर्थात कर्मोंमें अश्रद्धाउत्पन्न न करें। (किंतु स्वयं) शास्त्रविहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ (उनसे भी वैसे ही) करवाये)<br />
(The learned man must not create wrong notion in the intellect of the ignorants who are acting out of attachment. But rather being established in Parmatma, he should continue his prescribed actions and inspire the ignorants for the same.)<br />
प्रकृतै: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सवॅश:।<br />
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।। (Gita-3/27)<br />
(सब कर्मों सब प्रकार से प्रकृतिके गुणों द्वारा किये जाते है; (फिरभी) अहंकार से मूढ़ हुआ अज्ञानी “मैं कर्ता हूँ”, ऐसा मानता है।)(Gita-3/27)<br />
(All the actions, in every way, are being done by the Gunas of the Nature, (yet) an ignorant, bewitched by the ego, believes: “I am the doer”.) (Gita-3/27).<br />
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वश:।<br />
य: पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति।। (Gita-13/29).<br />
(और जो पुरुष सब कर्मोंको सब प्रकारसे प्रकृतिसे ही कियेहुए देखता है और अपनेको अकर्ता देखता है, वही यथार्थदेखता है)(Gita-13/29).<br />
&#8220;The person who visualises that all actions are executed by the Nature, and realises himself as non doer, is the real visionary.&#8221; (Gita-13/29.)<br />
नान्यं गुणेभ्य: कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।<br />
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति।। (Gita-14/19)<br />
(जिस समय द्रष्टा (प्रकृति के) गुणोंके अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है, और (अपनेको उस) गुणोंसे अत्यंत परे हुआ महेसूस करता है, (उसी समय) वह मेरे स्वरुपको प्राप्त हो जाता है।)(Gita-14/19)<br />
(When the Witness, realises that there is no doer other than the Gunas (of the Nature), and perceives (Himself) as having transcended (the said) Gunas, he at once attains the Being of Mine.) (Gita-14/19).<br />
सदृशं चेष्टते स्वस्या: प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।<br />
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रह: किं करिष्यति।।3/33<br />
(संपूर्ण प्राणीजगत (परवश होकर) अपनी प्रकृति (चित्तवृत्ति या संस्कार) को अनुसरता (हुआ चेष्टा करता) है। ज्ञानी भी अपनी प्रकृति (चित्तवृत्ति या संस्कार) के अनुसार ही चेष्टा करता रहता है, फिर (कोई मन वग़ैरह का) निग्रह कैसे करेगा?)<br />
[All the creatures are (helplessly behaving) following to their innate Nature (Chittavritti or Habitual Inertia or Sanskaar.) Even a man of wisdom also keeps behaving as per his innate Nature (Chittavritti or Habitual Inertia or Sanskaar), then (how anyone) will be restraining (Mind etc)? (Gita-3/33).<br />
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयो:।<br />
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते।। 3/28<br />
(परंतु हे महाबाहो गुणविभाग और कर्मविभागके तत्त्वको जाननेवाला ज्ञानयोगी (तो) गुणों हि गुणोंमें बरत रहे है, एसा समजकर (उनमें) आसक्त नहीं होता।)<br />
प्रकृतेर्गुणसम्मूढा: सज्जन्ते गुणकर्मसु।<br />
तानकृत्स्न्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्।। 3/29<br />
(प्रकृतिके गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए मनुष्यों गुण (विभाग) और कर्म (विभाग)में आसक्त रहते है; (गुणविभाग और कर्मविभागके तत्त्वको जाननेवाला) आत्मवेताको चाहिये कि वह उन मंदबुद्धिवाले संपूर्ण अज्ञानियोंको विचलित न करे।)<br />
श्रेयान्स्वधर्मों विगुण: परघर्मात्स्वनुष्ठितात्।o<br />
स्वधर्मेनिधनं श्रेय: परधर्मों भयावह:।। 3/35<br />
अथ केन प्रयुक्तोअयं पापं चरति पूरुष:।<br />
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजित:। (Gita-3/36)(अर्जुन पूछता है)<br />
(हे कृष्ण तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात लगाये हुए की भाँति किससे जोतागया हुआ पाप कर्म का आचरण करता है)(Gita-3/36)<br />
(O Krishna! Then, though man himself not desiring yet, by whom harnessed he is committing sinful action, as if pushed forcefully.)(Gita-3/36).<br />
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव:। 3/37<br />
“The reason for this is the lust born out of material mode of passion and later transformed into wrath”. (Gita-3/37).<br />
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठान्मुच्यते।<br />
एतैविॅमोह़यत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्।। 3/40<br />
(इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि (ये सब) इसके वासस्थान कहे जातेहै। यह (काम) इन (इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि) द्वारा ही ज्ञानकोआच्छादित करके जीवात्माको मोहित करता है।)<br />
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।<br />
पाम्पानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्।।3/41<br />
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्य: परं मन:।<br />
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे: परतस्तु स;।। 3/42<br />
“The sense organs are superior to body, Mind is superior to sense organs, the intellect is superior to mind, and Pramatam is superior to intellect”. (Gita-3/42)<br />
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।<br />
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप।। (Gita-4/5)<br />
(हे परन्तप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत-से जन्मों हो चुके है, उन सबको मैं जानता हूँ लेकिन तू नहीं जानता।) (Gita-4/5)<br />
(O Parantapa Arjuna! Many births have been left behind by Me and by you, I know them all, but you don’t know them.) (Gita-4/5)<br />
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।<br />
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।(Gita-4/7)<br />
(हे भारत! मैं तब ही अपने साकाररुपसे प्रकट होता हुँ, जब जब धर्मकी संपूर्ण हानि (होती है और) अधर्म की बड़े पैमाने पर वृद्धि होती है।) (Gita-4/7)<br />
(O Bharat! I manifest my embodied form only when there is a total decline of religion and a predominant rise of irreligion) (Gita-4/7).<br />
परित्राणाय साधूनां विनाशाय चदुष्कृताम्।<br />
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।4/8<br />
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। 4/11<br />
कांक्षन्त: कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवता:।(Gita-4/12)<br />
(इस मनुष्य लोकमें कर्मोंके फलको चाहनेवाले (लोग अन्य) देवताओंका पूजन किया करते है।<br />
(Gita-4/12)<br />
(The people desiring the fruition of actions are worshipper of deities (other than me), in this mundane world) (Gita-4/12).<br />
न मां दुष्कृतिनो मूढ़ा: प्रपद्यन्ते नराधमा:।<br />
माययापह्रतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता:।। (Gita-7/15)<br />
(दुष्कर्म करनेवाले, मूढ़लोग, आसुरी भाववाले (और) नीच मनुष्यों का ज्ञान माया द्वारा हरा जा चूकने के कारण मेरा आश्रय नहीं कर सकते है।)(Gita-7/15).<br />
(The miscreants, grossly foolish, people with demonic nature (and) the vile men, cannot take refuge unto me, because their knowledge happens to be taken away by the illusion)(Gita-7/15).<br />
कामैस्तेस्तेर्ह्रतज्ञाना: प्रपद्यन्तेऽन्यदेवता:।<br />
तं तं नियममास्थाय प्रकृतिया नियता: स्वया।। (Gita-7/20)<br />
(अपने संस्कार (प्रकृति)के अनुरूप निर्मित हुई कामनाओंसे जिसका ज्ञान हरा जा चूका है वैसे लोग, उन उन (कामनाके अनुरुप) वह वह अन्य देवता का आश्रय लेते है।) (Gita-7/20).<br />
(They whose wisdom, has been detracted by the desires, formed according to their own Habitual Inertia or Sanskaar (Nature), take refuge unto each that deity that is (in accordance with) each that desire) (Gita-7/20).<br />
चातुवॅण्यॅं मया सृष्टं गुणकमॅविभागश:।<br />
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।(Gita-4/13)<br />
[(अतीत के जन्मों में साधक द्वारा अपने में अर्जित किये गये प्रधान) गुण के आधार पर (साधक के लिये) चार रंगो के (कृष्ण कर्म, शुक्लकृष्ण कर्म, शुक्ल कर्म और अशुक्लकृष्ण कर्म) कर्मों का विभाजन मेरे द्वारा रचा गया है। उस (कर्मों) का कर्ता होनेपर भी (वे साधक के द्वारा ही अर्जित किये गये होने के कारण) मुझ अविनाशीको तू (उसका) अकर्ता हि जान।)]
(Gita-4/13)<br />
[The division of four colored actions (Krishna Action, Shukla-Krishna Action, Shukla Action and Nonshukla-NonKrishna Action for the seeker) is made by Me on the base of (the Dominant) Guna ( that the seeker has earned in him during his past lives). Though being the maker of those (actions), perceive Immortal Me as non maker (of those actions as they have been earned by the seeker himself.)]. (Gita-4/13).<br />
कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य:।<br />
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्त: कृत्स्नकर्मकृत।। 4/18<br />
जो मनुष्य कर्ममें अकर्मको देखता है और अकर्ममे कर्मको देखता है, वह मनुष्योंमें बुद्धिमान है, योगी है और अब उसको कुछ करनेका बाक़ी नहीं है।)<br />
इसका मतलब है जीसको प्रकृतिमें कोइ द्वैत ही नहीं दिखता और सब विरोधाभासको जो पी गया है, और कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते होने के कारण वह अकर्ता है, और अगर द्वैत भाव बना लेता है तो प्रकृति को प्रतिक्रिया का आयोजन करना पड़ेगा और हालाँकि उसमें अन्य कोंई कर्ता होगा और वह खुद अकर्ता है, लेकिन फिरभी उसके द्वैत भाव के कारण यह कर्म हो रहा है इसलिये अकर्ता होने पर भी वह कर्ता है।<br />
यस्य सर्वे समारम्भा: कामसंकल्पवर्जिता।<br />
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा:।। 4/19<br />
निराशीर्यचित्तात्मा त्यक्त्त्तसर्वपरिग्रह:।<br />
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।(Gita-4/21).<br />
(आकांक्षारहित, चित्त सहित अपने को जिता हुआ, सब अर्जित पदार्थों को त्यागा हुआ (साधक); शरीर के कुछ कार्य करने के केवल कारण से पाप को प्राप्त नहीं होता है।) (Gita-4/21).<br />
[(A seeker) who is free from desire, who has overcome Chitta along with himself, who has abandoned all acquisitions; doesn’t avail sins for the only reason that the body has done some work.) (Gita-4/21).<br />
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञ: परन्तप।<br />
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।। (Gita-4/33)<br />
(हे परंतप! द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञ अत्यंत श्रेष्ठ है। हे पार्थ! पूरे ब्रह्मांड के सम्पूर्ण कर्मों ज्ञानमें समाविष्ट हो जाते है।) (Gita-4/33)<br />
(O Parth! All the actions of universe gets contained in the Knowledge.) (Gita-4/33).<br />
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पांडव।<br />
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि।।4/35<br />
(जिसको जानकर फिर (तू) इसप्रकार मोहको प्राप्त नहीं होगा। और हे अर्जुन! जिस ज्ञानके द्वारा (तू) संपूर्ण प्राणिओंको अपनेमें ओर मुझमें भी देखेगा।)<br />
अपि चेदसि पापेभ्य: सर्वेभ्य: पापकृतम्।<br />
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि।। (Gita-4/36)<br />
(यदि (तूने) सब पापीयोंसे भी अधिक पाप किये हुए है, (फिर भी तूने अगर विवेक) ज्ञान (आत्मसात किया है तो) उसकी नौकाद्वारा नि:संदेह तू (जन्म और मृत्युरुप) संतापों के समुद्र को भलीभाँति तर जायेगा।)(Gita-4/36).<br />
(Even if you are having committed sins more than all other sinners, (yet) if you have assimilated Knowledge (of Discernment), then doubtlessly you shall well transcend the ocean of affliction (of birth and death) by the raft of Knowledge. (Gita-4/36).<br />
यथैधांसि समिद्धोअग्निभॅस्मसात्कुरुतेअर्जुन।<br />
ज्ञानाग्नि: सवॅकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।। (Gita-4/37).<br />
(हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंन्धनों को भस्मीभूत कर देता है, वैसे ही ज्ञानरुप अग्नि सब कर्मों को भस्मीभूत कर देता है।)(Gita-4/37).<br />
(As the blazing fire turns firewood to ashes, so does the light of Wisdom burns all effects of all sort of actions). (Gita-4/37).<br />
नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।<br />
तत्स्वयं योगसंसिद्ध: कालेनात्मनि विन्दति।। 4/38<br />
(इस संसारमें ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला नि:संदेह (कुछ भी) नहीं है। उस ज्ञानको समय जानेपर योगको सिद्ध किया हुआ तू अपने-आप, अपनेमें ही पा लेता है।)<br />
श्रद्धावांल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।<br />
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।। (Gita-4/39)<br />
(जो श्रद्धावान, तत्पर, जितेन्द्रिय है वह ज्ञान को प्राप्त होता है; ज्ञान को प्राप्त होकर तत्काल ही परम शांति को उपलब्ध हो जाता है।) (Gita-4/39)<br />
(One who is full of faith, assiduous, who has won over the senses, obtains the wisdom; having obtained the wisdom, he instantly avails to the supreme Peace) (Gita-4/39).<br />
अज्ञचाश्रद्धानश्च संशयात्मा विनश्यति।<br />
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मन:।।(Gita-4/40).<br />
(अज्ञानी, श्रद्धारहित, संशययुक्त मनुष्य नष्ट हो जाता है; संशययुक्त मनुष्य के लिए न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है।)(Gita-4/40).<br />
(One who is ignorant, faithless and doubting man, gets perished; one who is doubting man, doesn’t have this world, nor that beyond, nor the happiness). (Gita-4/40).<br />
संन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।<br />
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रुहि सुनिश्चितम्।।5/1<br />
ज्ञेय: स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न कांक्षति।<br />
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते।। (Gita-5/3)<br />
(हे महाबाहो! जो पुरुष (अनायास जो कुछ प्राप्त होता है,) न (उसका) तिरस्कार करता है (और) (जो उसे प्राप्त नहीं हो रहा है,) न ही (उसकी) आकांक्षा करता है, उसको सदा संन्यासी ही जानने योग्य है; क्योंकि राग-द्वेषादि द्वन्दों से रहित पुरुष सुखपूर्वक (जन्म और मृत्यु के चक्र से) मुक्त हो जाता है।) (Gita-5/3)<br />
(O Strong Man! One who is not loathing (what has effortlessly come to him and) is not expecting (what he has not materialized), he is always to be understood as a hermit; because a man free from all dualities, easily gets liberated (from the cycle of birth and death.) (Gita-5/3).<br />
सांख्ययोगौ पृथग्बाला: प्रवदन्ति न पण्डिता:। 5/4<br />
सांख्ययोगौ पृथग्बाला: प्रवदन्ति न पण्डिता:।<br />
एकमप्यास्थित: सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।।5/4<br />
यत्सांख्ये: प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।<br />
एकं सांख्यं च योगं च य: पश्यति स पश्यति।।5/5<br />
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्।<br />
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्।। 5/8-9<br />
न कर्तृत्व न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु:।<br />
न कमॅफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवतॅते।। 5/14.<br />
(परमेश्वर मनुष्योंके न तो कर्मकरनेकी चाह या कर्मकरनेकी शक्तिको, न मनुष्यके कर्मोंकी और न हि मनुष्यके कर्मोंके कर्मफलके संयोगकी रचना करते है, (किंतु यह सब मनुष्यके पूर्व जन्मोंके कर्मोंसे निर्मित) स्वभावके मुताबिक़ ही हो रहा है)<br />
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभु:।<br />
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तव:।। 5/15<br />
(सर्वव्यापी परमेश्वर न किसीके पापकर्मको और न (किसीके) शुभकर्मको ही ग्रहण करते है; (किंतु) अज्ञानके द्वारा (लोगोंका) ज्ञान ढका हुआ है, उसीसे सब अज्ञानी मनुष्य (प्रभु यह ग्रहण करते है ऐसा) भ्रमित हो रहे है।)<br />
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मन:।<br />
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्।। (Gita-5/16)<br />
(लेकिन आत्मज्ञानके द्वारा जिनका वह अज्ञान नष्ट हो गया है, उनका सूर्यके समान प्रकाशमान वह ज्ञान उस महात्माको प्रबुद्ध कर देता है।) (Gita-5/16)<br />
(But whose the said Ignorance has been destroyed by the Self-Knowledge, their said Knowledge as bright as the light of Sun, enlightens that erudite.) (Gita-5/16).<br />
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तम:।<br />
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।। 10/11<br />
(उनके (उपर) अनुग्रह करनेके लिये उनके अंत:करणमें स्थितहुआ मैं स्वयं ही (उनके) अज्ञानजनित अंधकारको प्रकाशमयतत्त्वज्ञानरुप दीपकके द्वारा नष्ट कर देता हूँ ).<br />
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणा:।<br />
गच्छन्त्यपुनरावृतिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषा:।। 5/17<br />
(जो आप प्रभुमय हुआ है, जीसकी बुद्धि प्रभुमय हुइ है, जीसकी निष्ठा प्रभुमय हुइ है, वह प्रभुमय पुरुष ज्ञानके द्वारा पापरहित होकर जन्म-मरणके चक्रसे मूक्त हो जाता है।)<br />
इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:।<br />
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिता:।। (Gita-5/19)<br />
(जिनके मन समत्व में स्थित है, उन्होंने इस जिवित अवस्थामें ही प्रकृतिपर विजय पा लिया है।क्योंकि वे परमात्मा के समान निर्दोष है, इसलिये वे परमात्मामें (एकीभूत होकर) स्थित है।).(Gita-5/19)<br />
[Those whose mind is firmly established in the Equanimity, have indeed won over the Nature in this life itself. Because they are as innocent as Parmatma, therefore they are abiding in Parmatma (by becoming one with Him)](Gita-5/19).<br />
न प्रह्रष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्।<br />
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थित:।।(Gita- 5/20)<br />
(प्रियको प्राप्त होकर जो हर्षित न हो और अप्रियको प्राप्त होकर जो उद्विग्न न हो (वह) स्थितप्रज्ञ, ज्ञानी और ब्रह्मवेत्ता पुरुष (है और वह सहज ही) ब्रह्ममें ही स्थायी रहता है।)<br />
[A person who neither rejoices upon achieving something pleasant nor laments upon achieving something unpleasant, is a resolute, a disillusioned and a man who has Realised Parmatma; (and he inherently) remains abiding in Parmatma (God)](Gita-5/20).<br />
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।<br />
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते।। 5/21<br />
(बहारके विषयोंमें आसक्तिरहित अंत:करणवाला साधकआत्मामें जो (ध्यानजनित सात्विक) आनंद है, उसको प्राप्तहोता है, (तदन्तर) वह परमात्माके ध्यानरुप योगमेंअभिन्नभावसे स्थित पुरुष अक्षय आनंदका अनुभव करता है।)<br />
ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते।<br />
आद्धन्तवन्त: कौन्त्य न तेषु रमते बुध:।। (Gita-5/22).<br />
(Gita-5/22).<br />
(हे अर्जुन! विषयोंके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले जो भोगों है, वे आदि और अंतवाले होने के कारण नि:संदेह दु:ख के कारणभूत हैं, इसलिये विवेकी पुरुष उनमें रममाण नहीं होता). (Gita-5/22).<br />
(O Arjun! As the pleasures born from the sense organs’ contacts with the subjects are having beginning and the end, they are verily sources of sufferings only, therefore a man with Knowledge of Discernment doesn’t indulge in them)(Gita-5/22).<br />
शक्नोतीहैव य: सोढुं प्राकशरीरविमोक्षणात्।<br />
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्त्त: स सुखी नर:।।<br />
(Gita-5/23)<br />
(इस शरीर से मुक्त होने से पहेले ही, यहाँ (पृथ्वी पर) ही जो काम और क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले आवेग पर विजय पाने में समर्थ हो जाता है, वह पुरुष योगी है और वही सुखी है।) (Gita-5/23).<br />
(Before being liberated from the body, if one becomes able here (on earth) itself, to overcome the propulsive force arising from lust and anger, then he is Yogi and he is a happy man.)(Gita-5/23).<br />
योऽन्त: सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव य:।<br />
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति।। 5/24<br />
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यां श्चक्षु श्चैवान्तरे भ्रुवो:।<br />
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ।। 5/27<br />
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायण:।<br />
विगतेच्छाभयक्रोधो य: सदा मूक्त एव च।। 5/28<br />
(बाहरके विषयभोगोंको (न चिंतन करता हुआ) बाहर हि निकालकर और नेत्रोंकी दृष्टिको भृकुटिके बिचमें (स्थत करके तथा) नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि जीती हुई है, (ऐसा) जो मोक्षपरायण मुनी इच्छा, भय और क्रोधसे रहित हो गया हा, वह सदा मूक्त ही है।)<br />
अनाश्रित: कर्मफलं कार्यं कर्म करोति य:।<br />
स सन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रिय:।। 6/1<br />
(जो पुरुष कर्मफलका आश्रय न लेकर करने योग्य कर्मकरता है, वह संन्यासी तथा योगी है; केवल अग्निका त्यागकरनेवाला (संन्यासी) नहीं है तथा केवल क्रियाओंका त्यागकरनेवाला (योगी) नहीं है।)<br />
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।<br />
न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन।।6/2<br />
(हे अर्जुन जिसको संन्यास ऐसा कहते है, उसीको तु योगजान। क्योंकि संकल्पोंका त्याग न करनेवाला कोईभी पुरुषयोगी नहीं होता)<br />
(Know, Arjun, that what man call renunciation is the authentic yoga; for without renouncing all volitions, none can become Yogi.)<br />
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।<br />
योगारुढस्य तस्यैव शम: कारणमुच्यते।। (Gita-6/3)<br />
(योगमें आरूढ़ हो रहे मुनी के लिये कर्म हेतु कहा गया है, वही योगारुढ का समत्व हेतु कहा गया है।) (Gita-6/3)<br />
(For the Sage advancing in yoga, action is the mean, the equanimity is the mean for the one who has already established in yoga.) (Gita-6/3).<br />
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।<br />
सर्वसंकल्पसन्न्यासी योगारुढस्तदोच्यते।। 6/4<br />
(जीस कालमें (पुरुष)न तो इन्द्रियोंके भोगोंमें और न कर्मोंमें ही आसक्त होता है, उस कालमें सर्वसंकल्पोंका त्यागी पुरुष योगारुढ कहा जाता है।)<br />
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।<br />
आत्मैव ह्यात्मनो बन्घुरात्मैव रिपुरात्मन:।। (Gita-6/5)<br />
[(साधक को चाहिये कि) अपने द्वारा अपना उद्धार करें, अपनी अवनति न करें; क्योंकि (साधक) आप ही अपना मित्र (या) आप ही अपना शत्रु (बन सकता) है।(Gita: 6/5).<br />
[(A seeker) must help uplift himself and must not degrade himself; because he can (either) become friend to himself (or can) become foe to himself].(Gita: 6/5).<br />
बंधुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जित:।<br />
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।। 6/6<br />
(जेनाथी पोताना वडे पोताना उपर जीत मेलवायेल छे ते पोतेपोतानो मित्रज छे अने (जीत मेलवायेल ) नथी (ते) पोतेपोतानी साथे शत्रुतामां वर्ते छे)<br />
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिर:।<br />
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्।। 6/13<br />
(काया, शिर और गलेको समान एवं अचल रखकर और स्थिर होकर अपनी नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाकर अन्य दिशाओंको न देखता हुआ (ध्यानमें स्थित होवे)<br />
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिर:।<br />
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्।। 6/14<br />
(काया, शिर और गलेको समान एवं अचल रखकर और स्थिर होकर अपनी नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाकर अन्य दिशाओंको न देखता हुआ (ध्यानमें स्थित होवे)<br />
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मषु।<br />
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा।।6/17<br />
(दु:खोका नाश करनेवाला योगतो यथायोगय आहार-विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोगय चेष्टा करनेवालेका (और) यथायोगय सोने तथा जागनेवालेका (ही सिद्ध) होता है।)<br />
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।<br />
नि:स्पृह: सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा।।6/18<br />
(अत्यन्त वशमें किया हुआ चित्त जिस कालमें अपनेमें हि भली भाँति स्थित हो जाता है, उस कालमें सम्पूर्ण भोगोंसे स्पृहा रहित (वह) पुरुष योग युक्त (ध्यानस्थ) है, एसा कहा जाता है।)<br />
यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता।<br />
योगिनो यतचित्तस्य युंजतो योगमात्मन:।। 6/19<br />
(जिस प्रकार वायुरहित स्थानमें स्थित दीपक चलायमान नहींहोता, वैसी ही उपमा नीजस्वरूपके ध्यानमें लगे हुए योगीकेजीते हुए चित्तकी कही गयी है।)<br />
यत्रोपरमते चितं निरुद्धं योगसेवया।<br />
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुषियति।। 6/20<br />
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।<br />
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वत:।। 6/21<br />
(इन्द्रियोंसे अतीत (केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म) बुद्धिद्वारा ग्रहणकरने योग्य जो अनन्त आनंद है, उसको जिस अवस्थामेंअनुभव करता है, और जिस अवस्थामें स्थित यह (योगी) परमात्माके स्वरुपसे विचलित नहीं होता (वह ध्यान योग है)<br />
यं लब्धवा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत:।<br />
यस्मिन्स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते।। 6/22<br />
(और जीस लाभको प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा (कुछभीलाभ) नहीं मानता और (ध्यानरुप) जिस अवस्थामें स्थित(योगी) बड़े भारी दु:खसे भी चलायमान नहीं होता)<br />
तं विद्याद्दु:खसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।<br />
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा।। 6/23<br />
(और जो दु:खरुप संसारके संयोगसे रहित है (तथा) जिसकानाम योग है, उसको जानना चाहिये। वह योग न उक्ताये हुएअर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्तसे निश्चयपूर्वक करनाचाहिये।)<br />
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।<br />
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयेन।। 8/8<br />
(हे पार्थ (यह नियम है कि) ध्यानके अभ्यासरुप योगसे युक्तदूसरी और न जानेवाले चित्तसे निरंतन चिंतन करता हुआ(मनुष्य) परम दिव्य पुरुषको अर्थात परमेश्वरको ही प्राप्तहोता है।) 8/8<br />
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।<br />
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते।। 5/21<br />
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।<br />
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे।। 13/24<br />
संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषत:। (Gita-6/24)<br />
[संकल्पसे उत्पन्न होनेवाले सभी कामों को नि:शेषरुपसे त्याग करना (चाहिये)]।) (Gita-6/24)<br />
[One must unexceptionally abandon all actions that are born out of his volition.) (Gita-6/24).<br />
युंजन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मष:।<br />
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।। 6/28<br />
((वह) पापरहित योगी इसप्रकार निरंतर अपनेको अपनेमेंलगाता हुआ सुखपूर्वक ब्रह्म अनुभूतिका अनंत आनंदकाअनुभव करता है)<br />
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।<br />
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन:।।<br />
(Gita-6/29)<br />
(जो सब प्राणिओंको अपनेमें स्थित देखता है और अपनेको सब प्राणिओंमें हि (स्थित देखता है); वही सबको समदृष्टिसे देखने वाला आत्मवेत्ता योगी है।) (Gita-6/29)<br />
(One who perceives all beings as abiding in himself and (perceives) himself (as abiding) in all beings; is a self realized Yogi, looking on all with equanimity). (Gita-6/29)<br />
The self, harmonised by yoga, seeth the Self abiding in all beings, all beings in the Self; everywhere he seeth the same.<br />
यो मां पश्यति सवॅत्र सवॅं च मयि पश्यति।<br />
तस्याहं न प्रणश्यामि स च में न प्रणश्यति।। 6/30<br />
(He who sees me everywhere and sees all in me, he is never felt away from me and I am also never felt away from him).<br />
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थित:।<br />
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते।। (Gita-6/31)<br />
(सब भूतोंमें (मैं) एक हि बसा हुँ, इसतरह जानकर जो मुझको भजता है, वह योगी जो कुछ भी करता हुआ भी मुझमें ही बसता है।) (Gita-6/31).<br />
(Whoever worships me believing as that (I) alone am abiding in all beings; behaving in whatever way yet that Yogi, abides in me only.)(Gita-6/31).<br />
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।<br />
सुखं वा यदि वा दु:खं स योगी परमो मत:।। 6/32<br />
(हे अर्जुन! सुख (प्राप्त होता) हो या दु:ख (प्राप्त होता) हो (फिर भी) जो मनुष्य, जैसे (वह) अपने साथ (वर्तता है) वैसे ही सभी के साथ समभावसे वर्तता है, उस योगीको परम श्रेष्ठ माना गया है।)<br />
[O Arjuna! Though it may be (entailing) happiness or it may be (entailing) suffering, but yet who behaves with everyone with the equanimity, just like as he (behaves) with himself, that Yogi is believed to be the best divine. (Gita-6/32).<br />
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्त: साम्येन मधुसूदन।<br />
एतस्याहं न पश्यामि चंचलत्वात्स्थितिं सथिराम्।।6/33<br />
चंचलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवदृढम्।<br />
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।। 6/34<br />
असंशयं महाबाहो मनो दुनिॅग्रहं चलम्।<br />
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येन च गृह्यते।। 6/35<br />
&#8220;O Arjun! Doubtlessly mind is uncontrollable and wavering, but you can control it by practice and renunciation&#8221;. (Gita-6/35 )<br />
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मति:।<br />
वश्यात्मना तु यतता शक्योअवाप्तुमुपायत:।। 6/36<br />
(जिसका मन वशमें किया हुआ नहीं है, एसे पुरुष द्वारा योगदुष्प्राप्य है और वशमें किये हुए मनवाले प्रयत्नशील पुरुषद्वारासाधनसे (उसका) प्राप्त होना सहज है- यह मेरा मत है।)<br />
न हि कल्याणकृत्कच्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति। 6/40<br />
(क्योंकि हे प्यारे (भगवत्प्राप्तिके लिये) शुभ कर्म करनेवालेकाकोईभी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं होता।)<br />
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वती: समा:।<br />
शुचिनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते। 6/41<br />
(योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानोंके लोकोंको प्राप्त होकर (उनमें) बहुत वर्षोंतक निवास करके (फिर) शुद्ध आचरणवाले श्रीमंत पुरुषोंकेघरमें जन्म लेता है।)<br />
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।<br />
श्रद्धावान्भजन्ते यो मां स मे यक्ततमो मत;।। 6/47<br />
ज्ञानं तेअहं सविज्ञानं इदं वक्ष्याम्यशेषत:।<br />
यज्ज्ञात्वानेह भूयोअन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते।। 7/2<br />
मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।<br />
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्तवत:।। 7/3<br />
भूमिरापोअनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।<br />
अहंकार इतियं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।। (Gita-7/4)<br />
(भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार भी इस प्रकार यह आठ प्रकार की भिन्नता वाली मेरी प्रकृति है।(Gita-7/4)<br />
(The earth, water, fire, air, space, mind, intellect and ego, are parts of my eight folded Nature.) (Gita-7/4 )<br />
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।<br />
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धायॅते जगत।। 7/5<br />
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय।<br />
अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा।। 7/6<br />
(एसा समज कि संपूर्ण भूतों इन दोनों प्रकृतिसे उत्पन्नहोनेवाले है और मैं संपूर्ण जगतका प्रभव तथा प्रलय हूँ(अर्थात संपूर्ण जगतका मूल कारण हूँ ))<br />
मत्त: परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय।<br />
मयि सवॅमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।। 7/7<br />
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्। 7/10<br />
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।। (Gita-7/11)<br />
(हे भरतश्रेष्ठ! जो धर्मका विरोधी नहीं है, वैसा प्राणिओं में रहा काम मैं हि हूँ।) (Gita-7/11)<br />
(O Best among Bharats! I am also the deeds in creatures that are not antagonistic to the righteousness.) (Gita-7/11).<br />
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।<br />
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि। 7/12<br />
(और जो भी सत्त्व, रजस और तमससे उत्पन्न होनेवाले भाव है, उन सबको तू मुझसे ही (होनेवाले हैं) ऐसा जान, परंतु (वास्तवमें) मैं उनमें नहीं हुँ और न वो मुझमें है।)<br />
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभि: सर्वमिदं जगत्।<br />
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्य: परमव्ययम्।। 7/13. (इन तिन प्रकारके गुणोंके भावोंसे सारा संसार मोहित हो रहा है, (इसलिये) इन तीनों गुणोंसे परे मुझ अविनाशीको (कोइ) नहीं जानता।)<br />
दैवी ह्यैषा गुणमयि मम माया दुरत्यया।<br />
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।। 7/14<br />
(क्योंकि यह मेरी त्रिगुणमयी अलौकिक माया (तैरनी) बडी दुस्तर है; (परंतु) जो (पुरुष) मुझको ही भजते है, वे इस मायाको उल्लंघन कर जाते है।)<br />
न मां दुष्कृतिनो मूढ़ा: प्रपद्यन्ते नराधमा:।<br />
माययापह्रतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता:।। (Gita-7/15)<br />
(दुष्कर्म करनेवाले, मूढ़लोग, आसुरी भाववाले (और) नीच मनुष्यों का ज्ञान माया द्वारा हरा जा चूकने के कारण मेरा आश्रय नहीं कर सकते है।)(Gita-7/15).<br />
(The miscreants, grossly foolish, people with demonic nature (and) the vile men, cannot take refuge unto me, because their knowledge happens to be taken away by the illusion)(Gita-7/15).<br />
चतुविॅधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोअर्जुन।<br />
आर्तो जिज्ञासुर्थार्थी ज्ञानी च भरतषॅभ।। (Gita-7/16).<br />
(हे सुकृतिन अर्जुन! चार प्रकारके साधक मुझको भजते है।हे भरतषॅभ (वे) अर्थार्थी, व्यथित, जिज्ञासु और ज्ञानी है) (Gita-7/16).<br />
(O Good Arjuna! Four types of seekers are worshipping me. (They are) money minded, afflicted, inquisitive and sapient.). (Gita-7/16).<br />
ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। 7/18<br />
बहुनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।<br />
वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ ।। (Gita-7/19).<br />
(हे प्रिय मित्र! बहुत जन्मोंके अंत में ज्ञानवान स्वीकार करता है कि “यह सब कुछ परमात्मा ही है”; वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।)(Gita-7/19).<br />
(O dear friend! At the end of many births, the erudite assents that “Everything here is nothing but Parmatma”; the said Mahatma is the rarest.) (Gita-7/19).<br />
कामैस्तेस्तेर्ह्रतज्ञाना: प्रपद्यन्तेऽन्यदेवता:।<br />
तं तं नियममास्थाय प्रकृतिया नियता: स्वया।। (Gita-7/20)<br />
(उनके जन्मजात (अभ्यस्त जड़ता या संस्कार) के अधिन (पैदा हुई) उन उन कामनाके कारण जिसका ज्ञान हरा जा चुका है, वे उस उस नियम का आश्रय लेकर अन्य देवताओं होनेका स्वीकारते है।)(Gita-7/20)<br />
(They, whose wisdom, has been detracted by that each desire, (born) controlled by their inherent (Habitual Inertia or Sanskaar), taking recourse to that each rule, assent the existence of other deities.) (Gita-7/20).<br />
यो यो यां यां तनुं भक्त: श्रद्ध्याचिॅतुमिच्छति।<br />
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्।। 7/21<br />
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धय:।<br />
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।। 7/24<br />
(बुद्धिहीन पुरुषों मेरे अनुत्तम अविनाशी परम भावको न जानते हुए मुझ अव्यक्त परमात्माको (सामान्य) व्यक्ति मान लेते है।)<br />
(The idiot men, not knowing my supreme, imperishable, divine and imperceptible excellence; takes me as a (common) person) (Gita-7/24).<br />
नाहं प्रकाश: सवॅस्य योगमायासमावृत:।<br />
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्। 7/25<br />
(अपनी योगमीयासे छीपा हुआ मैं सबको (परमात्मा रुप) नहीं दिखता हुँ, इसलिये यह मूढलोगों मुझे अजन्मा अविनाशी न (जानकर जन्मने-मरनेवाला) समजते है।) 7/25<br />
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।<br />
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।। (Gita-7/27)<br />
(हे भरतवंशी अर्जुन! राग-द्वेष (आदि द्वैत भावों) के प्रयोग में से उत्पन्न हुई द्वन्द्वरुप मूर्खता के कारण, सब मनुष्यों, इस संसारमें अविद्या को प्राप्त हो जाते है।)(Gita-7/27)<br />
[O descendant of Bharat Dynasty! All the people in this world are made to avail to Ignorance, owing to the foolishness of duality, produced from the usage of attachment and hatred (etc dual aspects)] (Gita-7/27).<br />
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।l<br />
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां द्रढव्रता:।। (Gita-7/28)<br />
[जिन लोगोंका पाप-पुण्यरुप कर्मों (मानने के द्वन्द्वों) का अंत हो ही गया है; वे द्वन्द्वरुप अज्ञानता से मुक्त हुए दृढ़व्रत लोगों सहज ही मुझको भज रहे है।] (Gita-7/28)<br />
[The people whose (duality of believing) sinful-pious actions has indeed come to an end, those resolute people that are freed from the foolishness of duality, are inherently worshipping me]. (Gita-7/28).<br />
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।<br />
ते ब्रह्म तद्विदु: कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्।। 7/29<br />
(जो मेरे शरण होकर ज़रा और मरणसे छूटनेके लिये यत्न करते है, वे (पुरुष) ब्रह्मको, संपूर्ण अध्यात्मको तथा संपूर्ण कर्मको जानते है।)<br />
किं तद्ब्रहम किमध्यात्मं किं कमॅ पुरुषोत्तम।<br />
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते।। 8/1<br />
अधियज्ञ: कथं कोअत्र देहेस्मिन्मधुसूदन।<br />
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोअसि नियतात्मभि:।।,8/2<br />
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोअध्यात्ममुच्यते।<br />
भूतभावोद्भवकरो विसगॅ: कमॅसंज्ञित:।। 8/3<br />
(जो परम अक्षर है वह ब्रह्म है, अपना स्वभाव अध्यात्म कहाजाता है।भूतोंके भावको उत्पन्न करनेवाली चेष्टाओं कर्मनामसे कही गई है। )<br />
भूतभावोद्भवकरो विसगॅ: कमॅसंज्ञित:।। (Gita-8/3)<br />
[(कार्यमें उर्जाके) जिस त्यागसे मनुष्य में (द्वैत)<br />
भावका उद्भव हो जाता है, (केवल उस कार्य) को कर्म नामसे कहा गया है।](Gita-8/3).<br />
[The discharge (of energy in a deed) that creates (dualistic) attribute in a man, (that deed only) is said to have been named as an action].(Gita-8/3).<br />
स्वभावोअध्यात्ममुच्यते। (Gita8/3) (स्वभाव को ही अध्यात्म कहा गया है।) (Gita8/3). (The own state of Being is called to be the spirituality.) (Gita8/3).<br />
अधिभूतं क्षरो भाव: पुरुषश्चधिदैवतम्।<br />
अधियज्ञोअहमेवात्र देहे देहभृतां वर।। 8/4<br />
(उत्पत्ति-विनाश धर्मवाले सब पदार्थ अधिभूत है, हिरण्यमयपुरुष अधिदैव है और हे अर्जुन इस शरीरमें मैं ही अधियज्ञ हूँ।)<br />
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।<br />
य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय:।। 8/5<br />
(And whoever, at the end of his life span, when leaving body; remembers me alone, he attains my own being; of this there is no doubt).<br />
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यज्यन्ते कलेवरम्।<br />
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित:।। 8/6<br />
(Whatever state of being he remembers, at the time of abandoning body; that state he attains, being ever assumed to be in that being).<br />
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।<br />
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्।। 8/7<br />
(इसलिये सब समयमें मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। (इसप्रकार) मुझमें अर्पण किये मन-बुद्धिसे युक्त तु नि:संदेह मुझको ही प्राप्त होगा). “Therefore you must always engage yourself in remembering me and perform your duty of fighting (as per your Swadhrama). Thus by dedicating your mind and intellect to me, you shall doubtlessly attain me” (Gita-8/7.)<br />
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।<br />
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयेन।। 8/8<br />
(हे पार्थ (यह नियम है कि) ध्यानके अभ्यासरुप योगसे युक्त दूसरी और न जानेवाले चित्तसे निरंतन चिंतन करता हुआ(मनुष्य) परम दिव्य पुरुषको अर्थात परमेश्वरको ही प्राप्तहोता है।)<br />
आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावतिॅनोअर्जुन।<br />
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।। (Gita-8/16)<br />
(हे अर्जुन! ब्रह्मलोक पर्यन्त सब लोक (का मिल जाना भी) पुनर्जन्म ही देता है, हे कौन्तेय! मुझको जान लेने से ही पुनर्जन्म नहीं होता है।) (Gita-8/16)<br />
((Attainment of even) all the Lokas, coming to an end with the Brahma Loka, are ensuring rebirth only, only having comprehended me, O Kaunteya! doesn’t entail the rebirth)<br />
(Gita-8/16).<br />
अव्यक्ताद्वयक्तय: सर्वा: प्रभवन्त्यहरागमे।<br />
रात्र्यागमे प्रलियन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके।। 8/18<br />
(दिवस थायछे त्यारे बधां अव्यक्तमांथी व्यक्त थइ जायछे अनेरात्रि आवेछे त्यारे ते अव्यक्त रुपमांज लय पामेछे)<br />
भूतग्राम: स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।<br />
रात्र्यागमेऽवश: पार्थ प्रभवत्यहरागमे।। (Gita-8/19)<br />
(हे पार्थ! वही यह भूतसमुदाय उत्पन्न हो-होकर अवश ही रात्रि होने पर लीन होता है, दिन होनेपर उत्पन्न होता है।) (Gita-8/19)<br />
(O Partha! This multitude of beings, coming into being repeatedly, is helplessly dissolved at the coming of the night, it streams forth at the coming of the day.) (Gita-8/19)<br />
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातन:।<br />
य: स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति।।8/20<br />
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।<br />
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।। 9/1.<br />
(तुज दोष-दृष्टिरहित भक्तके लिये इस परम गोपनीय ज्ञानविज्ञान सहित भली भाँति कहूँगा कि जिसको जानकर तुदुखरुप संसारसे मुक्त हो जायगा।)<br />
अश्रद्धाना: पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप।<br />
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि।।9/3<br />
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।<br />
मतस्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित:।। 9/4<br />
(यह संपूर्ण सरुप जगत मुझ अव्यक्त (परमात्मा) से व्याप्त है। मैं सब प्राणिओंमें स्थित हुँ फीरभी वे मुझमें स्थित नहीं है। )9/4<br />
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।<br />
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावन:।। 9/5<br />
(मेरे योगके ऐश्वर्यको तू देख! भूतोंका धारण-पोषण करनेवाला और भूतोंका उत्पन्न करनेवाला (होनेपर भी) मेरा आत्मा भूतोंमें नहीं है और सब प्राणिओं भी मुझमें नहीं है।)<br />
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।<br />
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्।। 9/7<br />
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।<br />
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेवॅशात्।। 9/8<br />
(अपनी प्रकृतिका समर्थन लेकर, (अपने) संस्कारसे वशिभूत हुए यह संपूर्ण भूतसमुदायको मैं बार बार रचता हुँ।)<br />
न च मां तानि कर्माणि निबन्धन्ति धनंजय।<br />
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु।। 9/9<br />
मयाध्यक्षेण प्रकृति सूयते सचराचरम्।<br />
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवतॅते।। (Gita-9/10)<br />
(हे अर्जुन! मेरे अध्यक्षस्थान में प्रकृति सचराचर सवॅ जगत को रचती है, (और कर्मफल प्रदान करने के) हेतु से ही इस जगत का आवागमनना होता रहता है।)(Gita-9/10)<br />
(O Arjuna! The Nature, under my chairmanship creates the whole movable and immovable universe, and for the purpose of (delivering the Karmafal), this universe is revolving).(Gita-9/10).<br />
अवजानन्ति मां मूढ़ा मानुषीं तनुमाश्रितम्।<br />
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।। 9/11.<br />
(संपूर्ण भूतोंके महान ईश्वरकी मेरी परम सत्ताको न जाननेवाले मूढलोग; मनुष्यका शरीर धारण करनेवाले मुझको तुच्छ समजते है।)<br />
(Not knowing my divine excellence as Maheshwar, as the governing head of all the creatures; the idiots deride me, seeing me assuming a human body). (Gita-9/11).</p>
<p>पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामह:।<br />
वेद्यं पवित्रमोंकार रृकसाम यजुरेव च।।9/17<br />
(इस संपूर्ण जगतका धारण करनेवाला, पिता, माता, पितामह, जाननेयोग्य पवित्र ॐकार ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ ।)<br />
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिता:।<br />
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्।। 9/13<br />
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।<br />
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन।। 9/19<br />
(मैं ही (सूर्यरुपसे) तपाता हूँ, वर्षाको आकर्षता हूँ और उसे बरसाता हूँ। हे अर्जुन मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ और सत-असत भी मैं ही हूँ ।)<br />
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।<br />
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।। 9/22<br />
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।<br />
तदहं भक्त्युपह्रतमश्नामि प्रयतात्मन:।। 9/26<br />
(जो (कोई भक्त) मेरे लिये प्रेमसे पत्र, पुष्प, फल, जलादि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्तका प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह मैं खाता हूँ ।)<br />
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।<br />
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्।।9/27<br />
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनै:।<br />
सन्न्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि।। 9/28<br />
(इस प्रकार जिसमें समस्त कर्म मुजको अर्पण होते है, ऐसे संन्यासयोगसे युक्त चित्तवाला तु शुभाशुभ फलरुप कर्मबन्धनसे मुक्त हो जायेगा (और उनसे) मुक्त होकर मुझको ही प्राप्त होगा) 9/28<br />
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:।<br />
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।। (Gita-9/29)<br />
(मैं सब प्राणियों और पदार्थों के प्रति समान हूँ, मेरा न (किसी से) द्वैष है न (कोई) प्रिय, और यही नहीं उन (सब) में मैं हूँ; परंतु जो लोग भक्तिसे मेरा लक्ष्य रखते है, वे मुझमें है।) (Gita-9/29)।<br />
(I am equal to all creatures and substances, neither my hatred is (to anyone) nor (anyone) is dear, moreover I am in (all of) them; but those who pursue Me with reverence, they are in Me.) (Gita-9/29).<br />
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।<br />
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:।। 9/30<br />
(यदि (कोई) अतिशय दुराचारी भी अनन्यभावसे मुझकोभजता है, तो वह साधु ही माननेयोग्य है, क्योंकि वह यथार्थनिश्चयवाला है।)<br />
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।<br />
कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति।। 9/31<br />
(वह शिघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है (और) सदा रहनेवालीपरमशान्तिको प्राप्त होता है। हे अर्जुन तु निश्चयपूर्वक सत्यजान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।) 9/31<br />
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य ये ऽपि स्यु: पापयोनय:।<br />
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।। 9/32<br />
(क्योंकि हे अर्जुन स्त्रि, वैश्य, शुद्र तथा पापयोनिवाले (चाडालादि) जो कोइ भी हों, वे भी मेरी शरण होकर परम गतिको हि प्राप्त होते है।)<br />
न मे विदु: सुरगणा: प्रभवं न महर्षय:।<br />
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वश:।।10/2<br />
(मेरी उत्पत्तिको न देवतालोग (जानते है और) न महर्षिजनजानते है; क्योंकि मैं सब प्रकारसे देवताओंका औरमहर्षियोंका भी आदि कारण हूँ ।)<br />
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोह: क्षमा सत्यं दम: शम:।<br />
सुखं दु:खं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च।। 10/4<br />
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयश:।<br />
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव प्रृथग्विधा:।। 10/5<br />
(बुद्धि, ज्ञान, असंमूढता, क्षमा, सत्य, इन्द्रियोंका वशमें करना, मनका निग्रह तथा सुख-दु:ख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभयतथा अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, कीर्ति-अपकीर्ति ऐसेये प्राणियोंके नानाप्रकारके भाव मुझसे ही होते है।)<br />
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्त: सर्वं प्रवर्तते।<br />
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भाव समन्विता:।। 10/8<br />
(मैं ही संम्पूर्ण जगतकी उत्पत्तिका कारण हूँ और मुझसेही सब जगत चेष्टा करता है इसप्रकार समझकर श्रद्धा और भक्तिसे युक्त बुद्धिमान भक्तजन मेरेको हि निरन्तर भजते है।)<br />
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।<br />
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च 10/9<br />
तेषां सतत युक्तानां भजतां प्रितिपूवॅकम् ।<br />
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते । 10/10<br />
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तम:।<br />
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।। 10/11<br />
(उनके (उपर) अनुग्रह करनेके लिये उनके अंत:करणमें स्थितहुआ मैं स्वयं ही (उनके) अज्ञानजनित अंधकारको प्रकाशमयतत्त्वज्ञानरुप दीपकके द्वारा नष्ट कर देता हूँ )<br />
“To show my special love to my devotees, I dwelling in their hearts, destroy their darkness born of ignorance with the luminous lamp of Knowledge.” (Gita-10/11).<br />
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।<br />
केषु केषु भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया। 10/17<br />
(हे योगेश्वर ! मैं किस प्रकार निरन्तर चिंतन करता हुआ आपको (ज्ञानमार्ग द्वारा) जानूँ और हे भगवन! (आप) किन किन भावोंमें (भक्तिमार्ग द्वारा) मेरे द्वारा चिन्तन करने योग्य है?)<br />
नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे।। 10/19.<br />
(मेरे विस्तारका अंत नहींहै।)<br />
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित:।<br />
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एवं च।। (Gita-10/20)<br />
(हे गुडाकेश! मैं प्राणिओं के शरीरों में रहा आत्मा हूँ। और तमाम प्राणिओं का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूं।) (Gita-10/20)<br />
(O Gudaakesh! I am the soul that pervades in the bodies of all creatures. I am the beginning, middle and the end of all creatures.) (Gita-10/20)<br />
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना।। 10/22<br />
(इन्द्रियोंमें मैं मन हूँ और प्राणियोंकी चेतना हूँ ।)<br />
गिरामस्म्येकमक्षरम् । 10/25 (शब्दोंमें एक अक्षर अर्थातॐ हूँ )</p>
<p>यम: संयमतांमहम्। 10/29। (शासन करनेवालोंमें यमराजमैं हूँ )<br />
पवन: पवतामस्मि। 10/31 (पवित्र करनेवालोंमें मैं वायु हूँ )<br />
मृत्यु: सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्। 10/34.<br />
(मैं सबका नाश करनेवाला मृत्यु और उत्पन्न होनेवालोंकाकारण हूँ )<br />
ज्ञानं ज्ञानवतामहम्।। 10/38 (ज्ञानवालोंका तत्त्वज्ञान मैं हीहूँ )<br />
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।<br />
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्।।10/39.<br />
(और हे अर्जुन जो सब भूतोंकी उत्पत्तिका कारण है, वह भी मैं(ही हूँ, क्योंकि ऐसा) वह चर और अचर (कोई भी) भूत नहींहै, जो मुझसे रहित हो।)<br />
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।<br />
विष्टाभ्याहमिदं कृत्स्नं एकांशेन स्थितो जगत्।। (Gita-10/42)<br />
(अथवा हे अर्जुन यह सब जान कर तुझे क्या है? (इतना ही जान ले कि) मैं इस संपूर्ण जगतको मेरे एक अंशमात्रसे अधीन करके खड़ा हूँ )(Gita-10/42)<br />
Otherwise o Arjun! Why you need to know all this? (Just try to assimilate that) I am here after restraining this entire universe with the little fraction of Me.)(Gita-10/42)<br />
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम्। 11/1<br />
यत् त्वया उक्तं वच: तेन मोह: अयम् विगत: मम्। (आपने जोवचन कहा उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया है)<br />
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमननेनैव स्वचक्षुसा ।<br />
दिव्यं ददामि ते चक्षु: पश्य मे ययोगमैश्वरम्।। (Gita-11/8)<br />
(परंतु मुझको इन अपने नेत्रोंसे ही नहीं देख सकेगा, इसलिये तुझे दिव्य दृष्टि प्रदान करता हुँ; तू मेरा ऐश्वर्ययुक्त योग को देख।)(Gita-11/8)<br />
(But verily thou art not able to behold Me with these thine eyes; the divine sight I give unto thee. You behold My sovereign Yoga.) (Gita-11/8).<br />
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो।<br />
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्।। 11/4<br />
(हे प्रभो! यदि मेरे द्वारा आपका वह रुप देखा जाना शक्य है, ऐसा आप मानते है, तो हे योगेश्वर आप अपने उस अविनाशी स्वरुपका दर्शन करवाइये।।)<br />
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमननेनैव स्वचक्षुसा ।<br />
दिव्यं ददामि ते चक्षु: पश्य मे योगमैश्वरम्।।(Gita-11/8).<br />
(लेकिन मुझको (तू) केवल अपने इन नेत्रों से ही नहीं देख सकेगा। (इसलिये) मैं तुझे दिव्य दृष्टि देता हूँ, (उससे तू) मेरा योग ऐश्वर्य को देख।)(Gita-11/8)।<br />
(But (you) will not be able to see Me only with your these eyes. (Therefore) I give you divine seeing, (you) behold My mystic opulence (with it.) (Gita-11/8).<br />
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरि:।<br />
दर्शयामास पार्थाय परमं रुपमैश्वरम्।। 11/9<br />
(हे राजन! महायोगेश्वर हरिने इस प्रकार कहकर उसके पश्चात अर्जुनको परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्यस्वरुप दिखलाया।)<br />
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वा:।<br />
दृष्टवाद्भुतं रुपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितंमहात्मन्।। 11/20<br />
यथा प्रदिप्तं ज्वलनं पतंगा: विशन्ति नाशाय समृद्धवेगा:।<br />
तथैव नाशाय विशन्ति लोका: तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगा: ।। 11/29<br />
रृतेअपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे। येऽविस्थिता: प्रत्यनीकेषुयोधा:।। 11/32<br />
(जो प्रतिपक्षयोंकी सेनामें योद्धायें है, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे।)<br />
मयैवैते निहता: पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्। 11/33<br />
(ये सब पहलेहीसे मेरे ही द्वारा मारे हुए है। हे सव्यसाचिन तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा)<br />
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा। (मारा द्वारा हणायेलाने तुंहण गभरा नहि) 11/34<br />
त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्। (जे सत असत तेनाथी परअक्षर(ब्रह्म) छे ते आपज छो) 11/37<br />
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् । (हे अमाप हुं आपनाथी क्षमाकराउ छुं) 11/42<br />
यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूवॅम्। ( जे मारुं (रुप ) तारा सिवायबीजाए पहेला जोयुं नथी) 11/47<br />
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।<br />
ये चाप्यक्षरंव्यक्तं तेषां के योगवित्तमा:।। 12/1<br />
मैय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्त्ता उपासते।<br />
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मता:।। 12/2<br />
(मुझमें मनको एकाग्र करके निरन्तर मेरे भजन-ध्यानमें लगे हुए जो अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धासे युक्त होकर मुझ सगुणरुप परमेश्वर को भजते है, उसको मैं योगियोंमें अति उत्तम योगी मानता हुँ ।)<br />
क्लेशोऽघिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम।<br />
अव्यक्ता हि गतिर्दु:खं देहवद्भिरवाप्यते।। 12/5<br />
(उन निराकारमें चित्तवाले पुरुषों को परिश्रम विशेष है; क्योंकि देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्त विषयक गतिदु:खपूर्वक प्राप्त की जाती है।)<br />
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।।12/6<br />
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।। 12/7<br />
(मेरेको ही अनन्य ध्यानयोगसे जो उपासते है, उसका मैं मृत्युरुप संसारसागरसे उद्धार करने वाला होता हुँ)<br />
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।<br />
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊध्र्वं न संशय:।। 12/8<br />
संतुष्ट: सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चय:।<br />
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्त: स मे प्रिय:।।12/14<br />
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च य:।<br />
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो य: स च मे प्रिय:।।12/15<br />
अनपेक्ष: शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथ:।<br />
सर्वारंभपरित्यागी यो मद्भक्त: स मे प्रिय:। (गीता-12/16.)<br />
(जो पुरुष आकांक्षासे रहित, बहार-भीतरसे शुद्ध, चतुर, पक्षपातसे रहित (साक्षी), सब दु:खोंसे मूक्त, और सब आरंभोंका त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझको प्रिय है।)<br />
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।<br />
एतद्यो वेत्ति तं प्राहु: क्षेत्रज्ञ इति तद्विद:। 13/1<br />
(हे अर्जुन यह शरीर &#8216;क्षेत्र&#8217; इस नाम से कहा जाता है, इसकोजो जानता है, उसको &#8216;क्षेत्रज्ञ&#8217; इस नामसे उनके तत्वकोजाननेवाले ज्ञानीजन कहते है।)<br />
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सवॅक्षेत्रेषु भारत।<br />
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम।। 13/2<br />
महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।<br />
इन्द्रियाणि दशैकं च पंच चेन्द्रियगोचरा:।। 13/5<br />
(पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त (मूल प्रकृति), दश इन्द्रियाँ और एक मन, और पाँच इन्द्रियोंके विषयों (मिलकर 24 तत्त्वोंकी सृष्टि बनती है।)<br />
इच्छा द्वेष: सुखं दुखं संघात श्चेतना धृति:।<br />
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम।।13/6<br />
अमानित्वम् अदम्भित्वम् अहिंसा क्षान्ति: आजॅवम् ।<br />
आचार्योपासनम् शौचम् स्थैयॅम् आत्मविनिग्रह:।। 13/7<br />
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम् अनहंकार एव च।<br />
जन्ममृत्युजराव्याधिदु:खदोषानुदशॅनम्।। 13/8 (जो कुछभी दु:ख आते है वो मेरे दोषके कारण ही आते है इसकावारंवार विचार करना, यह ज्ञानका लक्षण है।)।<br />
असक्ति: अनभिष्वंग: पुत्रदारगृहादिषु।<br />
नित्यं च समचित्तत्वम् इष्टानिष्टोपपतिषु।। 13/9<br />
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणि ।<br />
विविक्तदेशसेवित्वम् अरतिजॅनसंसदि । । 13/10<br />
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम् तत्त्वज्ञानाथॅदशॅनम्।<br />
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तं अज्ञानं यदतोअन्यथा।। (Gita-13/11)<br />
[(यहाँ जो सद्गुणों कहे गये उसको आत्मसात करना) यही ज्ञान है, जो इससे अन्य है उसे अज्ञान कहा जाता है।] (Gita-13/11)<br />
[(The assimilation of virtues stated here) that only is Knowledge, what is other than that is called Ignorance.) (Gita-13/11).<br />
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।<br />
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते । । 13/12<br />
(जे जाणवा योग्यछे अने जेने जाणीने अमृतत्वने प्राप्तथवायछे तेने हुं सारीरीते कहीश ते अनादि ब्रह्मने सत के असतकहेवातुं नथी). 13/12<br />
सर्वत:पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।<br />
सर्वत:श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति।. 13/13<br />
(वह सब और हाथ-पैरवाला सब और नेत्र सिर और मुखवालासब और कानवाला है। (क्योंकि) संसारमें सबको व्याप्तकरके स्थित है।)<br />
बहिरन्तश्च भूतानाम्।।(Gita-13/15)<br />
(सब लोगों के बाहर और भीतर (परमात्मा) व्याप्त है।)(Gita-13/15)<br />
(Without and within all beings He pervades)(Gita-13/15).<br />
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।<br />
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ।। 13/15<br />
(परमात्मा सब प्राणीओंके तथा सब चर-अचर पदार्थोंमें अंदर बाहर और चारों और याप्त है; लेकिन सूक्ष्म होनेके कारण यह अनुभवमें नहीं आनेवाला है.)<br />
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।<br />
भूतभर्तु च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च । । (Gita-13/16)<br />
[हालाँकि (परमात्मा) प्राणिओं और पदार्थों के (ब्रह्मा के रुपमें) उत्पन्न करनेवाले, (विष्णु के रुपमें) धारण-पोषण करनेवाले और (रुद्रके रुपमें) संहार करनेवाले; इस तरह मुख़्तलिफ़ दिखते है, फिरभी (परमात्मा) सब प्राणिओं और पदार्थों में एकरुप ही जानने योग्य है।](Gita-13/16)<br />
[Although (Parmatma) sounds to be manifold as creator (in the form of Brahma), as sustainer (in the form of Vishnu) and as destroyer (in the form of Shiva) of creatures and substances; yet (Parmatma) is to be known as homogeneous in all creatures and substances.]. (Gita-13/16).<br />
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासत:।<br />
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते।।13/18<br />
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धयनादी उभावपि ।<br />
विकारां श्च गुणां श्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्।। 13/19<br />
(प्रकृति अने पुरुष आ बनेने तुं अनादि जाण अने (रागद्वैषादि) विकारो तथा (त्रि) गुणों ने तुं प्रकृतिथी उपजेला जाण)<br />
कायॅकरणकर्तृत्वे हेतु: प्रकृतिरुच्यते ।<br />
पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते । । 13/20<br />
(कायॅ, करण और कर्तृत्व प्रकृतिथी उत्पन्न थायछे सुखदु:खनुंभोक्तापणुं जीवात्माथी उत्पन्न थायछे).<br />
पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुंक्ते प्रकृतिजान्गुणान्<br />
कारणं गुणसंगोअस्य सदसद्योनिजन्मसु । । 13/21<br />
(प्रकृतिमें स्थित ही जीवात्मा प्रकृतिसे उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थोंको भोगता है, और इन गुणोंका संग ही इस जीवात्माके अच्छी-बुरी योनिमें जन्म लेनेका कारण है।)<br />
(One who continues to be a subject to nature, indulges in enjoying the three modes (happiness, pain and infatuation) of nature. And this association (with modes of nature) becomes reason for him to take birth after birth in good or evil species.)<br />
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वर:।<br />
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेसअस्मिन्पुरुष: पर:।। 13/22<br />
&#8220;इस देहमें स्थित जीव, प्रकृति से पर (हो जाने से शुरु में) प्रतिबिंबरुप, (बादमें क्रमश:) अनुमति देनेवाला, भोक्ता, पोषण करनेवाला, महेश्वर और परमात्मा (बन जाता है ऐसा) कहा गया है&#8221;।<br />
&#8220;The (Jiva) in this body that has became independent of Nature, is said to become (initially) reflection, (then becomes) consenter, enjoyer, replenisher, Maheshwar (and then) Parmatma&#8221;.<br />
य एवं वेति पुरुषं प्रकृतिं च गुणै: सह।<br />
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते।। 13/23<br />
(इस प्रकार पुरुषको और गुणोंके सहित प्रकृतिको जो मनुष्यतत्त्वसे जानता है, वह सब प्रकारसे कर्तव्य कर्म करता हुआभी फिर नहिं जन्मता।।)<br />
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।<br />
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे।। 13/24<br />
(कितने ही (मनुष्य) तो अपनेको (शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिसे) ध्यानके द्वारा अपनेमें देखते है।)<br />
अन्ये त्वेवमजानन्त: श्रुत्वान्येभ्य उपासते।<br />
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणा:।। 13/25.<br />
(परंतु (मंद बुद्धिवाले) अन्य पुरुष इस प्रकार न जानते हुए दूसरोंसे सुनकर (तद अनुसार) उपासना करते है और वे श्रवणपरायण पुरुषों भी मृत्युरुप संसारसागरको नि:संन्देह तरजाते है।।)<br />
यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजंगमम्।<br />
क्षेत्र क्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ।। (Gita-13/26)<br />
(हे अर्जुन जो भी, जीतने भी स्थावरजंगम प्राणी अथवा पदार्थ उत्पन्न होते है, उन सबको (तू) क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे (उत्पन्न) जान।)<br />
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।<br />
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं य: पश्यति स पश्यति।। (Gita-13/27)<br />
(नष्ट हो रहे सब प्राणियों और पदार्थों में अविनाशी रहे परमात्मा को जो समभावसे देखता है, वही (यथार्थ) देखता है।) (Gita-13/27)<br />
[One who sees with equanimity, in creatures and substances that are coming to naught, the abiding imperishable Parmatma, that sees (intrinsically)] (Gita-13/27).<br />
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।<br />
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्।। 13/28<br />
( क्योंकि सबमें समभावसे रहे हुए ईश्वरको समान देखता हुआ जो पुरुष अपने द्वारा अपनेको नष्ट नहीं करता, इससे वह परम गतिको प्राप्त होता है।)<br />
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वश:।<br />
य: पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति।। (Gita-13/29).<br />
(और जो पुरुष सब कर्मोंको सब प्रकारसे प्रकृतिसे ही कियेहुए देखता है और अपनेको अकर्ता देखता है, वही यथार्थदेखता है)(Gita-13/29).<br />
&#8220;The person who visualises that all actions are executed by the Nature, and realises himself as non doer, is the real visionary.&#8221; (Gita-13/29.)<br />
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।<br />
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा।। (Gita-13/29.)<br />
[जब (मनुष्य) पृथक महाभूतों हि (शरीरों, पदार्थों, आदि रुपों में) एकत्र होकर स्थित है; और उन (पृथक महाभूतों) से हि (इस सृष्टिका) विस्तार है; ऐसा विवेकसे समझ लेता है; उसी क्षण (वह) ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।] (Gita-13/29.)<br />
(When a man perceives with discernment that the diversified basic elements are rooted in one (body or substance), and (also perceives this creation as) proceeding from them, then at that very moment he becomes one with the Brahmn.) (Gita-13/29.)<br />
पश्य भूतविकारांस्त्वं भूतमात्रान् यथाथॅतः ।<br />
तत्क्षणाद्बन्धनिमुॅक्तः स्वरुपस्थो भविष्यसि । (अष्टावक्र संहिता-9/7)<br />
(जब तुम यथार्थरुप से यह समझ पाओगे कि; तमाम प्राणिओं और पदार्थों और कुछ भी नहीं बल्कि मूलभूत तत्त्वों का रुपांतरन हि है; उसी क्षण तुम बंधन से मूक्त होकर अपने नीज स्वरुप में स्थित हो जाओगे।)(अष्टावक्र संहिता-9/7)<br />
(If you would just realize that all the creatures and substances are nothing but the transformations of the basic elements only, then at that very moment you would be freed from all the bonds and would get established in your own Being. )(Ashtaavakra Sanhita-9/7)<br />
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्यय:।<br />
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।। (Gita-13/31)<br />
(हे अर्जुन! अनादि होनेसे और निर्गुण होनेसे यह अविनाशी परमात्मा शरीरमें स्थित होनेपर भी न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है।). (Gita-13/31)<br />
(Being beginningless and being without attributes, the imperishable Parmatma, though seated in the body, O Kaunteya, He neither works nor gets smeared). (Gita-13/31)<br />
यथा सवॅगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।<br />
सवॅत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते।। 13/32<br />
(जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होनेके कारण लिप्तनहीं होता, वैसे ही देहमें सर्वत्र स्थित आत्मा (निर्गुण होनेकेकारण देहके गुणोंसे) लिप्त नहीं होता)<br />
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानच़क्षुषा।<br />
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्।। 13/34<br />
(इसप्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके भेदको तथा विकार सहित प्रकृतिसे मूक्ति पानेके उपायको जो ज्ञानरुप नेत्रोंसे जानते है, वे परब्रह्मको प्राप्त होते है।)<br />
परं भूय: प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।<br />
यज्ज्ञात्वा मुनय: सर्वे परां सिद्धिमितो गता:।। 14/1<br />
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागता:।<br />
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च।। 14/2<br />
मम योनिमॅहद्ब्रह्म तस्मिन्गभॅं दधाम्यहम् ।<br />
संभव: सवॅभूतानां ततो भवति भारत।। 14/3<br />
(आ समग्र ब्रह्मांडरुप हुं प्रकृतिनुं जन्म स्थान छुं जेमां हुं गभॅमूकूछुं जेमांथी सवॅ भूतोनी उत्पत्ति शक्य थायछे ) 14/3<br />
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तय: सम्भवन्ति या:।<br />
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रद: पिता।। 14/4<br />
(हे अर्जुन! सब योनियोंमें जो प्राणी पेदा होते है, उन सबकी योनितो प्रकृति और पुरुष हि है; और मैं बीजको स्थापन करनेवाला पिता हुँ ।)<br />
सत्वं रजस्तम इति गुणा: प्रकृतिसंभवाः ।<br />
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम।। 14/5<br />
(हे अर्जुन सत्व रज और तम यह प्रकृतिसे उत्तपन्न (तीनों) गुणों जीवको शाश्वत काल तक शरीरसे बाँधते है।). 14/5<br />
सत्वं सुखे संजयति रजः कमॅणि भारत ।<br />
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत।। 14/9<br />
सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।<br />
प्रमादमोहौ तमसो भवतोअज्ञानमेव च।। 14/17<br />
नान्यं गुणेभ्य: कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।<br />
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति।। (Gita-14/19)<br />
(जिस समय द्रष्टा (प्रकृति के) गुणोंके अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है, और (अपनेको उस) गुणोंसे अत्यंत परे हुआ महेसूस करता है, (उसी समय) वह मेरे स्वरुपको प्राप्त हो जाता है।)(Gita-14/19)<br />
(When the Witness, realises that there is no doer other than the Gunas (of the Nature), and perceives (Himself) as having transcended (the said) Gunas, he at once attains the Being of Mine.) (Gita-14/19).<br />
गुणानेतानतित्य त्रिन्देही देहसमुद्भवान्।<br />
जन्ममृत्युजरादु:खैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते।। 14/20.<br />
(तथा जो पुरुष यह स्थूल शरीरकी उत्पत्तिके कारणरूप इनतीनों गुणोंका अतिक्रमण करता है (वह) जन्म, मृत्यु , वृद्धावस्था, और सब प्रकारके दु:खोंसे मुक्त हुआ परमानंद(अमृत) को प्राप्त होता है।)<br />
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पांडव।<br />
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि कांक्षति।। 14/22<br />
(हे अर्जुन सत्वगुण के कार्यरुप प्रकाश को और रजोगुण के कार्यरुप प्रवृत्ति को तथा तमोगुण के कार्यरुप मोह को भी न तो प्रवृत्त होनेपर द्वेष करता है और न निवृत्त होनेपर उनकी आकांक्षा करता है। वह गुणातीत है)<br />
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।<br />
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेंगते।। 14/23<br />
(गुणों ही (कर्ता के रुप में) बरत रहे है, ऐसा (आत्मसात होने से) जो गुणों से विचलित नहीं होता है; और जो साक्षीके सदृश स्थिर बैठा है, और डोलायमान नहीं होता (वह गुणातीत कहा जाता है।)<br />
सर्वारंभपरित्यागी गुणातीत: स उच्यते। -14/25<br />
&#8220;When one shuns all the initiations, he transcends all the three modes of Nature&#8221;.<br />
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।<br />
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते।।14/26<br />
(और जो पुरुष एकनिष्ठ भक्तियोगके द्वारा मुझको निरंतर अनुसरता है, वह इन तीनों गुणोंको भलीभाँति लाँघकर ब्रह्म होनेको योग्य बनता है।)<br />
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।<br />
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च।। 14/27.<br />
(क्योंकि हे अर्जुन उस अविनाशी परब्रह्मका और अमृतका तथा नित्य-धर्मका और अखंड एकरस आनंदका आश्रय मैं हुँ।)<br />
ऊध्वॅमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।<br />
छन्दासि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।। 15/1<br />
((संचित कर्मरूप) उपर मूलवाला, (तदानुसार प्रवृत्तिरूप) नीचे शाखायेंवाला और (संस्काररुप) पर्णों जिसको आच्छादित करते है, उस पीपलके वृक्ष (जन्म-मरण चक्र) को अविनाशी कहते है। जो इसको जानता है वह वेदके ज्ञानको जाननेवाला है।) 15/1<br />
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवाला:।<br />
अधश्च मूलान्यनुसंततानि कर्मानुबंधीनि मनुष्य लोके।। 15/2<br />
(त्रिगुणात्मक (पदार्थोंको भोगने)से विकसित इसकी विषयोंरुप कोंपलों और शाखायें उपर-नीचे फैली हुई है और कर्मानुसार बंधनवाली (आगामी कर्मरूप) जड़े नीचे मनुष्य लोकमें भी व्याप्त हो रही है।)<br />
निर्मानमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामा:।<br />
द्वन्द्वैर्विमुक्ता: सुखदु:खसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढा: पदमव्ययं तत्।। 15/5.<br />
(जिसका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्तिरुपदोषको जीत लिया है, जिनकी परमात्माके स्वरुपमें नित्यस्थिति है (और) जिनकी कामनाएँ पूर्णरुपसे नष्ट हो गयी है (वे) सुखदु:खनामक द्वन्द्वोसे विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परमपदको प्राप्त होते है (जहाँ गये हुए लोग वापस नहीं लोटते)।<br />
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।<br />
मन: षष्ठनीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।। 15/7.<br />
(देहमें रहा (और) प्रकृतिके आधिन हुआ, मेराही सनातन अंशजीवात्माको मन और पाँचों इन्द्रियों (विषयोंमें) खिंचती है।)<br />
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।<br />
गृहीत्वैतानि संयाति वायुगॅन्धानिवाशयात्। 15/8<br />
(जे प्रमाणे वायु गंधने (तेना) स्थानथी (लइजायछे) (तेरीते) सूक्ष्मशरीर पण जे शरीर छोडीदेछे (तेमांथी) आ (मन अनेपाँच इन्द्रियो) ने ग्रहण करीने पछी जे शरीरने प्राप्त थायछे(तेमां) जायछे ) 15/8<br />
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।<br />
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते।। 15/9<br />
(और (दूसरे शरीरमें जाकर) यह जीवात्मा श्रोत्र, चक्षु, त्वचा, रसना और घ्राण और मनका आश्रय करके ही विषयोंकासेवन करता है।)<br />
“This individual, through the mind, perceives the subject with the help of ear, eye, skin, tongue and nose” (Gita-15/9).<br />
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुंजानं वा गुणान्वितम्।<br />
विमुढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानच़क्षुष:।। 15/10<br />
(शरीरको छोड़कर जाते हुएको अथवा शरीरमें स्थित हुएको अथवा विषयोंको भोगते हुएको (इस प्रकार तीनों) गुणोंसे युक्त हुएको भी अज्ञान (निद्रा वाले) लोग नहीं जानते, (केवल) (जिसकी अज्ञान निद्रा दूर हुई है ऐसे) ज्ञानरुप नेत्रोंवाले तत्त्वसे जानते है।)<br />
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।<br />
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतस:।। (Gita-15/11)<br />
(यत्न करनेवाले (विवेकज्ञानी) योगीयों भी, भीतर “अपने होने” में स्थित होकर ही इस (आत्मा) का एहसास कर सकते है।लेकिन (बहार की दुनिया में) यत्न करनेवाले बिन आत्मसाक्षात्कार किये अविवेकी लोग, इस (आत्मा) का एहसास नहीं कर सकते)। (Gita-15/11)<br />
(Even persevering (erudite) Yogis can realize that (Atmaa) only by being established innerly in one’s “Own Being”. But (others) persevering (in the outer world), the imprudent who have not self-realized cannot realize that (Atmaa). (Gita-15/11).<br />
सर्वस्य चाहं ह्रदि सन्निविष्टो मत: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।15/15<br />
उत्तम: पुरुषस्त्वन्य: परमात्मेत्युदाह्रत:।<br />
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वर:।। 15/17<br />
( उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो तीनों लोकोंमें प्रवेश करकेसबका धारण पोषण करता है (वह) अविनाशी ईश्वर कोपरमात्मा इस प्रकार कहा गया है। 15/17)<br />
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।<br />
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत।।15/20<br />
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।<br />
अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहैुतुकम्।।<br />
(ते (आसूरी माणसो) कहेछे जगत आश्रयरहित जूठूं इश्वरवगरनुं पोतानी मेले अकस्मातथी थयेलुंछे माटे केवल भोगसिवाय बीजो शुं हेतु होय? 16/8<br />
आशापाशशतैर्बद्धा: कामक्रोधपरायणा:।<br />
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान्।।16/12<br />
(आशाकी सैंकड़ों फाँसियोंसे बँधे हुए (आसुरि) मनुष्य काम-क्रोधके परायण होकर विषय भोगोंके लिये अन्याय पूर्वकधनादि पदार्थोंको संग्रह करनेकी चेष्टा करते है।)<br />
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।<br />
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।। 16/13<br />
(मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है (और अब) इस मनोरथको प्राप्त कर लूँगा। मेरे पास यह (इतना) धन है (और) फिर यह (इतना धन) भी हो जायगा।)<br />
प्रसक्ता: कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ। 16/16<br />
(विषयभोगोंमें अत्यन्त आसक्त (आसुरलोग) महान अपवित्रनरकमें गिरते है।)<br />
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिता:।<br />
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयका:।। 16/18.<br />
(आसुरि लोग अहंकार, बल, घमंड, कामना (और) क्रोधादिके परायण और दूसरोंकी नींदा करनेवाले पुरुष अपनेऔर दूसरोंके शरीरमें स्थित मुझ अंतर्यामीसे द्वेष करनेवालेहोते है।)<br />
तानहं द्विषत: क्रुरान्संसारेषु नराधमान्।<br />
क्षिपाम्यजस्त्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।। 16/19.<br />
(उन (आसुरि प्रकृतिवालों और) द्वेष करनेवाले पापाचारीऔर क्रुरकर्मी नराधमोंको मैं संसारमें बार-बार आसुरियोनीयोंमें ही डालता हूँ )<br />
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।<br />
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ।। 16/21.<br />
(काम, क्रोध तथा लोभ ये तीन प्रकारके नरकके द्वारअपनेका नाश करनेवाले है। अतएव तीनोंको त्याग देनाचाहिये)<br />
य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत:।<br />
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।। 16/23<br />
(जो पुरुष शास्त्रविधिको त्यागकर अपनी इच्छासे मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धिको प्राप्त होता है, न परम गतिको न सुखको हि)<br />
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तु मिहार्हसि।।16/24.<br />
(इससे तेरे लिये इस कर्तव्य और अकर्तव्यकी व्यवस्थामेंशास्त्रही प्रमाण है। ऐसा जानकर तु शास्त्रविधिसे नियत कर्म ही करने येग्य है।)<br />
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।<br />
सात्विकी राजसी चैव तामसी चेति मां श्रृणु।। 17/2<br />
(मनुष्योंकी वह(शास्त्रीय संस्कारोंसे रहित केवल) स्वभावसे उत्पन्न श्रद्धा सात्त्विकी, राजसी और तामसी ऐसे तीन प्रकारकी ही होती है। उसको तू मुझसे सून)<br />
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।<br />
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्ध: स एव स:। 17/3<br />
(यह (सब) पुरुष श्रद्धामय है। सभी मनुष्योंकी श्रद्धा उनके अंत:करणके अनुरुप होती है। जैसी (जिनकी) श्रद्धा होती है, वह भी वैसा ही होता है।)<br />
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।<br />
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वांगमयं तप उच्यते।। 17/15<br />
(जो उद्वेगरहित, प्रिय, हितकारक, सत्य भाषण है, तथा जो स्वाध्यायका अभ्यास है, वही वाणीसबन्धि तप है।)<br />
मन: प्रसाद: सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रह:।<br />
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते।। 17/16<br />
(मनकी प्रसन्नता, शांतभाव, मौन, अत:करणकी पवित्रता, इसप्रकार यह मनसम्बन्धि तप कहा जाता है।)<br />
यज्ञो दानं तप श्चैव पावनानि मनीषिणाम्।18/5<br />
(क्योंकि यज्ञ, दान और तप ये तीनों ही बुद्धिमान पुरूषोंकोपवित्र करनेवाले है।)<br />
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।<br />
संगं त्यक्त्वा फलं चैव स त्याग: सात्विको मत:।।18/9<br />
(हे अर्जुन! करना कर्तव्य है, इसी भावसे जो शास्त्रविहित कर्म, आसक्ति और फलका त्याग करके किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है।)<br />
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषत:।<br />
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते।। 18/11<br />
(क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्णतासे कर्मोंका त्याग किया जाना शक्य नहीं है; इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है ऐसा कहा जाता है।)<br />
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविघं कर्मण: फलम्।<br />
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्।। 18/12.<br />
(कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंके कर्मोंका अच्छा, बुरा और मिला हुआ ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके पश्चात(अवश्य) होता है, किंतु कर्मफलका त्याग कर देनेवालेमनुष्योंके (कर्मोंका फल) किसी हालमें भी नहीं होता।)<br />
पंचैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।<br />
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्।। 18/13.<br />
(हे महाबाहो! सांख्यशास्त्रमें सबकर्मो संपन्न होकर सिद्धहोनेके लिये यह पाँच कारणों कहे गये है, जीसको मैं (तुझसे) कहूँगा।)<br />
अधिष्ठानं तथा कताॅ करणं च पृथग्विधम्।<br />
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम्।।18/14.<br />
(इसमें आश्रय (अधिष्ठान) तथा कर्ता और भिन्न-भिन्न साधनएवं भिन्न-भिन्न अनेक चेष्टायें तथा पाँचवा दैव (नसीब) है।)<br />
शरीरवांगमनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नर:।<br />
न्याय्यं वा विपरीतं वा पंचैते तस्य हेतव:।।18/15.<br />
(क्योंकि मनुष्य मन, वाणी और शरीरसे शास्त्रानुकुल अथवाविपरीत जो कुछ भी कर्म करता है, उसके ये पाँचो कारण है।)<br />
तत्रैव सति कर्तारमात्मानं केवलं तु य:।<br />
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मति।। 18/16.<br />
(परंतु ऐसा होनेपर भी जो मनुष्य केवल अशुद्धबुद्धि होनेकेकारण वहाँ (यानी कर्मोंके सिद्ध होनेमें) अपनेको कर्तासमझता है वह दुर्मति यथार्थ नहीं समझता।)<br />
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।<br />
हत्वापि च इमॉंल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते।। (Gita-18/17)<br />
(जिस पुरुषको (कार्यों में कर्तापनके) अहंकार का भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि (उस कार्योंमें द्वन्द्वात्मकभाव बनाकर) लिपायमान नहीं होती है, वहपुरुष इन सब लोकोंको मारकर भी (वास्तवमें) न तो किसी को मारता है और न हीं (उस कार्यों के परिणाम से) बँधता है।)(Gita-18/17).<br />
[One who doesn’t have the ego (of doership in the deeds) and whose intelligence is not entangled (in begetting dualistic liaison in the deeds), though he kills all the men in all the worlds, neither he kills nor he is bound (by the outcome of those deeds)] (Gita-18/17).<br />
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।<br />
सत्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभि: स्यात्त्रिभिर्गुणै:।।18/40.<br />
(पृथिवीमें या स्वर्गमें या देवताओंमें तथा इनके सिवा औरकहीं भी (एसा कोई भी) प्राणी नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्नइन तीनों गुणोंसे रहित हो। )<br />
ब्राह्मण़क्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।<br />
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणै:।। 18/41<br />
(हे परंतप! ब्राह्मण़, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके (साधनारुप) कर्म (उस उसके) संस्कारसे उत्पन्न गुणोंके द्वारा विभक्त किये गये है।)<br />
श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।<br />
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।। 18/47<br />
(बहुत (संख्यामें लोकों द्वारा) आचरण किये हुए परधर्मसे (कम संख्यामें लोकों द्वारा आचरण किये हुएके कारण) गुणरहित (दिखता) स्वधर्म बढ़कर है, क्योंकि स्वधर्मरुप कर्म करता हुआ मनुष्य पापको नहीं प्राप्त होता।)<br />
सहजं कर्म कौंन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।<br />
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता:।। 18/48.<br />
(हे कौन्तेय दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मको नहीं त्यागनाचाहिये ; क्योंकि धूएंसे अग्निके भाँति सभी कर्म (कीसी नकीसी) दोषसे युक्त है।)<br />
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहं।<br />
विमुच्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते।। 18/53<br />
ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति।<br />
सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्।। 18/54.<br />
(ब्रह्ममें एकी भावसे स्थित, प्रसन्न मनवाला, न (तो किसीकेलिये) शोक करता है, और न किसीकी आकांक्षा करता है, ऐसा समस्त प्राणियोंमें समभाववाला योगी मेरी परम भक्तिकोप्राप्त हो जाता है।) Gita 18/54<br />
मच्चित्त सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।<br />
अथ चेत्त्वमहंकारेन्न श्रोष्यसि विनंक्ष्यसि।।18/58.<br />
(मुझमें चित्तवाला होकर तु मेरी कृपासे समस्त संकटोंको पारकर जायगा और अगर अहंकारके कारण नहीं सुनेगा तो नष्टहो जायगा।)<br />
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।<br />
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति।। 18/59.<br />
(अगर तु अहंकारका आश्रय लेकर यह मान रहा है कि &#8220;मैं युद्ध नहीं करूँगा&#8221; तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है, क्योंकि प्रकृति तुझे ज़बरदस्ती युद्धमें लगा देगी।)<br />
ईश्वरः सवॅभूतानां हृदेशेअर्जुन तिष्ठति ।<br />
भ्राम्यन्सवॅभूतानि यंन्त्रारुढानि मायया।। 18/61<br />
(हे अर्जुन शरीररुप यंन्त्रमें आरूढ़ हुए संम्पूर्ण प्राणियोंको अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी मायासे (उनके कर्मोंके अनुसार) भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियोंके ह्रदयमें स्थित है।)<br />
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।<br />
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।। 18/62<br />
(हे भारत! सब प्रकारसे उस परमेश्वरकी हि शरणमें जा। उस परमात्माकी कृपासे तू परम शान्तिको तथा शाश्वत परमधामको प्राप्त होगा।)<br />
यथेच्छसि तथा कुरु । 18/63. (जैसे चाहता है वैसे ही कर।)<br />
सर्वगुह्यतमं भूय: श्रृणु मे परमं वच:।<br />
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितं।।18/64<br />
सवॅधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।<br />
अहं त्वा सवॅपापेभ्यो मोक्षयिष्यामिमाशुचः।। 18/66.<br />
(इसलिये सम्पूर्ण आश्रयोंको त्यागकर एक मेरे ही शरणमें आ जा। तू शोक मत कर, क्योंकि मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा।<br />
&#8220;Surrender to me alone shunning the desire for all the shelters, you need not fear, I shall protect you against all hostilities&#8221;.<br />
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।<br />
न चाशुश्रषवे वाच्यं न च मां योअभ्यसूयति।। 18/67.<br />
(तुझे यह गीता उपदेश किसी भी कालमें न (तो) तपरहित मनुष्यसे कहना चाहिये, न भ<br />
(तुझे यह गीता उपदेश किसी भी कालमें न (तो) तपरहितमनुष्यसे कहना चाहिये, न भक्तिरहितसे और न नहीं सुननेकीइच्छावालोंसे ही (कहना चाहिये); तथा जो मुझमें दोषदृष्टिरखता है, उससे (तो कभी भी) नहीं कहना चाहिये।)<br />
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।<br />
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि।।18/69<br />
(उससे बढ़कर मेरा प्रियकार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भीनहीं है; तथा पृथ्वीभरमें उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोईभविष्यमें होगा भी नहीं।<br />
कच्चिदज्ञानसम्मोह: प्रनष्टस्ते धनंजय। 18/72. (हे धनंजय! क्या तेरा अज्ञानजनीत मोह नष्ट हो गया?)<br />
नष्टो मोहः स्मृतिलॅब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।<br />
स्थितोअस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।।18/73.<br />
(हे अच्युत आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया (और) मैनेंस्मृति प्राप्त करली है, मेरा संदेह नष्ट हुआ है, (अब) मैं स्थिरहुआ हूँ और आपकी आज्ञाका पालन करूँगा ।)<br />
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।<br />
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयत: स्वयम्।। 18/75<br />
(श्री व्यासजीकी कृपासे (दिव्य दृष्टि पाकर) मैंने इस परम गोपनीय योगको (अर्जुनके प्रति) कहते हुए स्वयं योगेश्वर भगवान श्री कृष्णसे प्रत्यक्ष सूना है।)<br />
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुधॅरः ।<br />
तत्र श्रीविॅजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिमॅतिमॅम।।18/78.<br />
(हे राजन जहॉं योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहॉंगाण्डीवधारी अर्जुन हैं, वहींपर श्री, विजय, विभूति (और) अचल नीति है ऐसा मेरा मत है।)<br />
हरिः ॐ तत्सत्। हरिः ॐ तत्सत्। हरिः ॐ तत्सत् ।</p>
<p>Acharya Vrujlal</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com/gita/">GITA</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com">VEDA VICHAR</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://vedavichar.com/gita/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>24</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>PATANJAL YOGDARSHAN</title>
		<link>https://vedavichar.com/patanjalyogdarshan/</link>
					<comments>https://vedavichar.com/patanjalyogdarshan/#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Acharya Vrujlal]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 07 Oct 2019 11:41:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[PATANJALYOGDARSHAN]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://vedavichar.com/?p=6085</guid>

					<description><![CDATA[<p>श्री पातंजलयोगदर्शन। योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन। योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां पतंजलिं प्रांजलिरानतोऽस्मि।। (जिसने चित्तका मल योगशास्त्रसे, वाणीका मल (पाणिनिमुनिके सूत्रोंपरके महाभाष्यरुप) पदशास्त्रसे और शरीरके मल चरक नामके...</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com/patanjalyogdarshan/">PATANJAL YOGDARSHAN</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com">VEDA VICHAR</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>श्री पातंजलयोगदर्शन।<br />
योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन।<br />
योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां पतंजलिं प्रांजलिरानतोऽस्मि।।<br />
(जिसने चित्तका मल योगशास्त्रसे, वाणीका मल (पाणिनिमुनिके सूत्रोंपरके महाभाष्यरुप) पदशास्त्रसे और शरीरके मल चरक नामके वैद्यग्रंथसे दूर किये है, वह मुनिओंमें श्रेष्ठ भगवान पतंजलिको मैं दोनों हाथ जोड़कर नमा हुआ हुँ।)<br />
द्वापरमें जन्मे। माता गोणिका और पिता अंगी नामक थे। सूर्यको अंजलि देते हुए हाथसे पुत्र पड़ा इसलिये पतंजलि। जन्मकेबाद तप करने चले गये। महेश्वरके प्रसादसे महाभाष्य, योगसूत्रों, चरकनामक वैद्यशास्त्रकी रचनी की।<br />
दूसरी मान्यतानुसार पाणिनिमुनि उनके पिता थे। और सायंको सूर्यको अर्ध्य देते अंजलिमेंसे सर्पका बच्चा नीचे पड़ा तो पाणिनिमुनि बोले:<br />
पिता: को भवान? की जगह कोर्भवान?<br />
बालक: सर्पोऽहम की जगह सपोहम कहा<br />
पिता: रेफ: कुत्र गत:।<br />
पुत्र: त्वया ह्रृत:।<br />
हिरण्यगर्भो योगस्य वक़्ता नान्य: पुरातन:।।<br />
(योगका पुरातन वक़्ता हिरण्यगर्भ है, अन्य कोइ नहीं।).<br />
वृत्तय: विषयसम्बन्धात् चित्तस्य परिणामविशेषा:।<br />
अथ योगानुशासनम्। (पातंजलयोगदर्शन1/1)<br />
योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:। (पातंजलयोगदर्शन-1/2)<br />
(चित्तकी वृत्तिका (संपूर्ण) निरोध (ही) परमात्मा के साथ एक होना (योग) है।)(पातंजलयोगदर्शन-1/2)।<br />
(The (complete) inhibition of Chittavritti (itself) is becoming one with Parmatma). (Patanjal Yogadarshan-1/2).<br />
तदा द्रष्टु: स्वरुपेऽवस्थानम्।(पातंजलयोगदर्शन-1/3)<br />
((जब चित्त निरुद्ध हो जाता है) तब द्रष्टाकी स्वरुपमें स्थिति (होती है).<br />
वृत्तिसारुप्यमितरत्र। (पातंजलयोगदर्शन-1/4)<br />
((जब चित्त निरुद्ध नहीं होता है तब जीवात्माकी) वृत्तिके साथ एकरूपता प्रतीत होती है।)<br />
वृतय: पंचतय्य: क्लिष्टाक्लिष्टा:।। (पातंजलयोगदर्शन-1/5)(सांख्यशास्त्र-2/33)<br />
(वृतियां पाँच प्रकारकी है, वे क्लिष्ट तथा अक्लिष्टरुप है)<br />
वृत्ति: विषयसम्बन्धात् चित्तस्य परिणाम विशेष:। विषयके साथ संबंध होनेसे चित्तमें जो परिणाम विशेष स्थिति पेदा हो जाती है, उसको वृत्ति कहा जाता है।<br />
प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतय:।।<br />
(पातंजलयोगदर्शन-1/6)<br />
(प्रमाण, विपर्यय (मिथ्याज्ञान), विकल्प, निद्रा और स्मृति (यह वृतियोंके प्रकार है)<br />
विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रुपप्रतिष्ठिम्।।(पातंजलयोगदर्शन-1/8)<br />
(जिस रुपमें प्रथम दिखता है) वैसे ही रुपमें जो (बादमें) नहीं रहता है, (ऐसा) विपर्यय मिथ्याज्ञान है।<br />
शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्प:।।(पातंजलयोगदर्शन-1/9)<br />
(शब्द के ज्ञान परसे इस (द्वैत) का होने का भास उत्पन्न होता है, (लेकिन तुरंत) प्रतीत हो जाता है के ऐसा कुछ भी नहीं है, वह विकल्प (द्वैत) है।) (पातंजलयोगदर्शन-1/9)<br />
[From the phrasing of the words, (the duality) sounds to be, but soon manifests that nothing is like that, it is called Vikalpa (Duality). (Patanjal Yogadarshan-1/9).<br />
अनुभूतविषयासंप्रमोष: स्मृति:।।<br />
(पातंजलयोगदर्शन-1/11)<br />
(विषय की अनुभूति के प्रभाव को (संस्कार के रुप में) ग्रहण करके रखने की क्रिया को स्मृति कहते है।) (पातंजलयोगदर्शन-1/11)<br />
(The act of capturing the impression of experiencing of a subject (in the form of Habitual Inertia or Sanskaar) is called Memory.) (Patanjal Yogadarshan-1/11).<br />
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध:। (पातंजलयोगदर्शन-1/12)<br />
(अभ्यास और वैराग्य से उन<br />
(पाँचो वृतियों)का निरोध होता है।)<br />
(वृतियां इस प्रकार है: प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति)<br />
तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यास:। (पातंजलयोगदर्शन-1/13)<br />
(उस (निरोध) की स्थिति बनी रहे, उसका जो प्रयत्न है, उसको अभ्यास कहते है।)<br />
(वहाँ (स्वस्वरुपमें द्रष्टाकी) स्थिति बनाये रखनेका प्रयत्न अभ्यास है।)<br />
स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारसेवितो द्रढभूमि:।। (पातंजलयोगदर्शन-1/14)<br />
(वह (अभ्यास) तो दीर्घकालतक निरंतर आदरपूर्वक सेवन करनेसे ही द्रढ होता है।)<br />
दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशिकारसंज्ञा वैराग्यम्।। (पातंजलयोगदर्शन-1/15)<br />
(जो दृष्ट और श्रवण (आदि) विषयोंमें (चित्तकी) रागरहित स्थिति है, (उनको और इन्द्रियों पर) वशिकरण जैसी स्थितिको वैराग्य कहते है।)<br />
ईश्वरप्रणिधानाद्वा।। (पातंजलयोगदर्शन-1/23)<br />
(ईश्वरप्रणिधानसे (ईश्वरकी भक्तिविशेषसे) भी (समाधिलाभ तिव्रतासे होता है।)<br />
क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्ट: पुरुषविशेष ईश्वर:।। (पातंजलयोगदर्शन-1/24)<br />
(जीस पुरुषविशेषमें क्लेश (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश), कर्म (धर्माधर्म रुप), विपाक (कर्मफल: जाति, आयुष्य और भोग) और आशय (जिस में संस्कार आश्रित होकर रहता होनेके कारण, जिसको कर्मफल मिलना निश्चित हि है वैसा चित्त) का संसर्ग नहीं है, वह ईश्वर है।)<br />
पूर्वेषामपि गुरु: कालेनानवच्छेदात्।।(पातंजलयोगदर्शन-1/26)<br />
कालसे अनादि होनेके कारण (ईश्वर ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि) पूर्वों के भी गुरु है।<br />
तस्य वाचक: प्रणव:। (पातंजलयोगदर्शन-1/27)<br />
(ॐ वह (ईश्वर)का वाचक (शब्द) है।)<br />
तज्जपस्तदर्थभावनम्। (पातंजलयोगदर्शन-1/28)<br />
(उस (प्रणव) का जप और उसका ध्यान करना (ईश्वर प्रणिधान) है।)<br />
तत: प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च।।((पातंजलयोगदर्शन-1/29)<br />
(वह (प्रणवके जप और ध्यानसे) ब्रह्मका साक्षात्कार और अंतरायोंका अभाव भी होता है।)<br />
मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदु:खपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्। (पातंजलयोगदर्शन-1/33)<br />
(साधकको चाहिये की वह सुखीमें मैत्रीकी, दु:खीमें करुणाकी, पुण्यवानमें हर्षकी और पापीमें उपेक्षाकी भावना करके चित्तकी प्रसन्नता बनाके(चित्तके दोषोंकी निवृत्तिके उपाय करे)।)<br />
विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनस: स्थितिनिबंधिनी।। (पातंजलयोगदर्शन-1/35)<br />
(विषयमें एकाग्र और प्रवृत्तिजनित चित्त स्थितिमें स्थिरता लाता है।)(योग: कर्मेषु कौशलम्।)<br />
यथाभिमतध्यानाद्वा।। (पातंजलयोगदर्शन-1/39)<br />
(अथवा जो इष्टदेव है, उसके ध्यानसे भी (चित्त स्थिर होता है।)<br />
तज्ज: संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धि।। (पातंजलयोगदर्शन-1/50)<br />
(उस (निर्विचारसमाधि) से उत्पन्न संस्कार अन्य (व्युत्थानके) संस्कारका प्रतिबन्धक (होता) है।)<br />
तप: स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग:। (पातंजलयोगदर्शन-2/1)<br />
(तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान वह क्रियायोग है।)<br />
समाधिभावनार्थ: क्लेशतनूकरणार्थश्च।। (पातंजलयोगदर्शन-2/2)<br />
((क्रियायोग) समाधिकी भावनाके लिये तथा क्लेशको शिथिल करनेके लिये है।)<br />
अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशा: पंच क्लेशा:। (पातंजलयोगदर्शन-2/3)<br />
अविद्या, अस्मिता (अहंकारयुक्त बुद्धि), राग, द्वेष और अभिनिवेश (मृत्युका भय) यह पाँच क्लेश है।)<br />
ક્લેશો પોતુોતાની વૃત્તિઓને પામીને દ્દષ્ટાદ્દષ્ટહેતુવડે સત્ત્વાદિ ગુણોના કાર્ય કરવાના સામર્થ્યને બલવાન કરેછે, તથા ઊત્પત્તિના કારણભૂત ગુણોના વિષમપણારુપ પરિણામને સિદ્ધ કરેછે, તેથી મહદાદિરુપ કાર્યકારણરુપ પ્રવાહ ચાલુ થઈ જાય છે, તેથી અવિદ્યાદિનું ક્લેશ એ તાંત્રિક નામ યોગ્ય જ છે.<br />
अनित्याशुचिदु:खानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या।। (पातंजलयोगदर्शन-2/5)<br />
(अनित्य, अपवित्र, दु:ख और अनात्ममें (क्रमानुसार) नित्य, पवित्र, सुख और आत्माकी भावना करनी वह अविद्या है।)<br />
दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता। (पातंजलयोगदर्शन-2/6)<br />
दृग्दर्शनशक्त्यो: एकात्मता इव अस्मिता।<br />
(द्दक् शक्ति (पुरुष, आत्मा) और दर्शन शक्ति (सात्विक अत:करण, बुद्धि) में एकरुपात्मक भ्रांतिको अस्मिता कहते है।)<br />
(दृष्टा (आत्मा) और दृश्य (देह) में (जो) एकरुपात्मक (होनेकी) भ्रांति (दिखती है, उन) को अस्मिता कहते है।)<br />
सुखानुशयी राग:। (पातंजलयोगदर्शन-2/7)<br />
(सुख है ऐसा समजनेवाली (चित्तवृत्ति) राग है।)<br />
ते प्रतिप्रसवहेया: सूक्ष्मा:।।(पातंजलयोगदर्शन-2/10)<br />
जो सूक्ष्म हुए (क्लेशों है, वे (चित्त के) प्रलय द्वारा लय होते है।<br />
ध्यानहेयास्तद्वृत्तय:।।(पातंजलयोगदर्शन-2/11)<br />
उस (क्लेशों) की वृत्तियाँ को ध्यानद्वारा निवृत्त करनी होती है।<br />
क्लेशमूल: कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीय:।। (पातंजलयोगदर्शन-2/12)<br />
(द्वैत हि संस्कारका मूल है जीसे (कर्मफल के रुपमें) इस जन्ममें या बादके जन्मोंमें भुगतना पड़ता है।)<br />
(The duality, is the root cause of Habitual Inertia or Sanskaar, which need to be undergone ( in the form of Karmafal) either in present life or in the future lives).<br />
(Patanjal Yogadarshana-2/12)<br />
सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगा:। (पातंजलयोगदर्शन-2/13)<br />
(अगर (द्वैत रुप) मूल बचता है, तो उसका कर्मफल जाति, आयु और भोग के रुपमें अवश्य है।) (पातंजलयोगदर्शन-2/13)<br />
(If the root (in the form of duality) survives, then there also is its fructification in the form of Specie, Longevity and Usufruct)<br />
(Patanjal Yogadarshana-2/13).<br />
हेयं दु:खमनागतम्।। (पातंजलयोगदर्शन-2/16)<br />
(भविष्यका दु:ख त्याजने योग्य है)<br />
वर्तमान समाधि है, संसार भविष्य है। संसार दु:ख है।<br />
द्रष्टृदृश्ययो: संयोगो हेयहेतु:।। (पातंजलयोगदर्शन-2/17)<br />
(दृष्टा (चित्तस्वभाव) और दृश्य (जगत) का जो (भ्रांतिरुप) संयोग (दिखता) है, वह दु:ख का कारण है।)<br />
प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मक भोगापवर्गार्थं द्दश्यम्।।(पातंजलयोगदर्शन-2/18)<br />
[प्रकाश (सत्त्व), क्रिया (रजस) और स्थिति (तमस) स्वरुप स्वभाववाली दृश्य सृष्टि जो (आकाश, वायु, तेज़, जल और पृथ्वि ऐसे पाँच) भूतों के पदार्थों से और (प्राणिओंके शरीरों व) इन्द्रियों बनी है, वह (अज्ञानी के) भोग के लिए (और ज्ञानी के) मोक्ष के लिए है।] (पातंजलयोगदर्शन-2/18)<br />
[The visible Creation that has inherent nature of Illumination (Sattva), Activity (Rajas) and Inertia (Tamas); which is made of substances of (five) basic elements (sky, air, fire, water and earth) and also of sense organs (and bodies of the animals); is meant for the usufruct (of ignorant) and for the Salvation (of erudite)] (Patanjal Yogadarshan-2/18).<br />
विशेषाविशेषलिंगमात्रालिंगानि गुणपर्वाणि।।(पातंजलयोगदर्शन-2/19)<br />
(विशेषो (विकारों: पाँच महाभूत, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और मन), अविशेषो (पाँच तन्मात्रा और अहंकार), लिंग (महत्तत्त्व), अलिंग (मूल प्रकृति वा माया वा साम्यावस्था), यह सब गुणोंकी अवस्था विशेष ही है।)<br />
द्रष्टा दृशिमात्र: शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्य:।(पातंजलयोगदर्शन-2/20)<br />
[आत्मा चैतन्यरुप ही है। शुद्ध होनेपर भी बुद्धिवृत्ति के साथ साथ वह भी उसे देखता है (ऐसा मान लेता है।)]
[Atmaa itself is Consciousness. Though being absolute, (mistakenly believes that) it also simultaneously sees that what the Intelligence sees]
तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा।।(पातंजलयोगदर्शन-2/21)<br />
उस (द्दृष्टा) के (भोगापवर्ग के) लिए ही द्दश्य (सृष्टि) का स्वरुप है।<br />
कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्।। (पातंजलयोगदर्शन-2/22)<br />
(तत्त्वज्ञानीके प्रति जगत (दृश्य) नष्ट हो जानेपर भी अविद्यायुक्तके प्रति अनष्ट रहता है।)<br />
(જાગીને જોઉંતો જગત દિસે નહી )<br />
स्वस्वामिशक्त्यो: स्वरुपोपलब्धिहेतु: संयोग:।। (पातंजलयोगदर्शन-2/23)<br />
(दृष्टा (पुरुष) और दृश्य (प्रकृति) का (जो) संयोग (जुड़ना दिखता) है, उनका हेतु स्वस्वरुपकी उपलब्धि (मोक्ष प्राप्त) कराना है।)<br />
तस्य हेतुरविद्या।। (पातंजलयोगदर्शन-2/24)<br />
(यह जो दृष्टा (आत्मा) और दृश्य (बुद्धि) का संयोग दिखता है,) उसका कारण अविद्या है।)<br />
तदभावात्संयोगाभावो हानं तद् दृशे: कैवल्यम्।। (पातंजलयोगदर्शन-2/25)<br />
उस (अविद्या) के विनाशसे (भ्रांतिरुप) संयोगकाभी विनाश (होता है)। वही हान (मोक्ष) है और वही पुरुषका कैवल्य भी है।)<br />
विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपाय।। (पातंजलयोगदर्शन-2/26)<br />
(मिथ्याज्ञानरहित विवेकख्यति (से अविद्याका नाश होता है और यही) हान (कैवल्यका) उपाय है।)<br />
योगांगानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदिप्तिराविवेकख्याते:।। (पातंजलयोगदर्शन-2/28)<br />
(योगके (आठ) अंगोके अनुष्ठानसे अशुद्धियोंका क्षय हो जानेसे विवेकख्याति होनेतक ज्ञानका प्रकाश (मार्गदर्शककेरुपमें रहता है।))<br />
वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्।। (पातंजलयोगदर्शन-2/33)<br />
((हिंसादि) ग़लत भावनाओंका अंत लानेके लिये (साधकको करुणादि) विरुद्ध भावनाओंका आश्रय (लेना चाहिये।)).<br />
अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्याग:। (पातंजलयोगदर्शन-2/35)<br />
((साधक योगीके चित्तमें) अहिंसाकी स्थिरता होनेसे (उनकी) समीपमे (प्राणियों अपने स्वाभाविक) वैरका त्याग करते है।)<br />
सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्। (पातंजलयोगदर्शन-2/36)<br />
(साधक योगीके चित्तमें) सत्यकी स्थिरता हो जानेसे क्रियाकी और फलकी (इच्छानुसार परिणाम प्राप्तिका) सामर्थ्य प्राप्त होता है)<br />
देशबंन्धचित्तस्य धारणा। (पातंजलयोगदर्शन-3/1)<br />
(ध्येयदेशमें चित्तकी स्थितिको धारणा कहते है)<br />
स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोग:।। (पातंजलयोगदर्शन-2/44)<br />
(स्वाध्यायसे इष्ट देवताका दर्शन होता है।)<br />
समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात्।। (पातंजलयोगदर्शन-2/45)<br />
(ईश्वरप्रणिधानसे समाधिकी सिद्धि होती है।)<br />
स्थिरसुखमासनम्।। (पातंजलयोगदर्शन-2/46)<br />
(स्थिर है और सुखरुप है, वह आसन है)<br />
प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम्।। (पातंजलयोगदर्शन-2/47)<br />
(प्रयत्नोंकी संपूर्ण सिथिलतासे और अव्यक्तमें चित्तको स्थिर करनेसे (आसन सिद्धि होती है))<br />
ततो द्वन्द्वानभिधात:।। (पातंजलयोगदर्शन-2/48)<br />
((आसन जय होनेसे) द्वन्द्वोसे पराभव नहीं होता।)<br />
तस्मिन सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद प्राणायाम।। (पातंजलयोगदर्शन-2/49)<br />
(उस (आसन) की (स्थिरता) होनेके उपरांत श्वासप्रश्वास गतिका जहाँ विच्छेद होता है ऐसा प्राणायाम (हो सकता) है।)<br />
&#8220;The Pranayama that is regulating the inhale and exhale, happens only if the seeker has won over the Asana&#8221;. (Patanjal Yoga Darshan-2/49).<br />
प्राणामायात् क्षीयते प्रकाशावरणम्।। (पातंजलयोगदर्शन-2/52)<br />
(प्राणायामसे ज्ञानपर जो (अज्ञानरुप) आवरण होता है, वह नष्ट होता है।)<br />
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा।। (पातंजलयोगदर्शन-3/1)<br />
((ध्येयके) देशमें चित्तकी स्थिर स्थितिको धारणा कहते है।)<br />
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्। (पातंजलयोगदर्शन-3/2)<br />
((ध्येयके प्रदेशमें धारणाकी जो स्थिति बनी) उसमें प्रवाह की अविरतताको ध्यान कहते है।)<br />
तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरुपशून्यमिव समाधि:। (पातंजलयोगदर्शन-3/3)<br />
(वह ध्यान जब अपने स्वरुप जैसा न रहकर मात्र ध्येयरुप और प्रकाशरुप हो जाता है, तब वह समाधि कहलाता है।)<br />
[विजातीयवृत्तिच्छिन्ना धारणा। अविच्छिन्नं ध्यानम्। तच्च ध्येयध्यानध्यातृस्फूर्तीमत्। तत् यदा ध्येयमात्रस्फूर्तीमद्भवति तदा स: समाधि। स एव दिर्घकालव्यापी सन् सम्प्रज्ञाताख्यो योग:। स यदा ध्येयस्फूर्तिशून्यो भवति तदा असम्प्रज्ञात इति दिक्।।<br />
त्रयमेकत्र संयम:। (पातंजलयोगदर्शन-3/4)<br />
((जब धारणा, ध्यान और समाधि) तीनों एकत्र (एक ही विषयमें किया जाता है तब वह) संयम कहलाता है।)<br />
व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणाम:।। (पातंजलयोगदर्शन-3/9)<br />
(जिस क्षण व्युत्थान संस्कारका नाश होता है और निरोधसंस्कारका प्रादुर्भाव होता है, उस क्षणको निरोधक्षण कहते है। उस क्षण चित्त असंप्रज्ञातयोग युक्त हो जाताहै, इसको निरोध परिणाम कहते है।)<br />
तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात्।।(पातंजलयोगदर्शन-3/10)<br />
((निरोध) संस्कार (उत्पन्न होने) से उस (चित्त) की स्थिरता संपन्न होती है।)<br />
सर्वार्थतैकाग्रतयो: क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणाम:।। (पातंजलयोगदर्शन-3/11)<br />
(समाधिपरिणाम यह है कि तब चित्तकी सर्वार्थताका (जो मिले उसे ग्रहण करनेकी वृत्तिका) नाश होता है और चित्तकी एकाग्रताका (केवल परमात्माको हि विषय बनानेकी वृत्तिका) उदय होता है।)<br />
तत: पुन: शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणाम:।। (पातंजलयोगदर्शन-3/12)<br />
((चित्तमेंसे अतीतके सब संस्कारोंका नाश होकर) फिरसे अतीत और वर्तमानके चित्तका एक समान (समाधिरुप जैसा) होना एकाग्रता परिणाम है।)<br />
एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याता।। (पातंजलयोगदर्शन-3/13)<br />
इस (पूर्वोक्त प्रतिपादन) से (पाँचो) भूतों में और (दश) इन्द्रियों में धर्मपरिणाम, लक्षणपरिणाम और अवस्थापरिणाम की व्याख्या हो गई।<br />
क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतु:।। (पातंजलयोगदर्शन-3/15)<br />
(भिन्न भिन्न परिणाम परसे भिन्न भिन्न क्रमका बोध मिलता है।)<br />
( क्रमका भिन्न भिन्न होना, वह परिणामके भिन्न भिन्न होनेमें कारणरुप है)<br />
मृत्तिका धर्मीका चूर्ण, पींड, घट आदि स्वरुपमें परिवर्तन होता है, उसको धर्मपरिणाम कहते है.<br />
धर्मपरिणाम परसे अतीत, वर्तमान, अनागतका बोध हो जाता है, उसे लक्षणपरिणाम कहते है।<br />
घट प्रतिक्षण जीर्ण होता जाता है। फिर घट नष्ट होकर फिर मृत्तिका बन जाता है। घटका प्रतिक्षण जो नया स्थितिपरिवर्तन होता है, उसको अवस्थापरिणाम कहते है।<br />
यह सभी परिवर्तनोंमें धर्मी (मृत्तिका) में कोइ परिवर्तन नहीं होता है। वह तो यथावत ही रहती है।<br />
(परिणामके भेद परसे क्रमके भेदका बोध मिलता है। जैसे मृत्तिका, पींड और घट, यह तीन परिणाम भेद है। इस परसे अनागत, वर्तमान और अतीतका बोध मिलता है। समयमें निरपेक्ष भेद प्रतीत नहीं होता। परिणामके भेद दिखनेसे ही समयमें भी (अनागत, वर्तमान और अतीतका) भेदकी कल्पना होती है।)<br />
परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम्।<br />
(संयमात् अतीत अनागत ) (पातंजलयोगदर्शन-3/16)<br />
((धारणा, ध्यान और समाधि) तीनोंमें परिणाम संयम करनेसे (योगीको) अतीत और अनागतका ज्ञान (होता है)<br />
प्रातिभाद्वा सर्वम्।।(पातंजलयोगदर्शन-3/33)<br />
अथवा प्रातिभज्ञान से (योगी) सबकुछ (जानता है)<br />
बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेश:।। (पातंजलयोगदर्शन-3/38)<br />
((पर शरीरगमनको रोकनेवाला धर्माधर्मरुप संस्कारके) कारणरुप बन्धकी निवृत्ति होनेसे और (साथ ही समाधिबलसे) चित्त नाड़ीमें पथ संचलनका ज्ञान हो जानेसे चित्तका परशरीर प्रवेश सामर्थ्य (हो जाता है।))<br />
समानजयात्प्रज्वलनम्।। (पातंजलयोगदर्शन-3/40)<br />
((संयमद्वारा) समानपर जय पानेसे (योगीके शरीरमें) प्रज्वलित (अग्नि होता है।))<br />
यह कुंडलिनी जागृति हो सक्ति है।<br />
सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च।। (पातंजलयोगदर्शन-3/49)<br />
(बुद्धिसत्त्व और पुरुषके (भेदके साक्षात्कार) मात्रसे अन्यताख्याति (विवेकख्यति होती है और) सर्वपदार्थोंपर स्वामीभाव (और) सर्वज्ञाताभाव (प्राप्त होता है।)<br />
तद्वैराग्यादपि दोषबीज़ये कैवल्यम्।। (पातंजलयोगदर्शन-3/50)<br />
(उस (सर्वपदार्थोंपर स्वामीभाव और सर्वज्ञाताभाव सिद्धियों या विवेकख्याति हो जाती है और उसके) उपरांत वैराग्य भी हो जानेसे दोषबीज़रुप (संस्कार या वासना) का क्षय होनेसे (पूर्वोक्त सिद्धियोंके उपरांत) कैवल्य (भी होता है।))<br />
स्थान्युपनिमन्त्रणे संगस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसंगात्। (पातंजलयोगदर्शन-3/51)<br />
((योगीकी सिद्धिको देखकर जब) देवों सत्कारपूर्वक प्रार्थना (करते है तो योगी उसमें) संग (आसक्ति) तथा स्मय (गर्व) न करें। (क्योंकि उससे) पुन: अनिष्टकी प्राप्ति होती है।)<br />
क्षणतत्क्रमयो: संयमाद्विवेकजं ज्ञानम्।।(पातंजलयोगदर्शन-3/52)<br />
क्षण और उसके क्रम में संयम करने से विवेकज ज्ञान प्राप्त होता है।<br />
तारकं सर्वविषयं सर्वथा विषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम्।। (पातंजलयोगदर्शन-3/54)<br />
(संसारसागर से) तारनेवाला, सर्वको विषय बनानेवाला, सर्वप्रकार से विषय बनानेवाला और क्रम रहित ( ऐसा ज्ञान) विवेकज ज्ञान है।<br />
सत्त्वपुरुषयो: शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति। (पातंजलयोगदर्शन-3/55)<br />
(जब बुद्धिकी शुद्धि (भी) परमात्मा की शुद्धिके समान हो जाती है, तो वही कैवल्य है।)(पातंजलयोगदर्शन-3/55)<br />
(When the Intellect (of person) becomes as pure as Parmatma, that is Salvation).(Patanjal Yogadarshan-3/55).<br />
[सत्त्वस्य बुद्धिद्रव्यस्य वृत्तिशून्यता शुद्धि:। पुरुषस्यापि तदा कल्पितभोगशून्यता शुद्धि:। एवं तयो: शुद्धिसाम्ये सति कैवल्यं भवतीति शेष:।]
(जब अविद्यादि क्लेशकी निवृत्ति हो जाती है और कर्माशयरुप संस्कार दग्धबीजरुप हो जाते है, तब उत्पन्न हुइ विवेकख्यतिसे गुणोंके अधिकारकी समाप्ति हो जानेसे, बुद्धि भी निर्गुण हो जाती है। यही बुद्धिकी पुरुषके जैसी ही शुद्धता कही जाती है। अविवेकदशामें बुद्धिकी बोधरुप जो भोगता है, वह औपाधिकरुपतासे पुरुषमें दिखाई देती है। बुद्धि आत्मा जैसी ही शुद्ध हो जानेसे बुद्धिमें साक्षीभाव आ जाता है और आत्माकी यह भ्रांतिरुप भोगताकी समाप्ति हो जाती है। यही पुरुषकी शुद्धता है। बुद्धि और पुरुष (आत्मा) की समान शुद्धि होनेसे बुद्धिमें वृत्तिशून्यता आती है, वही चित्तकी समाप्ति है। और आत्माकी भी तब प्रतिबिंबित और कल्पित भोगशून्यता सिद्ध हो जाती है। इसलिये बुद्धि और पुरुष (आत्मा) की शुद्धिकी समानता ही कैवल्य है। इति।)<br />
निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतिनां वरणभेदस्तु तत: क्षेत्रिकवत्। (पातंजलयोगदर्शन-4/3).<br />
[(नश्वर) साधन प्रकृति (के पार होने) का प्रयोजक नहीं हो सकता है।उससे केवल (अविद्यारुप) प्रतिबंधक की निवृत्ति होती है, जैसे कृषक करता है।](पातंजलयोगदर्शन-4/3).<br />
[(Ephemeral) instrument cannot be sponsor for (transcending) the Nature. Only the cessation of the obstacle (of Ignorance) is affected by it; as the farmer does.)<br />
(Patanjal Yogadarrshan-4/3).<br />
((धर्मादिक) निमित्त प्रकृतिके प्रयोजक नहीं है। परंतु उनसे प्रतिबंधककी निवृत्ति होती है, जैसे कृषक (खेतमें पियतके लिये अड़चनको दूर करता है तो पानी अपने आप पौधें तक पहुँच जाता है।))<br />
कारण हि कार्यका प्रयोजक हो सकता है, कार्य कारणका प्रयोजक नहीं हो सकता।धर्मादिक निमित्त प्रकृतिके कार्य है, और प्रकृति उसका कारण है, इसलिये धर्मादिक निमित्त प्रकृतिके प्रयोजक नहीं बन सकते; वे केवल प्रकृतिके रास्तेमें पड़े प्रतिबंधकोकी निवृत्ति करदेते है, जिससे प्रकृति अपने स्वभावके अनुसार शेष काम निपटा देती है।<br />
पर्जन्यादन्नसम्भव:। (गीता3/14). कृषक यहाँ उत्पादनन्नमें निमित्त है। तो कृषक उत्पादनकी प्रकृतिका प्रयोजक या प्रवर्तक नही है।वह तो केवल पानी पौधेके मूलतक पहुँचनेमें जो घासादि प्रतिबंधक है, उस प्रतिबंधककी केवल निवृत्ति ही करता है। तब पानी जड़ तक पहुँच पाता है और प्रकृति ही आगेका उत्पादन्नका काम करती है।<br />
रगड़ा-पेटीश खानेसे मादगी आती है, तब रगडा-पेटीश मांदगी नामक नयी प्रकृति का प्रयोजक अथवा प्रवर्तक नहीं है; किंतु रेगडा-पेटीश, शरीरकी जो रोगप्रतिरोधकता रोगको शरीरमें प्रवेशनेसे अटकाती है; उस रोगप्रतिरोधक नामक प्रतिबंधककी निवृत्ति कर देता है। उस प्रतिबंधककी निवृत्ति हो जाने से रोग प्रवेश कर जाता है।<br />
कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम्।। (पातंजलयोगदर्शन-4/7).<br />
[(गुणातीत) योगीओंके कर्मों अशुक्ल अकृष्ण कर्म होते है, अन्य लोगों के कर्मों (कृष्ण कर्म, शुक्लकृष्ण कर्म, और शुक्ल कर्म ऐसे) तीन अन्य प्रकारके होते है।) (पातंजलयोगदर्शन-4/7).<br />
[The actions of (Gunateet) Yogis are Non Shukla-Non Krishna Actions; the actions of other people are of three other types (Krishna Actions, Shukla-Krishna Actions and Shukla Actions)] (Patanjal Yoga Darshan-4/7).<br />
ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम्।। (पातंजलयोगदर्शन-4/8)<br />
(उस (तीनप्रकारके कर्मों) से, (उस कर्मोंके कर्ताओं में), केवल उस वासनाओंका प्रादुर्भाव हो सकता है; जो उस (कर्मों) के कर्मफल देने के अनुरुप होती है।) (पातंजलयोगदर्शन-4/8)<br />
[By those (three type of actions), only those desires (in the doers of those actions) manifest which are relevant to availing the Karmafal of those (actions)]. (Patanjal Yogadarshan-4/8)<br />
કર્મોથી એવી જ ઇચ્છાઓ વ્યક્તિ મા પેદા થાય છે, જે ઇચ્છાઓ ની પૂર્તી કરવાથી તે વ્યક્તિને તે કર્મોના અનુરૂપ કર્મફળ પ્રાપ્ત થાય.<br />
स्मृतिसंस्कारयोरेकरुपत्वात्।।(पातंजलयोगदर्शन-4/9)<br />
( स्मृति और संस्कार (चित्तवृत्ति) की एकरूपता होने के कारण)(पातंजलयोगदर्शन-4/9). (It is due to the uniformity of memories and Habitual Inertia or Sanskaar (Chittavritti)) (Patanjal Yoga Darshan-4/9).<br />
जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयोरेकरुपत्वात्।।(पातंजलयोगदर्शन-4/9)<br />
(जाति, देश और कालकी दृष्टिसे (संस्कारों) दूरस्थ होते हुए भी, स्मृति और संस्कारकी एकरूपताके कारण वे नज़दीक के हि है (वैसी हि उसकी असर रहती है) (पातंजलयोगदर्शन-4/9).<br />
(Though from the point of view of specie, region and era; (Habitual Inertia or Sanskaars) being placed apart, due to the uniformity of the memories and the Habitual Inertia or Sanskaar, (the effect is created as if) they are in immediate succession). (Patanjal Yoga Darshan-4/9).<br />
प्राणीका जैसा अनुभव वैसा उसका संस्कार, जैसा उसका संस्कार वैसी उसकी स्मृति। स्मृति तो हंमेशा नयी हि दिखती है, इसलिये जाती, देश और कालकी दूरीके कारण ढंके हुए दिखते हुए भी संस्कारोंकी असर वे नये ही है वैसी हि होती है। अश्व की योनि लाखों साल बाद जीव को प्राप्त होती है, फिर भी अश्व योनि प्राप्त होते हि, अगली बार के अश्व के संस्कार तुरंत हि प्राप्त हो जाते है, और घास खाने लगता है।<br />
हेतुफलाश्रयालम्बने: संगृहितत्वादेषामभावे तदभाव:।। (पातंजलयोगदर्शन-4/11)<br />
(हेतु, फल, आश्रय और आलंबनके द्वारा वासनायें इकठ्ठी (रखी जाती है।) उन (चारों) का अभाव हो जानेसे उस (वासनाओं) का (भी) अभाव (हो जाता है।)<br />
[टीका: वासनानामनन्तरानुभवो हेतु:।तस्याप्यनुभवस्य रागादयस्तेषामविद्येति साक्षात् पारम्पर्येण च हेतुत्वम्। फलं शरीरादि स्मृत्यादयश्च। आश्रय चित्तम्।आलम्बनं यदेवानुभवस्य तदेव वासनानां शब्दादिकमिति यावत्। हेत्वादिनां अभावे तदभाव।।]
अतीतानागतं स्वरुपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम।। (पातंजलयोगदर्शन-4/12)<br />
(भूतभविष्यत (भूतों या वस्तुयें) अपने रुप सहित (वर्तमानमें विद्यमान होती) है, धर्म और कालके भेदको लेकर।)<br />
ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मान:।(पातंजलयोगदर्शन-4/13)<br />
(व्यतक्त (प्रत्यक्ष जगत) और सूक्ष्म (बीजरुप जगत है) वह (सब तीनों) गुणोंका ही (विस्तृत) स्वरुप है।)<br />
(The tangible (present world) and the intangible (potential world) are the variant forms of Gunas only). (Patanjal Yoga Darshan-4/13).<br />
परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम्।। (पातंजलयोगदर्शन-4/14)<br />
[(वस्तु मे रहे तीनों गुणों का) परिणाम एकरूप होने से (वस्तु का) वस्तुतत्त्व (सुनिश्चित रहता) है।)] (पातंजलयोगदर्शन-4/14).<br />
[As there is oneness of result (of Three Gunas of an object), the objectiveness (of the object remains ensured). (Patanjal Yoga Darshan-4/14).<br />
जैसे मृत्तिका, तंतु और दूधसे बने दिपक, वाट और तैल अलग अलग होनेपर भी तीनोंका कार्य प्रकाश एक बन शकता है, वैसे ही तीनों गुण एक वस्तुरुप हो सकते है।<br />
वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्त: पन्था:।। (पातंजलयोगदर्शन-4/15)<br />
(वस्तु (में हर वक़्त तीनों गुणोंका प्रमाण) एक समान होने के बावजूद (अलग अलग) चित्त (में रहे तीनों गुणों के प्रमाण के) भेदके कारण, उस (अलग अलग चित्तों) के (वस्तु के प्रति के व्यवहार के) तरीक़ों अलग अलग है।) (पातंजलयोगदर्शन-4/15)।<br />
[In spite of (in) an object (the proportion of three Gunas always) being same, due to the difference of (the proportion of three Gunas in) Chitta, the ways of (dealing towards the object of) those Chittas are different.].<br />
(Patanjal Yoga Darshan-4/15).<br />
(एक ही स्त्रीको पति, शोक्य, कामी पुरुष और ज्ञानी के देखनेपर क्रमश: सुख, दु:ख, मोह और उदासीन होनेके भाव हो सक्ते है)<br />
तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम्।।<br />
(पातंजलयोगदर्शन-4/17)<br />
((वस्तुके ज्ञानके लिये) चित्तका वस्तुको ग्रहण करना आवश्यक (अपेक्षित) है। (इसलिये चित्तका ग्रहण अग्रहण होनेसे) वस्तु (भी चित्तको) ज्ञात अज्ञात रहती है।)<br />
सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभो: पुरुषस्यापरिणामित्वात्।।(पातंजलयोगदर्शन-4/18)<br />
(हंमेशा चित्तस्वभाव ज्ञाता है, उस (चित्तस्वभाव) के प्रभो आत्मा अपरिणामी होने के कारण।)(पातंजलयोगदर्शन-4/18).<br />
(The knower is always the disposition of Chitta, as its ruler Atmaa being the unchangeable.)<br />
(Patanjal Yoga Darshan-4/18).<br />
(चित्तस्वभाव को ही दृष्टा कहा जाता है। योगदर्शन 1/3)<br />
न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात्।। (पातंजलयोगदर्शन-4/19)<br />
(वह(चित्त) दृश्य होनेसे स्वप्रकाशित नहीं है।)<br />
सब दृश्य परप्रकाशित है। दृष्टा ही केवल स्वप्रकाशित है।<br />
चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम्।।(पातंजलयोगदर्शन-4/22)<br />
(चित्त के सान्निध्य के कारण, (आत्मा में भी) उस (चित्तस्वभाव) का स्वरुप आ जाता है, ऐसी बुद्धिवृत्ति होती है।)(पातंजलयोगदर्शन-4/22).<br />
(It becomes the intelligence that due to the proximity of Chitta, the form of that (disposition of Chitta) comes (in Atmaa also.)<br />
(Patanjal Yoga Darshan-4/22).<br />
द्रष्टुद्दश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम्।।(पातंजलयोगदर्शन-4/23)<br />
द्रष्टा (चित्तस्वभाव) और द्दश्य (जगत) की ऐकरुपता प्राप्त चित्त (एक परमात्मा के लिए ही नहीं बल्कि) सर्व के लिए है।<br />
विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृति:।। (पातंजलयोगदर्शन-4/25)<br />
((शरीर, चित्त, बुद्धि वग़ैरह मैं हुँ) ऐसी आत्मभाव भावनाकी ज्ञानीमें निवृति हो जाती है।)<br />
हानमेषां क्लेशवदुक्तम्।।(पातंजलयोगदर्शन-4/28)<br />
उस (व्युत्थान संस्कारों) का नाश क्लेशों (के नाश) की तरह कहा गया है।<br />
प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघ: समाधि:।। (पातंजलयोगदर्शन-4/29)<br />
(विवेकज्ञान (के उपरांत जिसको) वैराग्य भी है उसको सर्वथा विवेकज्ञान से भी धर्ममेघसमाधि प्राप्त होती है।)<br />
तत: क्लेशकर्मनिवृति:।। (पातंजलयोगदर्शन-4/30)<br />
(उस (धर्ममेघसमाधि) से क्लेश तथा कर्मकी निवृत्ति (होती है।)<br />
तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम्।। (पातंजलयोगदर्शन-4/31)<br />
तब (धर्ममेघसमाधि से) सर्व आवरणरुप मलसे रहित हुए ज्ञानकी अनंतता के सामने ज्ञेयरुप विषय बहुत अल्प दिखता है।<br />
तत: कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम्।।(पातंजलयोगदर्शन-4/32)<br />
(अत: (धर्ममेघसमाधिके उदय होने से) कृतार्थ हुए गुणों का (कार्योत्पादनरुप) परिणामक्रम की समाप्ति होती है।)<br />
क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्य: क्रम:।।<br />
(पातंजलयोगदर्शन-4/33)<br />
[क्षण के साथ ताल्लुक़ बनाने के परिणामस्वरूप (अपने मे) हुई तबदीली को देखकर, (मानव द्वारा) महसूस किया गया (क्षणों का प्रवाह), क्रम है (जो उसे समय लगता है।)] (पातंजलयोगदर्शन-4/33).<br />
[Seeing the modification (in himself) resulted from forging liaison with the moment, the perception (of flow of moments) felt (by the human) is sequence (which sounds to him as time).].<br />
नया रखा हुआ वस्त्र अनेक वरसोंके बाद झीर्ण हो जाता है। झीर्णता सूक्ष्मतम, सूक्ष्मत्तर, सूक्ष्म, स्थूल, स्थूलत्तर, स्थूलतम और अंतमें वस्त्र झीर्णरुप दिखने लगता है। यह परिणाम; क्षण क्षणका जो प्रहार वस्त्रपर हुआ है, और वस्त्रने उस प्रहारका जो प्रतिकार किया है, उस प्रतिकारके परिणामके अंतमें हमें दिखने मिलता है। उस परिणामके अंतको देखकर क्षणके पूर्वोत्तर अविरत प्रवाहकी कल्पना हो जाती है। वह क्रम है, वही समय है।<br />
पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसव: कैवल्यं स्वरुपप्रतिष्ठा वा चितिशक्त्तिरिति।। (पातंजलयोगदर्शन-4/34)<br />
(गुणोंकी (भोगापवर्गरुप) पुरुषार्थकी समाप्ति होनेसे (गुणोंका) अपने मूल कारण में लय हो जाना कैवल्य अथवा चेतना की स्वस्वरुपमें स्थिति है।)<br />
(The returning to the original state of Gunas, because of absolute nonexistence of their pursuits (of usufruct and beatitude), is called Salvation, or establishing in Atmaa of Own Being ) (Patanjal Yoga Darshan-4/34).<br />
हरिः ॐ तत्सत्। हरिः ॐ तत्सत्। हरिः ॐ तत्सत्।</p>
<p>Acharya Vrujlal</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com/patanjalyogdarshan/">PATANJAL YOGDARSHAN</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com">VEDA VICHAR</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://vedavichar.com/patanjalyogdarshan/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>37</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>UPANISHADS</title>
		<link>https://vedavichar.com/upanishads/</link>
					<comments>https://vedavichar.com/upanishads/#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Acharya Vrujlal]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 07 Oct 2019 11:40:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[UPANISHADS]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://vedavichar.com/?p=6078</guid>

					<description><![CDATA[<p>ADVAYATARKA UPANISHAD जीवेश्वरौ मायिकौ विज्ञाय सर्वविशेषं नेति नेतीति विहाय यदवशिष्यते तदद्वयं ब्रह्म। (अद्वयतारकोपनिषद-3) (जीव और ईश्वरको मायिक जानकर, जो विशेषकर है उस सबको “नेति नेति” कहते हुए उसको त्यागकर, जो...</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com/upanishads/">UPANISHADS</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com">VEDA VICHAR</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>ADVAYATARKA UPANISHAD<br />
जीवेश्वरौ मायिकौ विज्ञाय सर्वविशेषं नेति नेतीति विहाय यदवशिष्यते तदद्वयं ब्रह्म।<br />
(अद्वयतारकोपनिषद-3)<br />
(जीव और ईश्वरको मायिक जानकर, जो विशेषकर है उस सबको “नेति नेति” कहते हुए उसको त्यागकर, जो शेष रहता है, वही अद्वय ब्रह्म (कहलाता) है।)<br />
“After taking Jiva and Ishwara as illusive, after abdicating all that which is some or other way any special, terming it as “Not this, not this”, what remains is the Nondual Brahmn (that is the form of bliss).<br />
तालुमूलोर्ध्वभागे महान् ज्योतिर्मयूखो वर्तते।<br />
तद्योगिभिर्ध्येयम्। तस्मादणिमादिसिद्धिर्भवति।।<br />
(अद्वयतारकोपनिषद-11)<br />
(तालुमूलके उर्ध्वभागमें महान ज्योति किरन मंडल स्थित है। योगी उनका ध्यान करते है। उससे हि अणिमा विगेरह सिद्धियाँ प्राप्त होती है।)</p>
<p>AMRUTNADA UPANISHAD</p>
<p>तथेन्द्रियकृता दोषा दह्यन्ते प्राणधारणात्।।<br />
(अमृतनादोपनिषद-7)<br />
(वैसेही समस्त इन्द्रियाँ द्वारा किये दोषों प्राणायाम द्वारा भस्म हो जाते है।)<br />
अन्धवत्पश्य रुपाणि शब्दं बधिरवच्छृणु।<br />
काष्ठवत्पश्य वै देहं प्रशान्तस्येति लक्षणम्।।(अमृतनादोपनिषद-15)<br />
अंधेकी तरह जो दृश्यपदार्थोंकों देखता है, बहेरेकी तरह जो आवाज़को सुनता है, और देहको जो काष्ठकी तरह जानता है, वे सब स्थितप्रज्ञके लक्षण है।<br />
मन: संकल्पकं ध्यात्वा संक्षिप्यात्मनि बुद्धिमान्।<br />
धारयित्वा तथात्मानं धारणा परिकीर्तिता।।<br />
(अमृतनादोपनिषद-16)<br />
(मनको संकल्पात्मक समजकर बुद्धिमान मनुष्य मनका आत्मामें लय करके तथा (लय किये हुए मनको अपने) आत्मामें हि धारण किये रखता है (उसी क्रिया को) धारणा कहते है।)<br />
आगमस्याविरोधेन ऊहनं तर्क उच्यते।<br />
समं मन्येत यल्लब्ध्वा स समाधि प्रकीर्तित:।।<br />
(अमृतनादोपनिषद-17)<br />
(शास्त्रानुकुल शंका उपस्थित करना उसको तर्क कहते है। (ऐसी शंका के मदेनजर भी) जो भी प्राप्त होता है उसमें समभाव रखना हि समाधि कहलाती है।)</p>
<p>AITREYA UPANISHAD</p>
<p>आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसिन्नान्यत्किंचन मिषत्। स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति।<br />
(ऐतरयोपनिषद-1/1/1)<br />
(सृष्टिकी शुरुआतमें एकमात्र आत्मा ही था। इसके अलावा सचेष्ट जैसा और कुछ भी नथा। तब उस (परमात्मा) ने सोचा की मैं लोकोंका सृजन करुं।)<br />
या अधस्तात्ता आप:। (ऐतरयोपनिषद-1/1/2)<br />
(जो आधाररुप है वह आप(जल) है।)<br />
स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत। सैषाविदृतिर्नाम द्वारस्तदेतन्नान्दनम्। तस्य त्रय आवसथास्त्रय:स्वप्ना अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथइति।। (ऐतरयोपनिषद-1/3/12)<br />
(वह परमात्मा मानव शरीरकी सीमा मूर्धा (ब्रह्मरंध्र)कोचीरकर (विदीर्ण करके) उसमें प्रवेश हो गये। विदीर्णकरनेसे उसको विदृति नामका द्वार कहा जाता है, यहद्वार आनंदरुप परमात्माकी प्राप्ति कराता है। उसपरमात्माके तीन आश्रय स्थान है और तीन स्वप्न है।यही उसका आवास स्थल है यही उसका आवासस्थल है यही उसका आवास स्थल है)<br />
(Three places: Body, Nature, Inexhibitive)<br />
(शरीर। प्रकृति। अव्यक्त)<br />
(Three dreams: make efforts through body, get tuned with the Nature, and prepare for the voyage to inexplicable)<br />
यदेतत् ह्रदयं मनश्चैतत्। (ऐतरयोपनिषद-3/1/2)<br />
(जो यह ह्रदय है, मन भी वही है।)<br />
प्रज्ञानं ब्रह्म। (ऐतरयोपनिषद-3/1/3)</p>
<p>ATMABODHA UPANISHAD</p>
<p>न मे बन्धो न मे मुक्तिर्न मे शास्त्रं न मे गुरु:।।<br />
(आत्मबोधोपनिषद-19)<br />
(न तो मेरे लिये बंधन है, न मुक्ति। न मेरे लिये कोइ शास्त्र है, न कोइ गुरु है।)</p>
<p>AXAYA UPANISHAD</p>
<p>ॐ असतो मा सद् गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्माऽमृतं गमय। (अक्ष्यूपनिषद-1)-</p>
<p>BRAHDARANYAKA UPANISHAD</p>
<p>नैवेह किंचनाग्र आसीत। (ब़ह्दारण्यकोपनिषद-1/2/1)<br />
(पहेले यहाँ कुछ भी नहीं था।)<br />
द्वितीयाद्वै भयं भवति। (बृहदारण्यकोपनिषद-1/4/2)<br />
[दूसराओंसे हि भय होता है। (लेकिन यहाँ दूसरा कोई है हि नहीं, फिर भय क्यों)]
ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्तदात्मानमेवावेत्।अहं ब्रह्मास्मि।तदिदमप्येतर्हि य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मि स इदं सर्वं भवति।अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवं स: देवानाम्।।यथा ह वै बहन: पशवो मनुष्यं भुंज्युरेवमेकैक: पुरुषो देवान्भुनक्त्येकस्मिन्नेव पशादियमानेऽप्रियं भवति किमु बहुषु तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनुष्या विद्यु:।। (बृहदारण्यकोपनिषद-1/4/10)<br />
(पहले यह ब्रह्म ही था; उसने अपनेको जाना कि “मैं ब्रह्म हूँ”।अत: वह सर्वरुप हो गया।उस इस ब्रह्मको इस समय भी जो इस प्रकार जानता है कि “मैं ब्रह्म हूँ” वह यह सर्वरुप हो जाता है।और जो अन्य देवताकी “यह अन्य है और मैं अन्य हूँ” इस प्रकार उपासना करते है, वह नहीं जानता (कि “मैं ब्रह्म हूँ”)।जैसे (मनुष्यके) पशु होते है वैसे ही वह देवताओंका पशु है।जैसे लोकमें बहुत से पशु मनुष्यका पालन करते है, उसी प्रकार एक एक मनुष्य देवताओंका पालन करते है।एक पशुका ही हरण किये जानेपर अच्छा नहीं लगता, फिर बहुतोंका हरण होनेपर तो कहना ही क्या? इसलिये देवतोओंको यह प्रिय नहीं है कि मनुष्य (“मैं ब्रह्म हूँ” यह)जानें।)(बृहदारण्यकोपनिषद-1/4/10)<br />
[Brahmn alone was here in the beginning. He Himself perceived that “I Am Brahmn”; therefore He become one with all. Even today whoever perceives the said Brahmn that “I Am Brahmn”, becomes one with all. And if one worships other Devatas thinking that “he is another, and I am another,&#8217; doesn’t know (that I am Brahmn). As there are animals (of men) same way he is an animal of the Devatas. As in Mundane World many animals severs men, same way each one man serves Devatas. Even if one animal is taken away it causes anguish then what to say when many animal are taken away? Therefore it is not liked by Devatas that men should know this (that I am Brahmn)]. (Brihdaaranyaka Upanishad-1/4/10)<br />
येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम्।।(बृहदारण्यकोपनिषद-2/4/3)<br />
(जिस से मैं परमात्मारुप नहीं हो सकती, उसे लेकर मैं क्या करुंगी?) (बृहदारण्यकोपनिषद-2/4/3)<br />
(What shall I do by accepting that if it is not making me one with Parmatma?)<br />
(Brihdaaranyaka Upanishad-2/4/3)<br />
येनाहं नामृता स्यां तेनाहं किं कुर्याम्।।(बृहदारण्यकोपनिषद-2/4/3)<br />
यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति।<br />
यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्।।<br />
(बृहदारण्यकोपनिषद-2/4/14)<br />
((अविद्या के) कारण जहाँ द्वैत सा महसूस होता है, वहीं अन्य अन्य को देखता है।लेकिन जहाँ (ज्ञान से) सब कुछ आत्मा के आत्मरुप ही महसूस हो गया है, तो कौन किसको देखेगा )(बृहदारण्यकोपनिषद-2/4/14)<br />
(Because (of Ignorance) where there is felt like duality, then one sees the other. But where (due to Knowledge) everything is felt belonging to Atmaa only, then who will see whom?).<br />
(Brihdaaranyaka Upanishad-2/4/14).<br />
द्वे वाव ब्रह्मणो रुपे मूर्तं चैवामूर्तं च मर्त्यं चामृतं च स्थितं च यच्च सच्च त्यच्च।। तदेतन्मूर्तं यदन्यद्वायोश्चान्तरिक्षाय।।(बृहदारण्यकोपनिषद-3/2/1-2)<br />
ब्रह्मके दो रुप है: व्यक्त और अव्यक्त।(व्यक्त) मरणधर्मा है, (अव्यक्त) अविनाशी है।(मरणधर्मा) जड-स्थिर है, (अविनाशी) गतीशिल है। वायु और आकाश से अन्य (अग्नि, जल, पृथिवी) व्यक्त है।<br />
आत्मा वा अरे द्रष्टव्य: श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो दर्शनेन श्रवणेन मत्वा विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम्।। (बृहदारण्यकोपनिषद-2/4/5, 4/5/6).<br />
(हे मैत्रेयी! यह आत्मा ही दर्शन करवा योग्य, श्रवण करवा योग्य, मनन करवा योग्य, निदिध्यासन (अनुभव, ध्यान) करवा योग्य है। यह आत्माके दर्शन, श्रवण, मनन और ज्ञानसे सबका ज्ञान हो जाता है।)<br />
स होवाच वायुर्वै तत्सूत्रं वायुना वै सूत्रेणायं च लोक: परश्च लोक: सर्वाणि च भूतानि च संदृब्धानि भवन्ति। (बृहदारण्यकोपनिषद-3/7/2)<br />
(याज्ञवल्क्य उवाच वायु हि वह सूत्र है, कारण यह लोक, पर लोक और समस्त प्राणियों उस के द्वारा हि ओतप्रोत रहे हुए है।)<br />
अष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्यास्त इन्द्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिंशाविति देवा:।। (बृहदारण्यकोपनिषद-3/9/2)<br />
(याज्ञवल्क्य ने शाकल्य को कहा) आठ वसु (अग्नि, पृथिवी, वायु, अंतरिक्ष, आदित्य, द्युलोक, (चंद्र और नक्षत्र), ग्यारह रुद्र (दश प्राण और मन), बारह आदित्य (बारह मास), इन्द्र (मेघ अथवा विद्युत) और प्रजापति (यज्ञ अथवा पशु) यह तेंत्रिस देवों है।)<br />
स एष नेति नेत्यात्मा। (ब्रहदारण्यकोपनिषद-3/9/26) अद्वयतारकोपनिषद-3)<br />
(इस आत्मा के बारे में “यह (आत्मा) नहीं है यह (आत्मा) नहीं है” ऐसा ही कहा जा सकता है।(ब्रहदारण्यकोपनिषद-3/9/26) अद्वयतारकोपनिषद-3)<br />
(About this Atmaa it can only be said “This is not (Atmaa) this is not (Atmaa)”.) (Brahadaranyaka Upanishad-3/9/26)(Advayataaraka Upanishad-3)<br />
विज्ञानमानन्दं ब्रह्म। (बृहदारण्यकोपनिषद-3/9/28)<br />
कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमय: प्राणेषु ह्रद्यन्तर्ज्योति: पुरुष: स समान सन्नुभो लोकावनुसंचरति ध्यायतीव लेलायतीव स हि स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतित्क्रामति मृत्यो रुपाणि।। (बृहदारण्यकोपनिषद-4/3/7)<br />
(जनक- आत्मा कौन है? (याज्ञवल्क्य)- यह जो प्राणोंमें विज्ञानरुप (और) ह्रदयमें ज्योतिरुप पुरुष (है वही आत्मा) है। वह मानो ध्यान करता हो या मानो चेस्टा करता हो (वैसे क्रमश: इह और पर) दोनों लोकोंमें समान हुआ संचार करता है। वही स्वप्न होकर इहलोकका और मृत्युके रुपोंमें परलोकका अतिक्रमण करता है।)<br />
असंगो ह्यं पुरुष:।। (बृहदारण्यकोपनिषद-4/3/15)<br />
(यह पुरुष असंग ही है)<br />
यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति न हि द्रष्टुर्द्दष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात्। न तु तद् द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यत् पश्येत्।।(बृहदारण्यकोपनिषद-4/3/23)<br />
वह जो नहीं देखता सो देखता हुआ ही नहीं देखता। द्रष्टाकी द्दष्टिका कभी लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस समय उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसे देखे।<br />
साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च।।<br />
(आत्मा साक्षी, चेतनरुप, केवल (अद्वितीय) और निर्गुण है।)<br />
तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा च।। (बृहदारण्यकोपनिषद-4/4/2)<br />
[(जब आत्मा बहिर्गमन करती है तो) उसके साथ हि उसका ज्ञान, कर्म और पूर्व प्रज्ञा (अनुभूत विषयों की वासना) भी जाते है।]
काममय एवायं पुरुष। यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते यत्कर्म कुरुते तदभिसंपद्यते।।(बृहदारण्यकोपनिषद-4/4/5)<br />
(यह (आत्मा) पुरुष काममय है।वह कामनाके अनुरुप संकल्प करता है।संकल्पके अनुरुप कर्म करता है। कर्मके अनुरुप फल पाता है।)<br />
योऽकामो निष्काम आप्तकाम आत्मकाम न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति।।(बृहदारण्यकोपनिषद-4/4/6)<br />
(परंतु जो पुरुष कामनाहीन, निष्काम, आप्तकाम, और आत्मकाम है, उसके प्राणों का (परलोक में) उत्क्रमण नहीं होता। वह ब्रह्म ही रहकर ब्रह्मको प्राप्त होता है।)(बृहदारण्यकोपनिषद-4/4/6).<br />
(But the stepping out of Subtle Body of the desireless, disinterested, one who has realized the Atmaa, desirous of emancipation; doesn’t happen. He avails Parmatma by remaining being Parmatma only.) (Brahdaranyaka Upanishad-4/4/6).<br />
स एष नेति नेत्यात्मा।<br />
(बृहदारण्यकोपनिषद-4/3/4)(4/4/22)<br />
(यह आत्मा नेति नेति रुपसे कहा गया है)<br />
मनसैवानुद्रष्टव्यं नेह नानास्ति किंचन।<br />
मृत्यौ: स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति।।<br />
(बृहदारण्यकोपनिषद-4/4/19)<br />
मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन।<br />
मृत्यौ: स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति।।<br />
(कठोपनिषद-2/1/11)<br />
((ब्रह्म एक ही यहाँ है), यहाँ अलग-अलग जैसा कुछभी नहीं है, (प्रगमनशील हुए) मनसे ही यह तत्त्व प्राप्त करने योग्य है। जो मनुष्य यहाँ अलग-अलगसा दिखता है, वह मृत्युसे मृत्युको ही प्राप्त होता रहता है।) (बृहदारण्यकोपनिषद-4/4/19)(कठोपनिषद-2/1/11)<br />
[(Parmatma alone is here), there is nothing like diversity here, this has to be realized by a Mind (that is made an excellent). Whoever is understanding that there prevails diversity here, ensures from death to death for himself] (Brihdaranyaka Upanishad-4/4/19) (Katha Upanishad-2/1/11).<br />
यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति। यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत तत् केन कं पश्येत्। येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानियात्।स एष नेति नेत्यात्मागृह्यो।।(बृहदारण्यकोपनिषद-4/5/15)<br />
जहाँ (अविद्यासे) द्वैतसा लगता है, वहीं अन्य अन्यको देखता है। किन्तु जहाँ इसके लिए सब आत्मा ही हो गया है, वहाँ किसके द्वारा किसे देखे? जिसके द्वारा पुरुष इस सबको जानता है, उसे किस साधनसे जाने? वह यह ‘नेति-नेति’ इस प्रकार निर्देश किया गया आत्मा अगृह्य है।(बृहदारण्यकोपनिषद-4/5/15)<br />
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। (इशावास्योपनिषद-15) (ब़ह्दारण्यकोपनिषद-5/15/1)<br />
(सत्यनुं मुख सोनाना पात्रथी ढंकायेल छे । )</p>
<p>BRAHMBINDU UPANISHAD<br />
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयौ: ।<br />
(ब्रह्मबिंदुउपनिषद-2) (मैत्रायण्युपनिषद-4/3/K)<br />
(मन ही मनुष्यके बन्धन या मूक्तिका कारणरुप है।)<br />
तावदेव निरोद्धव्यं ह्रदि यावत्क्षयं गतं मनो।<br />
एतज्ज्ञानं च मोक्षं च शेषास्तु ग्रंथ विस्तरा । (ब्रह्मबिंदूपनिषद-5)(मैत्रायण्युपनिषद-4/3/H)<br />
(मनका ह्रदयमें तबतक ही निरोध करना चाहिये जबतक उनका क्षय (यानि मनकी उन्मनी rस्थिति) न हो जाय। (संपूर्ण शास्त्रोंका साररुप) यही ज्ञान है और यही मोक्ष है, बाक़ी सबतो ग्रंथका (बिनजरुरी) विस्तार ही है।)<br />
एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थित:।<br />
एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचंद्रवत।। ( ब्रह्मबिंदुउपनिषद-12)<br />
(अलग अलग प्राणि में एक हि आत्मा रहा हुआ है; एक होते हुए भी अलग अलग दिखते है,<br />
जीस तरह एक ही चंद्र अलग अलग जलपात्र में अलग अलग दिखता है, वैसे ही।) ( ब्रह्मबिंदुउपनिषद-12)<br />
(The one and alone Atmaa pervades in each individual creature; in spite of being one, sounds to be individual; as the one alone moon is seen separate in each individual water pot.) (Brahmabindu Upanishad-12)<br />
घटसंवृतमाकाशं लीयमाने घटे यथा। घटो लियते नाकाशं तद्वज्जीवो नभोपम:।। ( ब्रह्मबिंदुउपनिषद-13)<br />
(घटमें आकाश पूर्णरुपसे विद्यमान है, परंतु जैसे घटके तूटनेपर केवल घटका ही नाश होता है; उसमें रहे आकाशका नहीं, ऐसे ही शरीर नष्ट होनेसे आत्माका नाश नहीं होता।)</p>
<p>BRAHMVIDYA UPANISHAD<br />
गुरुरेव हरि: साक्षान्नान्य इत्यब्रवीच्छ्रुति:।।<br />
(ब्रह्मविद्योपनिषद-31)<br />
(केवल गुरु ही साक्षात् परमात्मा है। अन्य नहीं है, ऐसा श्रुति का वचन है।)(ब्रह्मविद्योपनिषद-31)<br />
उल्काहस्तो यथालोके द्रव्यमालोक्य तां त्यजेत्।<br />
ज्ञानेन ज्ञेयमालोक्य पश्र्चाज्ज्ञानं परित्यजेत्।।<br />
(ब्रह्मविद्योपनिषद-36)<br />
(जैसे मशाल के प्रकाश से वस्तु को देख लेने से मशाल को छोड़ दि जाती है, वैसे ही ज्ञान से ज्ञातव्य विषय की प्राप्ति हो जाने से ज्ञान का परित्याग कर दिया जाता है।)(ब्रह्मविद्योपनिषद-36)<br />
ब्रह्महत्याश्वमेधै: पुण्यपापैर्न लिप्यते।<br />
चोदको बोधकश्चैव मोक्षदश्च पर: स्मृत:।।<br />
इत्येषां त्रिविधो ज्ञेय आचार्यस्तु महीतले।<br />
चोदको दर्शयेन्मार्गं बोधक: स्थानमाचरेत्।।<br />
मोक्षदस्तु परं तत्त्वं यज्ज्ञात्वा परमश्नुते।<br />
(ब्रह्मविद्योपनिषद-51-53)<br />
(जो ब्रह्महत्या के पाप से और अश्वमेधादि के पुण्य से लिप्त नहीं होता है; (ऐसे आचार्य को) प्रेरक, बोधक और मोक्षदाता माना जाता है।यहाँ संसार में आचार्य तीन श्रेणी के कहे गये है। प्रेरक आचार्य मार्ग बताते है। बोधक आचार्य लक्ष्य तक ले जाता है। मोक्षदाता आचार्य परं तत्त्व प्रदान कराते है, जिसको जानकर परमात्मा की प्राप्ति होती है।)<br />
(ब्रह्मविद्योपनिषद-51-53).<br />
अकारे संस्थितो ब्रह्म उकारे विष्णुरास्थित:।<br />
मकारे संस्थितो रुद्रस्ततोऽस्यान्त: परात्पर:।।<br />
(ब्रह्मविद्योपनिषद-71-72)<br />
(‘अ’कार में ब्रह्मा का, ‘उ’कार में विष्णु का तथा ‘म’कार में रुद्र का स्थान रहा है; उस के आगे परात्पर ब्रह्म रहे हुए है।)(ब्रह्मविद्योपनिषद-71-72)</p>
<p>CHHANDOGYA UPANISHAD<br />
यद्वै प्राणिति स प्राणो यदपानिति सोऽपानोऽथ य: प्राणाप्रानयो: सन्धि: स व्यानो।<br />
(छांदोग्योपनिषद-1/3/3)<br />
(मनुष्य स्वास द्वारा जो वायु बहार निकालता है, वह प्राण है और जो वायु अंदर लेता है, वह अपान है। जो प्राण अपानकी संधि है, वह व्यान है।)<br />
देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्या प्राविशँस्ते छन्दोभिरच्छादयन्यदेभिरच्छादयँस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम्।। (छांदोग्योपनिषद-1/4/2)<br />
(मृत्युसे डरे हुए देवोने त्रयी विद्यामें प्रवेश किया और अपनेको छन्दोसे आच्छादित कर लिया।आच्छादित करने वाले होनेके कारन वे छन्द कहे गये।)<br />
सत्यकामो जाबालो ह जबालां: किं गोत्रोन्वहमस्मीति। सा हैनमुवाच नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि बह्वहं चरन्ति परिचारिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो ब्रुविथा इति।। (छांदोग्योपनिषद-4/4/1-2)<br />
((सत्यकाम जाबालने (अपनी माता) जबालाको पूछा: मुझे बताइये मैं कौनसे गोत्र का हूँ? जबाला ने उत्तर दिया: तात! तुम जीस गोत्रका है उसको मैं भी नहीं जानती। युवा वस्थामें मैं जब मैं अनेक के साथ समागम करती परिचारिणी थी वैसेमें तुझको पाया। इसीलिये मैं यह नहीं जानती कि तुम कोनसे गोत्र का हो। जाबाला मेरा नाम है और तु सत्यकाम नामका है, तो (आचार्य को) कहना &#8220;मैं सत्यकाम जाबाल हुँ&#8221;।) (छांदोग्योपनिषद-4/4/1-2)<br />
(Satyakaam Jabaal asks (his mother): “Tell me of what clan I am. Jabaalaa replied: “My son, I even don’t know of what clan you are. While being youth, when I was a maid servant, rendering intercourse services to many, I got you in those circumstances. That is why I don’t know that of what clan you are. Jabaalaa is my name and you are having the name of Satyakaam; so tell (your Acharya in Gurukul) that you are Satyakaam Jabaal”). (Chhandogya Upanishad-4/4/1-2).<br />
प्रथम आहुति: प्राणाय स्वाहा<br />
द्वितिय आहुति: व्यानाय स्वाहा<br />
तृतिय आहुति: अपानाय स्वाहा<br />
चतुथीॅआहुति: समानाय स्वाहा<br />
पंचमीआहुति: उदानाय स्वाहा (छांदोग्योपनिषद)<br />
मनो ह वा आयतनम्। (छांदोग्योपनिषद- 5/1/5) (अवश्य मन ही आयतन (आश्रय) शरीर है). (छांदोग्योपनिषद- 5/1/5)<br />
(Verily the Mind itself is a body) (Chhandogya Upanishad-5/1/5).<br />
त्वं न: श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति। (छांदोग्योपनिषद5/1/12)<br />
((प्राण) आपही हम सबमें श्रेष्ठ है, आप बहार न जाना)<br />
यथेतमाकाशमाकाशाद्वायुं वायुर्भूत्वा धूमो भवति धूमोभूत्वाभ्रं भवति। अभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वाप्रवर्षति त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलमाषा इतिजायन्ते। यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेत: सिंचति तद्भूय एव भवति। (छांदोग्योपनिषद-5/10/5-6)<br />
(वहांसे वह (सूक्ष्मशरीर) प्रथम आकाशको प्राप्त होता है, आकाशसे वायुको प्राप्त करने के बाद वायुमे से धूम्र होता है, धूम्र में से बादल बन जाता है। बादल में से जब वर्षा बनकर बरसता है, तब सभी प्राणीओं इस लोकमें डांगर, जव, औषधि, वनस्पति, उड़द और तील बनकर प्रादुर्भूत होते है। (कर्मानुसार) जो जो इस अन्नको खाता है, और उनसे उत्पन्न विर्यका सिंचन करनेसे जो जीव बनता है, वह वैसा बन जाता है।) (छांदोग्योपनिषद-5/10/5-6)<br />
[From there the Jiva (subtle body) transforms into the sky, from sky into air, from air into vapour, from vapour into cloud, when it rains from the cloud; then all the Jivas are born into paddy, barley, herbs, plants, sesame, pulses, etc. (According to the actions) whoever eats this grain, etc and procreates (species) through the semen that is produced out of said (grain, etc), those (species) are identical to those (eaters)] (Chhandogya Upanishad-5/10/5-6).<br />
न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति।(छांदोग्योपनिषद -6/1/1)<br />
(हमारे कुलमें जन्म लेनेवाला बालक बिना ब्रह्मविद्याके अध्ययन किये, ब्राह्मण नहीं बन सकता)<br />
येनाश्रुतंश्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति स उपदेशो भवतीति।(छांदोग्योपनिषद -6/1/3) [( पिता उदाल अपने पुत्र श्वेतकेतुसे पूछते है:) जीसके द्वारा जो अश्रुत रहा है वह श्रुत हो जाता है, नहीं माना हुआ रहा है वह माना हुआ हो जाता है और जो नहीं जाना हुआ रहा है, वह विशेषरुपसे जाना हुआ हो जाता है, वह ब्रह्मविद्या तुमने प्राप्त कर लि क्या?].<br />
(छांदोग्योपनिषद -6/1/3)<br />
[(Father Udaalak asks his son:) have you attained that BrahmVidya by which what is not yet listened becomes listened, what is yet not believed becomes believed and what is yet not known becomes exclusively known?]
(Chhandogya Upanishad-6/1/3).<br />
यथा सोम्यैकेन मृत्पिंडेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्। (छांदोग्योपनिषद-6/1/4)<br />
सदेव सौम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितियं।<br />
(छांदोग्योपनिषद-6/2/1)<br />
(हे सोम्य प्रारंभमें एक मात्र अद्वितीय सत ही था।)<br />
तद्वैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति। (छांदोग्योपनिषद-6/2/3)<br />
(उसने संकल्प कियाकि मैं विभिन्न रुपोंमें उत्पन्न होजाउ।)<br />
स्वपितित्याचक्षते । (छांदोग्योपनिषद-6/8/1)<br />
(अपने स्वरुपको प्राप्त करलेता है ऐसा कहते है।)<br />
प्राणबंधनं हि सोम्य मन । (छांदोग्योपनिषद-6/8/2)<br />
(हे सौम्य! मन प्राणरुप बंधनवाला है)<br />
सन्मूला: सोम्येमा: सर्वा: प्रजा: सदायतना: सत्प्रतिष्ठा:।। (छांदोग्योपनिषद-6/8/4)<br />
((उदालक श्वेतकेतु को) हे सौम्य (इस तरह) यह सब प्रजाका मूल सत्य हि है, वह सत्यमें हि आश्रित और सत्यमें हि प्रतिष्ठित है।)<br />
सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाँगमनसि संपद्यते मन:प्राणेप्राणस्तेजसि तेज:परस्यां देवतायाम् । (छांदोग्योपनिषद-6/8/6)<br />
(हे सौम्य! अंत काले मनुष्यकी वाणी मनमां, मन प्राणमां, प्राण तेजमां और तेज़ परम देवमां लीन होताहै। )<br />
स य अषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो। तस्मात् त्वं तु विज्ञातं सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति। (छांदोग्योपनिषद-6/8/7)<br />
((पिता उदालकने पुत्र श्वेतकेतुको कहा) हे सौम्य! जैसे एक माटीके पिंड (को जान लेने)से माटीके पिंडमेंसे बने सब पदार्थोंका बोध हो जाता है, वास्तवमें विभिन्न प्रकारके (माटीके उपकरणोंके) नाम तो मात्र वाणीका विकार ही है। माटी ही एक मात्र सत्य है।<br />
(वैसे ही यहाँ) सब वही सत्य ही है। वही आत्मा है। और श्वेतकेतु तुम भी वही (सत्य या ब्रह्म) हो। अत: अपनेको जान लेनेसे सबको विशेषरुपसे जान लिया है, ऐसा हो जाता है।)<br />
(जब नारदजीने सनतकुमारोंको उपदेशके लिये कहा तो सनतकुमारोंने कहा)<br />
नामैवैतत् । ( नाम एव एतत्)(छांदोग्योपनिषद-7/1/3) (रुग्वेद विगेरे नामही है)<br />
सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मविच्छ्रुतं।<br />
तरति शोकमात्मविदिति।। (छांदोग्योपनिषद-7/1/3)<br />
(नारदजीने कहा- भगवन! मैं तो मंत्र विद ही हुँ। मैं आत्मज्ञानी नहीं हुं। मैंने सुना है आत्मज्ञानी (जन्म मरणके) शोकको पार कर जाता है।)<br />
मत्वैव विजानाति । (हे नारद मननसे हीजानाजाशकता है । ) (छांदोग्योपनिषद-7/18/1)<br />
यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति । (छांदोग्योपनिषद-7/23/1)<br />
(जो निरतिशय है, उस (परमात्मा होने) में सुख है, अल्प (जीव हो जाने) में सुख नहीं है।) (छांदोग्योपनिषद-7/23/1)<br />
[There is bliss in (Being) infinite (Parmatma), bliss is not in (being) finite (Jiva).)<br />
(Chhandogya Upanishad-7/23/1).<br />
यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा। यो वै भूमा तदमृतम्।। (छांदोग्योपनिषद-7/24/1)<br />
(जहाँ अन्य कोई न देखता है, अन्य कोई न सुनता है, अन्य कोई न जानता है, वही भूमा है। जो भूमा है वही अमृत है)<br />
आहारशुद्धौ सत्वशुद्धि:। सत्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृति ।स्मृतिलम्भे सवॅग्रंथीनां विप्रमोक्षस्तस्मै । (छांदोग्योपनिषद-7/26/2)<br />
( आहार शुद्धिसे (अंत:करणनी शुद्धि, अंत:करणकी शुद्धिसे अचल स्मृति, स्मृति मीलनेसे सब ग्रंथीयोंकी निवृत्ति हो जाती है ) (छांदोग्योपनिषद-7/26/2)<br />
यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन्समाहितमिति।। (छांदोग्योपनिषद-8/1/3)<br />
(जो कुछ भी इस लोकमें है, और जो नहीं भी है, वह सब पूर्णरुपसे इस (आत्मा) में रहा हुआ है।)<br />
(यत् च अस्य इह अस्ति)<br />
तद्यथेह कर्मजितो लोक: क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोक: क्षियते। (छांदोग्योपनिषद-8/1/6)<br />
(जिस तरह इस लोकमें कर्मके द्वारा अर्जित किया सब पदार्थ नष्ट हो जाते है, वैसे ही परलोकमें पुण्य द्वारा प्राप्त किया सब कुछ नष्ट हो जाता है।)<br />
(यद् यथा इह)<br />
यो वेदेदं जिध्राणीति स आत्मा।<br />
यो वेदेदं श्रृणवानीति स आत्मा । । (छांदोग्योपनिषद-8/12/4)<br />
(जो अनुभव करता है की मैं सुंघता हूँ वह आत्मा है, जो अनुभव करता है की मैं सूनता हूँ वह आत्मा है)</p>
<p>DHYANBINDU UPANISHAD<br />
हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत्पुन:।<br />
हंसहंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा।<br />
शतानि षड् दिवारात्रं सहस्त्राण्येकविंशति:।।<br />
(ध्यानबिंदुपनिषद-61-62) (योगचूडामण्युपनिषद-31-32)<br />
(&#8216;ह&#8217;कार ध्वनिसे प्राण बहार निकलता है और &#8216;स&#8217;कार ध्वनिसे फिर अंदर पिरवेशता है। हंस हंस इस प्रकार मंत्रजप जीव हंमेशा जपता रहता है। जिसकी संख्या दिन-रातमें मिलकर 21600 होती है।)<br />
स एव र्द्विविधो बिन्दु: पाण्डरो लोहितस्तथा।पाण्डरं शुक्रमित्याहुर्लोहिताख्यं महाराज:।।<br />
योनिस्थाने स्थितं रज:।। शशिस्थाने वसेद्बिन्दुस्तयोरैक्यं सुदुर्लभम्।<br />
बिन्दु: शिवो रज: शक्तिर्बिन्दु रजो रवि:।।<br />
(ध्यानबिंदूपनिषद-86-88)<br />
विर्य दो प्रकार के होते है: सफ़ेद और लाल।सफ़ेद को शुक्र और लाल को महारज कहा है। रज का निवास योनि स्थान में और बिन्दु चंन्द्र स्थान में निवास करता है। दोनोंका संयोग अतिदुर्लभ माना गया है।बिन्दु शिव और रज शक्ति है; बिन्दु चंन्द्र और रज को सूर्य कहा गया है।<br />
यदा तुरियातीतावस्था तदा सर्वेषामानन्दस्वरुपो भवति द्वन्द्वातीतो भवति।।(ध्यानबिंदुपनिषद-93-94)<br />
जब तुरियातीतावस्था प्राप्त होती है, तब सब कुछ आनंदस्वरुप लगने लगता है और द्वन्द्वभाव समाप्त हो जाता है।</p>
<p>DVAYA UPANISHAD<br />
आचिनोति हि शास्त्रार्थानाचारस्थापनादपि। स्वयमाचरते यस्तु तस्मादाचार्य उच्यते।<br />
(द्वयोपनिषद-3)<br />
(जो शास्त्रोंका सम्यक अर्थ करता है, और जो सदाचारकी केवल स्थापना ही नहीं करता बल्की स्वयम् उसका आचरण भी करता है, उसको आचार्य कहते है।)<br />
गुशब्दस्त्वन्धकार: स्यात् रुशब्दस्तन्निरोधक:।<br />
अन्धकारनिरोधित्वाद्गुरुरित्यभिधीयते।।<br />
(द्वयोपनिषद-4)<br />
(गु शब्दका अर्थ अंधकार और रु शब्दका अर्थ उस (अंधकार) का निरोधक होता है। (अज्ञानके) अंधकारको रोकनेके कारण ही (अंधकारको रोकनेवाली व्यक्तिको) गुरु कहते है।) (द्वयोपनिषद-4)</p>
<p>GOPALPURVATAPIN UPANISHAD<br />
गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद<br />
कृषिर्भूवाचक: शब्दो नश्च निर्वृतिवाचक:।<br />
तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते।।<br />
ॐ सच्चिदानन्दरुपाय कृष्णायाक्लिष्टकर्मणे।<br />
नमो वेदान्तवेद्याय गुरवे बुद्धिसाक्षिणे।।<br />
(गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद-1)<br />
(&#8216;कृष्&#8217; शब्द सत्तावाचक है और &#8216;न&#8217; शब्द आनंदबोधक है। उन दोनोंकी समीपता ही परब्रह्म श्रीकृष्णके नामको प्रतिपादित करती है। जो अनायास ही सब करनेको शक्तिमान है, जो वेदांतके द्वारा जानने योग्य है, जो सभीकी बुद्धिके साक्षी और समग्र विश्वके गुरु है, वह सच्चिदानंदस्वरुप भगवान श्रीकृष्णको सादर नमस्कार।)<br />
कृष्णो वै परमं दैवतम्। गोविन्दान्मृत्युर्बिभेति। गोपीजनवल्लभज्ञानेनैतद्विज्ञातं भवति।<br />
स्वाहेदं विश्वं संसरतीति।।<br />
(गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद-3)<br />
(श्रीकृष्ण ही सर्वश्रेष्ठ देवता है। गोविंदसे मृत्यु भी भयभीत रहता है। गोपीजनवल्लभको जाननेसे सब अच्छी तरह जान लिया हो जाता है। उनकी स्वाहारुप मायाशक्तिसे प्रेरित यह समग्र जगत आवागमनके चक्रमें घूमाकरता है।)<br />
क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।। (गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद-12)<br />
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो विद्यां तस्मै गोपायति स्म कृष्ण:।<br />
तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षु: शरणं व्रजेत्।। (गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद-22) (श्वेताश्वतरोपनिषद-6/18)<br />
(जो सृष्टिके आरंभमें ब्रह्माजीको प्रकट करके उनको वेदविद्याका ज्ञान प्रदान करते है, उस भगवान श्रीकृष्णके शरणमें मुमुक्षुओंको आत्म बुद्धि प्रकाशकी आकांक्षासे जाना चाहिये।)</p>
<p>ISHAVASYAM UPANISHAD<br />
ॐ ईशावास्यंमिदं सवॅं यत्किंच जगत्यां जगत् ।<br />
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनं ।(ईशावास्योपनिषद-1)<br />
(Ishaavasyam idam sarvam yatkinchjagatyamjagat- Ishavasyopanishad-1). Whatever live or dead is visible here, in this world, is Brahm.<br />
(यह लोकमें जो कुछभी है, वह सब ईशमय है । केवल उनके द्वारा जो त्यागा हुआ है, उसका ही उपयोग करो । लालच न करो । धन कभी किसीका हुआ है?)<br />
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः ।<br />
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः । (ईशावास्योपनिषद-3)<br />
(उपरोक्त अनुशासनका भंग करनेवाले जो आत्म हनन करने वाले है वे लोग है वे (मृत्युके बाद) प्रेतरुपमें गाढ अंधकारयुक्त वह असुर्या नामसे जानेजाते लोकमें जाते है।)<br />
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति।<br />
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते।।(ईशावास्योपनिषद-6)<br />
परंतु जो (मनुष्य जड-चेतन) सम्पूर्ण प्राणियोंको अपनेमें ही निरंतर देखता है, और सम्पूर्ण प्राणियोंमें अपनेको (देखता है); उसके पश्च्यात (वह कभी भी किसी से) अगोचर नहीं हो सकता है।<br />
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभ्यं सह।<br />
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते।। (ईशावास्योपनिषद-11)<br />
(विद्या और अविद्याको दोनोंको एक साथ जानों। अविद्या (भौतिक ज्ञान) द्वारा मृत्युको पार करके, विद्या (आध्यात्मिक ज्ञान) द्वारा अमरत्वकी प्राप्ति हो सकती है।)<br />
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। (इशावास्योपनिषद-15) (ब़ह्दारण्यकोपनिषद-5/15/1)<br />
(सत्यका मुख सुवर्ण पात्रसे ढंका हुआ है। )<br />
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।<br />
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम।। (ईशावास्योपनिषद-18)<br />
(हे अग्ने (यज्ञ प्रभु) आप हमें श्रेष्ठ मार्गसे ऐश्वर्यकी और ले जाइये। हे विश्वके अधिष्ठाता देव! आप कर्म मार्गोंके श्रेष्ठ ज्ञाता है। हमें कुटिल पापकर्मोंसे बचाइए। हम बारं-बार नमन करके आपसे विनंति कर रहे है।)</p>
<p>JABAL DARSHANA UPANISHAD<br />
આ ઉપનિષદ મા, ભગવાન દત્તાત્રેય પોતાના શિષ્ય સાંકૃતિ ને જીવન મુક્તિ ના સાધન એવા અષ્ટાંગ યોગનો બોધ આપેછે.<br />
आत्मन्यनात्मभावेन व्यवहारविवर्जितम्।<br />
यत्तदस्तेयमित्युक्तमात्मविद्भिर्महामुने।। (जाबालदर्शनोपनिषद1/12)<br />
(हे मुनि!! इस संसारके समस्त व्यवहारमें अनात्मबुद्धि रखकर, आत्मासे उसको दूर रखनेका जो भाव है, उसको ही आत्मज्ञानी लोग &#8220;अस्तेय&#8221; कहते है)<br />
स्वात्मवत्सर्वभूतेषु कायेन मनसा गिरा सा दया। (जाबालदर्शनोपनिषद1/15)<br />
(तमाम भूत प्राणीओंको शरीर, मन और वचनसे अपने समान मानना दया है।)<br />
पुत्रे मित्रे कलत्रे च रिपौ स्वात्मनि संततम्।एकरुपं यत्तदार्जविमित्युक्तम्। (जाबालदर्शनोपनिषद1/16)<br />
(पुत्र, मित्र, स्त्री और अपनेमें भी हंमेशा मनका समान भावको आर्जव (सरलता) कहते है।)<br />
वेदादेव विनिर्मोक्ष: संसारस्य न चान्यथा। (जाबालदर्शनोपनिषद1/18)<br />
(वेदज्ञानसेही संसारका संपूर्ण मोक्ष होता है, अन्यथा कीसीसे नहीं।)<br />
अत्यन्त मलिनो देहो देही चात्यन्त निर्मल:।<br />
(जाबालदर्शनोपनिषद-1/21)<br />
(देह अत्यन्त मलिन है और आत्मा अत्यन्त निर्मल है।)<br />
न चास्ति किंचित्कर्तव्यमस्ति चेन्न स तत्त्ववित्।।<br />
(जाबालदर्शनोपनिषद-1/23)<br />
(ब्रह्मज्ञानीको इस जगतमें कुछभी कर्तव्य बाक़ी नहीं है। अगर बाक़ी है तो वह ब्रह्मज्ञानी नहीं है।)<br />
रागाद्यपेतं ह्रदयं वागदुष्टानृतादिना।<br />
हिंसादिरहितं कर्म यत्तदीश्वरपूजनम्।। (जाबालदर्शनोपनिषद-2/8)<br />
(राग आदि विकारोंसे मुक्त ह्रदय, असत्य आदि दोषोंसे पर वाणी और हिंसा आदि दोषोंसे मुक्त कर्म ही ईश्वर-पूजन है।)<br />
अष्टप्रकृतिरुपा सा कुण्डली मुनिसत्तम।। (जाबालदर्शनोपनिषद4/11)<br />
(हे मुनि कुंडलिनीको अष्ट प्रकृति रुपा (पृथ्वी, जल, तेज़, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार युक्त) कही जाती है।)<br />
सुषुम्नाया इड़ा सव्ये दक्षिणे पिंगला स्थिता। (जाबालदर्शनोपनिषद-4/13)<br />
(सुषुम्नाके बांये भागमें इड़ा और दाहिने भागमें पिंगला रही हुइ है।)<br />
सुषुम्नाया: शिवो देव उड़ाया देवता हरि: पिंगलाया विरंचि। (जाबालदर्शनोपनिषद-4/36)<br />
शिवमात्मनि पश्यन्ति प्रतिमासु न योगिन:।<br />
अज्ञानां भावनार्थाय प्रतिमापरिकल्पिता ।। (जाबालदशॅनोपनिषद4/59)<br />
&#8220;Men with wisdom see God in themselves, and not in the idols. The idols are imagined just to shelter the sentiments of ignorant people&#8221;.<br />
आत्मस्वरुपविज्ञानादज्ञानस्य परिक्षय:। क्षीणेऽज्ञाने महाप्राज्ञ रागीदीनां परिक्षय:।। रागाद्यसंभवे प्राज्ञ पुण्यपापविमर्दनम्। तयोर्नाशे शरीरेण न पुन: संप्रयुज्यते।। (जाबालदर्शनोपनिषद-6/50-51)<br />
(आत्मस्वरुपके सम्यक् ज्ञान हो जानेसे, अज्ञानका नाश हो जाता है। हे महा प्राज्ञ! अज्ञान नष्ट होनेसे राग द्वेष आदिका भी विनाश हो जाता है। हे प्राज्ञ! रागादि विषयों न रहनेसे पाप-पुण्यका भी विलय हो जाता है।और पाप-पुण्य न रहनेसे (ऐसे ज्ञानीको) फिर शरीरसे नहीं जोड़ा जा सकता।)<br />
इन्द्रियाणां विचरतां विषयेषु स्वभावत:। बलादाहरणं तेषां प्रत्याहार: स उच्यते। यत्पश्यति तु तत्सर्वं ब्रह्म पश्यन्समाहित:।। प्रत्याहारो भवेदेष ब्रह्मविद्भि: पुरोदित:। (जाबालदर्शनोपनिषद7/1-3)<br />
(विषय भोगोंमें स्वभाववश विचरने वाली सभी इन्द्रियोंको वहाँसे बलपूर्वक पुन: खिंचनेका जो प्रयास है, उसको प्रत्याहार कहा जाता है। मनुष्य जो कंई दिखता है वह सब ब्रह्म ही है, इस तरह जानकर उस ब्रह्ममें चित्त एकाग्र करना हि प्रत्याहार है, ऐसा ब्रह्मवेत्ता कहते है।)<br />
अहमस्मीत्यभिध्यायेयातीतं विमुक्तये।। (जाबालदर्शनोपनिषद9/5)<br />
((परमात्मा) मैं स्वयम् ही हूँ , इसतरह किया हुआ ध्यान मोक्ष प्राप्त करानेवाला है।)<br />
समाधि: संविदुत्पत्ति: परजीवैकतां प्रति।। (जाबालदर्शनोपनिषद10/1)<br />
(परमात्मा और जीवात्मा एक हि है ऐसे प्रज्ञानका निरंतर रहना हि समाधि है।)<br />
नित्य: सर्वगतो ह्यात्मा कूटस्थो दोषवर्जित:।<br />
एक: संभिद्यते भ्रान्त्या मायया न स्वरुपत:।। (जाबालदर्शनोपनिषद-10/2)<br />
(आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल और सर्वदोषरहित ही है। एकही है फीरभी माया द्वारा उत्पन्न भ्रमके कारण अलग-अलग दिखते है, वास्तवमें अलग-अलग नहीं है।) (जाबालदर्शनोपनिषद-10/2)<br />
(Atmaa is eternal, omnipresent, changeless and with the exception of any defects. In reality it is one alone and not individual; but sounds individual because of confusion born out of illusion.) (Jabaldarshana Upanishad-10/2)<br />
तस्मादद्वैतमेवास्ति न प्रपंचो न संसृति:।<br />
इसलिए केवल अद्वैतरुप (परमात्मा) ही यहाँ है, प्रपंच या संसार जैसा कुछ भी नहीं है।<br />
यथा फेनतरंगादि समुद्रादुत्थितं पुन: समुद्रे लीयते। तद्वज्जगन्मय्यनुलीयते।। (जाबालदर्शनोपनिषद10/6)<br />
(जैसे समुद्रसे उत्पन्न फिण और लहरें वापस समुद्रमें विलीन हो जाते है, वैसे ही जगत (मेरेमेंसे उत्पन्न होकर) मेरेमें ही विलीन हो जाता है।)<br />
यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येव हि पश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ब्रह्म संपद्यते तदा।। (जाबालदर्शनोपनिषद10/10)<br />
जब (योगी) सब प्राणिओंको अपनेमें देखता है और अपनेको सब प्राणिओंमें देखता है, तब वह स्वयं ब्रह्म ही बन जाता है।)</p>
<p>JABALA UPANISHAD<br />
सोअविमुक्त ज्ञानमाचष्टे यो वै तदेतदेवं वेदेति।(जाबालोपनिषद-2/2<br />
(जीसने अविमुक्तका ज्ञान प्राप्त कर लिया है, वही यह अात्मा-देवके विषयमें उपदेश दे शकते है))</p>
<p>JABALI UPANISHAD<br />
पशुपतिरहंकाराविष्ट: संसारी जीव: स एव पशु:।<br />
(जाबाल्युपनिषद-11)<br />
( पशुपति स्वयम् अहंकारयुक्त हो जानेसे संसारी जीव हो जाता है, वही पशु भी है।)</p>
<p>KALISANTARN UPANISHAD<br />
द्वापरान्ते नारदो ब्रह्माणं जगाम कथं भगवन् गां पर्यटन्कलिं संतरेयमिति। स होवाच।<br />
भगवत आदिपुरुषस्य नारायणस्य नामोच्चारणमात्रेण निर्धूतकलिर्भवति। (कलिसंतरणोपनिषद-1)<br />
द्वापरयुगके अंतिम समयमें एकबार देवर्षि नारदजीने ब्रह्माजीको पूछा कि &#8220;हे भगवन पृथ्विलोकमें भ्रमन करता मैं कलियुगसे कैसे मूक्ति पा शकता हूँ&#8221; ? ब्रह्माजीने कहा: &#8220;भगवान आदिपुरुष श्रीनारायणके मात्र नामोच्चारसे ही (मनुष्य) कलियुगके सभी दोषोंसे मूक्त हो जाता है&#8221;।)</p>
<p>KATHOPANISHAD<br />
सस्यमिव मर्त्य: पच्यते सस्यमिवाजायते पुन:।। (कठोपनिषद-1/1/6)<br />
(मरणधर्मा मनुष्य फसलके समान पकता है (वृद्ध होकरमृत्युको प्राप्त होता है) और पुन: कालक्रमानुसार फसलके समान उत्पन्न होता है)<br />
अग्निं विद्धि त्वमेतन्निहितं गुहायाम्।। (कठोपनिषद-1/1/14)<br />
((नचिकेत संसारकी आधाररुप) इस अग्निको तुम गुफ़ामें (गुप्त) रही हुइ समजो)<br />
चित्तका स्थान नाभी है। नाभीको गुफ़ाभी कहा जाता है। कुंडलीनीका स्थान भी नाभी कहा जाता है जो विश्वउर्जा का रुप कही जाती है। यहाँ यम नचिकेतको यह कुंडलिनी विद्या दे रहे है।<br />
न वित्तेन तपॅणियो मनुष्यो ।(कठोपनिषद-1/1/27)<br />
(मनुष्य कभीभी वित्तसे संतुष्ट नहीं होता । )<br />
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ संपरीत्य विविनक्ति धीर:।<br />
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणिते प्रेयो मन्दोयोगक्षेमादवृणिते।। (कठोपनिषद-1/2/2)<br />
(श्रेय (मार्ग) और प्रेय (मार्ग) दोनों मार्ग मनुष्यके सामने क़रीब एक साथ ही उपस्थित होतेहै। विवेकी मनुष्य ही दोनोंके भेदको समज लेता है। विवेकी जन ही प्रेय (मार्ग) से श्रेय (मार्ग) को कल्याणकारी समजकर पसंद कर लेता है, जबकी मंदमती योग़क्षेमकी लालसासे प्रेयमार्गको ही पसंद कर पाता है।) (कठोपनिषद-1/2/2)<br />
[Both the Righteous (Path) and the Pleasant (Path) present themselves almost simultaneously to a man. The Enlightened examines them well and discriminates good and evil (among both). The Enlightened man selects the Righteous (Path) over the Pleasant (Path); but the idiot selects the Pleasant (Path) for procuring sustenances.](Katha Upanishad-1/2/2)<br />
अविद्यायामन्तरे वतॅमाना: स्वयं धीरा: पण्डितं मन्यमाना:।<br />
दन्द्रम्यमाणा: परियन्ति मूढा अंधेनैव नीयमाना यथान्धा:।।(कठोपनिषद-1/2/5)(मुंडकोपनिषद-1/2/8).<br />
(अविद्यारुप अंधकारमें रहते हुए भी, अपनेको ज्ञानी और पंडित समजने वाले मूढ़ों, ठीक वैसे ही अनेक ठोकरों खाते हुए भटकते फिरते है; जैसे अंधों मनुष्यों के द्वारा चलाये जानेवाले अंधे।)(कठोपनिषद-1/2/5) (मुंडकोपनिषद-1/2/8).<br />
(The idiots, even though they are staying in the darkness of the Ignorance, yet believing themselves to be wise and erudite, are peregrinating and repeatedly stumbling exactly likewise the blinds that are being lead by the blind leaders).<br />
(Katha Upanishad-1/2/5). (Mundaka Upanishad-1/2/8)<br />
अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनवॅशमापद्यतेमे। (कठोपनिषद-1/2/6)<br />
(यह लोक ही है, पर लोक नहीं है, ऐसा जो मानता है, वह वारंवार मेरे पाशमें आता है।) यमराजा<br />
न ह्यध्रृवै: प्राप्यते हि ध्रुवं तत्। (कठोपनिषद-1/2/10)<br />
(नश्वर साधनोसे उस अनश्वर (परमात्मा) का साक्षात्कार नहि हो सकता) (कठोपनिषद-1/2/10).<br />
(What is eternal (Parmatma) that can’t be realized by the ephemeral applications). (Katha Upanishad-1/2/10.).<br />
स मोदते मोदनीयंहि लब्धवा। (कठोपनिषद-1/2/13) (वे आनंदस्वरुप परमात्माको प्राप्त करके आनंदमें लीन हो जाते है।)<br />
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च तद्वदन्ति।<br />
यदिच्छन्तो ब्रह्मचयँ चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेणब्रवीम्योमित्येतत्।। (कठोपनिषद-1/2/15)<br />
(सवॅ वेदों जीस पदका वारंवार वणॅन करते है, सवॅ तपों जीसकी प्राप्तिकेसाधन है, जीसकी प्राप्तिकी इच्छाके लिये ब्रह्मचयॅका पालन करा जाता है, वह मैं पद टूंकमें कहता हुँ। ॐ ही वह पद है) (कठोपनिषद)<br />
एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् ।<br />
एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत्।। (कठोपनिषद-1/2/16)<br />
(यह ॐ अक्षर ही ब्रह्म है, यह ॐ अक्षर ही परम है, यह ॐ अक्षरको जान लेनेसे वह जो इच्छता है, उनका वो हो जाता है।)<br />
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।<br />
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैव आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम्।। (कठोपनिषद-1/2/23) (मुंडकोपनिषद-3/2/3)<br />
(यह परमात्मा नतो धर्मोपदेश करनेसे, नहीं बुद्धिसे और नहीं वेदों के ज्ञान को बहुत सुनने से भी प्राप्त होनेवाला है। केवल जिसको परमात्मा ने चयनित किया है, वह हि परमात्मा को प्राप्त करने के योग्य बनता है; क्योंकि परमात्मा खुद हि उनके सामने अपने स्वरुपको प्रकट कर देते है।) (कठोपनिषद-1/2/23) (मुंडकोपनिषद-3/2/3)<br />
(This Parmatma is neither obtainable by spiritual preaching, nor by intellect and nor by severely listening to the knowledge of Vedas. Only the one who has been selected by Parmatma, becomes capable of obtaining Parmatma; because Parmatma Himself unsheathes His own form before that person). (Katha Upanishad-1/2/23) (Mundaka Upanishad-3/2/3).<br />
यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत: औदन:।<br />
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र स:।।<br />
(ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों जिसका आहार हो जाते है, स्वयं मृत्युतो उस(ब्रह्म )का चटनी जैसा व्यंजन है, उसको जाननेवाला यहाँ कौन है?)<br />
मृत्यु: यस्य उपसेचनम्। (कठोपनिषद-1/2/25)<br />
मृत्युर्यस्योपसेचनम्।<br />
(मृत्युतो उस(ब्रह्म )का चटनी जैसा व्यंजन है । )<br />
या प्राणेन संभवत्यदितिर्देवतामयी।<br />
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तिं या भूतेभिर्व्यजायत, एतद्वै तत्।। (कठोपनिषद2/1/7)<br />
(जो प्राणसे उत्तपन्न हुई है, जो भूतोंके साथ ही उत्तपन्न हुई है, वह देव क्षमता संपन्न अखंडचेतना सभीकी गुफ़ामें प्रवेश करके रहती है, वही उस (परमात्मा) है।)<br />
आत्मानं रथिनं विद्धि शरिरं रथमेव च।<br />
बुद्धिं तु सारथि विद्धि मन: प्रग्रहमेव च ।। (कठोपनिषद-1/3/3) (पेंगलोपनिषद)<br />
तस्माद्भूयो न जायते। (कठोपनिषद-1/3/8)<br />
(जहाँ जानेसे फिर पुन: जन्म नहीं होता)<br />
महत: परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुष: पर: ।<br />
पुरुषान्न परं किचिंत्सा काष्ठा सा परा गति:।। (कठोपनिषद-1/3/11)<br />
(बुद्धिसे प्रकृति श्रेष्ठ है, प्रकृतिसे परमात्मा श्रेष्ठ है और परमात्मासे श्रेष्ठ कुछभी नहीं है। वह सबकी पराकाष्ठा और परमगति है।)<br />
एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते।<br />
दृश्यते त्वग्रयया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभि:।। (कठोपनिषद-1/3/12)<br />
(संपूर्ण भूतोंमें छीपा यह परमात्मा दृष्यमान नहीं होता। यह तो सूक्ष्मदर्शि पुरुषों द्वारा अपनी सूक्ष्म बुद्धिसे ही देखा जाता है।)<br />
परांचि खानि व्यतृणत्स्वयंभूस्तस्मात्परांपश्यति नान्तरात्मन्।<br />
कश्चिद्धिर: प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्।। (कठोपनिषद-2/1/1)<br />
(स्वयंभू परमात्माने सभी इन्द्रियोंके द्वार बहिर्मुख करके बनाये है, इसलिये (मनुष्य स्वाभाविकरुपसे) बाहर ही देखता है, अंतरात्माको नहीं। अमृतत्व पानेकी आकांक्षासे जीस धीर पुरुषने अपनी इन्द्रियोंको बाहर देखने से रोक लिया है, उसने ही प्रत्यगात्माको देखा है।)(कठोपनिषद-2/1/1).<br />
(Self Existent Parmatma has made the openings of sense organs outwardly, therefore (man naturally) observes outwardly only and not the inner Atmaa. A rare man having the Knowledge of Discernment, who has obstructed his sense organs from looking outwardly with a view to attaining immortality, that alone has realized Parmatma)(Katha Upanishad-2/1/1).<br />
यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह।<br />
मृत्यो: स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति।।(कठोपनिषद-2/1/10)<br />
इह तत् एव अमुत्र यत् अमुत्र तत् अनु इह<br />
जो (ब्रह्म) यहाँ है, वही वहाँ (परलोकमें) भी है, जो (वहाँ है, वही यहाँ (इस लोकमें) भी है। वह वारंवार मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है, जो यहाँ (ब्रह्मको) अनेकरुप समजता है।)<br />
नेह नानास्ति किंचन। (कठोपनिषद-2/1/11)<br />
(जगतमें ब्रह्मके सिवाय कुछभी नहीं है।)<br />
यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति।<br />
एवं धर्मान्पृथक्पश्यंस्तानेवानुविधावति।।(कठोपनिषद-2/1/14)<br />
(जैसे शिखरों के पर वर्षा हुआ पानी पर्वतों में चारों ओर बह (कर नष्ट हो) जाता है, वैसे ही धर्मों को अलग अलग समजता हुआ (मनुष्य) उसी तरह चारों ओर भटक (कर नष्ट हो) जाता है।)<br />
योनिमध्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिन:।<br />
स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथा श्रुतम्।। (कठोपनिषद-2/2/7)<br />
(આ ત્રીજા પ્રશ્નનો ઉત્તર છે.)<br />
(अपने कर्म और ज्ञानके अनुसार कितने ही जीव तो देह धारण करने लिये अलग अलग योनीको प्राप्त होते है, और कितने ही स्थावरभावको प्राप्त हो जाते है।)<br />
अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रुपं रुपं प्रतिरुपो बभूव।<br />
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रुपं रुपं प्रतिरुपो बहिश्च।। (कठोपनिषद-2/2/9)<br />
(जैसे एक ही अग्नि (प्रकृतिकी अलग अलग) कृतिमें प्रवेश करके उस कृतिके रुपका ही हो जाता है, वैसे ही समस्त प्राणिओंके अंदर एक ही आत्मा उस प्राणीओंके अनुरुप हो जाता है।)<br />
(As fire which is one, on entering creation, conforms its own form to the form of each being; so also one Atma, while dwelling in all beings, assumes their forms. It dwells outside them also.)<br />
वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रुपं रुपं प्रतिरुपो बभूव।<br />
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रुपं रुपं प्रतिरुपो बहिश्च।। (कठोपनिषद-2/2/9)<br />
(जैसे एक ही वायु (प्रकृतिकी अलग अलग) कृतिमें प्रवेश करके उस कृतिके रुपका ही हो जाता है, वैसे ही समस्त प्राणिओंके अंदर एक ही आत्मा उस प्राणीओंके अनुरुप हो जाता है।)<br />
(As air which is one, on entering creation, conforms its own form to the form of each being; so also one Atma, while dwelling in all beings, assumes their forms. It dwells outside them also.)<br />
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रुपं रुपं प्रतिरुपो बहिश्च।। (कठोपनिषद-2/2/10)<br />
(समस्त प्राणिओंमें विद्यमान परमात्मा एकही होनेपर भी विभिन्न रुपों वाले दिखते है, बहार भी वही है।)<br />
मनसैवानुद्रष्टव्यं नेह नानास्ति किंचन।<br />
मृत्यौ: स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति।।<br />
(बृहदारण्यकोपनिषद-4/4/19)<br />
मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन।<br />
मृत्यौ: स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति।।<br />
(कठोपनिषद-2/1/11)<br />
((ब्रह्म एक ही यहाँ है), यहाँ अलग-अलग जैसा कुछभी नहीं है, (प्रगमनशील हुए) मनसे ही यह तत्त्व प्राप्त करने योग्य है। जो मनुष्य यहाँ अलग-अलगसा दिखता है, वह मृत्युसे मृत्युको ही प्राप्त होता रहता है।) (बृहदारण्यकोपनिषद-4/4/19)(कठोपनिषद-2/1/11)<br />
[(Parmatma alone is here), there is nothing like diversity here, this has to be realized by a Mind (that is made an excellent). Whoever is understanding that there prevails diversity here, ensures from death to death for himself] (Brihdaranyaka Upanishad-4/4/19) (Katha Upanishad-2/1/11).<br />
यो विदधाति कामान्। (कठोपनिषद-2/2/13) (श्वेताश्वतरोपनिषद-6/13)<br />
(जो (परमात्मा समस्त जीवोंको) कर्मानुसार फल देनेवाला है।)<br />
तस्य भासा सवॅमिदं विभाति। (कठोपनिषद-2/2/15) (मुंडकोपनिषद)<br />
(उसके प्रकाशने से ही यह समस्त जगत प्रकाशमान दिखता है।)<br />
ऊर्ध्वमूलोऽवाकशाख एषोऽश्वत्थ: सनातन:। (कठोपनिषद-2/3/1)<br />
भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्य:।<br />
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पंचम:।। (कठोपनिषद-2/3/3)<br />
भीषाअस्माद्वातः पवते । भीषोदेति सूयॅ।भीषाअस्मादग्निश्चेन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पंचम इति।<br />
(तैत्तिरीयोपनिषद-2/8/1)<br />
(वह परमात्माके भयसे वायु वाता है, उसके भयसे सूयॅ उगता है, और उसके भयसे ही अग्नि, इंन्द्र और पांचवा मृत्यु दोडता है ।)<br />
न चक्षुसा पश्यति कश्चनैनम्। (कठोपनिषद-2/3/9) (श्वेताश्वतरोपनिषद-4/20) (अांखसे कोइ उसे देख नहि शकता)<br />
(Na chakshusa pasyati kaschaneinam-Kathopanishad-2/3/9)(None can see That(Brahman) with eyes).<br />
यदा पंचावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह।<br />
बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहु: परमां गतिम्।। (कठोपनिषद-2/3/10)(આનેજ યોગ કહ્યો છે.)<br />
(जब मनके साथ पाँचो ज्ञानेन्द्रिय (आत्मतत्वमें) स्थिर हो जाती है, और बुद्धिभी चेष्टा रहित हो जाती है, तब वह परम स्थिति कहलाती है।)<br />
तां योगमिति मन्यन्ते।।(कठोपनिषद-2/3/11)<br />
(इसको ही योग माना गया है।)</p>
<p>KAUSHHITAKIBRAHMNA UPANISHAD<br />
स होवाच ये वै के चास्माल्लोकात्प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति। तेषां प्राणै: पूर्वपक्ष आप्यायते। अथारपक्षे न प्रजनयति। (कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद-1/2)<br />
(उस (गर्गना प्रपौत्र महर्षि चित्रने श्वेतकेतुके पिता और आरुणके पुत्र महात्मा उदालक (गौतम, आरुणि)को) कहा हे ब्रह्मन! जो कोई (अग्नि होत्रादि सत्कार्योंका अनुष्ठान करने वाले सब) लोगों, जब इस लोकमेंसे प्रयाण करते है, तो वै चन्द्रलोक ( स्वर्गलोक)में जाते है। पूर्वपक्ष (पुण्य बाक़ी होता है तब) तक वे प्राणोंके द्वारा वहाँके भोग पदार्थोंका सेवन करते है। दूसरे पक्षमें (अर्थात् पहेलेके पुण्यों क्षीण होते हि चन्द्रलोक उसको) तृप्ति प्रदान नहीं कर सकता (तब वहाँसे गीरा देते है)<br />
इह वृष्टर्भूत्वा वर्षति स इह कीटो वा पतंगो वाशकुनिर्वा शार्दूलो वा सिंहो वा मत्स्यो वा परश्वा वा पुरुषो वान्यो वैतेषु स्थानेषु प्रत्याजायते यथाकर्म यथाविद्यम्।<br />
(कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद-1/3)<br />
(इस लोकमें उन (सूक्ष्म जीव) को वर्षाके रुपमें बरसा देते है। यहाँ वह जीव अपने कर्म और विद्या और वासनाके अनुसार कीट, पतंगा, पक्षी, वाघ, सिंह, मछली, साँप, मनुष्य, अथवा अन्य कोइ योनीका शरीर प्राप्त करके कर्मानुसार स्थानमें रहता है।)<br />
तत्सुकृतदुष्कृते धुनुते। तस्य प्रिया ज्ञातय: सुकृतमुपयन्त्यप्रिया दुष्कृतम्।<br />
(कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद-1/4)<br />
((ब्रह्मज्ञानी विरजा नदीको पाप करके) वहाँ वह ब्रह्मज्ञानी सब पुण्य और पापको छोड़ देता है। (उस ब्रह्मज्ञानीके) जो प्रिय कुटंबीजन है उनको पुण्य कर्म प्राप्त होते है, और जो उनका द्वेष करनेवाले है, उनको पाप उठाने पड़ते है।)<br />
तद्यथा रथेन धावयन्रथचक्रे पर्यवेक्षत, एवमहोरात्रे पर्यवेक्षत एवं सर्वाणि च द्वन्द्वानि स एष ब्रह्म विद्वान्ब्रह्मैवाभिप्रैति।।(कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद-1/4)<br />
जिस तरह रथसे यात्रा करनार को, (रथके पैडेका ज़मीन से होता संयोग वियोग) दृष्टा होनेके कारण (अपना संयोग वियोग नहीं लगता वैसे ही) दिवस रात और अन्य सभी द्वन्द्वोका दृष्टा होनेके कारण ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म को ही प्राप्त होते है।<br />
वै प्राणा: एकैकमेतानि सर्वाण्येव प्रज्ञापयन्ति। (कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद-3/2)<br />
(वे सब प्राण क्रमश: एक-एक विषयकी अनुभूति करते है।)<br />
यो वै प्राण: सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राण:। (कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद-3/3)<br />
((क्रियाशक्तिका ज्ञान जिससे होता है) वह जो प्राण है, वहि (ज्ञानका बोध जिससे होता है वह) प्रज्ञा है, और जो प्रज्ञा है वहि प्राण है।)<br />
न हि प्रज्ञापेता धी: काचन सिद्धयेन्न प्रज्ञातव्यं प्रज्ञायेत।।(कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद-3/7)<br />
कोई भी बुद्धिवृत्ति प्रज्ञा से पृथक होनेपर नहीं सिद्ध हो सकती, उसके द्वारा ज्ञातव्य वस्तुका बोध भी नहीं हो सकता।<br />
स एष प्राण एव प्रज्ञात्मानन्दोऽजरोऽमृत:। स मआत्मेति विद्यात्।।(कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद-3/9)<br />
(यह जो प्राण है वही प्रज्ञात्मा, आनंदस्वरुप, अजर-अमर है। यह प्राण को हि आत्मा है, ऐसा समजना चाहिये।)</p>
<p>KEVALYA UPANISHAD<br />
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।<br />
संप्रश्यन्ब्रह्म परमं याति नान्येन हेतुना।। (कैवल्योपनिषद-10)<br />
(जब सब प्राणिओंमें रहे हुए आत्माको मनुष्य समभावसे देखता है और अपनेको सब प्राणिओंमें देखता है, तब वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है; अन्य कोइ उपायसे नहीं।)<br />
स्त्रियन्नपानादिविचित्रभोगै: स एव जाग्रत्परितृप्तिमेति।<br />
स्वप्ने स जीव: सुखदु:खभोक्ता स्वमायया कल्पितजीवलोके।<br />
सुषुप्तिकाले सकले विलिने तमोऽभिभूत: सुखरुपमेति।। (कैवल्योपनिषद-12-13)<br />
(जीव जाग्रतावस्थामें स्त्रि, अन्नपान, विगेरे विविध भोगोंको भोगके तृप्त होता है। स्वप्नावस्थामें वह जीव अपनी माया द्वारा कल्पित सब प्रकारके सुख-दु:ख जीवलोकमें भोगता है। तथा सुषुप्तिकालमें (जब माया द्वारा रचे गये सब प्रपंचो) विलिन हो जाते है; (तब वह जीव) तमोगुणरुप सुखस्वरुपको प्राप्त होता है)<br />
तत्त्वमेव त्वमेव तत्। (कैवल्योपनिषद-16)<br />
((वह ब्रह्म) तत्त्व तुम हो, तुम वह हो।)</p>
<p>KEN UPANISHAD<br />
यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते।<br />
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते।।<br />
(केनोपनिषद-1/4)<br />
(जो वाणिसे प्रकाशित नहीं है, किन्तु जिससे वाणि प्रकाशित होती है, उसीको तू ब्रह्म जान, जिस इस (देशकालावच्छिन्न वस्तु) की लोक उपासना करते है वह ब्रह्म नहीं है।)<br />
यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राण: प्रणियते।<br />
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते।। (केनोपनिषद-1/8)<br />
जिसको प्राणके द्वारा सजीवन नहीं किया जाता है, लेकिन जिससे प्राण उपजते है; उसीको तू ब्रह्म जान।जिस इस (देशकालावच्छिन्न वस्तु) की लोक उपासना करते है वह ब्रह्म नहीं है।)<br />
यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रुपम्। (केनोपनिषद-2/1)<br />
((आचार्य शिष्यको कहते है)अगर आपकी मान्यता है की मैंने ब्रह्मको अच्छी तरहसे जान लिया है , तो निश्चितही आपने ब्रह्मकाअल्प अंश ही जानाहै।)<br />
नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च।<br />
यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च।। (केनोपनिषद-2/2)<br />
((शिष्य उत्तर देता है:(ब्रह्मको पूर्णतया जान लिया है, ऐसा मैं मानता नहीं हुँ और ऐसा भी नहीं मानता कि नहीं जानता, क्योंकि जानता भी हुँ।हम शिष्योंमेंसे जो उसे &#8216;न तो नहीं जानता हुँ और जानता ही हुँ&#8217; इस प्रकार जानता है वही जानता है)<br />
यस्यामतं तस्यमतं मतं यस्य न वेद स:।<br />
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्।।<br />
(केनोपनिषद-2/3)<br />
[(ब्रह्म जाना जा सकता) नहीं है (ऐसा) मत जिसका है, (यह) उस (ज्ञानी) का मत है।(ब्रह्म जाना जा सकता है ऐसा) मत जिसका है, वह अज्ञानी है।ज्ञानीओं का (ब्रह्म उससे जो) अज्ञात (रह गया वह) होता है और अज्ञानी का (ब्रह्म मन, बुद्धि, शरीर जो उसे) ज्ञात (लगता है वह) होता है।] (केनोपनिषद-2/3)<br />
[Whose supposition is (that Parmatma could) not (be known), is supposition that of (sapient). Whose supposition is (that Parmatma can be known), that is ignorant. (Parmatma) for sapient happens to be (what remains) unknown (to them) and (Parmatma) for ignorant happens to be (mind, intellect, body that sounds) known (to him.)<br />
(Kena Upanishad-2/3).<br />
प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते।(केनोपनिषद-2/4)<br />
(बोध प्रतीति (ऐसा बोध जिसके द्वारा प्रत्येक वस्तुका ज्ञान प्राप्त हो जाता है उसके) द्वारा मनुष्य (अमृत स्वरुप) ब्रह्मको हि प्राप्त कर लेता है।)<br />
तस्यैष आदेशो यदेतद्विद्युतो व्यद्युतदा। (केनोपनिषद-4/4)<br />
(ब्रह्मकी उपस्थितिका संकेत विद्युतके चमकारा जैसा होता है।)</p>
<p>KSHURIKA UPANISHAD<br />
इड़ा तिष्ठति वामेन पिंगला दक्षिणेन च।।<br />
तयोर्मध्ये वरं स्थानं यस्तं वेद स वेदवित्। (क्षुरिकोपनिषद-16)<br />
(इड़ाका निवास बाँयी और है, पिंगलाका दाहिनी और होता है। उसके बिचमें परम स्थान है, उसको जो जानता है, वही वेद यानी ज्ञानको जानने वाला है।)<br />
यथा निर्वाणकाले तु दिपो दग्ध्वा लयं व्रजेत।<br />
तथा सर्वाणि कर्माणि योगी दग्ध्वा लयं व्रजेत।। (क्षुरिकोपनिषद-23)<br />
(जैसे निर्वाणकालमें ( बूझनेके वक़्त) दीप ज्योति (दिपककी बाट और तैल) सबको जलाकर स्वयं परम प्रकाशमें लीन हो जाती है, वैसे ही योगी अपने सभी कर्मोंको भस्म करके परमात्मामें लीन हो जाता है।)<br />
अमृतत्वं समाप्नोति यदा कामात्प्रमुच्यते। (क्षुरिकोपनिषद-25)</p>
<p>MAHA UPANISHAD<br />
स एकाकी न रमते। (महोपनिषद-1/3)<br />
(उस (ब्रह्म) को (यहाँ) अकेला (होना) पसंद न आया।)<br />
संसाराडम्बरमिदं कथमभ्युत्थितं मुने। कथं च प्रशमं याति। (महोपनिषद-2/15)<br />
(शुकदेवजी व्यास भगवान से पूछते है की हे मुनी! यह जगतरुपी प्रपंचका प्रगट्य कैसे हुआ और यह कैसे नाश हो जाता है?।)<br />
संसाराडम्बरमिदं कथमभ्युत्थितं गुरो। कथं च प्रशममायाति। (महोपनिषद-2/30)<br />
(शुकदेवजी जनक राजा से पूछते है की हे गुरुवर्य! यह जगतरुपी प्रपंचका प्रगट्य कैसे हुआ और यह कैसे नाश हो जाता है?।)<br />
मनोविकल्पसंजातं तद्विकल्पपरिक्षयात् क्षीयते संसारो। (महोपनिषद-2/34)<br />
(मनके विकल्पमेंसे संसारिक प्रपंचका प्रादुर्भाव होता है, और विकल्पका नाश होते ही इस प्रपंचका भी नाश हो जाता है।)<br />
भोगा इह न रोचन्ते स जीवन्मुक्त उच्यते । (महोपनिषद-2/42)<br />
(जिनको यहाँ विषयभोग पसंद न होने का स्वभाव बन गया है, वह जीवनमुक्त कहलाता है।)(महोपनिषद-2/42).<br />
(Jivanmukta is one whose temperament has become to be that of not liking the lusts here) (Maha Upanishad-2/42).<br />
भुंक्ते य: प्रकृतान्भोगान्स जीवनमुक्त उच्यते।।<br />
(महोपनिषद-2/60)<br />
(जो भोगोंको (मनसे नहीं लेकिन इन्द्रियदि शरीर रुप) प्रकृतिसे भोक्ता है, उसे जीवनमुक्त कहते है।)<br />
जायते म्रृतये लोको म्रियते जननाय च। (महोपनिषद-3/4).<br />
(लोगों मरने के लिये जन्मते है और जन्मनेके लिये मरते है।) (महोपनिषद-3/4).<br />
(The people take birth just to die only and they die just to take birth only.).<br />
(Maha Upanishad-3/4).<br />
प्राप्यं संप्राप्यते येन भूयो येन न शोच्यते। पराया निवृते: स्थानं तज्जीवितमुच्यते। (महोपनिषद-3/12)<br />
(जीससे प्राप्य करने योग्यकी प्राप्ति हो जाती है, जीससे शोककी निवृत्ति होती है, और जीससे परम शान्तिकी उपलब्धि होती है वही वास्तवमें जीवन है।)<br />
जन्तव: साधुजिविता: ये पुनर्नेह जायन्ते शेषा जरठगर्दभा:। (महोपनिषद-3/14)<br />
(वह ही प्राणी सही अर्थमें जीवित है जो पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता, बाक़ी सब तो वृद्ध होते हुए गधे जैसे है।)<br />
भारो विवेकिन: शास्त्रं भारो ज्ञानं च रागिण:<br />
अशांतस्य मनो भारो भारोअनात्मविदो वपु: । (महोपनिषद-3/15)<br />
(जो विवेकी है उनको शास्त्र भाररुप है, रागी पुरुषके लिये ज्ञान भाररुप है। अशांत पुरुषके लिये मन भाररुप है ओर जिसको आत्मज्ञान नहीं हुआ उनके लिये शरीर भाररुप है।)<br />
जन्मान्तरन्धा विषया एकजन्महरं विषम्। (महोपनिषद-3/55)<br />
(झहर एकही जन्मका नाश करता है, विषयासक्त तोजन्मजन्मान्तरका नाश करता है।)<br />
मोक्षद्वारे द्वारपालाश्चत्वार: परिकीर्तिता:।<br />
शमो विचार: संतोषश्चतुर्थ: साधुसंगम:।। (महोपनिषद-4/2)<br />
निरिच्छे संस्थिते रत्ने यथा लोक: प्रवर्तते।<br />
सत्तामात्रे परे तत्त्वे तथैवायं जगद्गण:।। (महोपनिषद-4/13)<br />
(जैसे इच्छारहित पड़े रहनेपर भी लोग रत्नकी और सहजरुपसे आकर्शित होते है, वैसे ही सत्तामात्ररुप विद्यमान परम तत्त्व प्रति जगत आकर्शित होता है।)<br />
द्रष्टव्यः सवॅसंहर्ता न मृत्युरवहेलया । (महोपनिषद-4/22)<br />
(सवॅनो संहारक मृत्युने जोया पछी तेनी उपेक्षा करवीजोइए नहिं । )<br />
ऋतमात्मा परं ब्रह्म सत्यमित्यादिका बुद्धै:। कल्पिता व्यवहारार्थं यस्य संज्ञा महात्मन:। (महोपनिषद-4/45)<br />
(ऋत, आत्मा, परपब्रह्म, सत्य, वगेरे आत्माकी संज्ञायें व्यवहारके लिये महात्माओं द्वारा कल्पित है।)<br />
यतो वाचो निवर्तन्ते यो मुक्तैरवगम्यते। यस्य चात्मादिका: संज्ञा: कल्पिता न स्वभावगत:।। (महोपनिषद-4/57)<br />
(जहाँसे वाणि परत होती है, जीसको मूक्त पुरुष द्वाराही जाना जा सकता है; जीसकी आत्मा वग़ैरह संज्ञायें कल्पनामात्र है, वास्तविक नहीं है,(वो ही अविनाशी ब्रह्म कहलाता है))<br />
कल्पं क्षणीकरोत्यन्त: क्षणं नयति कल्पताम्।<br />
मनोविलाससंसार इति मे निश्चिता मति:।।<br />
(महोपनिषद-4/68)<br />
(यह मन ही कल्पको क्षण बना देता है, और क्षणमें कल्पत्व भर देता है। मेरा (ऋषि ऋभु पुत्र निदाधको कहते है) मत है कि जगत केवल मनोविलास ही है।)<br />
द्वे पदे बन्धमोक्षाय निर्ममेति ममेति च।<br />
ममेति बध्यते जन्तुर्निर्ममेति विमुच्यते।। (महोपनिषद-4/72)<br />
तस्मान्मुमुक्षुभिर्नैव मतिर्जीवेशवादयो:।<br />
कार्या किंतु ब्रह्मतत्त्वं निश्चलेन विचार्यताम्।। (महोपनिषद-4/75)<br />
(अत: जो पुरुष मोक्षकी आकांक्षा रखता है, वह जीव-ईश्वरके विवादमें अपनी बुद्धिको भ्रमित न करते हुए द्रढतासे ब्रह्मतत्त्वका ही चिंतन करे)<br />
उत्पन्नशक्तिबोधस्य त्यक्तनिःशेषकमॅणः ।<br />
योगिनःसहजावस्था स्वयेमेवोपजायते।। (महोपनिषद-4/78)<br />
जेणे बोधातमिका शक्ति जाग्रत करी लीधीछे समस्तकर्मोनो त्याग करी दीधोछे तेवो योगी स्वयमेव सहजावस्था प्राप्त करी लेछे ।<br />
सर्वगं सच्चिदानन्दं ज्ञानचक्षुर्निरीक्षते। (महोपनिषद-4/80)<br />
(सर्वव्यापी सच्चिदानंदस्वरुप परमात्माको ज्ञानरुप चक्षुओं से दिखा जाता है।)<br />
भिद्यते ह्रदयग्रन्थि छिद्यन्ते सवॅसंशया: ।<br />
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ।।(मुंडकोपनिषद-2/2/8)(महोपनिषद-4/82)(सरस्वतीरहस्योपनिषद-67)<br />
(जब साधक प्रकृतिविषयक समझ को आत्मसात कर लेता है, तो उसके सब संशयों का निराकरण हो जाता है, उसके सब कर्मों क्षीण हो जाते है, उसका सूक्ष्म शरीर का विसर्जन हो जाता है, (जो तुरन्त हि उसको कैवल्य को उपलब्ध करा देता है।)(मुंडकोपनिषद-2/2/8)(महोपनिषद-4/82)(सरस्वतीरहस्योपनिषद-67)<br />
[When the seeker assimilates the understanding about the Nature, then all his doubts get allayed, all his actions get waned, his Subtle Body gets disunited, (which instantly avails him to Keivalya)]
(Mundaka Upanishad-2/2/8).<br />
(Maha Upanishad-4/82). (Saraswatirahasya Upanishad-67)<br />
भवादुत्तारयात्मानं नासावन्येन तार्यते। (महोपनिषद-4/106)<br />
(you can cross this Bhavsagar on your own only, none can make you cross)<br />
एष एव मनोनाशस्त्वविद्यानाश एव च। (महोपनिषद-4/109)<br />
(जो मनका विनाश है, उसको ही अविद्याका नाश कहा जाता है।)<br />
अविद्या विद्यमानैव नष्टप्रज्ञेषु दृश्यते । (महोपनिषद-4/110)<br />
(जो प्रज्ञा रहित है, उसमें ही अविद्या रहती है।)<br />
मा भवाज्ञो भव ज्ञस्त्वं जहि संसारभावनाम् ।(महोपनिषद-4/128)<br />
(तुम अज्ञानी न हो। ज्ञानी बनके संसारिक बंधनकी सभी भावनाओंका नाश कर दे।)<br />
मन: समुदितं परमात्मतत्त्वात्।(महोपनिषद-5/52) (मनकी उत्पत्ति परमात्व तत्त्वमेंसे हुई है।)<br />
मनसो विजयान्नान्या गतिरस्ति भवार्णवे। (महोपनिषद-5/76)<br />
(यह संसारसागरमें मनके पर विजय प्राप्त करनेके अलावा (जीवनका) और कोई ध्येय नहीं है।)<br />
भृत्योऽभिमतकर्तृत्वान्मन्त्री सर्वार्थकारणात्।<br />
सामन्तश्चेन्द्रियान्क्रान्तेर्मनो मन्ये विवेकिन:।। (महोपनिषद-5/79)<br />
(विवेकशील मनुष्यों अपने मनको अभिष्टकी सिद्धिके लिये सेवककी तरह, सभी प्रयोजनोंकी पूर्ति हेतु मंत्रीकी तरह और इन्द्रियों पर नियंत्रणके लिये सामंतरुप बना लेते है ऐसा मैं मानता हुँ ।)<br />
अज्ञस्यार्धप्रबुद्धस्य सर्वं ब्रह्मेति यो वदेत्।<br />
महानरकजालेषु स तेन विनियोजित:।। (महोपनिषद-5/105)<br />
(अपरिपकव बुद्धिवालेको और अज्ञानीको &#8220;यह सब ब्रह्ममय है&#8221; , ऐसा कहना उनको जैसे नरकमें हडसेलना जैसा है।)<br />
चितो रुपमिदं ब्रह्मन्क्षेत्रज्ञ इति कथ्यते।<br />
वासना: कल्पयन्सोऽपि यात्यहंकारतां पुन:।। 124<br />
अहंकारो विनिर्णेता कलंकी बुद्धिरुच्यते।<br />
बुद्धि: संकल्पिताकारा प्रयाति मननास्पदम्।। 125<br />
मनो धनविकल्पं तु गच्छतीन्द्रियतां शने:।<br />
पाणिपादमयं देहमिन्द्रियाणि विदुर्बुधा:।। 126 (महोपनिषद-5/124-126)<br />
(हे आत्मज्ञानी! चेतन (ब्रह्म) जब रुप (नाम, देश, काल) विगेरे प्राप्त करता है, तो वह क्षेत्रज्ञ (ईश्वर) कहलाता है। वह (क्षेत्रज्ञ) जब वासना का चिंतन करता है तो वह फिरसे अहंकार हो जाता है। जब अहंकार निश्चयात्मक और दोषयुक्त हो जाता है तब वह बुद्धि कहलाता है। बुद्धि जब संकल्प और मनन करने लगती है तो मनरुप हो जाती है। मन जब गहरे विकल्पमें डूब जाता है तो धीरे-धीरे इन्द्रियत्वको प्राप्त कर लेता है। मेधावी पुरुषों (भी) अपनेको हस्तपादयुक्त इन्द्रियोंवाला शरीर ही तो मानते है।) (महोपनिषद-5/124-126)<br />
(O Self Realized! When the Absolute avails form (name, time, space),etc, it is called Kshetragya (Ishwar), when that (Kshetragya) contemplates of carnal pleasures, again it becomes Ego, when the Ego becomes divisive and defiled, then it is called Intellect, when the Intellect becomes pulsatile and speculative, it turns to be a Mind, when the Mind sinks into deep uncertainty, it gradually instates the condition of being an organ. Even the sagacious men also believe themselves to be the body having hands and legs, etc.)<br />
(Maha Upanishad-5/126-126).<br />
सबाह्याभ्यन्तरं दृश्यं मा गृहाण विमुच मा । (महोपनिषद-5/172)<br />
(जो बाहर अंदर दृश्यमान जगत है, उसको पकड़ना भी नहीं और त्यागना भी नहीं। )<br />
तांडुलस्य यथा चमॅ पुरुषस्य तथा मलं सहजम् ।नश्यति क्रियया न संदेह ।। (महोपनिषद-5/185-186)<br />
(जेवीरीते चोखाने फोतरुं होयछे तेम माणसने वासना सहजज होयछे । योग्य क्रियाथी तेनो नाश थइ शकेछे तेमां संदेह नथी । )<br />
स्वसंकल्पे क्षयं याते समतैवावशिष्यते। (महोपनिषद-6/3)<br />
(अपने संकल्पोंका क्षय हो जाते ही, केवल समत्वभाव ही शेष रहता है।)(महोपनिषद-6/3)<br />
(When all the volitions of a person are declined, what remains is Equanimity only). (Maha Upanishad-6/3).<br />
सवॅं त्यक्त्वा येन त्यजसि तत्त्यज । (महोपनिषद-6/5-6)<br />
(सबका त्याग करके (अंतमें) जिससे सब छोड़ते हो उनका भी त्याग कर दो।)<br />
(After renunciating everything, leave that, too by which you renunciated everything.- Mahopanishad-6/5-6)<br />
ज्ञस्य संसारो गोष्पदाकृतिः । (महोपनिषद-6/9) (ज्ञानीनोसंसार गायना पगलाथी बनता खाबोचिया जेवोछे । )<br />
न तदस्ति न यत्राहं न तदस्ति न तन्मयम् । योअसिसोअसि ।।(महोपनिषद-6/11)<br />
(यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसमें मैं न रहा हूँ।<br />
और यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं है, जो मेरेसे व्याप्त नहीं है। यहाँ जो कुछ भी है, वह मैं ही हूँ।)<br />
त्यागादानपरित्यागी विज्वरो भव सर्वदा। (महोपनिषद-6/15)<br />
((कीसीभी वस्तुका) न तो त्याग करो और न हीं ग्रहण करो। इसी तरह संतापरहित होकर जीयो।)<br />
मा खेदं भज हेयेषु नोपादेयपरो भव । (महोपनिषद-6/28)<br />
(जो खो दिया है उसका खेद मत कर और जो मिला हुआ है उसमें आसक्त मत हो।)<br />
नाहं नेदमिति । (महोपनिषद-6/36) हुं नथी ((तेमज)आ (जगत )पण नथी । )<br />
रज्जुबद्धा विमुच्यन्ते । तृष्णाबद्धा न केनचित्।।(महोपनिषद-6/39)<br />
दोरडीथी बंधायेल छूटी जाय परंतु तृष्णाथी बंधायेलकोइरीते नहिं<br />
कुवॅतो लिलया क्रियाम् । (महोपनिषद-6/43) (नियत क्रियायें ऐसे करें जैसे वेशभूषा में अभिनय करते हैं।) (महोपनिषद-6/43)<br />
(Perform destined deeds as if performing in a pageant.)<br />
(Maha Upanishad-6/43).<br />
उदारचरितानां वसुधैव कुटुंबकम् । (महोपनिषद-6/72)<br />
चिदचैत्या किलात्मेति सर्वसिद्धान्तसंग्रह:। (महोनिपषद-6/78)<br />
(चित्तवृत्ति रहित हुआ चित्तही आत्मा (परमात्मा) है।यहि निश्चयपूर्वक समग्र( वेदोंके) सिद्धान्तों का सार है) (महोनिपषद-6/78)<br />
(The Chitta that has rendered without Chittavritti, itself is Atmaa (Brahmn). This certainly is comprehensive knowledge of all the Vedas together). (Maha Upanishad-6/78).</p>
<p>MANDUKYA UPANISHAD<br />
ऐषः योनि सवॅस्य । (मांडुक्योपनिषद-6)<br />
आ(ब्रह्म)ज सबका उद्भव स्थान है ।<br />
अयमात्मा ब्रह्म। (मांडुक्योपनिषद-2)</p>
<p>MANTRIKA UPANISHAD<br />
ध्यायतेऽध्यासिता तेन तन्यते प्रेर्यते पुन:।<br />
सूयते पुरुषार्थं च तेनैवाधिष्ठितं जगत्।।<br />
(मंत्रिकोपनिषद-4)<br />
ध्यानमग्न हो जाने से प्रसन्नता बढ़ती है, और (कैवल्य के लिए) प्रेरणा भी मिलती है। पुरुषार्थ में मग्न होने से तो यह संसार बढता है।(मंत्रिकोपनिषद-4)</p>
<p>MEYTRAN UPANISHAD<br />
एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति। (मैत्रायण्युपनिषद-2/2)<br />
(यह आत्माको वह अमृतरुप, भयरहित और ब्रह्म है ऐसा कहा गया है)<br />
शकटमिवाचेतनमिदं शरीरम्। (मैत्रायण्युपनिषद-2/3)<br />
(यह शरीर गाडेकी तरह अचेतन है) (मैत्रायण्युपनिषद-2/3)<br />
(This body is inanimate just like a cart)(Meitranya Upanishad-2/3)<br />
आत्मेन चेतनेनेदं शरीरं चेतनवत्। (मैत्रायण्युपनिषद-2/5)<br />
(आत्माके चैतन्यसे यह शरीर चेतनवंत (दिखता) है) (मैत्रायण्युपनिषद-2/5)<br />
(This body (sounds) animate because of the consciousness of Atmaa)<br />
(Meitranyu Upanishad-2/5).<br />
अकर्ता कर्तेवावस्थित:। (मैत्रायण्युपनिषद-2/10)<br />
(अकर्ता होनेपर भी आत्मा कर्ता प्रतीत होता है।)<br />
अस्ति खल्वन्योऽपरो भूतात्मा योऽयं सितासितै: कर्मफलैरभिभूयमान: सदसद्योनिमापद्यत इत्यवाचीं वोर्ध्वागतिं। (मैत्रायण्युपनिषद-3/2)<br />
(जो शुभ-अशुभ कर्मोंके कारण अधेगामी हुआ है, वो(आत्मा नही है पर वो) तो अन्य भूतात्मा (जीवात्मा)है। वह कर्मानुसार अच्छी बुरी योनीयोंमें गमन करता हैऔर उँची या नीची गतीयोंको प्राप्त होता है।)<br />
इत्यहं सो ममेदमित्येवं मन्यमानो भूतात्मा । (मैत्रायण्युपनिषद-3/2)<br />
(यह मैं हुँ , वह मेरा है, ऐसा माना हुआ ही जीवात्मा है।) (मैत्रायण्युपनिषद-3/2)<br />
(Jiva is one who has believed: “I am this, that is mine”.) (Meitrani Upanishad-3/2).<br />
चतुरशीतिलक्षयोनिपरिणतम् । (मैत्रायण्युपनिषद-3/3)<br />
(चोराशी लाख योनियोमें भ्रमण करता रहता है । )<br />
यथा निरिन्धनो वह्नि: स्वयोनावुपशाम्यति<br />
तथा वृत्तिक्षयाच्चितं स्वयोनावुपशाम्यति(मैत्रायण्युपनिषद-4/3/A)(मैत्रेय्युपनिषद-1/7)<br />
(Just as the fire becomes extinct on its own when the wood lasts, same way the Chitta becomes extinct on its own when its tendency gets inhibited.)<br />
तावदेव निरोद्धव्यं ह्रदि यावत्क्षयं गतं मनो।<br />
एतज्ज्ञानं च मोक्षं च शेषास्तु ग्रंथ विस्तरा । (मैत्रायण्युपनिषद-4/3/H)(ब्रह्मबिंदूपनिषद-5)<br />
(मनका ह्रदयमें तबतक ही निरोध करना चाहिये जबतक उनका क्षय (यानि मनकी उन्मनी स्थिति) न हो जाय। (संपूर्ण शास्त्रोंका साररुप) यही ज्ञान है और यही मोक्ष है, बाक़ी सबतो ग्रंथका (बिनजरुरी) विस्तार ही है।)<br />
(Only so long must the mind be confined in the heart, until it is annihilated: this truly is the knowledge as well as liberation; the rest is nothing but pedantic superfluity.)<br />
(जयांसुधी मननो क्षय नथाय त्यांसुधीज ह्रदयमां अेनो निरोध करवो जोइए । मात्र आज ज्ञान अने मोक्ष छेबाकी बीजुंतो ग्रंथनो विस्तारज छे । )<br />
न शक्यते वणॅयितुं गिरा तदा । (मैत्रायण्युपनिषद-4/3/I)<br />
(That (Brahm) can never be expressed by words).<br />
(त्यारे तेनुं वणॅन वाणीद्वाराकरवा कोइ समथॅ नथी । )<br />
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयौ: । (मैत्राण्युपनिषद-4/3/K) (Brahmbindupanishad-2)<br />
(मन ही मनुष्यके बन्धन या मूक्तिका कारणरुप है।)<br />
(The mind alone is man&#8217;s cause of bondage or liberation).<br />
विश्वेश्वर नमस्तुभ्यं विश्वात्मा विश्वकमॅकृत ।<br />
विश्वभुग्विश्वमायस्त्वं विश्वक्रीडारतिः प्रभुः । (मैत्रायण्युपनिषद-4/3/N)<br />
(हे विश्वेश्वर आपने नमस्कार छे । आप विश्वना आत्माअने विश्वना कमोॅ करनारा विश्वना भरणपोषणकरनारा विश्व मायाने करनारा विश्व क्रिडा करनाराप्रभुछो)<br />
स एव आत्मान्तर्बहिश्चान्तर्बहिश्च। (मैत्रायण्युपनिषद-4/5)<br />
(यह (परमात्मा) आत्माके रुपमें अंदर बाहर अंदर बाहर विद्यमान है)<br />
राजसोंअशोअसौ ब्रह्मा तामसोंअशोअसौ रुद्रसात्विकोंअशोअसौ स एव विष्णुः । (मैत्रायण्युपनिषद-4/5)<br />
(योगचूडामण्युपनिषद-72)(पाशुपतब्राह्मणोपनिषद-पूर्वकांड-10)<br />
(इस (परमात्मा) के रजोगुण अंशको ब्रह्मा, इस (परमात्मा) के तमोगुण अंशको रुद्र और इस (परमात्मा) के सत्त्वगुण अंशको विष्णु कहते है।) (मैत्राण्युपनिषद-4/5)(योगचूडामण्युपनिषद-72)(पाशुपतब्राह्मणोपनिषद-पूर्वकांड-10)<br />
(The Rajas part of this (Parmatma) is known as Brahma, the Tamas part this (Parmatma) is known as Shiva and Sattva part this (Parmatma) is known as Vishnu.)<br />
(Meitrannyyu Upanishad-4/5).<br />
(Yoga Chudamani Upanishad-72)<br />
(Pashupat Brahmana Upanishad-10)<br />
(अे परमात्माना रजोगुण अंशने ब्रह्मा तमोगुण अंशने रुद्रसत्वगुण अंशने विष्णु कहेवायछे । )<br />
तमोमायात्मको रुद्र: सात्विकमायात्मको विष्णू राजसमायात्मको ब्रह्मा।<br />
(पाशुपतब्राह्मणोपनिषद-पूर्वकांड-10)<br />
(रुद्र तमोगुणी मायारुप है, विष्णु सत्त्वगुणी मायारुप है और ब्रह्मा रजोगुणी मायारुप है।)<br />
द्वै वाव ब्रह्मणो रुपे मूर्तं चामूर्तं चाथ यन्मूर्तं तदसत्यं यदमूर्तं तत्सत्यं तद्ब्रह्म। एतदात्मा। (मैत्रायण्युपनिषद-5/3)<br />
(ब्रह्मके दो रुप है- मूर्त और अमूर्त। जो मूर्त है वह असत्य है, जो अमूर्त है वह सत्य है। वही ब्रह्म है। वही आत्मा है)</p>
<p>MEYTREYA UPANISHAD<br />
यथा निरिन्धनो वह्नि: स्वयोनावुपशाम्यति<br />
तथा वृत्तिक्षयाच्चितं स्वयोनावुपशाम्यति(मैत्रेय्युपनिषद-1/7)(मैत्रायण्युपनिषद-4/3/A)<br />
अगोचरं मनोवाचाम्। (मैत्रेय्युपनिषद-1/13)<br />
वर्णाश्रमाचारयुता विमूढा: कर्मानुसारेण फलं लभन्ते।<br />
वर्णादिधर्म हि परित्यजन्तः स्वानन्दतृप्ताः पुरुषा: भवन्ति।। (मैत्रेय्युपनिषद-1/17)<br />
(जाति और आश्रमके (आधार पर ही आध्यात्मिकतामें) आचरण करनेवाले पूरी तरहसे मूर्खों ही कर्मानुसार फल भोगते है।<br />
The completely morons, behaving (in spirituality on the basis of) possessed of caste and order, have to be afflicted according to the Karmafal. परंतु जो पुरुषों वणॅ विगेरे धर्मों त्याग देते है, वे अपने नीजानंदमें तृप्त रहते है।)<br />
The people who acts in spirituality on the basis of castes, these completely morons only have to undergo the effect of Theory of Karma. (Meitreya Upanishad-1/17).<br />
अभेददशॅनं ज्ञानं ध्यानं निर्विषयं मन: ।<br />
स्नानं मनोमलत्यागं शौचमिन्द़िय निग्रह:।।(मैत्रेय्युपनिषद-2/2) (स्कंदोपनिषद-11)<br />
[(सृष्टिमें ब्रह्मका) अभेदरुप दर्शन होना ही ज्ञान है। मनका विषय रहित हो जाना हि ध्यान है। मनके (द्वन्द्वात्मक) मल का त्याग हो जाना ही स्नान है। इन्द्रियोंका (पूरा) वशमें होना ही पवित्रता है।](मैत्रेय्युपनिषद-2/2) (स्कंदोपनिषद-11)<br />
[The identical perception (in Creation of Parmatma) is Knowledge. The Mind becoming devoid of subject is Meditation. The renunciation of (dualistic) filth of Mind is Bath and the (complete) restraint on the sense organs is sacredness). (Meitriya Upanishad-2/2) (Skanda Upanishad-11).<br />
अद्वैतभावना भैक्षमभक्ष्यं द्वैतभावनम् । (मैत्रेय्युपनिषद-2/10)<br />
अद्वैतनी भावनाज भिक्षावृतिछे द्वैतभावना अभक्ष्य वस्तुछे।<br />
मृता मोहमयिमाता जातो बोधमय: सुत: ।<br />
सूतकद्वयसंप्राप्तौ कथं संध्यामुपास्महे ।। (मैत्रेय्युपनिषद-2/13)<br />
एकमेवाद्वितियं ब्रह्म।(मैत्रेय्युपनिषद-2/15)<br />
(शुकरहस्योपनिषद-20).<br />
(यहाँ केवल परमात्मा एक ही है, बिना किसी दुसरे के।)(मैत्रेय्युपनिषद-2/15)(शुकरहस्योपनिषद-20)।<br />
(Parmatma alone is here, only one without any second) (Meitriya Upanishad-2/15). (Shukarahasya Upanishad-20).<br />
एकमेवाद्वितीयम्। एतदेकान्तमित्युक्तं न मठो न वनान्तरम्।। (मैत्रेय्युपनिषद-2/15)<br />
[(यहाँ) केवल (परमात्मा) एक ही है, बिना किसी दुसरे के। इस (भावना) को ही एकांत कहा गया है; नहीं कि मठको या तो वन के मध्यभाग को।] (मैत्रेय्युपनिषद-2/15)<br />
[Parmatma alone is here, the only one without any second. This (notion) is what is called to be solitude, and not the cloister or the middle of the forest.]. (Meitreya Upanishad-2/15)<br />
असंशयवतां मुक्तिः संशयाविश्टचेतसाम् नमुक्तिजॅन्मजन्मान्ते । (मैत्रेय्युपनिषद-2/16)<br />
जे संशय रहित छे ते मुक्ति मेलवी लेँछे । जेने संशयछेते अनेक जन्मोना अंते पण मुक्ति मेलवी शक्ता नथी।<br />
उत्तमा तत्त्वचिन्तैव मध्यमं शास्त्रचिन्तनम् ।<br />
अधमा मंन्त्रचिन्ता च तीथॅभ्रान्त्यधमाधमा । (मैत्रेय्युपनिषद-2/21)<br />
(तत्व का चिंतन ही उत्तम है, शास्त्रों का चिंतन मध्यम है, मंत्रो का चिंतन अधम है और तिर्थो का भ्रमण तो अधम का भी अधम है।)(मैत्रेय्युपनिषद-2/21)<br />
(The thought of (contemplation upon) Ṭaṭṭwas is the transcendental one; that of the Śhāsṭras the middling, and that of Manṭras the lowest. The delusion of pilgrimages is the lowest of the lowest)(Meitraya Upanishad-2/21).<br />
धनवृद्धा वयोवृद्धा विद्यावृद्धास्तथैव च ।<br />
ते सर्वे ज्ञानवृद्धस्य किंकरा शिस्यकिंकरा। (मैत्रेय्युपनिषद-2/24) जे धनमां मोटाछे वयमां मोटाछेविद्यामां मोटाछे ते बधां ज्ञानमां मोटा पासे नोकर अथवा शिस्यना नोकर जेवाछे । )<br />
सोऽस्म्यहम्। (मैत्रेय्युपनिषद-3/1)<br />
(I am that)<br />
न जगत्सवॅद्रष्टास्मि । (मैत्रेय्युपनिषद-3/14)<br />
(हुं आसंसारनो सवॅ द्रष्टा नथी । )</p>
<p>MUDGALA UPANISHAD<br />
तं यथायथोपासते तथैव भवति। (मुद्गलोपनिषद-33)<br />
उस (परमात्मा) की (साधक) जो जो भावसे उपासना करता है, (वह परमात्मा उसके लिये) वैसे (भाववाले ही) बन जाते है।)</p>
<p>MUNDAKA UPANISHAD<br />
कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सवॅमिदं विज्ञातं भवतीती । (मुंडकोपनिषद-1/1/3)<br />
हे भगवान अेवुं शुं छे जे जाणी लेवाथी बधुंज जाणीलीधेलुं थइ जायछे ।<br />
&#8220;Oh Lord, what is that which if known, then even what is unknown, also becomes known&#8221;?<br />
तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेद सामवेदोऽथर्ववेद: शिक्षा कल्पो व्याकरण निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति।अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते।।(मुंडकोपनिषद-1/1/5)<br />
[(ऋषि अंगिरस ने शौनक ऋषि को कहा) जिसमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, (वेदों की उच्चारण विधि), कल्प (यज्ञ-याग विधि), व्याकरण (शब्दप्रयोग नियमावली), निरुक्त (वैदिक शब्दों के अर्थ विधि), छन्द (वैदिक छन्दों के भेद विधि) और ज्योतिष (नक्षत्रों की गति और उसके साथ मानवजात के संबंध की विधि) का ज्ञान है वे सब अपरा विद्या है। जिस से अविनाशी परमात्मा की प्राप्ति होती है वह परा विद्या है।] (मुंडकोपनिषद-1/1/5).<br />
[(Rishi Angiras clarifies to Rishi Shonak that) wherein the Knowledge of Rigveda, Yajurveda, Samveda, Atharva Veda, Shikshaa, Kalp, Vyaakaran, Nirukruta, Chhanda and Jyotisha, etc is contained is Aparaa Vidya. Paraa Vidya is that through which Parmatma is obtained) (Mundaka Upanishad-1/1/5).<br />
यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रम्।(मुंडकोपनिषद-1/1/6)<br />
(वह (परमात्मा) को देख नहीं सकते, पकड़ नहीं सकते, उसका कोई गोत्र नहीं है)<br />
यथोर्णनाभि: सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधय: संभवन्ति।<br />
यथा सत: पुरुषात्केशलोमानि तथाक्षरात्संभवतिहविश्वं।। (मुंडकोपनिषद-1/1/7)<br />
(जैसे करौलियो अपने पेटसे जालको उत्पन्न करता हैऔर अपनी अंदर निगल जाता है, पृथ्विमें जैसे विभिन्नवनस्पति होती है, मनुष्यके शरीरसे जैसे कैश और रोमउत्पन्न होते है, वैसे ही अनश्वर ब्रह्मसे ही यह विश्वउत्पन्न होता है।)<br />
अविद्यायामन्तरे वतॅमाना: स्वयं धीरा: पण्डितंमन्यमाना:।<br />
जअन्घन्यमाना परियन्ति मूढा अंधनैव नीयमानायथान्धा:।।(मुंडकोपनिषद-1/2/8)Kathopanishad-1/2/5)<br />
(अविद्यारुप अंधकारमें रहते हुए भी, अपनेको ज्ञानी और पंडित समजने वाले मूढ़ों, ठीक वैसे ही अनेक ठोकरों खाते हुए भटकते फिरते है; जैसे अंधों मनुष्यों के द्वारा चलाये जानेवाले अंधे।)(कठोपनिषद-1/2/5) (मुंडकोपनिषद-1/2/8).<br />
(The idiots, even though they are staying in the darkness of the Ignorance, yet believing themselves to be wise and erudite, are peregrinating and repeatedly stumbling exactly likewise the blinds that are being lead by the blind leaders).<br />
(Katha Upanishad-1/2/5). (Mundaka Upanishad-1/2/8)<br />
नास्ति अकृत: कृतेन। (मुंडकोपनिषद-1/2/12).<br />
(जो अकृत है वह (स्वयंभू परमात्मा), उसके लिए (कार्य रुप उपासना आदि) करने से प्राप्त नहीं हो सकते है।)(मुंडकोपनिषद-1/2/12).<br />
(the (Self Existent Parmatma that is) Uncreated, cannot be realized by doing (actions of worshipping, etc) for Him.) (Mundaka Upanishad-1/2/12).<br />
परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृत: कृतेन।<br />
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्समित्पाणि: श्रोत्रियंब्रह्मनिष्ठम्।। (मुंडकोपनिषद-1/2/12)<br />
निर्वेदम् आयात् न अस्ति अकृत: कृतेन। (मुंडकोपनिषद-1/2/12)<br />
[(वेदों में कथित) कर्मों करने से प्राप्य (स्वर्गादि) लोकों (की क्षणभंगुरता) से व्यथित ब्रह्मविद्याके साधक को, वेदों से विमुख होकर इस निर्णय पर आना चाहिये कि जो अकृत है वह (स्वयंभू परमात्मा), उसके लिए (कार्य रुप उपासना आदि) करने से प्राप्त नहीं हो सकते है।अत: उस ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिहेतु उसे चाहिये कि वह निश्चित ही हाथमें समिध लेकर वेदज्ञ और ब्रह्मनिष्ठ गुरु की पास विनयपूर्वक जाय।](मुंडकोपनिषद-1/2/12).<br />
[The seeker of the Knowledge of Parmatma, being injured by the (ephemera of) regions (like Heaven etc) obtained by doing the actions (said in the Vedas), after flinching from the Vedas, should come to conclusion that the (Self Existent Parmatma that is) Uncreated, cannot be realized by doing (actions of worshipping, etc) for Him. Therefore, for the Realisation of that Knowledge of Parmatma, he indeed, along with having oblation wood in his hand, needs beseeching proceed to Guru, who is learned in Vedas as well as is dedicated to Parmatma alone.).(Mundaka Upanishad-1/2/12).<br />
तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय।<br />
येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम्।। (मुंडकोपनिषद-1/2/13)<br />
(उस विद्वान महात्मा को शरण को आये हुए पूरे शांतचित्त, जितेन्द्रिय शिष्य को ब्रह्मविद्या का उपदेश करना चाहिये जिससे वह शिष्य अविनाशी, नित्य परमपुरुष को जाण सके।)<br />
पुरुष एवेदं विश्वम्।।(मुंडकोपनिषद-2/1/10)<br />
(यह विश्व पुरुषोत्तम ही है।)(मुंडकोपनिषद-2/1/10)<br />
(This universe is Parmatma only)(Mundaka Upanishad-2/1/10)<br />
प्रणवो धनु: शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।<br />
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत्।।(मुंडकोपनिषद-2/2/4)<br />
(ॐ धनुष्य है, आत्मा बाण है, ब्रह्मको लक्ष्यवेध माना गया है।उसको बाण की तरह तन्मय होकर आलस-प्रमाद रहित मनुष्य हि वेध कर सकता है।)<br />
बाण को एक बार लक्ष्य पर छोड़ दिया जाता है, तो तन्मयता के कारण फिर अपने रास्ते से नही भटकता<br />
भिद्यते ह्रदयग्रन्थि छिद्यन्ते सवॅसंशया: ।<br />
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ।।द(मुंडकोपनिषद-2/2/8)(महोपनिषद-4/82)(सरस्वतीरहस्योपनिषद-67)<br />
(जब साधक प्रकृतिविषयक समझ को आत्मसात कर लेता है, तो उसके सब संशयों का निराकरण हो जाता है, उसके सब कर्मों क्षीण हो जाते है, उसका सूक्ष्म शरीर का विसर्जन हो जाता है, (जो तुरन्त हि उसको कैवल्य को उपलब्ध करा देता है।)(मुंडकोपनिषद-2/2/8)(महोपनिषद-4/82)(सरस्वतीरहस्योपनिषद-67)<br />
[When the seeker assimilates the understanding about the Nature, then all his doubts get allayed, all his actions get waned, his Subtle Body gets disunited, (which instantly avails him to Keivalya)]
(Mundaka Upanishad-2/2/8).<br />
(Maha Upanishad-4/82). (Saraswatirahasya Upanishad-67)<br />
तस्य भासा सवॅमिदं विभाति। (मुंडकोपनिषद-2/2/10) (कठोपनिषद-2/2/15)<br />
(तेना प्रकाशथी आ बधुंप्रकाशमान जणायछे । )<br />
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।<br />
तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ।। (मुंडकोपनिषद-3/1/1)और (श्वेताश्वतरोपनिषद-4/6)<br />
(समान उम्रवाला मैत्रीभाववाला बे पक्षीओ अेकजजातनावृक्षनी डालीओं पर बेठाछे । ते पैकी एक पिप्पलनावृक्षना फल अति खायछे ज्यारे अन्य फक्त जोया करेछे। )<br />
सत्यमेव जयते नानृतं। (मुंडकोपनिषद-3/1/6)<br />
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।<br />
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैव आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम्।। (कठोपनिषद-1/2/23) (मुंडकोपनिषद-3/2/3)<br />
(यह परमात्मा नतो धर्मोपदेश करनेसे, नहीं बुद्धिसे और नहीं वेदों के ज्ञान को बहुत सुनने से भी प्राप्त होनेवाला है। केवल जिसको परमात्मा ने चयनित किया है, वह हि परमात्मा को प्राप्त करने के योग्य बनता है; क्योंकि परमात्मा खुद हि उनके सामने अपने स्वरुपको प्रकट कर देते है।) (कठोपनिषद-1/2/23) (मुंडकोपनिषद-3/2/3)<br />
(This Parmatma is neither obtainable by spiritual preaching, nor by intellect and nor by severely listening to the knowledge of Vedas. Only the one who has been selected by Parmatma, becomes capable of obtaining Parmatma; because Parmatma Himself unsheathes His own form before that person). (Katha Upanishad-1/2/23) (Mundaka Upanishad-3/2/3).<br />
गता: कला: पंचदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु।<br />
कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति।। (मुंडकोपनिषद-3/2/7)<br />
(उस महापुरुषका देहपात होता है तब पंद्रह कलायें और मन सहित सब इन्द्रियोंके देवता अपने अपने अभिमानी देवताओंमें जाकर स्थित हो जाते है, (उनके साथ उस जीवनमुक्त का कोंई संबंध नहीं रहता)। उसके बाद उसके समस्त कर्मों और ब्रह्मज्ञानी जीवात्मा सबके सब अविनाशी परमात्मामें एकरुप हो जाते है।)<br />
यथा नद्य: स्यन्दमाना: समुद्रेअस्तं गच्छन्ति नामरुपेविहाय।<br />
तथा विद्वान्नामरुपाद्विमुक्त: परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यं।।(मुंडकोपनिषद-3/2/8)<br />
जेवी रीते वहेती नदीओं पोताना नामरुप छोडीने समुद्रमांविलिन थइ जायछे तेवी रीते ज्ञानी पुरुष नामरुपथीविमुक्त थइने दिव्य परात्पर ब्रह्मने समपिॅत थइ जायछे ।<br />
ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति। (मुंडकोपनिषद-3/2/9)<br />
(ब्रह्मज्ञाता ब्रह्म ही हो जाता है, उसके कुल में कोई ब्रह्मको नहीं जाननेवाला नहीं होता) (मुंडकोपनिषद-3/2/9)</p>
<p>NAADBINDU UPANISHAD<br />
अधिष्ठाने तथा ज्ञाते प्रपंचे शून्यतां गते।<br />
देहस्यापि प्रपंचत्वात्प्रारब्धावस्थिति: कुत:।।(नादबिंदुपनिषद-28)<br />
जिस तरह अधिष्ठान (ब्रह्म) का ज्ञान हो जानेसे, (संसार) प्रपंच शून्यताको पा लेता है, (ऐसी हालतमें) देह भी प्रपंचरुप होनेके कारण प्रारब्ध कैसे बच सकता है?<br />
अज्ञानजनबोधार्थं प्रारब्धमिति चोच्यते।<br />
तत: कालवशादेव प्रारब्धे तु क्षयं गते।।<br />
(नादबिंदुपनिषद-29)<br />
अज्ञानग्रस्त लोगोंको बोध करानेके लिए, प्रारब्ध कर्मकी बात कही जाती है। (क्योंकि)बादमें कालवशाद ही प्रारब्ध कर्मों का भी क्षय हो जाता है।</p>
<p>NARAD PARIVRAJKA UPANISHAD<br />
प्राणेगते यथा देह: सुखं द:खं न विन्दति।<br />
तथा चेत्प्राणयुक्तोऽपि स कैवल्याश्रमे वसेत।।<br />
(नारद परिव्राजकोपनिषद-3/27)<br />
(जैसे प्राणविहिन शरीरको सुख-दु;खका अहेसास नहीं होता है, वैसे ही जिसको प्राण होते हुए भी सुख-दु;खका अहेसास नहीं होता; वही संन्यास लेनेको योग्य है।)<br />
आपो वै सर्वा देवता:।।(नारदपरिव्राजकोपनिषद-3/79)<br />
(अवश्य सर्व देवता जलरुप हि है।)(नारदपरिव्राजकोपनिषद-3/79)<br />
(Verily all the Devatas are embodied in Jala only.)(Narada Parivrajka Upanishad-3/79)<br />
त्यक्त्वा लोकांश्च वेदांश्च विषयानिन्द्रियाणि च।<br />
आत्मन्येव स्थिति यस्तु स याति परमां गतिम्।।<br />
(नारद परिव्राजकोपनिषद-4/2)<br />
(जो सब लोकव्यवहार, वेदों, और विषयवासनाके भोगोंको छोड़कर एकमात्र अपने आत्मामें ही स्थिर स्थित हो जाता है, वह परम पदको प्राप्त होता है।)<br />
आत्मवत्सर्वभूतानि पश्यन्।<br />
(नारद परिव्राजकोपनिषद-4/21)<br />
देहाभिमानेन जीवो भवती।<br />
(नारद परिव्राजकोपनिषद-6/3)<br />
(देह होने की भावना होने से जीव बन जाता है) (नारद परिव्राजकोपनिषद-6/3)<br />
(By creating a sense of being body, one becomes Jiva.). (Narada Parivrajika Upanishad-6/3).<br />
शरीराभिमानेन जीवत्वम्।<br />
(नारद परिव्राजकोपनिषद-6/4)<br />
सोऽहमिति। (नारद परिव्राजकोपनिषद-6/4)<br />
ओमिति ब्रह्मेति । (नारद परिव्राजकोपनिषद-8/1)<br />
(ब्रह्माजीने नारदजीको कहा)(ॐ ही ब्रह्म है)<br />
अथ ब्रह्मस्वरुपं कथमिति नारद: पप्रच्छ। तं होवाच पितामह: किं ब्रह्मस्वरुपमिति। अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति ये विदुस्ते पशवो न स्वभावपशवस्तमेवं ज्ञात्वा विद्वान्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते नान्य: पन्था विद्यतेऽयनाय।।<br />
(नारद परिव्राजकोपनिषद-9/1) (श्वेताश्वतरोपनिषद-3/8)<br />
( बाद नारदजीने फिरसे पूछा: ब्रह्मका स्वरुप कैसा है? ब्रह्माजीने नारदजीको कहा: ब्रह्म अपने स्वरुपसे अन्य क्या है? ब्रह्म अलग है और मैं भी अलग हूँ, ऐसा जो मानता है वह पशु है। पशुयोनीमें जन्मा वोही पशु नहीं है। इसको ही जानकर विद्वानलोग जन्म-मृत्युके मार्गसे मूक्त हो जाते है। इस ज्ञानके अलावा मूक्तिका कोई अन्य मार्ग नहीं है।)</p>
<p>NIRALANBA UPANISHAD<br />
चैतन्यं ब्रह्म । ब्रह्मैव स्वशक्तिं प्रकृत्यभिधेयामाश्रित्य लोकान्सृष्टवा प्रविश्यान्तर्यामीत्वेन ब्रह्मादिनां बुद्धिन्द्रियनियन्तृत्वादीश्वरः। (निरालंबोपनिषद-4)<br />
(चैतन्य ब्रह्म हि है। अब ईश्वके स्वरुपका कथन करते है। यह ब्रह्म हि जब अपनी प्रकृति नामकी स्वशक्ति के सहारे लोकोंका सजॅन करके अंतर्यामीरुपसे उसमें प्रवेशकर ब्रह्मा, (विष्णु, महेश), आदी तथा बुद्धि और इन्द्रियों को नियंत्रित करते है, तब (वे) ईश्वर (कहलाते) है।)<br />
(The very Consciousness is Brahmn. Now we say about Ishwara. When this Brahmn creates the Universe with the help of Nature, that is His Energy, and enters into His Creation as its intrinsic inbuilt mechanism and controls and administrates the entire Universe including Brahma, (Vishnu and Mahesh) etc, as well as Intellect and Sense organs; then (He) is called Ishwara.) (Niralanba Upanishad-4)<br />
जीव इति च ब्रह्मविष्ण्वीशानेन्द्रादीनां नामरुपद्वारा स्थूलोअहमिति मिथ्याध्यासवशाज्जीवः। सोऽहमेकोऽपि देहारम्भकभ्दवशाद्बहुजीव:।। (निरालंबोपनिषद-5)<br />
(जब इस ईश्वरको ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा इन्द्र आदि नाम और रुपके कारण &#8220;मैं स्थूल हूँ&#8221; ऐसा मिथ्याध्यास हो जाता है, तब उनको जीव कहते है। चैतन्य सोऽहमके रुपमें एक ही होनेपर भी शरीरोंकी भिन्नताके कारण जीव अनेकविध हो जाते है।)<br />
प्रकृतिरिति च ब्रह्मण: सकाशान्नाविचित्रजगन्निर्माणसामर्थ्यबुद्धिरुपा ब्रह्मशक्तिरेव प्रकृति:।। (निरालंबोपनिषद-6)<br />
(प्रकृति इसको कहते है, जो ब्रह्मके सान्निध्य मात्रसे भिन्न-भिन्न विचित्र जगतके निर्माणके सामर्थ्यकलारुप है। ब्रह्मकी जो शक्ति है, वही प्रकृति है।)<br />
ब्रह्मैव परमात्मा । (निरालंबोपनिषद-7)<br />
परमात्मैव ब्रह्मा स विष्णु: स इन्द्र: स शमन: स सूर्य: स चन्द्रस्ते सुरास्ते असुरास्ते पिशाचास्ते मनुष्यास्ता: स्त्रियस्ते पश्वादयस्तत्स्थावरं ते ब्राह्मणादय:।। (निरालंबोपनिषद-8)<br />
(यही परमात्मा ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, यम, सूर्य, चन्द्र विगेरे देवताके रुपमें और यही असुर, पिशाच, नर-नारी और पशुओंके रुपमें प्रगट होते है, यही जड़ पदार्थ और ब्राह्मण, क्षत्रिय, शुद्र और वैश्य वगेरह भी है।)<br />
सवॅं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन । (निरालंबोपनिषद-9)<br />
(यह पूरा विश्व परमात्मा ही है। परमात्मा से अलग यहाँ अन्य जैसा कुछ भी नहीं है।)(निरालंबोपनिषद-9).<br />
(This entire universe is nothing but Parmatma, there is nothing other that is separate from Parmatma.). (Niralamba Upanishad-9).<br />
जातिरिति च। न चमॅणो न रक्तस्य न मांसस्य न चास्थिनः।<br />
न जातिरात्मनो जातिव्यॅवहारप्रकल्पिता । (निरालंबोपनिषद-10)<br />
(जाती चामडीनी रक्तनी मांसनी हाडकानी के आत्मानीहोती नथी । जाती व्यवहार फक्त परिकल्पना ज छे । )<br />
कर्मेति च क्रियमाणेन्द्रियै: कर्माण्यहं करोमीत्यध्यात्मनिष्ठतया कृतं कर्मैव कर्म।(निरालंबोपनिषद-11)<br />
(“मैं (यह) करता हुँ”, ऐसे अपने भाव के साथ, जो कर्मेन्द्रियों के द्वारा किया गया है, वही कर्म है।)(निरालंबोपनिषद-11)<br />
(The action is one which is done with one’s attribute that, “I am doing (this)” as well as which is done by the Karmendriyas.) (Niralamba Upanishad-11).<br />
कर्मेति च क्रियमाणेन्द्रियै: कर्माण्यहं करोमीत्यध्यात्मनिष्ठतया कृतं कर्मैव कर्म। अकर्मेति च कर्तृत्वभोक्तृत्वाद्यहंकारतया बन्धरुप जन्मादिकारणं नित्यनैमित्तिकयागव्रततपोदानादिषु फलाभिसंधानं यत्तदकर्म।।(निरालंबोपनिषद-11-12)<br />
(“मैं (यह) करता हुँ”, ऐसे अपने भाव के साथ, जो कर्मेन्द्रियों के द्वारा किया गया है, वही कर्म है।कर्तृत्व-भोक्तृत्वके अहंकार द्वारा ओर फल प्राप्तिके हेतु, जो यज्ञ, व्रत, तप, दान, विगेरह; नित्य-नैमित्तिक कर्म (किये जाते है) वे कर्मफल हेतु बन्धनरुप और जन्म-कुल-आयुके कारणरुप कर्मोंको अकर्म कहते है।)<br />
ज्ञानमिति देहेन्द्रियनिग्रहसदगुरुपासनश्रवणमनननिदिध्यासनैर्यद्यद्दृग्दृश्यस्वरुपं सर्वान्तरस्थं सर्वसमं घटपटादिपदाथॅमिवाविकारं विकारेषु चैतन्यं किंचिन्नास्तीतिसाक्षात्कारानुभवो ज्ञानम् । (निरालंबोपनिषद-13)<br />
(घट-वस्त्रादि पदार्थों (में रहे माटी और सूत) की तरह सब प्राणीओंके भीतर समभावसे व्याप्त और सब परिवर्तनशील वस्तुओंमें अपरिवर्तनशीलरुप स्थित शुद्ध चैतन्यके अलावा यहाँ दूसरा कुछ भी नहीं है, ऐसा साक्षात्कारी अनुभवजन्य ज्ञान जो शरीर और इन्द्रियोंके निग्रहसे, सद्गुरूकी उपासनासे और श्रवण, मनन और निदिध्यासनसे (प्राप्त होता है) यही ज्ञान है।)<br />
सत्संसगॅ स्वर्गः । असत्संसारविषयजनसंसगॅ एव नरकः। (निरालंबोपनिषद-17)<br />
सतनो समागम ज स्वर्ग छे । संसार अने लोकोनाअसत विषयों साथेनो संसगॅ नरक छे ।<br />
ज्ञान संकल्पो बंधः । (निरालंबोपनिषद-26) ज्ञानसंकल्प पण बंधन छे ।<br />
मोक्षापेक्षोसंकल्पो बन्ध । (निरालंबोपनिषद-27) मोक्षसंकल्प पण बंधन छे ।<br />
सवॅशरीरस्थचैतन्यब्रह्मप्रापको गुरुरुपास्य । (निरालंबोपनिषद-30)<br />
बधां शरीरोमां रहेल चैतन्यरुप ब्रह्मने प्राप्त करावनार गुरुज उपास्य छे ।<br />
विद्वानिति च सर्वान्तरस्थस्वसंविद्रुपविद्विद्वान्।।<br />
(निरालंबोपनिषद-32)<br />
सबके अंदर रहे (आत्मतत्त्वके साथ) जिसका प्रज्ञानका संबंध हो गया है, वह विद्वान है।<br />
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या । (निरालंबोपनिषद-35)<br />
ब्रह्मैवाहमस्मि । (निरालंबोपनिषद-39) (मैं ब्रह्म ही हुँ ।)<br />
सोअग्निपूतो भवति स वायुपूतो भवति पुनर्नाभिजाये । (निरालंबोपनिषद-40)<br />
(त अग्नि समान पवित्र थायछे । ते वायु समान पवित्रथायछे।तेने पुनर्जन्म थतो नथी ।</p>
<p>PAASHUPATBRAHMNA UPANISHAD<br />
तमोमायात्मको रुद्र: सात्विकमायात्मको विष्णू राजसमायात्मको ब्रह्मा।<br />
(पाशुपतब्राह्मणोपनिषद-पूर्वकांड-10)<br />
(रुद्र तमोगुणी मायारुप है, विष्णु सत्त्वगुणी मायारुप है और ब्रह्मा रजोगुणी मायारुप है।)<br />
राजसोंअशोअसौ ब्रह्मा तामसोंअशोअसौ रुद्रसात्विकोंअशोअसौ स एव विष्णुः । (मैत्रायण्युपनिषद-4/5)(<br />
(उस परमात्माके रजोगुण अंशको ब्रह्मा, तमोगुण अंशको रुद्र और सत्त्वगुण अंशको विष्णु कहते है।) (मैत्राण्युपनिषद-4/5)(मैत्राण्युपनिषद-4/5)(योगचूडामण्युपनिषद-72)<br />
नास्ति माया च वस्तुत:।(पाशुपतब्राह्मणोपनिषद उत्तरकांड-44)<br />
(વસ્તુત: માયાનું અસ્તિત્વ જ નથી)</p>
<p>PENGAL UPANISHAD<br />
स होवाच याज्ञवल्क्य: सदेव सोम्येदमग्र आसीत्। तन्नित्यमुक्त्तमविक्रियं सत्यज्ञानानन्दं परिपूर्णं सनातनमेकमेवाद्वितियं ब्रह्म।। (पेंगलोपनिषद-1/2)<br />
(ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा: हे वत्स (इस सृष्टि के पैदा होने से) पहेले यहाँ केवल सत ही था।वही नित्य, मुक्त, अविकारी, सत्य, ज्ञान, आनंद से परिपूर्ण, सनातन ब्रह्म है; जो केवल एक बिना किसी दुसरे के है।)(पेंगलोपनिषद-1/2)।<br />
(Rishi Yagyavalkya said: O my son (before this Creation came into being,) there was only Existence. The same is eternal, liberated, changeless, existence, knowledge and full of bliss, beginningess Brahmn that is only one without any second.)(Pengala Upanishad-1/2).<br />
प्रकृतित्वं तत: सृष्टं सत्त्वादिगुणसाम्यत:। (सरस्वती रहस्योपनिषद-47) (तत् पच्याद् सत्त्व, रजस, तमस गुणके साम्यावस्था (बनाये रखने का तंत्र) वाली यह प्रकृतिकी रचना संपन्न हुई।). “Then the creation of this Nature was accomplished, which has (a System that maintains) the equanimity of Sattva, Rajas, and Tamas”. (Saraswati Rahasya Upanishad-47)<br />
सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृति:।। (सांख्यदर्शन-1/61). (प्रकृति; (तीनों गुण) सत्त्व, रजस और तमसकी साम्यावस्था (बनाये रखने का तंत्र) है।) (The Nature (is a System that maintains) the equality of (Three Gunas) Sattva, Rajas, and Tamas). (Sankhyadarshan-1/61.).<br />
तस्मिन्मरुशुक्तिकास्थाणुस्फटिकादौ जलरौप्यपुरुषरेखादिवल्लोहितशुक्लकृष्णगुणमयी गुणसाम्यानिर्वाच्या मूलप्रकृतिरासीत्।तत्प्रतिबिम्बितं यत्तत्साक्षिचैतन्यमासीत्।। (पेंगलोपनिषद-1/3)<br />
(जैसे रेगिस्तान में जल, सीप में चांदी, ठूंठ में पुरुष और स्फटिक में वक्ररेखा आदि का आभास होता है, वैसे ही ( जिसमें तीनों) गुणों की साम्यावस्था (बनाये रखने का तंत्र) था वैसी निर्दोष (सत्त्व, रजस और तमस) त्रिगुणात्मक मूलप्रकृति उस (ब्रह्म) में बसी लगती थी। जो उस (ब्रह्म) में प्रतिबिम्बित था यह साक्षि चैतन्य था।(पेंगलोपनिषद-1/3)।<br />
[The blameless (primordial Nature) possessing (Sattva, Rajas, and Tamas) three Gunas that had (a mechanism of maintaining) the equanimity of (three) Gunas, was inkling sitting down in that(Parmatma). What was reflecting in that (Parmatma), was Universal Soul.). (Pengal Upanishad-1/3).<br />
सकलं जगदाविर्भावयति। प्राणीकर्मवशादेष पटो यद्वत् प्रसारित: प्राणीकर्मक्षयात् पुनस्तिरोभावयति। तस्मिन्नेवाखिलं विश्वं संकोचितपटवद्वर्तते।।(पेंगलोपनिषद-1/4)<br />
[(वह ब्रह्म) प्राणीओंके कर्मानुसार फल देने हेतु संपूर्ण जगतका आविर्भाव करके वस्त्रके पटकी तरह प्रसारते है, और प्राणीओंके कर्म नष्ट होनेपर फिरसे विश्व को (अपनेमें) सिमट भी लेते है। बादमें पूरा विश्व (उस ब्रह्म)में हि सिमटे हुए वस्त्रकी भाँति रहता है] (पेंगलोपनिषद-1/4)<br />
[(That Parmatma) to deliver the Karmafal to the creatures according to their Karmas spreads forth the entire universe before us like a piece of cloth, and with the diminishing of the Karmas of the creatures, again causes it to disappear (in the self). Thereafter the entire universe remains in Parmatma like a folded piece of cloth.] (Pengal Upanishad-1/4).<br />
सा पुनर्विकृतिं प्राप्य सत्त्वोद्रित्त्काऽव्यक्ताख्यावरणशक्त्तिरासीत्। तत्प्रतिबिम्बितं यत्तदीश्वरचैतन्यमासीत्।<br />
स स्वाधीनमाय: सर्वज्ञ: सृष्टिस्थितिलयानामादिकर्ता जगदअंकुररुपो भवति स्वस्मिन्विलीनं सकलं जगदाविर्भावयति।<br />
प्राणीकर्मवशादेष पटो यद्वत् प्रसारित: प्राणीकर्मक्षयात् पुनस्तिरोभावयति। तस्मन्नेवाखिलं विश्वं संकोचितपटवद्वर्तते।।(पेंगलोपनिषद-1/4) (वह फिरसे विकार को प्राप्त होकर स्त्त्वगुणप्रधान, आवरण शक्तिवाली अव्यक्त (प्रकृति) हुई। जो उस अव्यक्त (प्रकृति) में प्रतिबिम्बित था यह इश्वर चैतन्य था।अपने में स्वाधीनता प्राप्त सर्वज्ञ, सृष्टि, स्थिति और प्रलय आदिके कर्ता उस (ब्रह्म)में (प्रलयके वक़्त) जगत अंकुररुपमें होता है। जैसे वस्त्रके पट को प्रसारा जाता है, वैसे वह (ब्रह्म) प्राणीओंके कर्म बनने के कारण अपनेमें विलिन रहे संपूर्ण जगत को प्रकट करते है। प्राणीओं के कर्म नष्ट होनेपर फिरसे (जगत को) अपनेमें सिमट भी लेते है। बादमें पूरा विश्व (उस ब्रह्म)में हि सिमटे हुए वस्त्रकी भाँति रहता है)<br />
(पेंगलोपनिषद-1/4)।<br />
तस्मादात्मन आकाश: संभूत:। आाकाशाद्वायु:। वायोरग्नि:। अग्नेराप:। अद्भय: पृथिवी।तानि पंच तन्मात्राणि त्रिगुणानि भवन्ति। (पेंगलोपनिषद-1/6)<br />
स्त्रष्टुकामो सूक्ष्मतन्मात्राणि भूतानि स्थूलीकर्तुं सोऽकामयत। (पेंगलोपनिषद-1/7)<br />
(सृष्टिकी रचना हेतु (ईश्वरने) सूक्ष्म तन्मात्राओंको स्थूल पंतत्त्वोंमें स्थापित करनेकी कामना कि।)<br />
ब्रह्मांडब्रह्मरन्ध्राणि समस्तव्यष्टिमस्तकान्विदार्य तदेवानुप्राविशत्। (पेंगलोपनिषद-1/11).<br />
(वह (ब्रह्म) समस्त व्यष्टिके मस्तकको चिरके ब्रह्मांड-ब्रह्मरंध्रसे उसमें ही प्रवेश कर गये।)<br />
मोहितो जीवत्वमगमत्। (पेंगलोपनिषद-1/12)<br />
(मोहके कारण जीवत्वको प्राप्त हूआ ।)<br />
तदेव स्थूलशरीरम्। कर्मेन्द्रियै: सह प्राणादिपंचकं प्राणमयकोश:। ज्ञानेन्द्रियै: सह मनो मनोमयकोश:। ज्ञानेन्द्रियै: सह बुद्धिर्विज्ञानमयकोश:। एतत्कोशत्रयं लिंगशरीरम्। स्वरुपाज्ञानमानन्दमयकोश:। तत् कारणशरीरम्।। (पेंगलोपनिषद-2/4)<br />
(यही स्थूल शरीर है। कर्मेन्द्रियोंके साथ पाँच प्राण मिलकर प्राणमयकोश, ज्ञानेन्द्रियोंके साथ मन मिलकर मनोमयकोश, और ज्ञानेन्द्रियोंके साथ बुद्धि मिलकर विज्ञानमयकोश बनता है। यही तीनों कोश मिलकर लिंग शरीर बनता है। जहाँ अपनेका बोध नहीं रहता वह आनन्दमयकोश है, उसको ही कारण शरीर कहते है।)<br />
अंत:करणप्रतिबिंम्बितचैतन्यं यत्तदेवावस्थात्रयभाग्भवति। स जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यवस्था: प्राप्य घटियन्त्रवदुद्विग्नो जातो मृत इव स्थितो भवति।। (पेंगलोपनिषद-2/10)<br />
(अंत:करणमें जो चैतन्य प्रतिबिंबित होता है, वही अवस्था त्रय (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) का भागीदार होता है। वही जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाको प्राप्त होता है, वही रहेंटके समान उद्विग्न होता है, वही निरंतर जन्म मृत्युको प्राप्त होता रहता है।)<br />
जाग्रदवस्था गतो जीव: क्रियाकर्ता भवति<br />
लोकान्तरगत: कर्मार्जितफलं स एव भुंक्ते। (पेंगलोपनिषद-2/11)<br />
(जाग्रदवस्था प्राप्त जीवों करताहंकारसे क्रिया करते है। वे ही अपने किये हुए कर्मोंके प्राप्त फलोंको परलोकमें भी भोगते है।)<br />
सत्कर्मपरिपाकतो बहुनां जन्मनामन्ते नृणां मोक्षेच्छा जायते। (पेंगलोपनिषद-2/17)<br />
(बहुत जन्मोंके बाद जब सदकार्योंका फल मिलता है, तब मोक्षकी इच्छा पेदा होती है।)<br />
अध्यारोपापवादत: स्वरुपं निश्चयीकर्तुं शक्यते। (पेंगलोपनिषद-2/18)<br />
(अध्यारोप और अपवादसे स्वरुपका निश्चय कर शक्ते है।)<br />
अहं ब्रह्मास्मीति वाक्यार्थविचार: श्रवणं भवति। एकान्तेन श्रवणार्थानुसंधानं मननं भवति। श्रवणमनननिर्विचिकित्स्येऽर्थे वस्तुन्येकतानवत्तया चेत:स्थापनं निदिध्यासनं भवति। ध्यातृध्याने विहाय निवातस्थितदीपवद्ध्येयैकगोचरं चित्तं समाधिर्भवति।। (पेंगलोपनिषद-3/4)<br />
(अहं ब्रह्मास्मि यह महावाक्यके अर्थ पर विचार करना वह श्रवण कहलाता है। श्रवण किये हुए विषयके अर्थपर एकांतमें अनुसंधान करना वह मनन कहलाता है। श्रवण और मनन द्वारा निश्चित किये हुए अर्थरुप वस्तुमें एकाग्रतापूर्वक चित्तका स्थापन करना वह निदिध्यासन कहलाता है। जब चित्तवृत्ति ध्याता और ध्यानके भावको छोड़कर, वायु विहीन स्थानमें रखे दीपककी ज्योतकी भांती केवल ध्येयमें ही स्थिर हो जाती है, तब उस अवस्थाको समाधि कहा जाता है।)<br />
प्राक्परोक्षमपि करतलामलकवद्वाक्यप्रतिबद्धापरोक्षसाक्षात्कारं प्रसूयते। तदा जीवनमूक्तो भवति।। (पेंगलोपनिषद-3/5)(त्रिशिखब्राह्मणोपनिषद-2/158) (वज्रसूचिकोपनिषद-9)<br />
((इस स्थितिमें) पहेले जो तत्त्वमसि वग़ैरह शब्दोंके अर्थ परोक्ष दिखतेथे वही अब हस्तामलकवत विना अवरोध ज्ञात हो जाते है, और ब्रह्मका साक्षात्कार होता है, तब योगी जीवनमूक्त हो जाता है।)<br />
आत्मानं रथिनं विद्धि शरिरं रथमेव च।<br />
बुद्धि तु सारथि विद्धि मन: प्रग्रहमेव च ।। (पेंगलोपनिषद-4/3) (कठोपनिषद-1/3/3)<br />
स्वात्मानं ज्ञात्वा वेदै: प्रयोजनं किं भवति। (पेंगलोपनिषद-4/13)<br />
(आत्मज्ञान हो जाननेके बाद वेदोंसे क्या प्रयोजन रहता है?)<br />
विद्वान्ब्रह्मज्ञानाग्निना कर्मबन्धं निर्दहेत्। (पेंगलोपनिषद-4/16)<br />
(विद्वान पुरुष ब्रह्मज्ञानरुपी अग्निसे कर्मबन्धनको भस्म कर देता है।)<br />
स बाह्यमभ्यन्तरनिश्चलात्मा ज्ञानोल्कया पश्यति चान्तरात्मा। (पेंगलोपनिषद-4/18)<br />
(आत्मा बाहरसे और भीतरसे निश्चल है। आत्माको ज्ञानरुपी उल्कासे ही देखा जा सक्ता है।)<br />
तपेद्वर्षसहस्त्राणि एकपादस्थितो नर:। एतस्य ध्यानयोगस्य कलां नार्हति षोडशीम्।। (पेंगलोपनिषद-4/21)<br />
(अगर कोइ पुरुष एक पैर पर खड़ा रहकर एक हज़ार वर्षतक तप करता है, फीरभी वह ध्यानयोगकी सोड कलाओं मेंसे एककी भी बराबर वहीं आता।)<br />
व्दै पदै बन्धमोक्षाय ममेति न ममेति च । (पेंगलोपनिषद-4/25)<br />
मनसो ह्युन्मनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते।<br />
(पेंगलोपनिषद-4/26)<br />
(मन जब उन्मनी अवस्थाको प्राप्त हो जाता है, तब द्वैत समाप्त हो जाता है।)<br />
यदा यात्युन्मनीभावस्तदा तत्परमं पदम्।<br />
यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र परं पदम्।।<br />
(पेंगलोपनिषद-4/27)<br />
(जब उन्मनीभाव प्राप्त हो जाता है, तब परम पद भी प्राप्त हो जाता है। उसके बाद जहाँ जहाँ मन जाता है, वो सब परम पद बन जाते है।)</p>
<p>PRASHNA UPANISHAD<br />
आत्मन एष प्राणोजायते ।<br />
यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं । (प्रश्नोपनिषद-3/3)<br />
(आ प्राणनी उत्पत्ति आत्माथी थायछे । जे रीते पडछायो पुरुषथी ते रीते प्राण आत्माथी उत्पन्न थायछे। )<br />
तस्मादेता: सप्तार्चिषो भवन्ति। (प्रश्नोपनिषद-3/5)<br />
((यह प्राणोंसे) सप्तज्वालाओंका प्रादुर्भाव होता है)<br />
ह्रदि ह्येष आत्मा । (प्रश्नोपनिषद-3/6)<br />
(आ आत्माह्रदय प्रदेशमां रहेलछे)<br />
तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति।प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति।।(प्रश्नोपनिषद-4/2)<br />
(यहाँ (स्वप्न में) वह सर्व (इन्द्रियाँ) परम देव मन में एकत्र हो जाती है।तब यह शरीर नगरमें प्राणाग्नि हि जागृत रहता है।)<br />
यथा वयांसि वासोवृक्षं संप्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत्सवॅं परआत्मनि संप्रतिष्ठते।। एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुष: स परेऽक्षर आत्मनि संप्रतिष्ठते।। (प्रश्नोपनिषद-4/7 और 9)<br />
(हे प्रिय! जिस प्रकार बहुत से पक्षी (सायंकालमें) अपने निवासरुप वृक्षपर (आकर) आरामसे ठहरते है; ठीक वैसे हि, (पृथिवी आदि से लेकर इन्द्रियों, उनके विषयों, मन, बुद्धि अहंकार और प्राण तक) सबके सब (सुषुप्ति कालमें) परम आत्मामें सुखपूर्वक आश्रय पाते है। अविनाशी परम आत्मा में जो सब आश्रित हुआ यह पुरुष हि द्रष्टा, स्पर्श करनेवाला, सुननेवाला, सूँघनेवाला, स्वाद लेनेवाला, मनन करनेवाला, बोधकरनेवाला विज्ञानात्मा है।)<br />
(जे प्रमाणे पक्षी पोताना रहेठाण अेवा वृक्षपर जइनेबेसी जायछे तेवीज रीते (सुषुप्तिमा) आ सवॅ तत्त्व परम आत्मामां प्रतिष्ठित थइ जायछे )<br />
परं चापरं च ब्रह्म यदोंकार:। (प्रश्नोपनिषद-5/2)<br />
(यह ॐ परा एवं अपरा एवं ब्रह्म है । )<br />
(पिप्पलादने सत्यकामको जवाब दिया।<br />
जब सत्यकामने ॐ की आराधना कर शकतेहै ऐसा पूछा)<br />
स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्जयोतिराप: पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मंत्रा: कर्मलोका लोकेषु च नाम च।। (प्रश्नोपनिषद-6/4)<br />
उस पुरुषने सबसे पहेले प्राणका सर्जन किया, बादमें प्राणसे श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, इन्द्रियाँ, मन, अन्नका सर्जन हुआ, अन्नसे विर्य, तप, मंत्र, कर्म, लोक और नाम पैदा हुए।इस (तरह सोलह कलाओं वाला पुरुष देह की रचना हुइ)<br />
यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तंगच्छन्ति भिद्यते तासां नामरुपे समुद्र इत्येव प्रोच्यते ।(प्रश्नोपनिषद-6/5)</p>
<p>SARASWATIRAHASYA UPANISHAD<br />
लोहितशुक्लकृष्णगुणमयी गुणसाम्यानिर्वाच्या मूलप्रकृतिरासीत्। (पेंगलोपनिषद-1/3)<br />
(जिसका वर्णन नहीं हो सक्ता है, जिसमें सत्त्व, रजस और तमस तीनों गुण की साम्यावस्था (बनाये रखने का तंत्र) है वैसी मूलप्रकृति (ब्रह्ममेंसे) उत्पन्न हुइ।) “This primordial Nature, which is beyond the description in the words, which has (a System that maintains) the equanimity of Sattva, Rajas, and Tamas Gunas; was born (from the Parmatma)”. (Pengal Upanishad-1/3).<br />
प्रकृतित्वं तत: सृष्टं सत्त्वादिगुणसाम्यत:। (सरस्वती रहस्योपनिषद-47) (तत् पच्याद् सत्त्व, रजस, तमस गुणके साम्यावस्था (बनाये रखने का तंत्र) वाली यह प्रकृतिकी रचना संपन्न हुई।). “Then the creation of this Nature was accomplished, which has (a System that maintains) the equanimity of Sattva, Rajas, and Tamas”. (Saraswati Rahasya Upanishad-47)<br />
सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृति:।। (सांख्यदर्शन-1/61). (प्रकृति; (तीनों गुण) सत्त्व, रजस और तमसकी साम्यावस्था (बनाये रखने का तंत्र) है।) (The Nature (is a System that maintains) the equality of (Three Gunas) Sattva, Rajas, and Tamas). (Sankhyadarshan-1/61.).<br />
जगत्कर्तुमकर्तु वा चान्यथा कर्तुमीशते। (सरस्वतीरहस्योपनिषद-51)<br />
(परमात्मा जगतकी रचना करने न करने और उनसे अलग कुछभी करने समर्थ है)<br />
शक्तिद्वयं हि मायाया विक्षेपावृतिरुपकम्। विक्षेपशक्तिर्लिंगादि ब्रह्माण्डान्तं जगत्सृजेत्।।<br />
अन्तर्द्रृग्दृश्ययोर्भेदं बहिश्च ब्रह्मसर्गयो:। आवृणोत्यपरा शक्ति: सा संसारस्य कारणम्।। (सरस्वतीरहस्योपनिषद-52-53)<br />
(विक्षेप और आवरण नामक मायाकी दो शक्तियाँ है। विक्षेप शक्ति लींगदेहसे ब्रह्मांड पर्यन्त जगतकी संरचना करती है। आवरण नामक अपरा शक्ति अंदरके दृष्टा-दृश्यके भेदको और बहारके परमात्मा-सृष्टिके भेदको आवृत करती है। यह आवरण शक्ति ही संसारके बंधनका कारण है।)<br />
अस्ति भाति प्रियं रुपं नाम चेत्यंशपंचकम् ।<br />
आद्यत्रयं ब्रह्मरुपं जगद्रूपं ततो द्वयम् । (सरस्वतीरहस्योपनिषद-58)<br />
(अस्ति (है), भाति (लगता है), प्रिय (आनंदस्वरुप) , रुप अौर नाम यह (अस्तित्व के) पाँच अंश कहे गये है । पहेले तीन ब्परमात्मारुप अौर पीछले दो जगतरुप कहे गये है।) (सरस्वतीरहस्योपनिषद-58)<br />
(Being, Consciousness, Bliss, Form and Name are called to be the five components (of Existence). The first three are form of Parmatma whereas the later two are form of world). (Saraswati Rahasya Upanishad-58).<br />
देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि। (सरस्वतीरहस्योपनिषद-66)<br />
(देहाभिमान नष्ट होनेसे अपनेमें ही परमात्माकी अनुभूति संप्राप्त होती है।)<br />
भिद्यते ह्रदयग्रन्थि छिद्यन्ते सवॅसंशया: ।<br />
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ।।(मुंडकोपनिषद-2/2/8)(महोपनिषद-4/82)(सरस्वतीरहस्योपनिषद-67)<br />
(जब साधक प्रकृतिविषयक समझ को आत्मसात कर लेता है, तो उसके सब संशयों का निराकरण हो जाता है, उसके सब कर्मों क्षीण हो जाते है, उसका सूक्ष्म शरीर का विसर्जन हो जाता है, (जो तुरन्त हि उसको कैवल्य को उपलब्ध करा देता है।)(मुंडकोपनिषद-2/2/8)(महोपनिषद-4/82)(सरस्वतीरहस्योपनिषद-67)<br />
[When the seeker assimilates the understanding about the Nature, then all his doubts get allayed, all his actions get waned, his Subtle Body gets disunited, (which instantly avails him to Keivalya)]
(Mundaka Upanishad-2/2/8).<br />
(Maha Upanishad-4/82). (Saraswatirahasya Upanishad-67)<br />
मयि जीवत्वमीशत्वं कल्पितं वस्तुतो न हि। इति यस्तु विजानाति स मुक्तो नात्र संशय:।। (सरस्वतीरहस्योपनिषद-68)<br />
(मेरेमें जीवत्व-इशत्वका भेद कल्पित है, वास्तवमें नहीं है। यह जो जान लेता है, वह मूक्त ही है; इसमें कोई संशय नहीं है।)</p>
<p>SARVASAR UPANISHAD<br />
आत्मेश्वरजीवोअनात्मनां देहादीनामात्मत्वेनाभिमन्यतेसोअभिमान आत्मनो बंन्धः। तन्निवृत्तिर्मोक्ष: ।(सवॅसारोपनिषद-2)<br />
(आत्मा ही परमात्मा है। देह (इन्द्रियों, मन) आदि अनात्ममोंमें जब अपने द्वारा (&#8220;यह मैं हुँ&#8221; ऐसा) अभिमान होता है, यह अभिमान हि जीव है, (यह अभिमान हि) अपना बन्धन है। उसकी निवृत्ति ही मोक्ष है।)<br />
(Atmaa itself is Parmatma. The attribute of Ego that is born in insentient (entities like) body, (Mind), etc, (purporting that “I am this”;) the said attribute of Ego is called Jiva; (the same attribute of Ego) is our bondage, its cessation is Salvation.) (Sarvasara Upanishad-2)<br />
या तदभिमानं कारयति सा अविद्या । सोअभिमानो ययानिवतॅते सा विद्या । (सवॅसारोपनिषद-3)<br />
(जो उस अभिमान को पैदा करती है, वह अविद्या है और जिसके द्वारा उस अिभमान की निवृत्ति होती है, वह विद्या है।) (सवॅसारोपनिषद-3)<br />
(That which begets the said attribute of Ego in person is Avidya, and that which causes the cessation of said attribute of Ego in person, is Vidya.) (Sarvasara Upanishad-3)<br />
ल्लिंगशरीरं ह्रदयग्रन्थिरित्युच्यते। (सवॅसारोपनिषद-7)<br />
(लिंग शरीरको ही ह्रदयग्रंथी कहते है।)<br />
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। (तैत्तिरीयोपनिषद-2/1/1)(सवॅसारोपनिषद-12)<br />
(परमात्मा सत्य, ज्ञान, अनन्त रुप है।)<br />
(तैत्तिरीयोपनिषद-2/1/1)(सवॅसारोपनिषद-12)<br />
(Parmatma is embodied as Truth, Knowledge, infinity.) (Teittariya Upanishad-2/1/1) (Sarvasara Upanishad-12).<br />
मृद्विकारेषु मृदिव स्वणॅविकारेषु स्वणॅमिव तंतुविकारेषुतंतुरिव पूणॅं व्यापकंचैतन्यमनन्तमित्युच्यते।(सवॅसारोपनिषद-12)<br />
(माटीथी बनेल पात्रोमां माटी समान सोनाना घरेणामांसोना समान दोराथी बनेल वस्तुमां दोरा समान अे व्यापक चैतन्य सताने अनंत कहेछे । )<br />
माया नाम अनादिरन्तवती प्रमाणाप्रमाणसाधारणा न सती नासती न सदसती स्वयमधिका विकाररहिता निरुप्यमाणा सतीतरलक्षनशून्या सा मायेत्युच्यते।अज्ञानं तुच्छाप्यसती कालत्रयेऽपि पामराणां वास्तवी च सत्त्वबुद्धिर्लौकिकानामिदमित्यनिवॅचनीया वक्तुं न शक्यते।। (सवॅसारोपनिषद-15)<br />
(माया नाम अनादि है, विनष्टप्राय है। वह न सत है, न असत है और नहीं सतअसत है। वह स्वयं ही अधिका है, विकार रहिता है।जैसे कि अन्य लक्षणों से रहित है ऐसा निरुपण हो सकता है, उसे माया ऐसा कहा जाता है। यह मायाशक्ति तुच्छ, अज्ञानरुप और मिथ्या भी है, फिर भी मूढ़ों को जैसे कि वह तीनों कालों में (हंमेशा) वास्तविक है, ऐसी दिखती है।अत: “वह इस प्रकारकी है”, ऐसा सुनिश्चितया बताना शक्य नहीं है।) (सवॅसारोपनिषद-15)<br />
(अे आ प्रकारनीछे अेवुं मायानुं स्वरुप बताववुं जड शक्यनथी)<br />
मत्सान्निध्यात्प्रवतॅन्ते देहाद्या अजडा इव । (सवॅसारोपनिषद-18)<br />
(मेरी (परमात्मा की) उपस्थितिसे देह (मन, बुद्धि, अहंकार) वग़ैरह जीवित हो वैसे वर्तते है।) (सवॅसारोपनिषद-18)<br />
(Because of my (Parmatma) proximity the body (Mind, Intellect, Ego) etc, are behaving as if they are animate) (Sarvasaar Upanishad-18).<br />
नाहं भवामि । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो बुद्धियादीनां हिसवॅदा । नाहं कर्ता नैव भोक्ता प्रकृतैः साक्षिरुपकः । मत्सान्निध्यात्प्रवतॅन्ते देहाद्या अजडा इव । आत्माहंसवॅभूतानां विभुः साक्षी न संशयः।<br />
ब्रह्मैवाहं सच्चिदानन्दरुपम् । (सवॅसारोपनिषद-16TO20)<br />
(मुझे जन्म नहीं है। मैं बिना प्राण, मन और बुद्धि ही हंमेश शुद्धस्वरुप हुँ । मैं कर्ता या भोक्ता भी नहीं हुँ बल्कि स्वभावसे साक्षीरुप ही हुँ । मेरी उपस्थितिसे ही देह, मन वग़ैरह जीवित हो वैसे बर्तते है। मैं सब प्राणीओंमें व्याप्त साक्षीरुप आत्मा हुँ, इसमें कोइ शंका नहीं है। मैं सत् चित् आनंदरुप ब्रह्म हुं।)<br />
नाहं देहो जन्ममृत्यू कुतो मे नाहं प्राणः क्षुत्पिपासे कुतोमे ।<br />
नाहं चेतः शोकमोहौ कुतो मे नाहं कर्ता बन्धमोक्षौ कुतोमे ।<br />
(सवॅसारोपनिषद-21) ( चेतः= मन)<br />
ल्लिंगशरीरं ह्रद्ग्रन्थिरित्युच्यते । (सवॅसारोपनिषद-7)<br />
जे लिंगशरीर छे तेज ह्रदयग्रन्थि कहेवायछे ।</p>
<p>SHANDILYA UPANISHAD<br />
शरीरं षण्णवत्यगुंलात्मकं भवति। शरीरात्प्राणो द्वादशांगुलाधिको भवति।। (शाण्डिल्योपनिषद-1/4/2). (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/54)<br />
(शरीर छीया नब्बे अंगुली प्रमाणका है। प्राण शरीरसे बारह अंगुली प्रमाण ज़्यादा बड़ा होता है।)<br />
नाभेस्तिर्यगध ऊर्ध्वं कुण्डलिनी स्थानम्। अष्टप्रकृतिरुपाऽष्टधा कुण्डलीकृता कुण्डलिनी शक्तिर्भवति।। (शाण्डिल्योपनिषद-1/4/8).<br />
(नाभीसे तीरछी नीचे उपर कुण्डलिनी क्षेत्र आया हुआ है। अष्ट प्रकृतिरुपा कुण्डलिनीशक्ति आठ कुंडली बनाकर रही हुइ है।)<br />
सुषुम्नाया: सव्यभागे इड़ा तिष्ठति। दक्षिणभागे पिंगला। इडाया चन्द्रचरति। पिंगलाया रवि:। तमोरुपश्चंन्द्र:। रजोरुप रवि:।। (शाण्डिल्योपनिषद-1/4/11).<br />
(सुषुम्णा नाड़ीके बाँयी और इड़ा नामकी और दाहिनी और पिंगला नाडी रही है। इड़ामें चन्द्र और पिंगलामें सूर्य संचरित होता है। चन्द्र तमोरुप और सूर्य रजोरुप है।)</p>
<p>SHARBHA UPANISHAD<br />
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।<br />
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कदाचन।। (शरभोपनिषद-20)<br />
(जहाँसे (ब्रह्मकी अनुभूतिसे) मनके साथ वाणीभी उसको न प्राप्त करके लौट आती है, उस आनंदस्वरुप ब्रह्मका जीसको बोध हुआ है, वह विद्वान कभी भयग्रस्त नहीं होता)</p>
<p>SHATYAAYNIYA UPANISHAD<br />
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो:।<br />
(शातयायनीयोपनिषद-1)</p>
<p>SHARIRAK UPANISHAD<br />
पृथिव्यादिमहाभूतानां समवायं शरीरं। (शारीरकोपनिषद-1)<br />
(पृथ्वि आदी पाँच महाभूतोनो समुदाय आ शरीरछे । )<br />
मनोबुद्धिरहंकारश्चित्तमित्यन्तःकरणचतुष्टयम् । (शारीरकोपनिषद-4)<br />
(मन बुद्धि चित और अहंकार यह चारोंका समूह अंतःकरण कहलाता है। )<br />
मनःस्थानं गलान्तं बुद्धेवॅदनमहंकारस्य ह्रदयं चित्तस्यनाभिरिति । (शारीरकोपनिषद-4)<br />
(मनका स्थान कंठका अंतिम भाग, बुद्धिका स्थान मुख, चित्तका स्थान नाभी अौर अहंकारका स्थान ह्रदय कहलाता है।)<br />
बुद्धिकर्मेन्द्रियप्राणपंचकैर्मनसा धिया। शरीरं सप्तदशभि: सुसूक्ष्मं लिंगमुच्यते।। (शारीरकोपनिषद-16)<br />
(ज्ञानेन्द्रिय (पाँच), कर्मेन्द्रि (पाँच), पांच प्राण, मन और बुद्धि यहसतरहका सत्रहका समूह सूक्ष्म शरीर लींग शरीर कहलाता है)</p>
<p>SHUKA RAHASYA UPANISHAD<br />
चतुर्णामपि वेदानां यथोपनिषद: शिर:।<br />
इयं रहस्योपनिषत्तथोपनिषदां शिर:।। (शुकरहस्योपनिषद-17)<br />
एकमेवाद्वितियं ब्रह्म।(मैत्रेय्युपनिषद-2/15)<br />
(शुकरहस्योपनिषद-20).<br />
(यहाँ केवल परमात्मा एक ही है, बिना किसी दुसरे के।)(मैत्रेय्युपनिषद-2/15)(शुकरहस्योपनिषद-20)।<br />
(Parmatma alone is here, only one without any second) (Meitriya Upanishad-2/15). (Shukarahasya Upanishad-20).<br />
जीवो ब्रह्मेति। (शुकरहस्योपनिषद-28)<br />
(जीव ही ब्रह्म है)<br />
येनेक्षते श्रृणोतीदं जिध्रति व्याकरोति च ।<br />
स्वाद्वस्वादु विजानाति तत्प्रज्ञानमुदिरितम्। (शुकरहस्योपनिषद-31)<br />
(प्राणी जिससे देखता है, सूनता है, सुगंध ग्रहण करता है, बोलता है, स्वाद-अस्वादका अनुभव करता है, उसे प्रज्ञान कहते है।)<br />
चतुर्मुखेन्द्रदेवेषु मनुष्याश्वगवादिषु। चैतन्यमेकं ब्रह्मात: प्रज्ञानं ब्रह्म मय्यपि।। (शुकरहस्योपनिषद-32)<br />
(चतुर्मुख ब्रह्मा, इन्द्रदेव, सब देवों , मनुष्य , अश्व, गाय वगेरे सब पशुओंमें एकही चैतन्य सत्ता ब्रह्म रही हुइ है। वही प्रज्ञान ब्रह्म मेरेमें भी समाहित है। )<br />
एकमेवाद्वितीयम् । (शुकरहस्योपनिषद-35)<br />
अहंकारादिदेहान्तं प्रत्यगात्मेति गीयते।।(शुकरहस्योपनिषद-37)<br />
(अहंकारसे लेकर शरीरतक को प्रत्यक् आत्मा कहा जाता है।)<br />
अनात्मदृष्टेरविवेकनिद्रामहं मम स्वप्नगतिं गतोऽहम्। (शुकरहस्योपनिषद-39)<br />
(मैं अनात्म पदार्थोमें दृष्टिसेलीन होनेके कारण अविवेककी निद्रामे &#8220;मैं&#8221; और &#8220;मेरा&#8221; से संमोहित होकर स्वप्नवत व्यवहार कर रहा हुँ।)<br />
कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीश्वरः ।<br />
कायॅकारणतां हित्वा पूणॅबोधोअवशिष्यते । (शुकरहस्योपनिषद-42)<br />
(कायॅ उपाधिसे यह जीव है और कारण उपाधिसे ईश्वर है। कायॅकारण उपाधिआेंका त्याग कर देनेसे पूणॅज्ञानरुप ब्रह्म ही शेष रहते है।)<br />
કાર્યનો કર્તાભાવ તો જીવ<br />
કાર્યનું કારણ ઈશ્વર છે.<br />
श्रवणं तु गुरो: पूर्वं मननं तदनन्तरम्।<br />
निदिध्यासनमित्येतत् पूर्णबोधस्य कारणम्।। (शुकरहस्योपनिषद-43)<br />
(साधकको पूर्ण बोध तब हो सकता है, जब वह पहेले गुरुका उपदेश सूनें, बाद मनन करें और बाद निदिध्यासन (अनुभूतिकी साधना) करें।)<br />
अन्यविद्यापरिज्ञानमवश्यं नश्वरं भवेत्।<br />
ब्रह्मविद्यापरिज्ञानं ब्रह्मप्राप्तिकरं स्थितम्।। (शुकरहस्योपनिषद-44)<br />
(अन्य विद्याका अच्छी तरहसे प्राप्त किया हुआ ज्ञान, अवश्य नश्वर है; किंतु ब्रह्मविद्याका अच्छी तरह प्राप्त किया हुआ ज्ञान ब्रह्म प्राप्तिमें समर्थ है।)</p>
<p>SHWETASHWATARA UPANISHAD<br />
हरि: ऊँ ब्रह्मवादिनो वदन्ति- किं कारणं ब्रह्म कुत:स्म जाता जीवाम केन क्व च संप्रतिष्ठा:। अधिष्ठिता: केन सुखेतरेषु वताॅमहे ब्रह्मविदोव्यवस्थाम्।।(श्वेताश्वतरोपनिषद-1/1)<br />
(जगतका कारण जो ब्रह्म है वो ब्रह्म क्या है? कैसाहै? हम कहाँसे उत्पन्न हुएहै? किससे जीतेहै? और अंतमें हम िकसमे रहतेहै? किसके नियमके तहत रहकरहम सुख-दु:खकी इस व्यवस्थाको मानतेहै?)<br />
भ्राम्यते चक्रे पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा।(श्वेताश्वतरोपनिषद-1/6)<br />
(अपनेको और ईश्वरको अलग समजके िजवन चक्रमेंघूमते रहतेहै ।)<br />
वह्नेयॅथा योनिगतस्य मूतिॅनॅ दृश्यते नैव च लिन्गनाश:।<br />
स भूय एवेन्धनयोनिगृह्यस्तद्वोभयं वै प्रणवेन देहे।।(श्वेताश्वतरोपनिषद-1/13)<br />
(जैसे (काष्ठ के) गभॅ में छीपे अग्नि का रुप (काष्ठ में) देखा नहीं जाता है, फीरभी सूक्ष्मरुपसे (काष्ठ में)अग्नि नहीं है ऐसा कहा भी नहीं जाता है; क्योंकि जब (काष्ठ को) इन्धन के रुपमें (जलाये जाता है तो काष्ठ के) गभॅमें छीपे अग्निको फीर से काष्ठ में से ) प्राप्त भी किया जाता है।यह दोनों (रुपकोकी) तरह परमात्मा (देह में होते हुए भी उसके रुप को देखा नहीं जाता है अौर सूक्ष्मरुपसे परमात्मा देह में नहीं है ऐसा कहा भी नहीं जाता है, क्योंकि वह) ध्यान के रास्ते ॐ द्वारा देह में महसूस किया जाता हैा) (श्वेताश्वतरोपनिषद-1/13)<br />
(As the fire, hidden in the abode (of the wood) cannot be seen (in the wood) and yet subtly it cannot be denied that there is no fire (in the wood), because when (the wood) is burnt as a fuel, the fire hidden in the abode (of the wood) is again grasped (from the wood). Same as these both (similes, though) Parmatma (is an integral part of body, He cannot be seen, and yet subtly it cannot be denied that there is no Parmatma in the body, because He) is realized from the body when meditated with ॐ). (Shvetashvataropanishad-1/13)<br />
श्रृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थु।। (श्वेताश्वतरोपनिषद-2/5)<br />
(दिव्यलोकमें रहनेवाले सभी परमात्माके पुत्रों मेरी बातसुने।)<br />
अग्निर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राभियुज्यते।<br />
सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मन:।। (श्वेताश्वतरोपनिषद-2/6)<br />
(जहाँ अग्निका मंथन होता है, जहाँ प्राणवायुका विधिवत निरोध होता है, जहाँ सोमरसका प्रचुर आनंद प्रगट होता है, वहाँ मन हंमेशा शुद्ध हो जाता है।)<br />
य एको जालवानीशत ईशनीभि: सर्वांल्लोकानीशत ईशनीभि:।<br />
य एवैक उद्भवे संभवे च य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति।। (श्वेताश्वतरोपनिषद-3/1) (एतद् विदु: अमृता: ते भवन्ति)<br />
( जो एक मायापति, अपनी प्रभुता संपन्न शक्तियोंद्वारा संपूर्ण लोकोंपर शासन करता है, जो अकेला ही सृष्टिकी उत्पत्ति और विकासके लिये समर्थ है, उस (परम पुरुष)को जो विद्वान जान लेता है वह अमर हो जाते है।)<br />
अथ ब्रह्मस्वरुपं कमिति नारद: पप्रच्छ। तं होवाच पितामह: किं ब्रह्मस्वरुपमिति। अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति ये विदुस्ते पशवो न स्वभावपशवस्तमेवं ज्ञात्वा विद्वान्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते नान्य: पन्था विद्यतेऽयनाय।। (नारद परिव्राजकोपनिषद-9/1) (श्वेताश्वतरोपनिषद-3/8)<br />
( बाद नारदजीने फिरसे पूछा: ब्रह्मका स्वरुप कैसा है? ब्रह्माजीने नारदजीको कहा: ब्रह्म अपने स्वरुपसे अन्य क्या है? ब्रह्म अलग है और मैं भी अलग हूँ, ऐसा जो मानता है वह पशु है। पशुयोनीमें जन्मा वोही पशु नहीं है। इसको ही जानकर विद्वानलोग जन्म-मृत्युके मार्गसे मूक्त हो जाते है। इस ज्ञानके अलावा मूक्तिका कोई अन्य मार्ग नहीं है।)<br />
अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षु: स श्रृणोत्यकणॅ:।<br />
स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्रयं पुरुषंमहान्तम् ।। (श्वेताश्वतरोपनिषद-3/19)<br />
हाथपग न होवाछतां ज़डपथी दोडीने पकड़ी लेछे आँखनहोवाछतां जुअेछे । कान न होवाछतां सांभलेछे । तेजाणवा योग्य बधुं जाणेछे पण तेने जाणनार कोइ नथी। ते परम ब्रह्म तरीके ओलखायछे । )<br />
अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वी: प्रजा सृजमानां सरुपा:।<br />
अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्य:।। (श्वेताश्वतरोपनिषद-4/5)<br />
(अपने ही जैसी बहुत प्रजाको उत्पन्न करनेवाली लोहित (लाल-रजस्), शुक्ल (सफ़ेद-सत्व), और कृष्ण (काला-तमस) वर्णवाली अनादि प्रकृति (अजा-बकरी)को एक जीव (अज-बकरा) स्विकार करते भोगता है, और दूसरा आत्मा (अज-बकरा) भोगनेयोग्य प्रकृतिको छोड़देता है।)<br />
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।<br />
तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ।। (श्वेताश्वतरोपनिषद-4/6) (मुंडकोपनिषद-3/1/1)<br />
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तुमहेश्वरम्।<br />
तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत्।।(श्वेताश्वतरोपनिषद-4/10)<br />
(प्रकृतिको तुम माया समजो और महेश्वरको मायापति। उसकेही अंगभूतोंसे यह समग्र विश्व व्याप्त है।) (श्वेताश्वतरोपनिषद-4/10)<br />
(You should find the Nature as Maya (illusion) and Maheshwar as conjurer. This entire universe prevails with their components.) (Shwetashwatar Upanishad-4/10.)<br />
न तस्य प्रतिमा अस्ति। (श्वेताश्वतरोपनिषद-4/19)<br />
(उस (परमात्मा) की कोई प्रतिमा नहीं है)<br />
न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम्। (श्वेताश्वतरोपनिषद-4/20) (कठोपनिषद -2/3/9)<br />
(Na chakshusa pasyati kaschaneinam-Kathopanishad-2/3/9)(None can see That(Brahman) with eyes).<br />
प्राणाधिप: संचरति स्वकर्मभि:।।माया(श्वेताश्वतरोपनिषद-5/7)<br />
(प्राणोंका अधिपति (जीवात्मा) अपने कर्मोंके अनुसार विविध योनीयोंमें गमन करता रहता है।)<br />
संकल्पनस्पर्शनदृष्टिमोहैर्ग्रासांबुवृष्ट्यात्मविवृद्धिजन्म।<br />
कर्मानुगान्यनुक्रमेण देही स्थानेषु रुपाण्यभिसंप्रद्यते।।(श्वेताश्वतरोपनिषद-5/11)<br />
(जैसे अन्न और जल के सेवन से शरीर की वृद्धि होती है, वैसे हि संकल्प, स्पर्श, दृष्टि और मोह से जीवात्मा का जन्म और (अनेक योनियों में) विस्तार होता है।जीवात्मा अपने किये हुए कर्मोंके फलानुसार भिन्न भिन्न स्थानोंमें भिन्न भिन्न रुपोंको वारंवार लेता है।)<br />
न तस्य कार्यं करणं च विद्यते। (श्वेताश्वतरोपनिषद-6/8)<br />
(उस परमात्माका कोई कार्य एवं शरीर-इन्द्रिय वग़ैरह नहीं है।)<br />
नैव च तस्य लिंगम्। (श्वेताश्वतरोपनिषद-6/9)<br />
(उस (परमात्मा) का कोई लिंग (स्त्री, पुरुष या नपुंसक) नहीं है।)<br />
एको देव: सर्वभूतेषु गूढ़:सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।।(श्वेताश्वतरोपनिषद-6/11)<br />
(सब प्राणीओंमें एकही परमात्मा गुप्त रहा हुआ है, वही वहसर्वव्यापी और सभी प्राणीओंके अंतरात्मा है।)<br />
यो विदधाति कामान् । (श्वेताश्वतरोपनिषद-6/13) (कठोपनिषद-2/2/13).<br />
जो(परमात्मा) प्राणियोंको अपने कर्मोंके फल देनेवाला है।)<br />
एको हँसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्नि: सलिले संनिविष्ट:।<br />
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्य: पन्था विद्यतेऽयनाय।। (श्वेताश्वतरोपनिषद-6/15)<br />
(यह शरीरमध्ये एक ही हंस (परमात्मा) है, जो पानीमें छीपे अग्निके भाँति अगोचर है। उसको जानकर साधक मृत्युरुपबंधनको पार कर देता है, इससे अलग मोक्षप्राप्तिका अन्य कोई मार्ग नहीं है।)<br />
Water is made of Hydrogen and Oxygen. Hydrogen is inflammable. Rishis knew this thousands of years back.<br />
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।<br />
तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये।। (श्वेताश्वतरोपनिषद-6/18) (गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद-22)<br />
(जो परमात्मा सबसे पहेले ब्रह्माको उत्पन्न करता है और उनको वेदोंका ज्ञान प्रदान करता है, मैं मोक्षप्राप्तिकी अभिलाषासे; बुद्धिको प्रकाशित करनेवाले उसदेवकी शरण स्विकारता हूँ ।)<br />
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति।। (श्वेताश्वतरोपनिषद-6/14)<br />
The entire universe is lighted by its light<br />
यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवा:।<br />
तदा देवमविज्ञाय दु:खस्यान्तो भविष्यति।। (श्वेताश्वतरोपनिषद-6/20)<br />
जब मनुष्य आकाशको चमड़ेकी भाँति लपेट शकेगा (जो अशक्य है) तब वह परमात्माको जाने बिना भी दु:खका अंत (जो भी अशक्य है) हो शकेगा।)<br />
(Only when men shall (succeed to) wrap round the sky as if it were a simple skin,<br />
Only then will there be an end to sorrow without knowing Parmatma.)</p>
<p>SKANDA UPANISHAD<br />
तुषेण बद्धो व्रिहि: स्यात्तुषाभावेन तन्डुल:। (स्कंदोपनिषद-6)<br />
जैसे भूसी से बद्ध है, तो डांगर है; अगर बिना भूसी के है, तो चावल है।)(स्कंदोपनिषद-6)<br />
(If fastened with the husk, then it is paddy, if without the husk then it is rice) (Skanda Upanishad-6).<br />
जीव: शिव: शिवो जीव: स जीव: केवल: शिव:।<br />
तुषेण बद्धो व्रिहि: स्यात्तुषाभावेन तन्डुल: । (स्कंदोपनिषद-6)<br />
(जीव ही शिव है और शिव ही जीव है। जीव जब कैवल्य प्राप्त होता है तो शिव ही बन जाता है; जैसे भूसी से बद्ध होती है तो डांगर और अगर बिना भूसी के होती है तो चावल कहलाती है।)<br />
देहो देवालय: प्रोक्त:।।(स्कंदोपनिषद-10)<br />
(तत्त्वदर्शियों द्वारा) देह को हि देवालय कहा गया है।) (स्कंदोपनिषद-10)<br />
(The body is said to be the abode of God (by one who is seer of reality)<br />
(Skanda Upanishad-10)<br />
अभेददशॅनं ज्ञानं ध्यानं निर्विषयं मन: ।<br />
स्नानं मनोमलत्यागं शौचमिन्द़िय निग्रह:।।(मैत्रेय्युपनिषद-2/2) (स्कंदोपनिषद-11)<br />
[(सृष्टिमें ब्रह्मका) अभेदरुप दर्शन होना ही ज्ञान है। मनका विषय रहित हो जाना हि ध्यान है। मनके (द्वन्द्वात्मक) मल का त्याग हो जाना ही स्नान है। इन्द्रियोंका (पूरा) वशमें होना ही पवित्रता है।](मैत्रेय्युपनिषद-2/2) (स्कंदोपनिषद-11)<br />
[The identical perception (in Creation of Parmatma) is Knowledge. The Mind becoming devoid of subject is Meditation. The renunciation of (dualistic) filth of Mind is Bath and the (complete) restraint on the sense organs is sacredness). (Meitriya Upanishad-2/2) (Skanda Upanishad-11).</p>
<p>SVASANVEDYA UPANISHAD<br />
तेषामेव पुनर्भवनं नो इहास्ति। स यथा मृत्पिंडे घटानां तन्तौ पटानां तथैवेति भवति।।(स्वसंवेद्योपनिषद1A)<br />
[(जो ब्रह्मलीन हुए है) उसका इस जगत में पुनर्जन्म नहीं होता।उसकी स्थिति, जैसे माटी के पिंड में कुंभकी और तंतुओंमें कपड़े की होती है, वैसी ही होती है।) (स्वसंवेद्योपनिषद1A)<br />
[Those ( who have been absorbed in Parmatma,) don’t have rebirth in this world. Their position is just like as the earthen pot has in the lump of soil and the cloth has in the yarns](Svasanvedya Upanishad-1A)<br />
यदस्ति तदस्ति यन्नास्ति नास्ति तत्। (स्वसंवेद्योपनिषद1B)<br />
(जीसका अस्तित्व है, उनका ही है। जीसका अस्तित्व नही है, उसका नहीं है)<br />
न सुकृतं न दुष्कृतम्। (स्वसंवेद्योपनिषद-1B)<br />
(पुण्य और पाप भी नहीं है)<br />
कर्माद्वैतं न कायॅं भावाद्वैतं तु कायॅं । (स्वसंवेद्योपनिषद-1D)<br />
(कर्मोंमें नहीं बल्कि भावमें अद्वैत करना चाहिये)(स्वसंवेद्योपनिषद-1D)<br />
(Nonduality must be observed not in action but in aspect.) (Svasanvedya Upanishad-1D).<br />
(कर्मोंमें द्वैत करना चाहिये और भावमें द्वैत नहीं करना चाहिये। कर्मों सब करो मगर भाव एक हि रखो।)<br />
(कर्म बूरा नहीं होता, भावना कर्मको बूरा बनाती है। किसी एक प्रकारका कर्म हि करना चाहिये, ऐसा नहीं रखना लेकिन भाव (अकर्ताका या अद्वैतका) एक हि रखना चाहिये।)</p>
<p>TEITTIRIYA UPANISHAD<br />
ओमिति ब्रह्म। ओमितीदंसवॅम्। (तैत्तिरीय उपनिषद-1/8/1)<br />
(ॐ ही ब्रह्म छे । ॐ ही प्रत्यक्ष जगत है)<br />
यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि। (तैत्तिरीयोपनिषद-1/11/2)<br />
(जो दोषरहित कर्म कहे गये है, उनका ही आचरण करना चाहिये। अन्यका नहीं।)<br />
ह्रिया देयम्। (तैत्तिरीयोपनिषद-1/11/3)<br />
(दान शरमसे (गुप्तरुपसे) देना चाहिये)<br />
श्रद्धया देयम्। (तैत्तिरीयोपनिषद-1/11/3)<br />
(दान श्रद्धासे देना चाहिये)<br />
स्वाध्यायान्मा प्रमद:। (तैत्तिरीय उपनिषद-1/11/4) (स्वाध्यायमां आलस न कर । )<br />
तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश: संभूत: आकाशाद्वायु: वायोरग्नि:। अग्नेराप:। अद्भय: पृथिवी। पृथिव्याओषधय:ओषधिभ्योऽन्नम्। अन्नात्पुरुष:। स वा एषपुरुषोऽन्नरसमय:। (तैत्तिरीयोपनिषद-2/1/1) (पेंगलोपनिषद-1/6)(निश्चयज तब इस परमात्मा में से आकाश उठा थी।आकाशमेंसे वायु, वायुमेंसे अग्नि, अग्निमेंसे जल, पाणीमेंसे पृथ्वि, पृथ्वीमेंसे औषधियाँ, औषधियोंमेंसे अन्न, अन्नमेंसे पुरुष।यह पुरुष निश्चय ही अन्नरसमय है।)(तैत्तिरीयोपनिषद-2/1/1). (पेंगलोपनिषद-1/6)(Certainly then the Akaash was arisen from the Parmatma. The Air from the Akaash, the Fire from the Air, the Water from the Air, the Earth from the Water. All the vegetation were arisen from the Earth, the grain from the vegetation, the man is result of grain, thus certainly this man is an extract of Grain.)(Teittiriya Upanishad-2/1/1).(सवॅसारोपनिषद-12)<br />
(परमात्मा सत्य, ज्ञान, अनन्त रुप है।)<br />
(तैत्तिरीयोपनिषद-2/1/1)(सवॅसारोपनिषद-12)<br />
(Parmatma is Truth, Knowledge, infinite.) (Teittariya Upanishad-2/1/1) (Sarvasara Upanishad-12)<br />
ब्रह्मविदाप्नोति परम्। (तैत्तिरीयोपनिषद-2/1/1) (ब्रह्मवेत्ता परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है। )<br />
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। (तैत्तिरीयोपनिषद-2/1/1)(सवॅसारोपनिषद-12)<br />
(परमात्मा सत्य, ज्ञान, अनन्त रुप है।)<br />
(तैत्तिरीयोपनिषद-2/1/1)(सवॅसारोपनिषद-12)<br />
(Parmatma is embodied as Truth, Knowledge, infinity.) (Teittariya Upanishad-2/1/1) (Sarvasara Upanishad-12).<br />
प्राणो हि भूतानामायु:।।(तैत्तिरीयोपनिषद-2/3/1)<br />
(प्राण हि सब प्राणीओं का आयुष्य है।)<br />
यतो वाचो निवतॅन्ते अप्राप्य मनसा सह ।(तैत्तिरीयोपनिषद-2/4/1)<br />
(जहाँ से मनके सहित वाणि (वग़ैरह सब इन्द्रियाँ परमात्मा को) न पाकर हारकर लौट आती है।)<br />
(तैत्तिरीयोपनिषद-2/4/1)<br />
[From where the Mind along with the Speech (etc all Indriyas) returns defeated without availing (Parmatma)].<br />
(Teittiriya Upanishad-2/4/1).<br />
यतो वाचो निवतॅन्ते अप्राप्य मनसा सह ।<br />
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान न बिभेति कदाचन्।।(तैत्तिरीयोपनिषद-2/4/1)<br />
(जहाँ से मनके सहित वाणि (वग़ैरह सब इन्द्रियाँ परमात्मा को) न पाकर हारकर लौट आती है।ब्रह्मविद्या को जाननेवाला का आनन्द (उसे) कभी भयभीत नहीं होने देता।) (तैत्तिरीयोपनिषद-2/4/1)<br />
(From where the Mind along with the Speech (etc all Indriyas) returns defeated without availing (Parmatma). The bliss of Knower of Knowledge of Brahmn never lets (him) be subjected to the fear.) (Teittiriya Upanishad-2/4/1).<br />
(ज्यां (ब्रह्मना वणॅन करवामां) थी मन सहित वाणी असमथॅ बनी पाछी फरेछे तेब्रह्मना आनंदनो अनुभव करनार विद्वान क्यारेय भयग्रस्तथतो नथी । )<br />
अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद। सन्तमेनं ततो विदुरिति।।(तैत्तिरीयोपनिषद-2/6/1)<br />
(जो ब्रह्म है, ऐसा अगर जानता है उसको संत कहा जाता है।)<br />
तत्सृष्टा तदेवानुप्राविशत्।<br />
(तैत्तिरीय उपनिषद-2/6/1)<br />
(उसकीरचना करके उसमेही प्रवेश करगया)<br />
तत्सत्यमित्याचक्षते । (तैत्तिरीय उपनिषद-2/6/1) ([तत्सत्यम् इति आचक्षते । ]
(जो कुछ अनुभवमें आता है, वह सत्य ही है।)<br />
असन्नेव स भवति । असद्ब्रह्मेति वेद चेत्। (तैत्तिरीयोपनिषद-2/6/1)<br />
असत् एव स भवति |असद् ब्रह्म इति वेद चेत्|<br />
(जो ब्रह्मका अस्तित्व नहीं है एेसा मानेंगे वो असत ही हो जायेंगे। )<br />
सोअकामयत। बहुस्यां प्रजायेयेति।। (तैत्तिरीयोपनिषद-2/6/1)<br />
(उस परमात्माने अनेक रुपमें प्रगट होनेकी इच्छा की)<br />
असद्वा इदमग्र आसीत् । ततो वै सदजायत । (तैत्तिरीयोपनिषद-2/7/1)<br />
(इससे पहेले यहाँ असत् ही था, उसमेंसे सत् उत्पन्न हुआ।)<br />
(There was in-existence, existence came out of it)<br />
रसो वै स:।।(तैत्तिरीयोपनिषद-2/7/1)<br />
(अवश्य वह (परमात्मा) रसरुप हि है।)(तैत्तिरीयोपनिषद-2/7/1)<br />
(Verily (Parmatma) is no other than the delight)(Teittiriya Upanishad-2/7/1).<br />
भीषाऽस्माद्वातः पवते । भीषोदेति सूयॅ:।भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पंचम इति । (तैत्तिरीयोपनिषद-2/8/1)<br />
तेना भयथी वायु वायछे भयथी सूयॅ उगेछे अने तेनाभयथीज अग्नि इंन्द्र अने पांचमुं मृत्यु दोडेछे ।<br />
भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्य:।<br />
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पंचम:।। (कठोपनिषद-2/3/3)<br />
श्रोत्रिस्य चाकामहतस्य आनन्द:। (तैत्तिरीयोपनिषद-2/8/1)<br />
(जो ब्रह्मज्ञानी और कामनारहित है, वही आनन्दका अधिकारी है।)<br />
यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जिवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति।।<br />
( तैत्तिरीयोपनिषद-3/1/1)<br />
(जिसमेसे यह सब प्राणियोंजन्मतेहै, और जन्म लेकर जिससे वो जीतेहै, औरप्रलयके वक़्त जिसमें जाकर लय हो जातेहै, उसकोजाननेकी जिज्ञासा करो । वह ब्रह्म है । )<br />
अन्नं न निन्द्यात् तद्व्रतम् | (तैत्तिरीय उपनिषद-3/7/1)<br />
(अन्ननी नींदा न करवी । आ व्रत छे । )<br />
अकुवॅन् विहितं कमॅ। (तैत्तिरीय उपनिषद-3/9/1) (विहितकमॅ करवा जोइअे । )<br />
न कंचन वसतौ प्रत्याचक्षित। (तैत्तिरीयोपनिषद-3/10/1)<br />
( घरपे आये अतिथिका तिरस्कार न करना चाहिये)</p>
<p>TRISHIKHIBRAHMANA UPANISHAD<br />
ब्रह्मणोऽव्यक्तम् । अव्यक्तान्महत् । महतोऽहंकार:।अहंकारात्पंचतन्मात्राणि । पंचतन्मात्रेभ्य: पंचमहाभूतानि। पंचमहाभूतेभ्योऽखिलं जगत ।। (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-1/3)<br />
(ब्रह्ममेंसे अव्यक्त, अव्यक्तमेंसे महत, महतमेंसे अहंकार, अहंकारमेंसे पाँच तन्मात्रायें, पाँच तन्मात्राओंसे पाँचमहाभूतों, पाँच महाभूतोमेंसे, यह समग्र जगत उत्पन्न हुआ है।)<br />
सत्त्वान्तर्वर्तिनो देवा: कर्त्रहंकारचेतना:।। (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/7)<br />
और उस (ह्रदय) की अंदर वह देवता (जीवात्मा) रहा हुआ है, जीसकी अंदर कर्तापणाका अभिमान दिखने मिलता है)<br />
(अहंकारका स्थान ह्रदय बताया है। यही अहंकारसे कर्तापणाका भाव पैदा होता है। इसीलिये जीवात्मा ह्रदयमें है ऐसा कहा जाता होगा।)<br />
प्रत्यगानन्दरुपात्मा मूध्निॅ स्थाने परे पदे । (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/9)<br />
प्रत्यक आनन्दमय आत्मानु परम पद मूर्धा स्थानछे ।<br />
सविकारस्तथा जीवो निर्विकारस्तथा शिव:। (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/12)<br />
अहंकाराभिमानेन जीवः । (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/16)<br />
नानायोनिशतं गत्वा शेतेऽसौ वासनावशात्। (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/17)<br />
[(वह जीव) विविध सैंकड़ों योनियोंमें जाकर, वहाँ संस्कार (वासनाओं) से वशीभूत होकर (अज्ञाननिद्रामें) सोया हुआ (स्वप्नवत हि) जीता रहता है।) (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/17)<br />
[(That Jiva), by going in hundreds of diverse species, there lives a (dreamlike) life in a sleeping state, as subjugated by the Habitual Inertia or Sanskaar (desires)]. (Trishikhabrahmina Upanishad-2/17)<br />
સંસ્કાર હેઠળ હોવું એટલે નિદ્રામાં હોવું<br />
शिखा ज्ञानमयी वृत्तिर्यमाद्यष्टाँगसाधनै:।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/23)<br />
(यम-नियमादि अष्टाँगयोगकी साधनासे ज्ञानमयी शिखा उत्पन्न होती है।)<br />
देहेन्द्रियेषु वैराग्यं यम इत्युच्यते बुधै:।।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/28)<br />
(देह और इन्द्रियोंके प्रति पूर्ण वैराग्यको प्रबुद्धों यम कहते है।)<br />
The men of wisdom define Yama as the total restraint on body and organs. (Trishikhibrahmana Upanishad-2/28).<br />
अनुरक्ति: परे तत्त्वे सततं नियम: स्मृत:।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/29)<br />
(परमात्म तत्त्वमें निरंतर सहज अनुराग रहे, उसको हि नियम कहते है।)<br />
&#8220;Niyam means spontaneous and continuous affection for Supreme Self&#8221;. (Trishikhibrahmana Upanishad-2/29).<br />
सर्ववस्तुन्युदासीनभावमासनमुत्तमम्।।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/29)<br />
(सर्व दृश्य पदार्थों प्रति चित्तमें हंमेश सहज उदासीन भाव रहे, उसको हि श्रेष्ठ आसन कहते है।) &#8220;Spontaneous and ever indifferent response of a person to all mundane things and beings is called the best Asana&#8221;. (Trishikhibrahmana Upanishad-2/29).<br />
जगत्सर्वमिदं मिथ्याप्रतीति: प्राणसंयम:।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/30)<br />
(यह जगत सब प्रकारसे मिथ्या प्रतीत होने लगे, वहि प्राणायाम है।)<br />
&#8220;Pranayama is when this entire world is felt by you as unreal in every sense of word&#8221;)<br />
चित्तस्यान्तर्मुखीभाव: प्रत्याहारस्तु सत्तम।।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/30)<br />
(चित्तके अंतर्मुखी भावको हि अत्युत्तम प्रत्याहार कहा गया है।)<br />
&#8220;The ever inwardly inclination of Subconscious Mind is called the best Pratyahaar&#8221;. (Trishikhibrahmana Upanishad-2/30).<br />
चित्तस्य निश्चलीभावो धारणा धारणं विदु:।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/31)<br />
(चित्तका अचल भाव धारण करलेना हि धारणा जानी जाती है।)<br />
&#8220;The Subconscious Mind, ever holding its original aspect of steadiness (in subjectlessness) is called Dharana&#8221;. (Trishikhibrahmana Upanishad-2/31)<br />
सोऽहं चिन्मात्रमेवेति चिन्तनं ध्यानमुच्यते।।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/31)<br />
(परमात्मा मैं हि हुँ, ऐसे अविरत चिन्तनको (ध्येयको) हि ध्यान कहते है।)<br />
ध्यानस्य विस्मृति: सम्यक्समाधिरभिधीयते।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/32)<br />
(ध्यान (और ध्याता) की विस्मृति (होकर केवल ज्योतिरुप ध्येय हि बचता है तब उस स्थिति) को सम्यक् समाधि कहते है।)<br />
देहमानं स्वांगुलिभि: षण्णवत्यअंगुलायतम्। प्राण: शरीरादधिको द्वादशाअंगुलमानत:। । (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/54) (शांडिल्योपनिषद-1/4/2)<br />
(मनुष्य देहका माप अपनी 96 अंगुलीओं के बराबर होता है।शरीरसे 12 अंगुलीओं ज़्यादा माप प्राणका होता है)<br />
देहस्थमनिलं देहसमुद्भूतेन वह्निना। न्यूनं समं वा योगेन कुर्वन्ब्रह्मविदिष्यते।। (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/55)<br />
(शरीरमें स्थित वायुका (प्राणायाम द्वारा) शरीरमें उत्पन्न हुए अग्निके साथ योग करके उनको न्यून, सम या योग करके ब्रह्मको जाना जा सकता है।)<br />
तस्योर्ध्वे कुण्डलीस्थानं नाभेस्तिर्यगथोर्ध्वत:।। अष्टप्रकृतिरुपा सा चाष्टधा कुण्डलीकृता।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/62-63)<br />
योगकालेन मरुता साग्निना बोधिता सती।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/65)<br />
(योगके अभ्याससे समय आनेपर वायु और अग्निके योगसे वह जाग्रत होती है।)<br />
नासाग्रन्यस्तनयनो दन्तैर्दन्तानसंस्पृशन।।<br />
रसनां तालुनि न्यस्य स्वस्थचित्तो निरामय:।<br />
आकुंचितशिर: किंचिन्निबन्धन्योगमुद्रया हस्तौ।।<br />
प्राणायाम समाचरेत्।।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/92-94)<br />
(नासिकाके अग्रभागपर दृष्टिको जमाकर, दाँतोसे दाँतका स्पर्श न करते हुए, जिह्वाको तालुनिमें लगाकर, स्वस्थ चित्त और निरामय भावसे, शिरको थोड़ासा संकुचन करके, दोनों हाथोंको योगमुद्रामें बाँधकर प्राणायामका अभ्यास करना चाहिये।)<br />
पूरितं कुम्भयेत्पश्चाच्चतु:षष्टया तु मात्रया। द्वात्रिंशन्मात्रया सम्यग्रेचयेत्पिंगलानिलम्।। एवं पुन: पुन: कार्यं व्युत्क्रमानुक्रमेण तु।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/97-98)<br />
(इसतरह यह चार विधियोंसे वायुको गतिशील करनेकी क्रियाको प्राणायाम कहते है। दाहिने हाथसे नासिकाके छिद्रको दबाकर वायुको पिंगलासे बहार निकालो। त्यारबाद सोलह मात्रामें इड़ा (बाँयी) नासिकासे वायुको भितर खेंचो। बाद 64 मात्रासे कुंभक करो। बाद 32 मात्रासे वायुको पिंगला (दाहिने) नासिका द्वारा बहार निकालो। बादमें 16 मात्रातक वायुको बिना लिये रोकेरखो।<br />
इसतरह बारंबार सीधे उल्टे क्रमसे नियमित अभ्यास करिये।)<br />
स्वरुपव्याप्तरुपस्य ध्यानं कैवल्यसिद्धिदम्।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/148)<br />
(अपने अंत:करणमें व्याप्त परमात्म तत्त्वका ध्यान कैवल्य सिद्धिकी प्राप्ति कराता है।)<br />
ध्यायतो योगिनस्तस्य मुक्ति: करतले स्थिता।। (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/158) (पेंगलोपनिषद-3/5) (व्रजसूचिकोपनिषद-9)<br />
((परब्रह्मका)ध्यान करनेवाले योगीको मूक्ति अपने हाथमें है।)<br />
समाधि: स तु विज्ञेय: सर्ववृत्तिविवर्जित:।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/162)<br />
(सर्व वृत्तियोंके त्यागको समाधि जानी जाती है।)</p>
<p>VRUJSUCHIKA UPANISHAD<br />
कर्माभिप्रेरिता: सन्तो जना: क्रिया: कुर्वन्तीति। (वज्रसूचिकोपनिषद-7)<br />
(हे संतों सुनें! लोगों कर्मों (के परिणामरुप मिले संस्कार)से प्रेरित होकर हि क्रियाएँ करते होते है।) (वज्रसूचिकोपनिषद-7)<br />
(O Saints listen! The people are doing deeds as inspired by the (Sanskaar that is attained as a result of the) actions). (Vrajsuchika Upanishad-7).<br />
करतलामलकवत्साक्षादपरोक्षीकृत्य । (वज्रसूचिकोपनिषद-9) (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/158) (पेंगलोपनिषद-3/5)<br />
अपरोक्ष अनुभूति (मूक्ति) हथेलीमें रखा आमला (देखना) सरल है, (उतनी सरल है)) Experiencing Realisation to of God is as easy as to behold an Aamla in hand-Vrajsoochikopanishad-9.<br />
तस्मान्न जीवो ब्राह्मण। तस्मान्न देहो ब्राह्मण। तस्मान्नजातीर्ब्राह्मण। तस्मान्न ज्ञानं ब्राह्मण। तस्मान्न कर्म ब्राह्मण। तस्मान्न धार्मिको ब्राह्मण।</p>
<p>YAGYAVALKYA UPANISHAD<br />
यो भवेत्पूवॅसंन्यासी तुल्यो वै धमॅतो यदि ।<br />
तस्मै प्रणामः कतॅव्यो नेतराय कदाचन । (याज्ञवल्क्योपनिषद-10)<br />
जेणे पहेला संन्यास ग्रहण करेल होय अथवा धमॅतुल्य होय तेनेज प्रणाम करवा जोइए बीजाने क्यारेय नहिं ।</p>
<p>YOGACHUDAMANI UPANISHAD<br />
ह्रदि प्राण: स्थितो नित्यमपानो गुदमण्डले।। समानो नाभिदेशे तु उदान: कण्ठमध्यग:। व्यान: शरीरे तु। (योगचूडामण्युपनिषद-23-24)<br />
हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत्पुन:।<br />
हंसहंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा।<br />
षट्शतानि दिवारात्रौ सहस्त्राण्येकविंशति:।।<br />
(ध्यानबिंदुपनिषद-61-62) (योगचूडामण्युपनिषद-31-32)<br />
(&#8216;ह&#8217;कार ध्वनिसे प्राण बहार निकलता है और &#8216;स&#8217;कार ध्वनिसे फिर अंदर पिरवेशता है। हंस हंस इस प्रकार मंत्रजप जीव हंमेशा जपता रहता है। जिसकी संख्या दिन-रातमें मिलकर 21600 होती है।)<br />
स पुनर्द्विविधो बिन्दु: पाण्डरो लोहितस्तथा।पाण्डरं शुक्लमित्याहुर्लोहिताख्यं महाराज:।।<br />
(योग चूड़ामणि उपनिषद-60)<br />
बिंदुओं के फिरसे दो प्रकार है: सफ़ेद और लाल।सफ़ेद को शुक्र और लाल को महारज कहा गया है।<br />
रविस्थानस्थितं रज:। शशिस्थानस्थितं शुक्लं। तयोरैक्यं सुदुर्लभम्।।(योग चूड़ामणि उपनिषद-61)<br />
रविस्थान में रज का निवास है, शशिस्थान में शुक्ल का निवास है; दोनों का संयोग बहुत दुर्लभ है।<br />
बिन्दुर्ब्रह्म रज: शक्तिर्बिन्दुरिन्दु रजो रवि:।उभयो: संगमादेव प्राप्यते परमं पदम्।।<br />
(योग चूड़ामणि उपनिषद-62)<br />
बिंदु परमात्मा है, रज शक्ति है; बिन्दु चंद्ररुप है, रज सूर्यरुप है। दोनों का मिलन होने से ही परम पद प्राप्त होता है।<br />
वायुना शक्तिचालेन प्रेरितं च यथा रज:। याति बिन्दु: सदैकत्वं भवेद्दिव्यवपुस्तदा।।<br />
(योग चूड़ामणि उपनिषद-63)<br />
सर्वदाऽनविच्छिन्नं परं ब्रह्म तस्माज्जाता परा शक्ति: स्वयंज्योतिरात्मिका।आत्मन आकाश: संभूत:।आकाशाद्वायु:।वायोरग्नि:।आग्नेराप:।अद्भय: पृथिवि।।(योगचूडामण्युपनिषद-72)<br />
राजसो ब्रह्मा सात्विको विष्णुस्तामसो रुद्र इति एते त्रयो गुणयुक्ता:।।(योगचूडामण्युपनिषद-72)<br />
(मैत्राण्युपनिषद-4/5)(पाशुपतब्राह्मणोपनिषद-पूर्वकांड-10)<br />
ब्रह्मा धाता च सृष्टौ विष्णुश्च स्थितौ रुद्रश्च नाशे बभूव:।।(योगचूडामण्युपनिषद-72)<br />
इन्द्रियैर्बध्यते जीव आत्मा चैव न बध्यते।।(योगचूडामण्युपनिषद-84)<br />
शुचिर्वाप्यशुचिर्वापि यो जपेत्प्रणवं सदा। न स लिप्यति पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा।।(योगचूडामण्युपनिषद-88)<br />
अपानवह्निसहितं शक्त्या समं चालितम्।आत्मध्यानयुतस्त्वनेन विधिना विन्यस्य मूर्ध्नि स्थिरम्।।(योगचूडामण्युपनिषद-107)<br />
અપાનને અગ્નિમાં મેળવીને ઉર્ધ્વગામી બનાવી શક્તિચાલિની મુદ્રા દ્વારા કુંડલિની માર્ગમાં દૃઢતાપૂર્વક ઉપર બ્રહ્મરંધ્રમાં આત્માના ધ્યાન સાથે સ્થાપિત કરવો.<br />
पवनं वक्त्रेण वापूरितम्। बध्वा वक्षसि बह्वपानसहितं मूर्ध्नि स्थिरं धारयेदेवं याति विशेषतत्त्वसमतां योगीश्वरास्तन्मना:।।(योगचूडामण्युपनिषद-114)<br />
મુખથી વાયુને ખેંચવો. ફરીથી નીચેથી અપાન વાયુને ઉર્ધ્વગામી કરવો. પછી બંને વાયુને હ્રદયપ્રદેશમાં રોકવા. ફરી ઉર્ધ્વગામી બનાવીને મૂર્ધનિમા સ્થિર કરીને (મનને) ધારણ કરવો. આ ક્રિયાથી યોગીઓને વિશેષ સમત્વભાવ પ્રાપ્ત થાય છે.</p>
<p>YOGKUNDLI UPANISHAD<br />
अधोगतिमपानं वै ऊर्ध्वगं कुरुते बलात्।आकुंचनेन तं प्राहुर्मूलबन्धोऽयमुच्यते।। (योगकुंडल्युपनिषद-1/42)<br />
आकुंचनेन तं प्राहुर्मूलबन्धोऽयमुच्यते। अपानश्चोर्ध्वगो भूत्वा वह्निना सह गच्छति।।(योगकुण्डल्युपनिषद-1/64)</p>
<p>प्राणस्थानं ततो वह्नि: प्राणापानौ च सत्वरम्। मिलित्वा कुण्डली याति प्रसुप्ता कुण्डलाकृति:।। तेनाग्निना च संतप्ता पवनेनैव चालिता।<br />
प्रसार्य स्वशरीरं तु सुषुम्ना वदनान्तरे।।<br />
(योगकुण्डल्युपनिषद-1/65-66)<br />
प्रकृत्यष्टकरुपं च स्थानं गच्छति कुण्डली। क्रोडीकृत्य शिवं याति क्रोडीकृत्य विलियते।।(योगकुण्डल्युपनिषद-1/74)<br />
(गुदाके आकुचनके द्वारा (अपानको उर्ध्व गामी बनानेकी प्रक्रियाको मूलबन्ध कहते है। अपान उर्ध्व गामी होकर अग्नि के साथ संयुक्त होकर जब वह अग्नि प्राण के स्थान में पहोंचता है, तब प्राण और अपान दोनों मिलकर सर्पाकृति में रही कुण्डली की पास आते है। तब उस अग्निसे संतप्त होकर और (प्राणायामके) वायु (के आघात) से ही चालित होकर कुण्डली अपना शरीर पसार के सुषुम्ना के मुखके छेड़े में से उर्ध्वगमन कर के (ब्रह्मग्रंथी, विष्णुग्रंथी और रुद्रग्रंथी को भेदकर) यह अष्टधाप्रकृतिरुप (पंच तत्त्वों और मन, बुद्धि अहंकार) और (अष्टधाप्रकृतिरुप) स्थानवाली कुंडलिनी शक्ति गती कर के शिव की ओर आती है और शिव को आलिंगन कर के शिव में एकाकार हो जाती है।)<br />
इत्यधोर्ध्वरज: शुक्लं शिवे तदनु मारुत:।(योगकुंडल्युपनिषद-1/75)<br />
इस तरह नीचे रही रज और ऊर्ध्व मां रहा शुक्र वायुके वेग से शिव में लीन हो जाते है।<br />
इति तं स्वरुपा हि मती रज्जुभुजंगवत्।<br />
(योगकुंडल्युपनिषद-1/79)<br />
उस (साधक) को अपने स्वरुप की समज मीलजाती है, जैसे रस्सीमें दिखते सर्प की भाँति।<br />
मेलनमंत्र: ह्रीं भं सं मं पं सं क्षम्। (योगकुण्डल्युपनिषद-3/1)<br />
मनसा मन आलोक्य तत्त्यजेत्परमं पदम्। मन एव हि बिन्दुश्च उत्पत्तिस्थितिकारणम्।। (योगकुण्डल्युपनिषद-3/5)<br />
(मनसे मनका अवलोकन करते हुए उसमेंसे मूक्त हो जाना उसीको परम पद कहा है। मन हि बिंदु (परमात्मा) और (जगत प्रपंचकी) उत्पत्ति स्थितिका कारन है।)</p>
<p>YOGATATVA UPANISHAD<br />
योगहीनं कथं ज्ञानं मोक्षदं भवति ध्रुवम्।<br />
योगों हि ज्ञानहीनस्तु न क्षमो मोक्ष कर्मणि।।<br />
(योगतत्वोपनिषद-14,15)<br />
(बिना योगका ज्ञान कैसे मोक्ष प्राप्त करा सकता है? बिना ज्ञानका योग भी केवल कर्मसे ही मोक्ष प्रदान करने सक्षम नहीं है।)<br />
अज्ञानादेव संसारो ज्ञानादेव विमुच्यते।ज्ञानस्वरुपमेवादौ ज्ञानं ज्ञेयैकसाधनम्।(योगतत्वोपनिषद-16)<br />
(यह संसार अज्ञानसे (बंधनरुप) है, ज्ञानसे ही (संसारसे) मूक्ति है। ज्ञानस्वरुप हि आदि है, ज्ञानसे हि ज्ञेय प्राप्त हो सकता है।)<br />
अल्पबुद्धिरिमं मंत्रयोगं सेवते साधकाधमः । (योगतत्वोपनिषद-22)<br />
(मंत्र(जप करवा रुप) योग अल्प बुद्धिवाले करते है ऐसे साधक अधम कोटीके होते है। )<br />
ततो दक्षिणहस्तस्य अंगुष्ठेनैव पिंगलाम्।<br />
निरुध्य पूरयेद्वायुमिडया तु शनै: शनै:।<br />
(योगतत्वोपनिषद-36,37)<br />
(त्यारबाद दाहिने हाथके अंगुठेसे पिंगलाको दाबकर, धीरे धीरे इड़ाके द्वारा वायुको (उदरकी) अंदर पूरना।)<br />
इडया वायुमारोप्य शनै: षोडशमात्रया।कुम्भयेत्पूरितं पश्र्चाच्चतु:षष्ट्या तु मात्रया।। रेचयेत्पिंगलानाड्या द्वात्रिंशन्मात्रया पुन:। पुन: पिंगलयापूर्य पूर्ववत्सुसमाहित:।। (योगतत्वोपनिषद-41-42)<br />
(प्रथम इड़ा द्वारा 16 मात्रामें वायुको धीरेसे खेंचे, बाद 64 मात्रामें कुंभक करें, बाद पिंगलानाडी द्वारा 32 मात्रामें रेचक करें। त्यारबाद दूसरी बार पिंगला द्वारा वायुको खिंचकर पहेलेकी तरह हि पूरी क्रिया पूर्ण करें।)<br />
सर्वविघ्नहरो मन्त्र: प्रणव: सर्वदोषहा। (योगतत्वोपनिषद-64)<br />
(ॐ मंत्र सर्वप्रकारके विघ्न और दोष हरनार है)<br />
तत: परिचयावस्था जायतेऽभ्यासयोगत:।।<br />
वायु: परिचितो यत्नादग्निना सह कुण्डलीम्।भावयित्वा सुषुम्नायां प्रविशेदनिरोधत:।।<br />
(योगतत्वोपनिषद-81-82)<br />
(तब अभ्यासयोगसे कुंभकावस्था पैदा हो जाती है।प्रयत्नों से इकठ्ठा किया वायुकी अग्नि के साथ कुंडलिनी सुषुम्ना नाड़ी में विरोध रहित प्रवेश करती है, ऐसी भावना (कल्पना) कि जाय।)<br />
आपोऽर्धचन्द्रं शुक्लं च वंबीजं परिकिर्तितम्।।(योगतत्त्वोपनिषद-82)<br />
जल स्थानमें अर्द्धचंद्रके रुप में वं बीज का होना माना गया है।<br />
यस्माज्जातो भगात्पूर्वं तस्मिन्नेव भगे रमन्।या माता सा पुनर्भार्या या भार्या मातरेव हि।<br />
एवं संसारचक्रेण कूपचक्रे घटा इव।।<br />
(योगतत्वोपनिषद-132-133)<br />
[जिस पूर्व बीज (योनि)के कारणरुप (मनुष्य इस जन्ममें) पैदा हुआ है, उस बीज (योनि)में (वह अब) क्रिडा नहीं करता।जैसे कि जो माता (सत्त्वगुण) होती है वह (बादके जन्ममें) फिरसे पत्नि (रजसगुण या तमसगुण बन जाती है और) जो पत्नि होती है, वह (बादके जन्ममें) माता। वैसे हि संसारचक्र (के क़िस्से) में होता है, रेंटचक्रमें रहे घटोंकी तरह।](योगतत्वोपनिषद-132-133)<br />
[One doesn’t frolic in that seed, because of which past seed he has been born (in this life). As who is mother (Sattva Guna in this life) now, again becomes wife (Rajas or Tamas Guna in later life). Same happens in (the case of) Wheel of Sansaar, as (it happens) with the pots in the wheel for raising water from the well.]
(Yogatattva Upanishad-132-133)<br />
स्थिता: सर्वे त्रयाक्षरे। (योगतत्वोपनिषद-135) बधुं ((ॐ) यह तीन अक्षरमें सब स्थित रहा हुआ है। )<br />
हरिः ॐ तत्सत् । हरिः ॐ तत्सत् । हरिः ॐ तत्सत् ।</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com/upanishads/">UPANISHADS</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com">VEDA VICHAR</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://vedavichar.com/upanishads/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>10</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>UPANISHADS COORDINATED</title>
		<link>https://vedavichar.com/upanishads-coordinated/</link>
					<comments>https://vedavichar.com/upanishads-coordinated/#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Acharya Vrujlal]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 07 Oct 2019 11:40:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[UPANISHADS COORDINATED]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://vedavichar.com/?p=6082</guid>

					<description><![CDATA[<p>ATMA नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैव आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम्।। (कठोपनिषद-1/2/23) (मुंडकोपनिषद-3/2/3) (यह आत्मा (परमात्मा) धर्मोपदेश करनेसे या बुद्धिसे या वेदों के ज्ञान...</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com/upanishads-coordinated/">UPANISHADS COORDINATED</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com">VEDA VICHAR</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>ATMA<br />
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।<br />
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैव आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम्।। (कठोपनिषद-1/2/23) (मुंडकोपनिषद-3/2/3)<br />
(यह आत्मा (परमात्मा) धर्मोपदेश करनेसे या बुद्धिसे या वेदों के ज्ञान को सुनने से प्राप्त नहीं होनेवाला है। केवल वह हि आत्मा (परमात्मा) प्राप्त करने के योग्य बनता है, जिसको परमात्मा ने (वरदान के लिये) चयनित किया है; उनके सामने परमात्मा अपने स्वरुपको स्वयं ही प्रकट कर देते है।) (कठोपनिषद-1/2/23) (मुंडकोपनिषद-3/2/3)<br />
(This Atmaa (Parmatma) is neither obtainable by spiritual preaching nor by intellect nor by severely listening knowledge of Vedas; only he becomes capable of obtaining Atmaa (Parmatma), whom Parmatma picks out (for granting him boon), before him Parmatma Himself unsheathes His own form.). (Katha Upanishad-1/2/23) (Mundaka Upanishad-3/2/3).<br />
नित्य: सर्वगतो ह्यात्मा कूटस्थो दोषवर्जित:।<br />
एक: संभिद्यते भ्रान्त्या मायया न स्वरुपत:।। (जाबालदर्शनोपनिषद-10/2)<br />
(आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल और सर्वदोषरहित ही है। एकही है फीरभी माया द्वारा उत्पन्न भ्रमके कारण अलग-अलग दिखते है, वास्तवमें अलग-अलग नहीं है।) (जाबालदर्शनोपनिषद-10/2)<br />
(Atmaa is eternal, omnipresent, changeless and with the exception of any defects. In reality it is one alone and not individual; but sounds individual because of confusion born out of illusion.) (Jabaldarshana Upanishad-10/2)<br />
एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थित:।<br />
एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचंद्रवत।। ( ब्रह्मबिंदुउपनिषद-12)<br />
(अलग अलग प्राणि में एक हि आत्मा रहा हुआ है; एक होते हुए भी अलग अलग दिखते है,<br />
जीस तरह एक ही चंद्र अलग अलग जलपात्र में अलग अलग दिखता है, वैसे ही।) ( ब्रह्मबिंदुउपनिषद-12)<br />
(The one and alone Atmaa pervades in each individual creature; in spite of being one, sounds to be individual; as the one alone moon is seen separate in each individual water pot.) (Brahmabindu Upanishad-12)<br />
चिदचैत्या किलात्मेति सर्वसिद्धान्तसंग्रह:। (महोनिपषद-6/78)चित् अचैत्या किल आत्मा इति (किल=निश्चयपूर्वक)<br />
( विषयरहित हुआ चित्तही आत्मा (परमात्मा) है।यहि निश्चयपूर्वक समग्र( वेदोंके) सिद्धान्तों का सार है) &#8220;Subjectless rendered Chitta itself is Atman (Brahmn). This is comprehensive knowledge of all Vedas together&#8221;. (Maha Upanishad-6/78).<br />
अस्ति खल्वन्योऽपरो भूतात्मा योऽयं सितासितै: कर्मफलैरभिभूयमान: सदसद्योनिमापद्यत इत्यवाचीं<br />
वोर्ध्वागतिं। (मैत्रायण्युपनिषद-3/2)<br />
(जो शुभ- अशुभ कर्मोंके कारण अधेगामी हुआ है, वो(आत्मा नही है पर वो) तो अन्य भूतात्मा (जीवात्मा) है। वह कर्मानुसार अच्छी बुरी योनीयोंमें गमन करता हैऔर उँची या नीची गतीयोंको प्राप्त होता है।<br />
चितो रुपमिदं ब्रह्मन्क्षेत्रज्ञ इति कथ्यते।<br />
वासना: कल्पयन्सोऽपि यात्यहंकारतां पुन:।। 5/124<br />
अहंकारो विनिर्णेता कलंकी बुद्धिरुच्यते।<br />
बुद्धि: संकल्पिताकारा प्रयाति मननास्पदम्।। 5/125<br />
मनो धनविकल्पं तु गच्छतीन्द्रियतां शने:।<br />
पाणिपादमयं देहमिन्द्रियाणि विदुर्बुधा:।। 5/126 (महोपनिषद-5/124-126)<br />
(हे ब्रह्मन! चेतनशक्ति जब नाम (रुप, देश, काल) विगेरे प्राप्त करती है, तो क्षेत्रज्ञ कहलाती है। वह (क्षेत्रज्ञ) फिरसे जब वासनाकी कल्पना करता है तो वह अहंकार हो जाता है। जब अहंकार निश्चयात्मक और दोषयुक्त होता है तब वह बुद्धि कहलाता है। बुद्धि जब संकल्प और मनन करने लगती है तो मनरुप हो जाती है। मन जब गहरे विकल्पमें डूबता है तो धीरे-धीरे इन्द्रियत्वको प्राप्त करता है। मेधावी पुरुषों (भी) अपनेको हस्तपादयुक्त इन्द्रियोंवाला शरीर ही मानते है.) (महोपनिषद-5/124-126)<br />
येनेक्षते श्रृणोतीदं जिध्रति व्याकरोति च ।<br />
स्वाद्वस्वादु विजानाति तत्प्रज्ञानमुदिरितम्।। (शुकरहस्योपनिषद-31)<br />
(प्राणी जिससे देखता है, सूनता है, सुगंध ग्रहण करता है, बोलता है, स्वाद-अस्वादका अनुभव करता है, उसे प्रज्ञान कहते है।)<br />
कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीश्वरः ।<br />
कायॅकारणतां हित्वा पूणॅबोधोअवशिष्यते । (शुकरहस्योपनिषद-42)<br />
(कायॅ उपाधिसे यह जीव है और कारण उपाधिसे ईश्वर है। कायॅकारण उपाधिआेंका त्याग कर देनेसे पूणॅज्ञानरुप ब्रह्म ही शेष रहते है।)<br />
अस्ति खल्वन्योऽपरो भूतात्मा योऽयं सितासितै: कर्मफलैरभिभूयमान: सदसद्योनिमापद्यत इत्यवाचीं वोर्ध्वागतिं। (मैत्रायण्युपनिषद-3/2)<br />
(जो शुभ-अशुभ कर्मोंके कारण अधेगामी हुआ है, वो(आत्मा नही है पर वो) तो अन्य भूतात्मा (जीवात्मा)है। वह कर्मानुसार अच्छी बुरी योनीयोंमें गमन करता हैऔर उँची या नीची गतीयोंको प्राप्त होता है।)<br />
चतुरशीतिलक्षयोनिपरिणतम् । (मैत्रायण्युपनिषद-3/3)<br />
(चोराशी लाख योनियोमें भ्रमण करता रहता है । )<br />
AUMKAR<br />
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च तद्वदन्ति।<br />
यदिच्छन्तो ब्रह्मचयँ चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेणब्रवीम्योमित्येतत्।। (कठोपनिषद-1/2/15)<br />
(सवॅ वेदों जीस पदका वारंवार वणॅन करते है, सवॅ तपों जीसकी प्राप्तिकेसाधन है, जीसकी प्राप्तिकी इच्छाके लिये ब्रह्मचयॅका पालन करा जाता है, वह मैं पद टूंकमें कहता हुँ। ॐ ही वह पद है) (कठोपनिषद)<br />
एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् ।<br />
एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत्।। (कठोपनिषद-1/2/16)<br />
(यह ॐ अक्षर ही ब्रह्म है, यह ॐ अक्षर ही परम है, यह ॐ अक्षरको जान लेनेसे वह जो इच्छता है, उनका वो हो जाता है।)<br />
परं चापरं च ब्रह्म यदोंकार:। (प्रश्नोपनिषद-5/2) (यह ॐ परा एवं अपरा एवं ब्रह्म है । )<br />
(पिप्पलादने सत्यकामको जवाब दिया।<br />
जब सत्यकामने ॐ की आराधना कर शकतेहै ऐसा पूछा)<br />
ओमिति ब्रह्म। ओमितीदंसवॅम्। (तैत्तिरीय उपनिषद-1/8/1) (ॐ ही ब्रह्म छे । ॐ ही प्रत्यक्ष जगत है)<br />
स्थिता: सर्वे त्रयाक्षरे। (योगतत्वोपनिषद-135)( बधुं ((ॐ) यह तीन अक्षरमें सब स्थित रहा हुआ है। )<br />
सर्वविघ्नहरो मन्त्र: प्रणव: सर्वदोषहा। (योगतत्वोपनिषद-64) (ॐ मंत्र सर्वप्रकारके विघ्न और दोष हरनार है)<br />
AVIDYA<br />
एष एव मनोनाशस्त्वविद्यानाश एव च। (महोपनिषद-4/109)<br />
(जो मनका विनाश है, उसको ही अविद्याका नाश कहा जाता है।)<br />
अविद्या विद्यमानैव नष्टप्रज्ञेषु दृश्यते । (महोपनिषद-4/110) (जो प्रज्ञा रहित है, उसमें ही अविद्या रहती है।)<br />
या तदभिमानं कारयति सा अविद्या ।<br />
सोअभिमानो ययानिवतॅते सा विद्या । (सवॅसारोपनिषद-3)<br />
(जो अहंभावकी जन्मदात्री है, वह अविद्या है और जिसके द्वारा अिभमानका नाश हो जाता है, वह विद्या है।)<br />
(yaa tadbhimanam karyati saa Avidya- Sarvasaropanishad-3) That which begets ego in person is Avidya, ignorance, the illusion).<br />
शक्तिद्वयं हि मायाया विक्षेपावृतिरुपकम्। विक्षेपशक्तिर्लिंगादि ब्रह्माण्डान्तं जगत्सृजेत्।।<br />
अन्तर्द्रृग्दृश्ययोर्भेदं बहिश्च ब्रह्मसर्गयो:। आवृणोत्यपरा शक्ति: सा संसारस्य कारणम्।।<br />
(सरस्वतीरहस्योपनिषद-52-53)<br />
(विक्षेप और आवरण नामक मायाकी दो शक्तियाँ है। विक्षेप शक्ति लींगदेहसे ब्रह्मांड पर्यन्त जगतकी संरचना करती है। आवरण नामक अपरा शक्ति अंदरके दृष्टा-दृश्यके भेदको और बहारके परमात्मा-सृष्टिके भेदको आवृत करती है। यह आवरण शक्ति ही संसारके बंधनका कारण है।)<br />
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभ्यं सह।<br />
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते।। (ईशावास्योपनिषद-11)<br />
(विद्या और अविद्याको दोनोंको एक साथ जानों। अविद्या (भौतिक ज्ञान) द्वारा मृत्युको पार करके, विद्या (आध्यात्मिक ज्ञान) द्वारा अमरत्वकी प्राप्ति हो सकती है।)<br />
BIRTH TO DEATH AND DEATH TO BIRTH<br />
जायते म्रृतये लोको म्रियते जननाय च। (महोपनिषद-3/4)<br />
(लोगों मरने के लिये जन्मते है और जन्मनेके लिये मरते है । )<br />
सस्यमिव मर्त्य: पच्यते सस्यमिवाजायते पुन:।। (कठोपनिषद-1/1/6)<br />
(मरणधर्मा मनुष्य फसलके समान पकता है (वृद्ध होकर मृत्युको प्राप्त होता है) और पुन: कालक्रमानुसार फसलके समान उत्पन्न होता है)<br />
BODY IS ALWAYS DEAD<br />
शकटमिवाचेतनमिदं शरीरम्। (मैत्रायण्युपनिषद-2/3)<br />
(यह शरीर गाडेकी तरह अचेतन है) (मैत्रायण्युपनिषद-2/3)<br />
(This body is inanimate just like a cart)(Meitranya Upanishad-2/3)<br />
आत्मेन चेतनेनेदं शरीरं चेतनवत्। (मैत्रायण्युपनिषद-2/5)<br />
(आत्माके चैतन्यसे यह शरीर चेतनवंत (दिखता) है) (मैत्रायण्युपनिषद-2/5)<br />
(This body (sounds) animate because of the consciousness of Atmaa)<br />
(Meitranyu Upanishad-2/5).<br />
मत्सान्निध्यात्प्रवतॅन्ते देहाद्या अजडा इव । (सवॅसारोपनिषद-18)<br />
(मेरी (परमात्मा की) उपस्थितिसे देह (मन, बुद्धि, अहंकार) वग़ैरह जीवित हो वैसे वर्तते है।) (सवॅसारोपनिषद-18)<br />
(Because of my (Parmatma) proximity the body (Mind, Intellect, Ego) etc, are behaving as if they are animate) (Sarvasaar Upanishad-18).<br />
मनो ह वा आयतनम्। (छांदोग्योपनिषद- 5/1/5) (अवश्य मन ही आयतन (आश्रय) शरीर है). (Verily the Mind itself is a body) (Chhandogya Upanishad-5/1/5).<br />
नाहं भवामि । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो बुद्धियादीनां हिसवॅदा । नाहं कर्ता नैव भोक्ता प्रकृतैः साक्षिरुपकः ।<br />
मत्सान्निध्यात्प्रवतॅन्ते देहाद्या अजडा इव । आत्माहंसवॅभूतानां विभुः साक्षी न संशयः।<br />
ब्रह्मैवाहं सच्चिदानन्दरुपम् । (सवॅसारोपनिषद-16TO20)<br />
(मुझे जन्म नहीं है। मैं बिना प्राण, मन और बुद्धि ही हंमेश शुद्धस्वरुप हुँ । मैं कर्ता या भोक्ता भी नहीं हुँ बल्कि स्वभावसे साक्षीरुप ही हुँ । मेरी उपस्थितिसे ही देह (मन, बुद्धि, अहंकार) वग़ैरह जीवित हो वैसे बर्तते है। मैं सब प्राणीओंमें व्याप्त साक्षीरुप आत्मा हुँ, इसमें कोइ शंका नहीं है। मैं सत् चित् आनंदरुप ब्रह्म हुं।)<br />
BRAHMN PARMATMA<br />
एकमेवाद्वितियं ब्रह्म।(मैत्रेय्युपनिषद-2/15)<br />
(शकरहस्योपनिषद-20).<br />
(यहाँ केवल परमात्मा एक ही है, बिना किसी दुसरे के।)(मैत्रेय्युपनिषद-2/15)(शकरहस्योपनिषद-20)।<br />
(Parmatma alone is here, only one without any second) (Meitriya Upanishad-2/15). (Shukarahasya Upanishad-20).<br />
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। (तैत्तिरीयोपनिषद-2/1/1)(सवॅसारोपनिषद-12)<br />
(परमात्मा सत्य, ज्ञान, अनन्त रुप है।)<br />
(तैत्तिरीयोपनिषद-2/1/1)(सवॅसारोपनिषद-12)<br />
(Parmatma is embodied as Truth, Knowledge, infinity.) (Teittariya Upanishad-2/1/1) (Sarvasara Upanishad-12).<br />
प्रज्ञानं ब्रह्म।ऋग्वेद(ऐतरैयोपनिषद-3/1/1) (आत्मबोधोपनिषद-6)<br />
तत्वमसि ।सामवेद (छांदोग्योपनिषद-6/8/7)<br />
अहं ब्रह्मास्मि।यजुर्वेद(ब़ह्दारण्यकोपनिषद-1/4/10)<br />
अयमात्मा ब्रह्म।अथर्ववेद।(मांडुक्योपनिषद-2)<br />
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति। (ऋग्वेद-1/164/46)<br />
(सत्य तो एक ही है। पंडितों अनेकविध दर्शाते है।)<br />
सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो।(छांदोग्योपनिषद-6/8/7)<br />
(वह सब सत्य ही है, वही आत्मा है, और श्वेतकेतु, वही तुम भी हो।)<br />
सोऽहमिति। (नारद परिव्राजकोपनिषद-6/4)<br />
विज्ञानमानन्दं ब्रह्म। (बृहदारण्यकोपनिषद-3/9/28)<br />
सवॅं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन । (निरालंबोपनिषद-9)<br />
(यह पूरा विश्व वास्तव में ब्रह्म ही है। उससे भिन्न और पृथक जैसा यहाँ कुछ भी नहीं है।)(निरालंबोपनिषद-9).(In reality this entire universe is a form of Parmatma only. There is nothing like different or separate from Him.). (Niralamba<br />
Upanishad-9).<br />
यत्पश्यति तु तत्सर्वं ब्रह्म।(जाबालदर्शनोपनिषद7/2) (मनुष्य जो कंई दिखता है वह सब ब्रह्म ही है)<br />
नेह नानास्ति किंचन। (कठोपनिषद-2/1/11) (जगतमें ब्रह्मके सिवाय कुछभी नहीं है।)<br />
ब्रह्मैव परमात्मा । (निरालंबोपनिषद-7)<br />
एकमेवाद्वितीयम्। एतदेकान्तमित्युक्तं न मठो न वनान्तरम्।। (मैत्रेय्युपनिषद-2/15)<br />
(यहाँ केवल (ब्रह्म) एकही है, दूसरा कुछ है ही नहीं। इस भावनाको ही एकांत कहा गया है, नहीं की मठको या जंगलके मध्यभागको।))<br />
सोऽस्म्यहम्। (मैत्रेय्युपनिषद-3/1) (I am that)<br />
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या । (निरालंबोपनिषद-35)<br />
ब्रह्मैवाहमस्मि । (निरालंबोपनिषद-39) (मैं ब्रह्म ही हुँ ।)<br />
नैव च तस्य लिंगम्। (श्वेताश्वतरोपनिषद-6/9)<br />
(उस (परमात्मा) का कोई लिंग (स्त्री, पुरुष या नपुंसक) नहीं है।)<br />
मृत्यु: यस्य उपसेचनम्। (कठोपनिषद-1/2/25)<br />
मृत्युर्यस्योपसेचनम्।<br />
(मृत्युतो उस(ब्रह्म )का चटनी जैसा व्यंजन है । )<br />
महत: परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुष: पर: ।<br />
पुरुषान्न परं किचिंत्सा काष्ठा सा परा गति:।। (कठोपनिषद-1/3/11)<br />
(बुद्धिसे प्रकृति श्रेष्ठ है, प्रकृतिसे परमात्मा श्रेष्ठ है और परमात्मासे श्रेष्ठ कुछभी नहीं है। वह सबकी पराकाष्ठा और परमगति है।)<br />
नेह नानास्ति किंचन। (कठोपनिषद-2/1/11) (जगतमें ब्रह्मके सिवाय कुछभी नहीं है।)<br />
एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति। (मैत्रायण्युपनिषद-2/2)<br />
जीवो ब्रह्मेति। (शुकरहस्योपनिषद-28) (जीव ही ब्रह्म है)<br />
सोऽस्म्यहम्। (मैत्रेय्युपनिषद-3/1) (I am that)<br />
यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जिवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।तद्विजिज्ञासस्व। तद्ब्रह्मेति।। ( तैत्तिरीयोपनिषद-3/1/1)<br />
(जिसमेसे यह सब प्राणियोंजन्मतेहै, और जन्म लेकर जिससे वो जीतेहै, औरप्रलयके वक़्त जिसमें जाकर लय हो जातेहै, उसकोजाननेकी जिज्ञासा करो । वह ब्रह्म है । )<br />
जीवेश्वरौ मायिकौ विज्ञाय सर्वविशेषं नेति नेतीति विहाय यदवशिष्यते तदद्वयं ब्रह्म।<br />
(अद्वयतारकोपनिषद-3)<br />
(जीव और ईश्वरको मायिक जानकर, जो विशेषकर है उस सबको “नेति नेति” कहते हुए उसको त्यागकर, जो शेष रहता है, वही अद्वय ब्रह्म (कहलाता) है।)<br />
“After taking Jiva and Ishwara as illusive, after abdicating all that which is some or other way any special, terming it as “Not this, not this”, what remains is the Nondual Brahmn (that is the form of bliss).<br />
पुरुष एवेदं विश्वम्।।(मुंडकोपनिषद-2/1/10)<br />
(यह विश्व पुरुषोत्तम ही है।)(मुंडकोपनिषद-2/1/10)<br />
(This universe is Parmatma only)(Mundaka Upanishad-2/1/10)</p>
<p>BRAHMN AND ISHWAR<br />
चैतन्यं ब्रह्म । ईश्वर इति च। ब्रह्मैव स्वशक्तिं प्रकृत्यभिधेयामाश्रित्यलोकान्सृष्टवा प्रविश्यान्तर्यामीत्वेन ब्रह्मादीनां बुद्धिन्द्रियनियन्तृत्वादीश्वरः।<br />
(निरालंबोपनिषद-4)<br />
(चैतन्य ब्रह्म हि है। अब ईश्वके स्वरुपका कथन करते है। यह ब्रह्म हि जब अपनी प्रकृति नामकी स्वशक्ति के सहारे लोकोंका सजॅन करके अंतर्यामीरुपसे उसमें प्रवेशकर ब्रह्मा, (विष्णु, महेश), आदी तथा बुद्धि और इन्द्रियों को नियंत्रित करते है, तब (वे) ईश्वर (कहलाते) है।) (निरालंबोपनिषद-4)<br />
(The very Consciousness is Brahmn. Now we say about Ishwara. When this Brahmn creates the Universe with the help of Nature, that is His Energy, and enters into His Creation as its intrinsic inbuilt mechanism and controls and administrates the entire Universe including Brahma, (Vishnu and Mahesh) etc, as well as Intellect and Sense organs; then (He) is called Ishwara.) (Niralanba Upanishad-4)<br />
कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीश्वरः ।<br />
कायॅकारणतां हित्वा पूणॅबोधोअवशिष्यते । (शुकरहस्योपनिषद-42)<br />
(कायॅ उपाधिथी आ जीव छे कारण उपाधिथी ईश्वर छे। कायॅकारण उपाधिआेने छोडवाथी पूणॅज्ञानरुप ब्रह्म ज शेष रहेछे)<br />
जीवेश्वरौ मायिकौ विज्ञाय सर्वविशेषं नेति नेतीति विहाय यदवशिष्यते तदद्वयं ब्रह्म।<br />
(अद्वयतारकोपनिषद-3)<br />
(जीव और ईश्वरको मायिक जानकर, जो विशेषकर है उस सबको “नेति नेति” कहते हुए उसको त्यागकर, जो शेष रहता है, वही अद्वय ब्रह्म (कहलाता) है।)<br />
“After taking Jiva and Ishwara as illusive, after abdicating all that which is some or other way any special, terming it as “Not this, not this”, what remains is the Nondual Brahmn (that is the form of bliss).</p>
<p>BRAHM CAN BE SEEN ONLY THROUGH GYANCHAKSHU<br />
सर्वगं सच्चिदानन्दं ज्ञानचक्षुर्निरीक्षते। (महोपनिषद-4/80)<br />
(सर्वव्यापी सच्चिदानंदस्वरुप परमात्माको ज्ञानरुप चक्षुओं से दिखा जाता है।)<br />
स बाह्यमभ्यन्तरनिश्चलात्मा ज्ञानोल्कया पश्यति चान्तरात्मा। (पेंगलोपनिषद-4/18)<br />
(आत्मा बाहरसे और भीतरसे निश्चल है। आत्माको ज्ञानरुपी उल्कासे ही देखा जा सक्ता है।)<br />
एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते।<br />
दृश्यते त्वग्रयया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभि:।। (कठोपनिषद-1/3/12)<br />
(संपूर्ण भूतोंमें छीपा यह परमात्मा दृष्यमान नहीं होता। यह तो सूक्ष्मदर्शि पुरुषों द्वारा अपनी सूक्ष्म बुद्धिसे ही देखा जाता है।)<br />
BRAHM CANNOT BE SEEN BY THE PHYSICAL EYES<br />
न तस्य प्रतिमा अस्ति। o(श्वेताश्वतरोपनिषद-4/19) (यजुर्वेद- 32/3)<br />
न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम्। (श्वेताश्वतरोपनिषद-4/20) (कठोपनिषद -2/3/9)<br />
(Na chakshusa pasyati kaschaneinam-Kathopanishad-2/3/9)(None can see That(Brahman) with eyes).<br />
यतो वाचो निवर्तन्ते यो मुक्तैरवगम्यते। यस्य चात्मादिका: संज्ञा: कल्पिता न स्वभावगत:।। (महोपनिषद-4/57)<br />
(जहाँसे वाणि परत होती है, जीसको मूक्त पुरुष द्वाराही जाना जा सकता है; जीसकी आत्मा वग़ैरह संज्ञायें कल्पनामात्र है, वास्तविक नहीं है,(वो ही अविनाशी ब्रह्म कहलाता है))<br />
न शक्यते वणॅयितुं गिरा तदा । (मैत्रायण्युपनिषद-4/3/I) (त्यारे तेनुं वणॅन वाणीद्वाराकरवा कोइ समथॅ नथी । )<br />
यतो वाचो निवतॅन्ते अप्राप्य मनसा सह ।<br />
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान न बिभेति कदाचन्।।(तैत्तिरीयोपनिषद-2/4/1)<br />
(ज्यां (ब्रह्मना वणॅन करवामां) थी मन सहित वाणी असमथॅ बनी पाछी फरेछे तेब्रह्मना आनंदनो अनुभव करनार विद्वान क्यारेय भयग्रस्तथतो नथी । )<br />
BRAHMAN IS EVERYWHERE<br />
ॐ ईशावास्यंमिदं सवॅं यत्किंच जगत्यां जगत् ।<br />
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनं ।(ईशावास्योपनिषद-1)<br />
(Ishaavasyam idam sarvam yatkinchjagatyamjagat- Ishavasyopanishad-1). Whatever live or dead is visible here, in this world, is Brahm.)<br />
(यह लोकमें जो कुछभी है, वह सब ईशमय है । केवल उनके द्वारा जो त्यागा हुआ है, उसका ही उपयोग करो । लालच न करो । धन कभी किसीका हुआ है?)<br />
एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थित:।<br />
एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचंद्रवत।। ( ब्रह्मबिंदुउपनिषद-12)<br />
(जीसतरह अेकही चंद्र अलग अलग जलपात्रमें अलगअलग दिखतेहै वैसे अेक ही परमात्मा अलग अलगप्राणीओमें अलग अलग दिखतेहै । )<br />
यत्पश्यति तु तत्सर्वं ब्रह्म। (जाबालदर्शनोपनिषद7/2) (मनुष्य जो कंई दिखता है वह सब ब्रह्म ही है)<br />
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रुपं रुपं प्रतिरुपो बहिश्च।। (कठोपनिषद-2/2/10)<br />
(समस्त प्राणिओंमें विद्यमान परमात्मा एकही होनेपर भी विभिन्न रुपों वाले दिखते है, बहार भी वही है।)<br />
सर्वगं सच्चिदानन्दं ज्ञानचक्षुर्निरीक्षते। (महोपनिषद-4/80)<br />
(सर्वव्यापी सच्चिदानंदस्वरुप परमात्माको ज्ञानरुप चक्षुओं से दिखा जाता है।)<br />
चतुर्मुखेन्द्रदेवेषु मनुष्याश्वगवादिषु। चैतन्यमेकं ब्रह्मात: प्रज्ञानं ब्रह्म मय्यपि।। (शुकरहस्योपनिषद-32)<br />
(चतुर्मुख ब्रह्मा, इन्द्रदेव, सब देवों , मनुष्य , अश्व, गाय वगेरे सब पशुओंमें एकही चैतन्य सत्ता ब्रह्म रही हुइ है। वही प्रज्ञान ब्रह्म मेरेमें भी समाहित है। )<br />
नाहं भवामि । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो बुद्धियादीनां हिसवॅदा । नाहं कर्ता नैव भोक्ता प्रकृतैः साक्षिरुपकः ।मत्सान्निध्यात्प्रवतॅन्ते देहाद्या अजडा इव । आत्माहंसवॅभूतानां विभुः साक्षी न संशयः। ब्रह्मैवाहं सच्चिदानन्दरुपम् । (सवॅसारोपनिषद-16TO20)<br />
(मुझे जन्म नहीं है। मैं बिना प्राण, मन और बुद्धि ही हंमेश शुद्धस्ररुप हुँ । मैं कर्ता या भोक्ता भी नहीं हुँ बल्कि स्वभावसे साक्षीरुप ही हुँ । मेरी उपस्थितिसे ही देह, मन वग़ैरह जीवित जैसे बर्तते है। मैं सब प्राणीओंमें व्याप्त साक्षीरुप आत्मा हुँ, इसमें कोइ शंका नहीं है। मैं सत् चित् आनंदरुप ब्रह्म हुं।)<br />
एको देव: सर्वभूतेषु गूढ़:सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।।(श्वेताश्वतरोपनिषद-6/11)<br />
(सब प्राणीओंमें एकही परमात्मा गुप्त रहा हुआ है, वही वहसर्वव्यापी और सभी प्राणीओंके अंतरात्मा है।)<br />
स एव आत्मान्तर्बहिश्चान्तर्बहिश्च। (मैत्रायण्युपनिषद-4/5)<br />
(यह (परमात्मा) आत्माके रुपमें अंदर बाहर अंदर बाहर विद्यमान है)<br />
सवॅशरीरस्थचैतन्यब्रह्मप्रापको गुरुरुपास्य । (निरालंबोपनिषद-30)<br />
बधां शरीरोमां रहेल चैतन्यरुप ब्रह्मने प्राप्त करावनार गुरुज उपास्य छे ।<br />
पुरुष एवेदं विश्वम्।।(मुंडकोपनिषद-2/1/10)<br />
(यह विश्व पुरुषोत्तम ही है।)(मुंडकोपनिषद-2/1/10)<br />
(This universe is Parmatma only)(Mundaka Upanishad-2/1/10)</p>
<p>GIST OF VEDAS<br />
तावदेव निरोद्धव्यं ह्रदि यावत्क्षयं गतं ।<br />
एतज्ज्ञानं च मोक्षं च शेषास्तु ग्रंथ विस्तरा ।। (मैत्रायण्युपनिषद-4/3/H) (ब्रह्मबिंदूपनिषद-5)<br />
(मनका ह्रदयमें तबतक ही निरोध करना चाहिये जबतक उनका क्षय (यानि मनकी उन्मनी स्थिति) न हो जाय। (संपूर्ण शास्त्रोंका साररुप) यही ज्ञान है और यही मोक्ष है, बाक़ी सबतो ग्रंथका (बिनजरुरी) विस्तार ही है।)<br />
(Only so long must the mind be detained in the heart, until it is annihilated; this only is the knowledge as well as Salvation; the rest is nothing but pedantic superfluity.)<br />
(जयांसुधी मननो क्षय नथाय त्यांसुधीज ह्रदयमां अेनो निरोध करवो जोइए । मात्र आज ज्ञान अने मोक्ष छे बाकी बीजुंतो ग्रंथनो विस्तारज छे । )<br />
चिदचैत्या किलात्मेति सर्वसिद्धान्तसंग्रह:। (महोनिपषद-6/78)<br />
(चित्तवृत्ति रहित हुआ चित्तही आत्मा (परमात्मा) है।यहि निश्चयपूर्वक समग्र( वेदोंके) सिद्धान्तों का सार है) (महोनिपषद-6/78)<br />
(The Chitta that has rendered without Chittavritti, itself is Atmaa (Brahmn). This certainly is comprehensive knowledge of all the Vedas together). (Maha Upanishad-6/78).<br />
GYAN<br />
आत्मा वा अरे द्रष्टव्य: श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो दर्शनेन श्रवणेन मत्वा विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम्।। (बृहदारण्यकोपनिषद-2/4/5, 4/5/6).<br />
(हे मैत्रेयी! यह आत्मा ही दर्शन करवा योग्य, श्रवण करवा योग्य, मनन करवा योग्य, निदिध्यासन (अनुभव, ध्यान) करवा योग्य है। यह आत्माके दर्शन, श्रवण, मनन और ज्ञानसे सबका ज्ञान हो जाता है।)<br />
जायते म्रृतये लोको म्रियते जननाय च। (महोपनिषद-3/4) (लोको मरवा माटे जन्मे छे अने जन्मवामाटे मरेछे । )<br />
भारो विवेकिन: शास्त्रं भारो ज्ञानं च रागिण: ।<br />
अशांतस्य मनो भारो भारोअनात्मविदो वपु: ।। (महोपनिषद-3/15)<br />
(जो विवेकी है उनको शास्त्र भाररुप है, रागी पुरुषके लिये ज्ञान भाररुप है। अशांत पुरुषके लिये मन भाररुप है ओर जिसको आत्मज्ञान नहीं हुआ उनके लिये शरीर भाररुप है।)<br />
तस्मान्मुमुक्षुभिर्नैव मतिर्जीवेशवादयो:। कार्या किंतु ब्रह्मतत्त्वं निश्चलेन विचार्यताम्।। (महोपनिषद-4/75)<br />
(अत: जो पुरुष मोक्षकी आकांक्षा रखता है, वह जीव-ईश्वरके विवादमें अपनी बुद्धिको भ्रमित न करते हुए द्रढतासे ब्रह्मतत्त्वका ही चिंतन करे)<br />
भिद्यते ह्रदयग्रन्थिछिद्यन्ते सवॅसंशया: ।<br />
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ।। (महोपनिषद-4/82) (मुंडकोपनिषद-2/2/8) (सरस्वतीरहस्योपनिषद-67)<br />
(जब प्रकृतिके तंत्रका ज्ञान हो जाता है, तो (देह होने के) सब संशयों का छेदन हो जाता है, सब प्रकारके कर्मोंका नाश हो जाता है, और सूक्ष्म शरीर (ह्रदयग्रंथी) का विसर्जन हो जाता है।<br />
भवादुत्तारयात्मानं नासावन्येन तार्यते। (महोपनिषद-4/106)<br />
(you can cross this Bhavsagar on your own only, none can make you cross)<br />
मा भवाज्ञो भव ज्ञस्त्वं जहि संसारभावनाम् ।(महोपनिषद-4/128)<br />
(तुम अज्ञानी न हो। ज्ञानी बनके संसारिक बंधनकी सभी भावनाओंका नाश कर दे।)<br />
सबाह्याभ्यन्तरं दृश्यं मा गृहाण विमुच मा । (महोपनिषद-5/172)<br />
(जो बहार अंदर दृश्यमान जगत है उनको न तो पकडो और न त्यागो भी।)<br />
तांडुलस्य यथा चमॅ पुरुषस्य तथा मलं सहजम् ।नश्यति क्रियया न संदेह ।। (महोपनिषद-5/185-186)<br />
(जेवीरीते चोखाने फोतरुं होयछे तेम माणसने अविद्यासहजज होयछे । योग्य क्रियाथी तेनो नाश थइ शकेछे तेमां संदेह नथी । )<br />
जीव: शिव: शिवो जीव: स जीव: केवल: शिव:।<br />
तुषेण बद्धो व्रिहि: स्यात्तुषाभावेन तन्डुल: । (स्कंदोपनिषद-6)<br />
(जीव ही शिव है और शिव ही जीव है। जीव जब कैवल्य प्राप्त होता है तो शिव ही बन जाता है; जैसे छिलकेसे बद्ध होती है तो डांगर और अगर बिना छिलकेकी होती है तो चोखा कहलाती है।)<br />
स्वसंकल्पे क्षयं याते समतैवावशिष्यते । (महोपनिषद-6/3)<br />
(सर्वसंकल्पोंका क्षय होते ही समत्वभाव ही बाक़ी रहता है।)<br />
सवॅं त्यक्त्वा येन त्यजसि तत्त्यज । (महोपनिषद-6/5-6)<br />
(सबका त्याग करके (अंतमें) जिससे सब छोड़ते हो उनका भी त्याग कर दो।)<br />
ज्ञस्य संसारो गोष्पदाकृतिः । (महोपनिषद-6/9) (ज्ञानीनोसंसार गायना पगलाथी बनता खाबोचिया जेवोछे । )<br />
न तदस्ति न यत्राहं न तदस्ति न तन्मयम् । योअसिसोअसि ।।(महोपनिषद-6/11)<br />
(यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसमें मैं न रहा हूँ।<br />
और यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं है, जो मेरेसे व्याप्त नहीं है। यहाँ जो कुछ भी है, वह मैं ही हूँ।)<br />
त्यागादानपरित्यागी विज्वरो भव सर्वदा।। (महोपनिषद-6/15)<br />
((कीसीभी वस्तुका) न तो त्याग करो और न हीं ग्रहण करो। इसी तरह संतापरहित होकर जीयो।)<br />
मा खेदं भज हेयेषु नोपादेयपरो भव । (महोपनिषद-6/28) गुमावेलमां खेद नकर । मलेलमां आसक्त नथा ।<br />
नाहं नेदमिति । (महोपनिषद-6/36)<br />
(मैं भी नहीं हूँ और यह (जगत) भी नहीं है)<br />
कुवॅतो लिलया क्रियाम् । (महोपनिषद-6/43) (सब क्रियायें लीलावत करो ।)<br />
अभेददशॅनं ज्ञानं ध्यानं निर्विषयं मन: ।<br />
स्नानं मनोमलत्यागं शौचमिन्द़िय निग्रह:।।(मैत्रेय्युपनिषद-2/2) (स्कंदोपनिषद-11)<br />
अद्वैतभावना भैक्षमभक्ष्यं द्वैतभावनम् । (मैत्रेय्युपनिषद-2/10)<br />
(अद्वैतनी भावनाही भिक्षावृति है और द्वैतभावना अभक्ष्य वस्तु है।)<br />
मृता मोहमयिमाता जातो बोधमय: सुत: ।<br />
सूतकद्वयसंप्राप्तौ कथं संध्यामुपास्महे ।। (मैत्रेय्युपनिषद-2/13)<br />
एकमेवाद्वितीयम्। एतदेकान्तमित्युक्तं न मठो न वनान्तरम्।। (मैत्रेय्युपनिषद-2/15)<br />
[(यहाँ) केवल (परमात्मा) एक ही है, बिना किसी दुसरे के। इस (भावना) को ही एकांत कहा गया है; नहीं कि मठको या तो वन के मध्यभाग को।] (मैत्रेय्युपनिषद-2/15)<br />
[Parmatma alone is here, the only one without any second. This (notion) is what is called to be solitude, and not the cloister or the middle of the forest.]. (Meitreya Upanishad-2/15)<br />
एकमेव अद्वितीयं । (मैत्रेय्युपनिषद-2/15)<br />
(यहाँ केवल परमात्मा एक ही है, बिना किसी दुसरे के।) Parmatma alone is here, only one without any second.<br />
(यहाँ केवल (ब्रह्म) एक ही है, दूसरा कुछ है ही नहीं। इस भावनाको ही एकांत कहा गया है, नहीं की मठको या जंगलके मध्यभागको।)<br />
धनवृद्धा वयोवृद्धा विद्यावृद्धास्तथैव च ।<br />
ते सर्वे ज्ञानवृद्धस्य किंकरा शिस्यकिंकरा। (मैत्रेय्युपनिषद-2/24)<br />
(जो धनमें बड़ा है, वयमें बड़ा है, विद्यामें बड़ा है; वे सब भी जो ज्ञानमें बड़ा है, उनके सामने नौकर या शिष्यके नौकरके समान ही है।)<br />
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।<br />
तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ।। (मुंडकोपनिषद-3/1/1) (श्वेताश्वतरोपनिषद-4/6)<br />
(समान उम्रवाले, मैत्रीभाववाले दो पक्षी अेकही क़िस्मके (दो) वृक्षकी पर बैठे है । उसमेंसे एक पक्षी पिप्पलके वृक्षके फलोंको अति खाता है; जबकी दूसरा बिना खाये सिर्फ़ देखा करता है। )<br />
स्वात्मानं ज्ञात्वा वेदै: प्रयोजनं किं भवति। (पेंगलोपनिषद-4/13)<br />
(आत्मज्ञान हो जाननेके बाद वेदोंसे क्या प्रयोजन रहता है?)<br />
अस्ति भाति प्रियं रुपं नाम चेत्यंशपंचकम् । आद्यत्रयं ब्रह्मरुपं जगद्रूपं ततो द्वयम् । (सरस्वतीरहस्योपनिषद-58)<br />
(अस्ति (है), भाति (आभास होता है), प्रिय (आनंदस्वरुप) , रुप अौर नाम यह पाँच अंश कहे गये है । पहेले तीन ब्रह्म रुप अौर पीछले दो जगतरुप कहे गये है । )<br />
हरि: ॐ ब्रह्मवादिनो वदन्ति- किं कारणं ब्रह्म कुत:स्म जाता जीवाम केन क्व च संप्रतिष्ठा:। अधिष्ठिता: केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदोव्यवस्थाम्।।(श्वेताश्वतरोपनिषद-1/1)<br />
(जगतका कारण जो ब्रह्म है वो ब्रह्म क्या है? कैसाहै? हम कहाँसे उत्पन्न हुएहै? किससे जीतेहै? और अंतमें हम किसमे रहतेहै? किसके नियमके तहत रह कर हम सुख-दु:खकी इस व्यवस्थाको मानते है?)<br />
भ्राम्यते चक्रे पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा। (श्वेताश्वतरोपनिषद-1/6)<br />
(अपनेको और ईश्वरको अलग अलग समजता है वह जीवन-मृत्युके चक्रमें घूमते रहते है ।)<br />
वह्नेयॅथा योनिगतस्य मूतिॅनॅ दृश्यते नैव च लिन्गनाश:।<br />
स भूय एवेन्धनयोनिगृह्यस्तद्वोभयं वै प्रणवेन देहे।। (श्वेताश्वतरोपनिषद-1/13)<br />
(जैसे (लकडेके) गभॅमें छीपे अग्निको देख नहीं शकाते फीरभी सूक्ष्मरुपसे अग्नि नहीं है ऐसा कह भी नहीं शकाते; अौर जब (लकडेको) इन्धनके रुपमें (जलानेसे) फीर अग्निको प्राप्त भी कर शकते है; यह दोनों (रुपकोकी) तरह (देहमें इश्वर होते हुए भी देख नहीं शकते अौर ईश्वर नहीं है ऐसा कह भी नहीं सकते और) ऊँकार द्वारा देह मेंसे प्राप्त कर शकते हैा)<br />
Vahneryatha yonigatasya murtirna drushyate neiv cha lingnashaha. Sa bhuya evendhanyonigruhyastadvobhayam vei pranven dehe-Shvetashvataropanishad-1/13) (As fire is an integral part (of wood), but yet is not visible (in wood), but same time we can&#8217;t say it is not there, as (fire) is again grasped when it is used as a fuel, same way the Brahmn (is an integral part of body, but not grasped) unless meditated with ॐ).<br />
एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति।। (श्वेताश्वतरोपनिषद-3/1) (एतद् विदु: अमृता: ते भवन्ति)<br />
(उस (परम पुरुष)को जाननेवाले अमर हो जाते है।)<br />
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्य: पंथा विद्यतेअयनाय।। (श्वेताश्वतरोपनिषद-3/8 and 6/15) (नारद परिव्राजकोपनिषद-9/1)<br />
(उस (परमात्मा) को जानकर मृत्युरूपी बंधनको विद्वान पार कर जाता है, परमपदकी प्राप्तिके लिये इसके अलावा दुसरा रास्ता ही नहि है।)<br />
एको हँसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्नि: सलिले संनिविष्ट:।<br />
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्य: पन्था विद्यतेऽयनाय।। (श्वेताश्वतरोपनिषद-6/15)<br />
(यह शरीरमध्ये एक ही हंस (परमात्मा) है, जो पानीमें छीपे अग्निके भाँति अगोचर है। उसको जानकर साधक मृत्युरुपबंधनको पार कर देता है, इससे अलग मोक्षप्राप्तिका अन्य कोई मार्ग नहीं है।)<br />
Water is made of Hydrogen and Oxygen. Hydrogen is inflammable. Rishis knew this thousands of years back.<br />
जीव: शिव: शिवो जीव: स जीव: केवल: शिव:।<br />
तुषेण बद्धो व्रिहि: स्यात्तुषाभावेन तन्डुल: । (स्कंदोपनिषद-6)<br />
(जीव ही शिव है और शिव ही जीव है। जीव जब कैवल्य प्राप्त होता है तो शिव ही बन जाता है; जैसे छिलकेसे बद्ध होती है तो डांगर और अगर बिना छिलकेकी होती है तो चोखा कहलाती है।)<br />
ब्रह्मविदाप्नोति परम्। (तैत्तिरीयोपनिषद-2/1/1) (ब्रह्मवेत्ता परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है। )<br />
तत्सत्यमित्याचक्षते । (तैत्तिरीय उपनिषद-2/6/1) ([तत्सत्यम् इति आचक्षते । ]
(जो कुछ अनुभवमें आता है, वह सत्य ही है।) करतलामलकवत्साक्षादपरोक्षीकृत्य । (वज्रसूचिकोपनिषद-9)<br />
(अपरोक्ष अनुभूति (मूक्ति), हथेलीमें रखा आमला (देखना) सरल है, (उतनी सरल है)) Experiencing Realisation to of God is as easy as to behold an Aamla in hand-(Vrajsoochikopanishad-9).<br />
HOW SHRUSTI CAME INTO BEING?<br />
सदेव सौम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितियं।<br />
(छांदोग्योपनिषद-6/2/1)<br />
(हे सोम्य प्रारंभमें एक मात्र अद्वितीय सत ही था।)<br />
स एकाकी न रमते। (महोपनिषद-1/3)<br />
(उस (ब्रह्म) को (यहाँ) अकेला (होना) पसंद न आया।) (महोपनिषद-1/3)<br />
तद्वैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति। (छांदोग्योपनिषद-6/2/3)<br />
(उसने संकल्प कियाकि मैं विभिन्न रुपोंमें उत्पन्न होजाउ।) (छांदोग्योपनिषद-6/2/3)<br />
तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश: संभूत: आकाशाद्वायु: वायोरग्नि:। अग्नेराप:। अद्भय: पृथिवी। पृथिव्याओषधय:ओषधिभ्योऽन्नम्। अन्नात्पुरुष:। स वा एषपुरुषोऽन्नरसमय:। (तैत्तिरीयोपनिषद-2/1/1) (पेंगलोपनिषद-1/6)(निश्चयज तब इस परमात्मा में से आकाश उठा था।आकाशमेंसे वायु, वायुमेंसे अग्नि, अग्निमेंसे जल, पाणीमेंसे पृथ्वि, पृथ्वीमेंसे औषधियाँ, औषधियोंमेंसे अन्न, अन्नमेंसे पुरुष।यह पुरुष निश्चय ही अन्नरसमय है।)(तैत्तिरीयोपनिषद-2/1/1). (पेंगलोपनिषद-1/6)(Certainly then the Akaash was arisen from the Parmatma. The Air from the Akaash, the Fire from the Air, the Water from the Air, the Earth from the Water. All the vegetation were arisen from the Earth, the grain from the vegetation, the man is result of grain, thus certainly this man is an extract of Grain.)(Teittiriya Upanishad-2/1/1).(पेंगलोपनिषद-1/6)<br />
द्वितीयाद्वै भयं भवति। (बृहदारण्यकोपनिषद-1/4/2)<br />
(दूसरा आनेसे भय होता है।) (बृहदारण्यकोपनिषद-1/4/2)<br />
आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसिन्नान्यत्किंचन मिषत्। स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति।<br />
(ऐतरयोपनिषद-1/1/1)<br />
(सृष्टिकी शुरुआतमें एकमात्र आत्मा ही था। इसके अलावा सचेष्ट जैसा और कुछ भी नहीं था। तब उस (परमात्मा) ने सोचा की मैं लोकोंका सृजन करुं।)<br />
नैवेह किंचनाग्र आसीत। (ब़ह्दारण्यकोपनिषद-1/2/1)<br />
(पहेले यहाँ कुछ भी नहीं था।)<br />
स एकाकी न रमते। (महोपनिषद-1/3)<br />
(उस (ब्रह्म) को (यहाँ) अकेला (होना) पसंद न आया।)<br />
सोअकामयत। बहुस्यां प्रजायेयेति।। (तैत्तिरीयोपनिषद-2/6/1)<br />
(उस परमात्माने अनेक रुपमें प्रगट होनेकी इच्छा की)<br />
असद्वा इदमग्र आसीत् । ततो वै सदजायत । (तैत्तिरीयोपनिषद-2/7/1)<br />
(इससे पहेले यहाँ असत् ही था, उसमेंसे सत् उत्पन्न हुआ।)<br />
(There was in-existence, existence came out of it)<br />
ब्रह्मणोऽव्यक्तं । अव्यक्तान्महत् । महतोऽहंकार: ।अहंकारात्पंचतन्मात्राणि । पंचतन्मात्रेभ्य: पंचमहाभूतानि। पंचमहाभूतेभ्योऽखिलं जगत ।। (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-1/3)<br />
(ब्रह्ममेंसे अव्यक्त, अव्यक्तमेंसे महत्तत्त्व, महत्तत्वमेंसे अहंकार, अहंकारमेंसे पाँच तन्मात्रायें, पाँच तन्मात्राओंसे पाँचमहाभूतों, पाँच महाभूतोमेंसे, समग्र जगत उत्पन्न हुआ है।)<br />
सदेव सोम्येदमग्र आसीत्। तन्नित्यमुक्त्तमविक्रियं सत्यज्ञानानन्दं परिपूर्णं सनातनमेकमेवाद्वितियं ब्रह्म।। (पेंगलोपनिषद-1/2)<br />
(&#8220;Before the Universe came into being, there was only Truth. The same is Brahmn which is only one without second and is beginningess, eternal, free, pure and full of existence, knowledge and bliss&#8221;. Pengalopanishad-1/2).<br />
ल्लोहितशुक्लकृष्णगुणमयी गुणसाम्यानिर्वाच्या मूलप्रकृतिरासीत्। (पेंगलोपनिषद-1/3)<br />
(जिसका वर्णन नहीं हो सक्ता है, जिसमें सत्त्व, रजस और तमस तीनों गुण समान है वैसी मूलप्रकृति (ब्रह्ममेंसे) उत्पन्न हुइ।) (पेंगलोपनिषद-1/3)<br />
(This primordial Nature, which has the equanimity of Sattva (existence or Neutron), Rajas (procreation or Proton), and Tamas (elimination or Electron); was born (from the Parmatma). (Pengal Upanishad-1/3).<br />
सा पुनर्विकृतिं प्राप्य सत्त्वोद्रित्त्काऽव्यक्ताख्यावरणशक्त्तिरासीत्। तत्प्रतिबिम्बितं यत्तदीश्वरचैतन्यमासीत्।<br />
स स्वाधीनमाय: सर्वज्ञ: सृष्टिस्थितिलयानामादिकर्ता जगदअंकुररुपो भवति स्वस्मिन्विलीनं सकलं जगदाविर्भावयति।<br />
प्राणीकर्मवशादेष पटो यद्वत् प्रसारित: प्राणीकर्मक्षयात् पुनस्तिरोभावयति। तस्मन्नेवाखिलं विश्वं संकोचितपटवद्वर्तते।।(पेंगलोपनिषद-1/4) ( जब वह ( मूल प्रकृति) फिरसे विकार युक्त हो गइ तो उसे स्त्त्वगुणयुक्त अव्यक्त आवरण शक्ति कहा जाने लगा। उसमें जो चैतन्य प्रतिबिम्बित हुआ वह ईश्वर है। वह (ब्रह्म) मायाको अपने आधीन रखते है, वह सर्वज्ञ है, वह सृष्टि, स्थिति और प्रलय आदिके कर्ता है, (प्रलयके वक़्त) उस (ब्रह्म)में जगत अंकुररुपमें हो जाता है। वह ब्रह्म प्राणीओंके कर्मानुसार (फल देने हेतु जरुरत होनेनेपर) अपनेमें (अंकुररुप) विलिन रहे यह संपूर्ण जगतका आविर्भाव करके वस्त्रके पटकी तरह प्रसारते है, और प्राणीओंके कर्म नष्ट होनेपर फिरसे (जरुरत न रहनेपर यह विश्वरुपी पटको वस्त्रकी तरह ) अपनेमें सिमट भी लेते है। बादमें पूरा विश्व (उस ब्रह्म)में हि समेटे हुए वस्त्रकी भाँति रहता है)<br />
तस्मादात्मन आकाश: संभूत:। आाकाशाद्वायु:। वायोरग्नि:। अग्नेराप:। अद्भय: पृथिवी।तानि पंच तन्मात्राणि त्रिगुणानि भवन्ति। (पेंगलोपनिषद-1/6)<br />
यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जिवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति।। ( तैत्तिरीयोपनिषद-3/1/1)<br />
(जिसमेसे यह सब प्राणियों जन्मते है, और जन्म लेकर जिससे वे जीतेहै, और प्रलयके वक़्त जिसमें जाकर वे लय हो जातेहै, उसको जाननेकी जिज्ञासा करो । वह ब्रह्म है । )<br />
सर्वदाऽनविच्छिन्नं परं ब्रह्म तस्माज्जाता परा शक्ति: स्वयंज्योतिरात्मिका।आत्मन आकाश: संभूत:।आकाशाद्वायु:।वायोरग्नि:।आग्नेराप:।अद्भय: पृथिवि।।(योगचूडामण्युपनिषद-72)<br />
राजसो ब्रह्मा सात्विको विष्णुस्तामसो रुद्र इति एते त्रयो गुणयुक्ता:।।(योगचूडामण्युपनिषद-72)<br />
(मैत्राण्युपनिषद-4/5)(पाशुपतब्राह्मणोपनिषद-पूर्वकांड-10)<br />
प्रकृतित्वं तत: सृष्टं सत्त्वादिगुणसाम्यत:। (सरस्वती रहस्योपनिषद-47) (तत् पच्याद् सत्त्व, रजस, तमस गुणके साम्यावस्था वाली यह प्रकृतिकी रचना संपन्न हुई।). (सरस्वती रहस्योपनिषद-47) (Then the creation of Nature, which has the equanimity of Sattva (existence or Neutron), Rajas (procreation or Proton), and Tamas (eliminating or Electron); was completed). (Saraswati Rahasya Upanishad-47)</p>
<p>IF YOU SAY YOU KNOW PARMATMA, YOU DON’T KNOW<br />
यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रुपम्। (केनोपनिषद-2/1)<br />
(अगर आपकी मान्यता है की मैंने ब्रह्मको अच्छी तरहसे जान लिया है , तो निश्चित ही आपने ब्रह्मका अल्प अंश ही जानाहै।)<br />
यस्यामतं तस्यमतं मतं यस्य न वेद स:। (केनोपनिषद-2/3)<br />
(जीसका मानना है की वह ब्रह्मको नहीं जानता, वह ब्रह्मको जानता है; और जीसका मानना है मैं ब्रह्मको जानता हूँ , वह ब्रह्मको नहीं जानता।)<br />
JIVA BHAVNA<br />
स्थूलोअहमिति मिथ्याध्यासवशाज्जीवः । (निरालंबोपनिषद-5)<br />
(मैं स्थूल हुँ ऐसा जब मिथ्याभिमान हो जाता है तब वह जीव है ऐसा कहलाता है। )<br />
अहंकाराभिमानेन जीवः । (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/16)<br />
इत्यहं सो ममेदमित्येवं मन्यमानो भूतात्मा । (मैत्रायण्युपनिषद-3/2)<br />
(यह मैं हुँ , वह मेरा है, ऐसा माना हुआ ही जीवात्मा है।) (मैत्रायण्युपनिषद-3/2)<br />
(Jiva is one who has believed: “I am this, that is mine”.) (Meitrani Upanishad-3/2).<br />
देहाभिमानेन जीवो भवती।<br />
(नारद परिव्राजकोपनिषद-6/3)<br />
(देह होने की भावना होने से जीव बन जाता है) (नारद परिव्राजकोपनिषद-6/3)<br />
(By creating a sense of being body, one becomes Jiva.). (Narada Parivrajika Upanishad-6/3).<br />
शरीराभिमानेन जीवत्वम्।<br />
(नारद परिव्राजकोपनिषद-6/4)<br />
मोहितो जीवत्वमगमत्। (पेंगलोपनिषद-1/12) (मोहके कारण जीवत्वको प्राप्त हूआ ।)<br />
जीवो ब्रह्मेति। (शुकरहस्योपनिषद-28)<br />
(जीव ही ब्रह्म है)<br />
सविकारस्तथा जीवो निर्विकारस्तथा शिव:। (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/12)<br />
अहंकाराभिमानेन जीवः । (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/16)<br />
इत्यहं सो ममेदमित्येवं मन्यमानो भूतात्मा ।<br />
मयि जीवत्वमीशत्वं कल्पितं वस्तुतो न हि। इति यस्तु विजानाति स मुक्तो नात्र संशय:।। (सरस्वतीरहस्योपनिषद-68)<br />
(मेरेमें जीवत्व-इशत्व कल्पित है, वास्तवमें नहीं है। यह जो जान लेता है, वह मूक्त ही है; इसमें कोई संशय नहीं है।)<br />
पशुपतिरहंकाराविष्ट: संसारी जीव: स एव पशु:। (जाबाल्युपनिषद-11)<br />
( पशुपति स्वयम् अहंकारयुक्त हो जानेसे संसारी जीव हो जाता है, वही पशु भी है।)<br />
सत्त्वान्तर्वर्तिनो देवा: कर्त्रहंकारचेतना:।। (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/7)<br />
(और उस (ह्रदय) की अंदर वह देवता (जीवात्मा) रहा हुआ है, जीसकी अंदर कर्तापणाका अभिमान दिखने मिलता है)<br />
(अहंकारका स्थान ह्रदय बताया है। यही अहंकारसे कर्तापणाका भाव पैदा होता है। इसीलिये जीवात्मा ह्रदयमें है ऐसा कहा जाता होगा।)<br />
अंत:करणप्रतिबिंम्बितचैतन्यं यत्तदेवावस्थात्रयभाग्भवति। स जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यवस्था: प्राप्य घटियन्त्रवदुद्विग्नो जातो मृत इव स्थितो भवति।। (पेंगलोपनिषद-2/10)<br />
(अंत:करणमें जो चैतन्य प्रतिबिंबित (उपद्रष्टा या जीव) होता है, वही अवस्था त्रय (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) का भागीदार होता है। वही जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाको प्राप्त होता है, वही रहेंटके समान उद्विग्न होता है, वही निरंतर जन्म मृत्युको प्राप्त होता रहता है।)<br />
जीवेश्वरौ मायिकौ विज्ञाय सर्वविशेषं नेति नेतीति विहाय यदवशिष्यते तदद्वयं ब्रह्म।<br />
(अद्वयतारकोपनिषद-3)<br />
(जीव और ईश्वरको मायिक जानकर, जो विशेषकर है उस सबको “नेति नेति” कहते हुए उसको त्यागकर, जो शेष रहता है, वही अद्वय ब्रह्म (कहलाता) है।)</p>
<p>KARMA FAL<br />
विद्वान्ब्रह्मज्ञानाग्निना कर्मबन्धं निर्दहेत्। (पेंगलोपनिषद-4/16)<br />
(विद्वान पुरुष ब्रह्मज्ञानरुपी अग्निसे कर्म बन्धनको भस्म कर देता है।)<br />
यो विदधाति कामान्। (कठोपनिषद-2/2/13) (श्वेताश्वतरोपनिषद-6/13)<br />
(वह (परमात्मा मनुष्योंको उसके) कर्मानुसार (लाभ या हानि) देनेवाला है।) (कठोपनिषद-2/2/13) (श्वेताश्वतरोपनिषद-6/13)<br />
(That (Parmatma) is to distribute (the gains and losses to the people) according to their actions.) (Katha Upanishad-2/2/13) (Shwetashwatar Upanishad-6/13).<br />
अजायते यथाकर्म यथाविद्यम्। (कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद-1/2)<br />
(जिस प्रकारके कर्म और जिस प्रकारकी विद्या, उसके अनुसार (प्राप्त शरीरमें) जन्म लेता है)<br />
वर्णाश्रमाचारयुता विमूढा: कर्मानुसारेण फलं लभन्ते।<br />
वर्णादिधर्म हि परित्यजन्तः स्वानन्दतृप्ताः पुरुषा: भवन्ति। (मैत्रेय्युपनिषद-1/17)<br />
(जाति और आश्रमके (आधार पर ही आध्यात्मिकतामें) आचरण करनेवाले पूरी तरहसे मूर्खों ही कर्मानुसार फल भोगते है।<br />
The completely morons, behaving (in spirituality on the basis of) possessed of caste and order, have to be afflicted according to the Karmafal.परंतु जो पुरुषों वणॅ विगेरे धर्मों त्याग देते है, वे अपने नीजानंदमें तृप्त रहते है।)<br />
जाग्रदवस्था गतो जीव: क्रियाकर्ता भवति<br />
लोकान्तरगत: कर्मार्जितफलं स एव भुंक्ते। (पेंगलोपनिषद-2/11)<br />
(जाग्रदवस्था प्राप्त जीवों करताहंकारसे क्रिया करते है। वे ही अपने किये हुए कर्मोंके प्राप्त फलोंको परलोकमें भी भोगते है।)<br />
सकलं जगदाविर्भावयति। प्राणीकर्मवशादेष पटो यद्वत् प्रसारित: प्राणीकर्मक्षयात् पुनस्तिरोभावयति। तस्मिन्नेवाखिलं विश्वं संकोचितपटवद्वर्तते।।(पेंगलोपनिषद-1/4)<br />
[(वह ब्रह्म) प्राणीओंके कर्मानुसार फल देने हेतु संपूर्ण जगतका आविर्भाव करके वस्त्रके पटकी तरह प्रसारते है, और प्राणीओंके कर्म नष्ट होनेपर फिरसे विश्व को (अपनेमें) सिमट भी लेते है। बादमें पूरा विश्व (उस ब्रह्म)में हि सिमेटे हुए वस्त्रकी भाँति रहता है] (पेंगलोपनिषद-1/4)<br />
[(That Parmatma) to deliver the Karmafal to the creatures according to their Karmas spreads forth the entire universe before us like a piece of cloth, and with the diminishing of the Karmas of the creatures, again causes it to disappear (in the self). Thereafter the entire universe remains in Parmatma like a folded piece of cloth.] (Pengal Upanishad-1/4).<br />
सा पुनर्विकृतिं प्राप्य सत्त्वोद्रित्त्काऽव्यक्ताख्यावरणशक्त्तिरासीत्। तत्प्रतिबिम्बितं यत्तदीश्वरचैतन्यमासीत्।तत्प्रतिबिम्बितं यत्तदीश्वरचैतन्यमासीत।<br />
स स्वाधीनमाय: सर्वज्ञ: सृष्टिस्थितिलयानामादिकर्ता जगदअंकुररुपो भवति स्वस्मिन्विलीनं सकलं जगदाविर्भावयति।<br />
प्राणीकर्मवशादेष पटो यद्वत् प्रसारित: प्राणीकर्मक्षयात् पुनस्तिरोभावयति। तस्मिन्नेवाखिलं विश्वं संकोचितपटवद्वर्तते।।(पेंगलोपनिषद-1/4) ( जब वह ( मूल प्रकृति) फिरसे विकार युक्त हो गइ तो उसे सत्त्वगुणयुक्त अव्यक्त आवरण शक्ति कहा जाने लगा। उसमें जो चैतन्य प्रतिबिम्बित हुआ वह ईश्वर है। वह (ब्रह्म) मायाको अपने आधीन रखते है, वह सर्वज्ञ है, वह सृष्टि, स्थिति और प्रलय आदिके कर्ता है, (प्रलयके वक़्त) उस (ब्रह्म)में जगत अंकुररुपमें हो जाता है। वह ब्रह्म प्राणीओंके कर्मानुसार (फल देने हेतु जरुरत होनेनेपर) अपनेमें (अंकुररुप विलिन रहे) संपूर्ण जगतका आविर्भाव करके वस्त्रके पटकी तरह प्रसारते है, और प्राणीओंके कर्म नष्ट होनेपर फिरसे (जरुरत न रहनेपर यह विश्वरुपी पटको वस्त्रकी तरह ) अपनेमें सिमट भी लेते है। बादमें पूरा विश्व (उस ब्रह्म)में हि समेटे हुए वस्त्रकी भाँति रहता है)<br />
प्राणाधिप: संचरति स्वकर्मभि:।।(श्वेताश्वतरोपनिषद-5/7)<br />
(जीवात्मा अपने कर्मोंके अनुसार विविध योनीयोंमें गमन करता रहता है।) (श्वेताश्वतरोपनिषद-5/7)<br />
The Jiva keeps visiting different species according to his Karmas. (Shwetashwatara Upanishad-5/7).<br />
कर्मानुगान्यनुक्रमेण देही स्थानेषु रुपाण्यभिसंप्रद्यते। (श्वेताश्वतरोपनिषद-5/11)<br />
(जीवात्मा अपने किये हुए कर्मोंके फलानुसार भिन्न भिन्न स्थानोंमें भिन्न भिन्न रुपोंको वारंवार लेता है।)<br />
अस्ति खल्वन्योऽपरो भूतात्मा योऽयं सितासितै: कर्मफलैरभिभूयमान: सदसद्योनिमापद्यत इत्यवाचीं वोर्ध्वागतिं। (मैत्रायण्युपनिषद-3/2)<br />
(जो शुभ- अशुभ कर्मोंके कारण अधेगामी हुआ है, वो(आत्मा नही है पर वो) तो अन्य भूतात्मा (जीवात्मा) है। वह कर्मानुसार अच्छी बुरी योनीयोंमें गमन करता हैऔर उँची या नीची गतीयोंको प्राप्त होता है।)<br />
यस्माज्जातो भगात्पूर्वं तस्मिन्नेव भगे रमन्।या माता सा पुनर्भार्या या भार्या मातरेव हि।<br />
एवं संसारचक्रेण कूपचक्रे घटा इव।।<br />
(योगतत्वोपनिषद-132-133)<br />
जिस पूर्व बीज (योनि)के कारणरुप (मनुष्य इस जन्ममें) पैदा हुआ है, उस बीज (योनि)में (वह अब) क्रिडा नहीं करता।जैसे कि जो माता (सत्त्वगुण) होती है वह (बादके जन्ममें) फिरसे पत्नि (रजसगुण या तमसगुण बन जाती है और) जो पत्नि होती है, वह (बादके जन्ममें) माता। वैसे हि संसारचक्र (के क़िस्से) में होता है, रेंटचक्रमें रहे घटोंकी तरह।(योगतत्वोपनिषद-132-133)<br />
One doesn’t frolic in that seed, because of which past seed he has been born (in this life). As who is mother (Sattva Guna in this life) now, again becomes wife (Rajas or Tamas Guna in later life). Same happens in (the case of) Wheel of Sansaar, as (it happens) with the pots in the wheel for raising water from the well.<br />
(Yogatattva Upanishad-132-133)<br />
कर्मेति च क्रियमाणेन्द्रियै: कर्माण्यहं करोमीत्यध्यात्मनिष्ठतया कृतं कर्मैव कर्म।(निरालंबोपनिषद-11)<br />
(जो कार्यों “मैं यह कर्मों करता हुँ”, ऐसे अपने एहसास के भाव के साथ, कर्मेन्द्रियों के द्वारा किया गया है, वही कर्म है।)(निरालंबोपनिषद-11)<br />
(The action is that only which is done by the sense organs of action, with one’s Realisation that, “I am doing these actions”.) (Niralamba Upanishad-11).</p>
<p>KUNDALINI<br />
कुणडलिनि<br />
तत: परिचयावस्था जायतेऽभ्यासयोगत:।।<br />
वायु: परिचितो यत्नादग्निना सह कुण्डलीम्।भावयित्वा सुषुम्नायां प्रविशेदनिरोधत:।।<br />
(योगतत्वोपनिषद-81-82)<br />
(तब अभ्यासयोगसे कुंभकावस्था पैदा हो जाती है।प्रयत्नों से इकठ्ठा किया वायुकी अग्नि के साथ कुंडलिनी सुषुम्ना नाड़ी में विरोध रहित प्रवेश करती है, ऐसी भावना (कल्पना) कि जाय।)<br />
आपोऽर्धचन्द्रं शुक्लं च वंबीजं परिकिर्तितम्।।(योगतत्त्वोपनिषद-82)<br />
जल स्थानमें अर्द्धचंद्रके रुप में वं बीज का होना माना गया है।<br />
अधोगतिमपानं वै ऊर्ध्वगं कुरुते बलात्।आकुंचनेन तं प्राहुर्मूलबन्धोऽयमुच्यते।। (योगकुंडल्युपनिषद-1/42)<br />
इत्यधोर्ध्वरज: शुक्लं शिवे तदनु मारुत:।(योगकुंडल्युपनिषद-1/75)<br />
इस तरह नीचे रही रज और ऊर्ध्व मां रहा शुक्र वायुके वेग से शिव में लीन हो जाते है।<br />
इति तं स्वरुपा हि मती रज्जुभुजंगवत्।<br />
(योगकुंडल्युपनिषद-1/79)<br />
उस (साधक) को अपने स्वरुप की समज मीलजाती है, जैसे रस्सीमें दिखते सर्प की भाँति।<br />
मन एव हि बिन्दु।।(योगकुंडल्युपनिषद-3/5)<br />
आकुंचनेन तं प्राहुर्मूलबन्धोऽयमुच्यते। अपानश्चोर्ध्वगो भूत्वा वह्निना सह गच्छति।।(योगकुण्डल्युपनिषद-1/64)<br />
प्राणस्थानं ततो वह्नि: प्राणापानौ च सत्वरम्। मिलित्वा कुण्डली याति प्रसुप्ता कुण्डलाकृति:।। तेनाग्निना च संतप्ता पवनेनैव चालिता।<br />
प्रसार्य स्वशरीरं तु सुषुम्ना वदनान्तरे।।<br />
(योगकुण्डल्युपनिषद-1/65-66)<br />
प्रकृत्यष्टकरुपं च स्थानं गच्छति कुण्डली। क्रोडीकृत्य शिवं याति क्रोडीकृत्य विलियते।।(योगकुण्डल्युपनिषद-1/74)<br />
(गुदाके आकुचनके द्वारा (अपानको उर्ध्व गामी बनानेकी प्रक्रियाको मूलबन्ध कहते है। अपान उर्ध्व गामी होकर अग्नि के साथ संयुक्त होकर जब वह अग्नि प्राण के स्थान में पहोंचता है, तब प्राण और अपान दोनों मिलकर सर्पाकृति में रही कुण्डली की पास आते है। तब उस अग्निसे संतप्त होकर और (प्राणायामके) वायु (के आघात) से ही चालित होकर कुण्डली अपना शरीर पसार के सुषुम्ना के मुखके छेड़े में से उर्ध्वगमन कर के (ब्रह्मग्रंथी, विष्णुग्रंथी और रुद्रग्रंथी को भेदकर) यह अष्टधाप्रकृतिरुप (पंच तत्त्वों और मन, बुद्धि अहंकार) और (अष्टधाप्रकृतिरुप) स्थानवाली कुंडलिनी शक्ति गती कर के शिव की ओर आती है और शिव को आलिंगन कर के शिव में एकाकार हो जाती है।)<br />
स पुनर्द्विविधो बिन्दु: पाण्डरो लोहितस्तथा।पाण्डरं शुक्लमित्याहुर्लोहिताख्यं महाराज:।।<br />
(योग चूड़ामणि उपनिषद-60)<br />
बिंदुओं के फिरसे दो प्रकार है: सफ़ेद और लाल।सफ़ेद को शुक्र और लाल को महारज कहा गया है।<br />
रविस्थानस्थितं रज:। शशिस्थानस्थितं शुक्लं। तयोरैक्यं सुदुर्लभम्।।(योग चूड़ामणि उपनिषद-61)<br />
रविस्थान में रज का निवास है, शशिस्थान में शुक्ल का निवास है; दोनों का संयोग बहुत दुर्लभ है।<br />
वायुना शक्तिचालेन प्रेरितं च यथा रज:। याति बिन्दु: सदैकत्वं भवेद्दिव्यवपुस्तदा।।<br />
(योग चूड़ामणि उपनिषद-63)<br />
बिन्दुर्ब्रह्म रज: शक्तिर्बिन्दुरिन्दु रजो रवि:।उभयो: संगमादेव प्राप्यते परमं पदम्।।<br />
(योग चूड़ामणि उपनिषद-62)<br />
बिंदु परमात्मा है, रज शक्ति है; बिन्दु चंद्ररुप है, रज सूर्यरुप है। दोनों का मिलन होने से ही परम पद प्राप्त होता है।<br />
स एव र्द्विविधो बिन्दु: पाण्डरो लोहितस्तथा।पाण्डरं शुक्रमित्याहुर्लोहिताख्यं महाराज:।।<br />
योनिस्थाने स्थितं रज:।। शशिस्थाने वसेद्बिन्दुस्तयोरैक्यं सुदुर्लभम्।<br />
बिन्दु: शिवो रज: शक्तिर्बिन्दु रजो रवि:।।<br />
(ध्यानबिंदूपनिषद-86-88)<br />
विर्य दो प्रकार के होते है: सफ़ेद और लाल।सफ़ेद को शुक्र और लाल को महारज कहा है। रज का निवास योनि स्थान में और बिन्दु चंन्द्र स्थान में निवास करता है। दोनोंका संयोग अतिदुर्लभ माना गया है।बिन्दु शिव और रज शक्ति है; बिन्दु चंन्द्र और रज को सूर्य कहा गया है।<br />
LEAVE THE MEDIUM TOO THAT HELPED YOU TO LEAVE EVERYTHING<br />
सवॅं त्यक्त्वा येन त्यजसि तत्त्यज । (महोपनिषद-6/5-6)<br />
((सबका त्याग करके (अंतमें) जिससे सब छोड़ते हो उनका भी त्याग कर दो।)<br />
(After renunciating everything, leave that, too by which you renunciated everything.- Mahopanishad-6/5-6).<br />
MAYA<br />
माया नाम अनादिरन्तवती प्रमाणाप्रमाणसाधारणा न सती नासती न सदसती स्वयमधिका विकाररहिता निरुप्यमाणा सतीतरलक्षनशून्या सा मायेत्युच्यते।अज्ञानं तुच्छाप्यसती कालत्रयेऽपि पामराणां वास्तवी च सत्त्वबुद्धिर्लौकिकानामिदमित्यनिवॅचनीया वक्तुं न शक्यते।। (सवॅसारोपनिषद-15)<br />
(माया नाम अनादि है, विनष्टप्राय है। वह न सत है, न असत है और नहीं सतअसत है। वह स्वयं ही अधिका है, विकार रहिता है।जैसे कि अन्य लक्षणों से रहित है ऐसा निरुपण हो सकता है, उसे माया ऐसा कहा जाता है। यह मायाशक्ति तुच्छ, अज्ञानरुप और मिथ्या भी है, फिर भी मूढ़ों को जैसे कि वह तीनों कालों में (हंमेशा) वास्तविक है, ऐसी दिखती है।अत: “वह इस प्रकारकी है”, ऐसा सुनिश्चितया बताना शक्य नहीं है।) (सवॅसारोपनिषद-15)<br />
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तुमहेश्वरम्।<br />
तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत्।।(श्वेताश्वतरोपनिषद-4/10)<br />
(प्रकृतिको तुम माया समजो और महेश्वरको मायापति। उसकेही अंगभूतोंसे यह समग्र विश्व व्याप्त है।)<br />
शक्तिद्वयं हि मायाया विक्षेपावृतिरुपकम्। विक्षेपशक्तिर्लिंगादि ब्रह्माण्डान्तं जगत्सृजेत्।।<br />
अन्तर्द्रृग्दृश्ययोर्भेदं बहिश्च ब्रह्मसर्गयो:। आवृणोत्यपरा शक्ति: सा संसारस्य कारणम्।।<br />
(सरस्वतीरहस्योपनिषद-52-53)<br />
(विक्षेप और आवरण नामक मायाकी दो शक्तियाँ है। विक्षेप शक्ति लींगदेहसे ब्रह्मांड पर्यन्त जगतकी संरचना करती है। आवरण नामक अपरा शक्ति अंदरके दृष्टा-दृश्यके भेदको और बहारके परमात्मा-सृष्टिके भेदको आवृत करती है। यह आवरण शक्ति ही संसारके बंधनका कारण है।)<br />
MEDITATION<br />
अभेददशॅनं ज्ञानं ध्यानं निर्विषयं मन: ।<br />
स्नानं मनोमलत्यागं शौचमिन्द़िय निग्रह:।।(मैत्रेय्युपनिषद-2/2) (स्कंदोपनिषद-11)<br />
[(सृष्टिमें ब्रह्मका) अभेदरुप दर्शन (करना ही यथार्थ) ज्ञान है। मनका विषय रहित हो जाना हि ध्यान है। मनके (द्वन्द्वात्मक) मल का त्याग हो जाना ही स्नान है। इन्द्रियोंका (पूरा) वशमें होना ही पवित्रता है।](मैत्रेय्युपनिषद-2/2) (स्कंदोपनिषद-11)<br />
[The perception of oneness (of Parmatma in the Creation) is called (real) Knowledge, the Meditation means the Mind that has turned devoid of subject, the renunciation of (dualistic) filth of Mind is called Bath and the Purity means the (complete) restraint on the sense organs.) (Meitriya Upanishad-2/2) (Skanda Upanishad-11).<br />
देहेन्द्रियेषु वैराग्यं यम इत्युच्यते बुधै:।।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/28)<br />
(देह और इन्द्रियोंके प्रति पूर्ण वैराग्यको प्रबुद्धों यम कहते है।)<br />
अनुरक्ति: परे तत्त्वे सततं नियम: स्मृत:।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/29)<br />
(परमात्म तत्त्वमें निरंतर सहज अनुराग रहे, उसको हि नियम कहते है।)<br />
सर्ववस्तुन्युदासीनभावमासनमुत्तमम्।।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/29)<br />
(सर्व दृश्य पदार्थों प्रति चित्तमें हंमेश सहज उदासीन भाव रहे, उसको हि श्रेष्ठ आसन कहते है।)<br />
जगत्सर्वमिदं मिथ्याप्रतीति: प्राणसंयम:।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/30)<br />
(यह जगत सब प्रकारसे मिथ्या प्रतीत होने लगे, वहि प्राणायाम है।)<br />
चित्तस्यान्तर्मुखीभाव: प्रत्याहारस्तु सत्तम।।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/30)<br />
(चित्तके अंतर्मुखी भावको हि अत्युत्तम प्रत्याहार कहा गया है।)<br />
चित्तस्य निश्चलीभावो धारणा धारणं विदु:।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/31)<br />
(चित्तका अचल भाव धारण करलेना हि धारणा जानी जाती है।)<br />
सोऽहं चिन्मात्रमेवेति चिन्तनं ध्यानमुच्यते।।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/31)<br />
(परमात्मा मैं हि हुँ, ऐसे अविरत चिन्तनको (ध्येयको) हि ध्यान कहते है।)<br />
ध्यानस्य विस्मृति: सम्यक्समाधिरभिधीयते।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/32)<br />
(ध्यान (और ध्याता) की विस्मृति (होकर केवल ज्योतिरुप ध्येय हि बचता है तब उस स्थिति) को सम्यक् समाधि कहते है।)<br />
स्वरुपव्याप्तरुपस्य ध्यानं कैवल्यसिद्धिदम्।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/148)<br />
(अपने अंत:करणमें व्याप्त परमात्म तत्त्वका ध्यान कैवल्य सिद्धिकी प्राप्ति कराता है।)<br />
समाधि: स तु विज्ञेय: सर्ववृत्तिविवर्जित:।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्-2/162)<br />
(सर्व वृत्तियोंके त्यागको समाधि जानी जाती है।)<br />
वेदादेव विनिर्मोक्ष: संसारस्य न चान्यथा। इति विज्ञाननिष्पत्तिर्धृति: प्रोक्ता हि वैदिके:। अहमात्मा न चान्योऽस्मीत्येवमप्रच्युता मति:। (जाबालदर्शनोपनिषद-1/18)<br />
(वेद ज्ञानसे हि मोक्ष प्राप्त होता है, अन्य कोई कारणसे नहीं, ऐसा जो दृढ़ संकल्प है, उसको हि वेदज्ञोंने धृति कहा है। अथवा &#8220;मैं आत्मा हि हुँ, आत्मासे अलग कुछ भी नहीं हुं&#8221;, ऐसी विचलित व होनेवाली मतिको धृति कहते है।)<br />
रागाद्यपेतं ह्रदयं वागदुष्टानृतादिना।<br />
हिंसादिरहितं कर्म यत्तदीश्वरपूजनम्।। (जाबालदर्शनोपनिषद-2/8)<br />
(राग आदि विकारोंसे मूक्त ह्रदय, असत्य भाषन आदि दोषोंसे मूक्त वाणी, हिंसा आदि दोषोंसे मूक्त कर्म हि ईश्वरपूजन है।)<br />
इन्द्रियाणां विचरतां विषयेषु स्वभावत:। बलादाहरणं तेषां प्रत्याहार: स उच्यते। यत्पश्यति तु तत्सर्वं ब्रह्म पश्यन्समाहित:।। प्रत्याहारो भवेदेष ब्रह्मविद्भि: पुरोदित:। (जाबालदर्शनोपनिषद7/1-3)<br />
(विषय भोगोंमें स्वभाववश विचरने वाली सभी इन्द्रियोंको वहाँसे बलपूर्वक पुन: खिंचनेका जो प्रयास है, उसको प्रत्याहार कहा जाता है। मनुष्य जो कंई दिखता है वह सब ब्रह्म ही है, इस तरह जानकर उस ब्रह्ममें चित्त एकाग्र करना हि प्रत्याहार है, ऐसा ब्रह्मवेत्ता कहते है।)<br />
मन: संकल्पकं ध्यात्वा संक्षिप्यात्मनि बुद्धिमान्।<br />
धारयित्वा तथात्मानं धारणा परिकीर्तिता।।<br />
(अमृतनादोपनिषद-16)<br />
(मनको संकल्पात्मक समजकर बुद्धिमान मनुष्य मनका आत्मामें लय करके तथा (लय किये हुए मनको अपने) आत्मामें हि धारण किये रखता है (उसी क्रिया को) धारणा कहते है।)<br />
आगमस्याविरोधेन ऊहनं तर्क उच्यते।<br />
समं मन्येत यल्लब्ध्वा स समाधि प्रकीर्तित:।।<br />
(अमृतनादोपनिषद-17)<br />
(शास्त्रानुकुल शंका उपस्थित करना उसको तर्क कहते है। (ऐसी शंका के मदेनजर भी) जो भी प्राप्त होता है उसमें समभाव रखना हि समाधि कहलाती है।)<br />
तावदेव निरोद्धव्यं ह्रदि यावत्क्षयं गतं ।<br />
एतज्ज्ञानं च मोक्षं च शेषास्तु ग्रंथ विस्तरा ।। (मैत्रायण्युपनिषद-4/3/H) (ब्रह्मबिंदूपनिषद-5)<br />
(मनका ह्रदयमें तबतक ही निरोध करना चाहिये जबतक उनका क्षय (यानि मनकी उन्मनी स्थिति) न हो जाय। (संपूर्ण शास्त्रोंका साररुप) यही ज्ञान है और यही मोक्ष है, बाक़ी सबतो ग्रंथका (बिनजरुरी) विस्तार ही है।)<br />
(Only so long must the mind be confined in the heart, until it is annihilated: this truly is the knowledge as well as liberation; the rest is nothing but pedantic superfluity.)<br />
(जयांसुधी मननो क्षय नथाय त्यांसुधीज ह्रदयमां एनो निरोध करवो जोइए । मात्र आज ज्ञान अने मोक्ष छे बाकी बीजुंतो ग्रंथनो विस्तारज छे । )<br />
चिदचैत्या किलात्मेति सर्वसिद्धान्तसंग्रह:। (महोनिपषद-6/78)<br />
चित् अचैत्या किल आत्मा इति (किल=खरेखर)<br />
(निश्चयपूर्वक विषयरहित हुआ चित्तकोही आत्मा कहागया है।यह समग्र वेदोंके सिद्धान्तों का सार है)<br />
देहस्थमनिलं देहसमुद्भूतेन वह्निना। न्यूनं समं वा योगेन कुर्वन्ब्रह्मविदिष्यते।। (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/55)<br />
(शरीरमें स्थित वायुका (प्राणायाम द्वारा) शरीरमें उत्पन्न हुए अग्निके साथ योग करके उनको न्यून, सम या योग करके ब्रह्मको जाना जा सकता है।)<br />
तस्योर्ध्वे कुण्डलीस्थानं नाभेस्तिर्यगथोर्ध्वत:।। अष्टप्रकृतिरुपा सा चाष्टधा कुण्डलीकृता।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/62-63)<br />
योगकालेन मरुता साग्निना बोधिता सती।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/65)<br />
(योगके अभ्याससे समय आनेपर वायु और अग्निके योगसे वह जाग्रत होती है।)<br />
नासाग्रन्यस्तनयनो दन्तैर्दन्तानसंस्पृशन।।<br />
रसनां तालुनि न्यस्य स्वस्थचित्तो निरामय:।<br />
आकुंचितशिर: किंचिन्निबन्धन्योगमुद्रया हस्तौ।।<br />
प्राणायाम समाचरेत्।।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/92-94)<br />
(नासिकाके अग्रभागपर दृष्टिको जमाकर, दाँतोसे दाँतका स्पर्श न करते हुए, जिह्वाको तालुनिमें लगाकर, स्वस्थ चित्त और निरामय भावसे, शिरको थोड़ासा संकुचन करके, दोनों हाथोंको योगमुद्रामें बाँधकर प्राणायामका अभ्यास करना चाहिये।)<br />
पूरितं कुम्भयेत्पश्चाच्चतु:षष्टया तु मात्रया। द्वात्रिंशन्मात्रया सम्यग्रेचयेत्पिंगलानिलम्।।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/97)<br />
(इसतरह यह चार विधियोंसे वायुको गतिशील करनेकी क्रियाको प्राणायाम कहते है। दाहिने हाथसे नासिकाके छिद्रको दबाकर वायुको पिंगलासे बहार निकालो। त्यारबाद सोलह मात्रामें इड़ा (बाँयी) नासिकासे वायुको भितर खेंचो। बाद 64 मात्रासे कुंभक करो। बाद 32 मात्रासे वायुको पिंगला (दाहिने) नासिका द्वारा बहार निकालो। बादमें 16 मात्रातक वायुको बिना लिये रोकेरखो।<br />
इसतरह बारंबार सीधे उल्टे क्रमसे नियमित अभ्यास करिये।)<br />
ध्यायतो योगिनस्तस्य मुक्ति: करतले स्थिता।। (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/158)<br />
((परब्रह्मका)ध्यान करनेवाले योगीको मूक्ति अपने हाथमें है।)<br />
तपेद्वर्षसहस्त्राणि एकपादस्थितो नर:। एतस्य ध्यानयोगस्य कलां नार्हति षोडशीम्।। (पेंगलोपनिषद-4/21)<br />
(अगर कोइ पुरुष एक पैर पर खड़ा रहकर एक हज़ार वर्षतक तप करता है, फीरभी वह ध्यानयोगकी सोड कलाओं मेंसे एककी भी बराबर नहीं आता।)<br />
तथेन्द्रियकृता दोषा दह्यन्ते प्राणधारणात्।। (अमृतबिंदुपनिषद-7)<br />
(वैसेही समस्त इन्द्रियाँ द्वारा किये दोषों प्राणायाम द्वारा भस्म हो जाते है।)<br />
अहमस्मीत्यभिध्यायेयातीतं विमुक्तये।। (जाबालदर्शनोपनिषद-9/5)<br />
((परमात्मा) मैं स्वयम् ही हूँ , इसतरह किया हुआ ध्यान मोक्ष प्राप्त करानेवाला है।)<br />
ध्यायतो योगिनस्तस्य मुक्ति: करतले स्थिता।। (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/158)<br />
((परब्रह्मका)ध्यान करनेवाले योगीको मूक्ति अपने हाथमें है।)<br />
ध्यानं निर्विषयं मन:। (मैत्रेय्युपनिषद-2/2) (स्कंदोपनिषद-11) (मनका विषयों से रहित हो जाना हि ध्यान है।) (Meditation means a Mind that turned devoid of subject.) (Skanda Upanishad-11) (Meitreya Upanishad-2/2).<br />
अहमस्मीत्यभिध्यायेयातीतं विमुक्तये।। (जाबालदर्शनोपनिषद9/5)<br />
((परमात्मा) मैं स्वयम् ही हूँ , इसतरह किया हुआ ध्यान मोक्ष प्राप्त करानेवाला है।)<br />
स्वसंकल्पे क्षयं याते समतैवावशिष्यते । (महोपनिषद-6/3) (अपने संकल्पोंका क्षय होते ही समत्वभाव ही बाक़ी रहता है।)<br />
सवॅं त्यक्त्वा येन त्यजसि तत्त्यज । (महोपनिषद-6/5-6)<br />
(सबका त्याग करके (अंतमें) जिससे सब छोड़ते हो उनका भी त्याग कर दो।)<br />
यथा निर्वाणकाले तु दिपो दग्ध्वा लयं व्रजेत।<br />
तथा सर्वाणि कर्माणि योगी दग्ध्वा लयं व्रजेत।। (क्षुरिकोपनिषद-23)<br />
(जैसे निर्वाणकालमें ( बूझनेके वक़्त) दीप ज्योति (दिपककी बाट और तैल) सबको जलाकर स्वयं परम प्रकाशमें लीन हो जाती है, वैसे ही योगी अपने सभी कर्मोंको भस्म करके परमात्मामें लीन हो जाता है।)<br />
अमृतत्वं समाप्नोति यदा कामात्प्रमुच्यते।<br />
(क्षुरिकोपनिषद-25)<br />
(जब सर्व कामनाओंका त्याग हो जाता है, तब पुरुष अमृतत्वको प्राप्त हो जाता है।)<br />
तालुमूलोर्ध्वभागे महान् ज्योतिर्मयूखो वर्तते।<br />
तद्योगिभिर्ध्येयम्। तस्मादणिमादिसिद्धिर्भवति।।<br />
(अद्वयतारकोपनिषद-11)<br />
(तालुमूलके उर्ध्वभागमें महान ज्योति किरन मंडल स्थित है। योगी उनका ध्यान करते है। उससे हि अणिमा विगेरह सिद्धियाँ प्राप्त होती है।)</p>
<p>MIND<br />
यदेतत् ह्रदयं मनश्चैतत्। (ऐतरयोपनिषद-3/1/2) (जो यह ह्रदय है, मन भी वही है।)<br />
मनो ह वा आयतनम्। (छांदोग्योपनिषद 5/1/5) (अवश्य मन ही आयतन (आश्रय)शरीर है)<br />
प्राणबंधनं हि सोम्य मन । (छांदोग्योपनिषद-6/8/2)<br />
(हे सौम्य! मन प्राणरुप बंधनवाला है)<br />
एष एव मनोनाशस्त्वविद्यानाश एव च। (महोपनिषद-4/109)<br />
(जो मनका विनाश है, उसको ही अविद्याका नाश कहा जाता है।)<br />
मन: समुदितं परमात्मतत्त्वात्। (महोपनिषद-5/52)<br />
(मन परमात्मा में से उत्पन्न हुआ है।)(महोपनिषद-5/52)<br />
(The Mind has born out of Parmatma.)<br />
(Maha Upanishad-5/52).<br />
मनसो विजयान्नान्या गतिरस्ति भवार्णवे। (महोपनिषद-5/76)<br />
(यह संसारसागरमें मनके पर विजय प्राप्त करनेके अलावा (जीवनका) और कोई ध्येय नहीं है।)<br />
भृत्योऽभिमतकर्तृत्वान्मन्त्री सर्वार्थकारणात्।<br />
सामन्तश्चेन्द्रियान्क्रान्तेर्मनो मन्ये विवेकिन:।। (महोपनिषद-5/79)<br />
(विवेकशील मनुष्यों अपने मनको अभिष्टकी सिद्धिके लिये सेवककी तरह, सभी प्रयोजनोंकी पूर्ति हेतु मंत्रीकी तरह और इन्द्रियों पर नियंत्रणके लिये सामंतरुप बना लेते है ऐसा मैं मानता हुँ ।)<br />
मनोबुद्धिरहंकारश्चित्तमित्यन्तःकरणचतुष्टयम् । (शारीरकोपनिषद-4)<br />
(मन बुद्धि चित और अहंकार यह चारोंका समूह अंतःकरण कहलाता है। )<br />
मनःस्थानं गलान्तं बुद्धेवॅदनमहंकारस्य ह्रदयं चित्तस्यनाभिरिति । (शारीरकोपनिषद-4)<br />
(मनका स्थान कंठका अंतिम भाग, बुद्धिका स्थान मुख, चित्तका स्थान नाभी अौर अहंकारका स्थान ह्रदय कहलाता है।)<br />
बुद्धिकर्मेन्द्रियप्राणपंचकैर्मनसा धिया। शरीरं सप्तदशभि: सुसूक्ष्मं लिंगमुच्यते।। (शारीरकोपनिषद-16)<br />
(ज्ञानेन्द्रिय (पाँच), कर्मेन्द्रि (पाँच), पांच प्राण, मन और बुद्धि यहसतरहका सत्रहका समूह सूक्ष्म शरीर लींग शरीर कहलाता है)<br />
अग्निर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राभियुज्यते।<br />
सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मन:।। (श्वेताश्वतरोपनिषद-2/6)<br />
(जहाँ अग्निका मंथन होता है, जहाँ प्राणवायुका विधिवत निरोध होता है, जहाँ सोमरसका प्रचुर आनंद प्रगट होता है, वहाँ मन हंमेशा शुद्ध हो जाता है।)<br />
मन अेव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयौ: ।<br />
(मन ही मनुष्यके बन्धन या मूक्तिका कारणरुप है।)<br />
(ब्रह्मबिंदुउपनिषद-2) (मैत्रायण्युपनिषद-4/3/K)<br />
तावदेव निरोद्धव्यं ह्रदि यावत्क्षयं गतं मनो।<br />
एतज्ज्ञानं च मोक्षं च शेषास्तु ग्रंथ विस्तरा।। (ब्रह्मबिंदूपनिषद-5)<br />
(मनका ह्रदयमें तबतक ही निरोध करना चाहिये जबतक उनका क्षय (यानि मनकी उन्मनी स्थिति) न हो जाय। (संपूर्ण शास्त्रोंका साररुप) यही ज्ञान है और यही मोक्ष है, बाक़ी सबतो ग्रंथका (बिनजरुरी) विस्तार ही है।)<br />
यदा पंचावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह।<br />
बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहु: परमां गतिम्।। (कठोपनिषद-2/3/10)<br />
(जब मनके साथ पाँचो ज्ञानेन्द्रिय (आत्मतत्वमें) स्थिर हो जाती है, और बुद्धिभी चेष्टा रहित हो जाती है, तब वह परम स्थिति कहलाती है।)<br />
मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन। मृत्यौ: स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति।।<br />
(कठोपनिषद-2/2/11)<br />
मनसैवानुद्रष्टव्यं नेह नानास्ति किंचन।<br />
मृत्यौ: स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति।।<br />
(बृहदारण्यकोपनिषद-4/4/19)<br />
MOKSHA<br />
भिद्यते ह्रदयग्रन्थि छिद्यन्ते सवॅसंशया: ।<br />
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ।।(मुंडकोपनिषद-2/2/8)(महोपनिषद-4/82)(सरस्वतीरहस्योपनिषद-67)<br />
(जब साधक प्रकृतिविषयक समझ को आत्मसात कर लेता है, तो उसके सब संशयों का निराकरण हो जाता है, उसके सब कर्मों क्षीण हो जाते है, उसका सूक्ष्म शरीर का विभाजन हो जाता है, (जो तुरन्त हि उसको कैवल्य को उपलब्ध करा देता है।)(मुंडकोपनिषद-2/2/8)(महोपनिषद-4/82)(सरस्वतीरहस्योपनिषद-67)<br />
[When the seeker assimilates the understanding about the Nature, then all his doubts get allayed, all his actions get waned, his Subtle Body gets disunited, (which instantly avails him to Keivalya)]
(Mundaka Upanishad-2/2/8).<br />
(Maha Upanishad-4/82). (Saraswatirahasya Upanishad-67)<br />
सत्कर्मपरिपाकतो बहुनां जन्मनामन्ते नृणां मोक्षेच्छा जायते। (पेंगलोपनिषद-2/17)<br />
(बहुत जन्मोंके बाद जब सदकार्योंका फल मिलता है, तब मोक्षकी इच्छा पेदा होती है।)<br />
तस्मान्मुमुक्षुभिर्नैव मतिर्जीवेशवादयो:।<br />
कार्या किंतु ब्रह्मतत्त्वं निश्चलेन विचार्यताम्।। (महोपनिषद-4/75)<br />
(अत: जो पुरुष मोक्षकी आकांक्षा रखता है, वह जीव-ईश्वरके विवादमें अपनी बुद्धिको भ्रमित न करते हुए द्रढतासे ब्रह्मतत्त्वका ही चिंतन करे)<br />
यथा फेनतरंगादि समुद्रादुत्थितं पुन: समुद्रे लीयते। तद्वज्जगन्मय्यनुलीयते।। (जाबालदर्शनोपनिषद-10/6)<br />
(जैसे समुद्रसे उत्पन्न फिण और लहरें वापस समुद्रमें विलीन हो जाते है, वैसे ही जगत (मेरेमेंसे उत्पन्न होकर) मेरेमें ही विलीन हो जाता है।)<br />
वेदादेव विनिर्मोक्ष: संसारस्य न चान्यथा। (जाबालदर्शनोपनिषद-1/18)<br />
(ज्ञानसे ही संसार से मोक्ष (मिलता) है और अन्य कीसी (मार्ग) से नहीं।) (जाबालदर्शनोपनिषद-1/18)<br />
(The Salvation from the Sansaar happens through the Knowledge only and not through any other (recourse).(Jabaladarshana Upanishad-1/18)<br />
अज्ञानादेव संसारो ज्ञानादेव विमुच्यते। (योगतत्वोपनिषद-16)<br />
(अज्ञानसे हि संसार है, ज्ञानसे ही (संसारसे) मूक्ति हो जाती है)(योगतत्वोपनिषद-16)<br />
(It is because of Ignorance that the Sansaar survives, the Knowledge instantly liberates (from the Sansaar). (Yogatattva Upanishad-16).<br />
किं ब्रह्मस्वरुपमिति। अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति ये विदुस्ते पशवो। तमेवं ज्ञात्वा विद्वान्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते नान्य: पन्था विद्यतेऽयनाय।। (नारद परिव्राजकोपनिषद-9/1) (श्वेताश्वतरोपनिषद-3/8)<br />
[(ब्रह्माजीने नारदजीको कहा:) ब्रह्म का स्वरुप (हमारे अपने स्वरुप से।) और क्या है? ब्रह्म दूसरा है और मैं दूसरा हूँ, इस प्रकार जो जानता है, वह पशु है; जो स्वभाव से पशु योनि में उत्पन्न हैं, केवल उन्हीं का नाम पशु नहीं है। उन परमात्मा को इस प्रकार (सर्वात्मा और सर्वरूप) जानकर विद्वान लोग मृत्युके मुख से (सदा के लिए) छूट जाते है। (इस ब्रह्म ज्ञान) के सिवा दूसरा कोई मार्ग मोक्ष की प्राप्ति करानेवाला नहीं है।] (नारद परिव्राजकोपनिषद-9/1) (श्वेताश्वतरोपनिषद-3/8)<br />
[(Brahma Ji replies to Narad Ji:) what else is the form of Parmatma (other than our own form)? Not that who has naturally born in the specie of beast is only a beast; but one who deduces that he and Parmatma are separate from each other is also a beast. The erudite having known Parmatma thus (as all beings together and assuming all forms), frees oneself from the mouth of death. There happens no recourse that is availing Salvation, other than this (Knowledge of Parmatma)]. (Naradaparivrajaka Upanishad- 9/1)(Shwetashwatara Upanishad-3/8).<br />
ब्रह्मविदाप्नोति परम्। (तैत्तिरीयोपनिषद-2/1/1) (ब्रह्मवेत्ता परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है। )<br />
मनोविकल्पसंजातं तद्विकल्पपरिक्षयात् क्षीयते संसारो। (महोपनिषद-2/34)l<br />
(मनके विकल्पमेंसे संसारिक प्रपंचका प्रादुर्भाव होता है, और विकल्पका नाश होते ही इस प्रपंचका भी नाश हो जाता है।)<br />
असंशयवतां मुक्तिः संशयाविश्टचेतसाम् नमुक्तिजॅन्मजन्मान्ते । (मैत्रेय्युपनिषद-2/16)<br />
जे संशय रहित छे ते मुक्ति मेलवी लेँछे । जेने संशयछेते अनेक जन्मोना अंते पण मुक्ति मेलवी शक्ता नथी। )<br />
करतलामलकवत्साक्षादपरोक्षीकृत्य । (वज्रसूचिकोपनिषद-9)<br />
अपरोक्ष अनुभूति (मूक्ति) हथेलीमें रखा आमला (देखना) सरल है, (उतनी सरल है)) Experiencing Realisation to of God is as easy as to behold an Aamla in hand-(Vrajsoochikopanishad-9).<br />
देहाभिमान गलिते विज्ञाते परमात्मनि। (सरस्वतीरहस्योपनिषद-66)<br />
(देहाभिमान नष्ट होनेसे अपनेमें ही परमात्माकी अनुभूति संप्राप्त होती है।)<br />
मयि जीवत्वमीशत्वं कल्पितं वस्तुतो न हि। इति यस्तु विजानाति स मुक्तो नात्र संशय:।।<br />
(सरस्वतीरहस्योपनिषद-68)<br />
(मेरेमें जीवत्व-इशत्वका भेद कल्पित है, वास्तवमें नहीं है। यह जो जान लेता है, वह मूक्त ही है; इसमें कोई संशय नहीं है।)<br />
आत्मेश्वरजीवोअनात्मनां देहादीनामात्मत्वेनाभिमन्यतेसोअभिमान आत्मनो बंन्धः। तन्निवृत्तिर्मोक्ष: ।<br />
(सवॅसारोपनिषद-2)<br />
(आत्मा ईश्वर छे अनात्म भाव जीवछे । देहादि विगेरेमां आत्मापणुं मानवुं अेज पोतानुं बंधनछे । तेनी निवृत्ति ज मोक्षछे ।)<br />
यदा पंचावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह।<br />
बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहु: परमां गतिम्।। (कठोपनिषद-2/3/10)<br />
(जब मनके साथ पाँचो ज्ञानेन्द्रिय (आत्मतत्वमें) स्थिर हो जाती है, और बुद्धिभी चेष्टा रहित हो जाती है, तब वह परम स्थिति कहलाती है।)<br />
संसाराडम्बरमिदं कथमभ्युत्थितं मुने। कथं च प्रशमं याति। (महोपनिषद-2/15)<br />
(शुकदेवजी व्यास भगवान से पूछते है की हे मुनी! यह जगतरुपी प्रपंचका प्रगट्य कैसे हुआ और यह कैसे नाश हो जाता है?।)<br />
संसाराडम्बरमिदं कथमभ्युत्थितं गुरो। कथं च प्रशममायाति। (महोपनिषद-2/30)<br />
(शुकदेवजी जनक राजा से पूछते है की हे गुरुवर्य! यह जगतरुपी प्रपंचका प्रगट्य कैसे हुआ और यह कैसे नाश हो जाता है?।)<br />
मनोविकल्पसंजातं तद्विकल्पपरिक्षयात् क्षीयते संसारो। (महोपनिषद-2/34)<br />
(मनके विकल्पमेंसे संसारिक प्रपंचका प्रादुर्भाव होता है, और विकल्पका नाश होते ही इस प्रपंचका भी नाश हो जाता है।)<br />
रज्जुबद्धा विमुच्यन्ते । तृष्णाबद्धा न केनचित्।।(महोपनिषद-6/39)<br />
(दोरडीथी बंधायेल छूटी जाय परंतु तृष्णाथी बंधायेलकोइरीते नहिं)<br />
तेषामेव पुनर्भवनं नो इहास्ति। स यथा मृत्पिंडे घटानां तन्तौ पटानां तथैवेति भवति।।(स्वसंवेद्योपनिषद1A)<br />
[(जो ब्रह्मलीन हुए है) उसका इस जगत में पुनर्जन्म नहीं होता।उसकी स्थिति, जैसे माटी के पिंड में कुंभकी और तंतुओंमें कपड़े की होती है, वैसी ही होती है।) (स्वसंवेद्योपनिषद1A)<br />
[Those ( who have been absorbed in Parmatma,) don’t have rebirth in this world. Their position is just like as the earthen pot has in the lump of soil and the cloth has in the yarns](Svasanvedya Upanishad-1A)<br />
PARA VIDYA AND APARA VIDYA<br />
न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति। (छांदोग्योपनिषद -6/1/1)<br />
(हमारे कुलमें जन्म लेनेवाला बालक ब्रह्मविद्याके बिना अध्ययन किये ब्राह्मण नहीं बनता)<br />
येनाश्रुतंश्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति स उपदेशो भवतीति।(छांदोग्योपनिषद -6/1/3) (( पिता उदालने पुत्र श्वेतकेतुसे पूछा:) जीस उपदेशके द्वारा अश्रुत श्रुत हो जाता है, मनन नहीं किया है वह मननीय और अज्ञानी विशेष ज्ञानी हो जाता है, वह उपदेश तुमने प्राप्त कर लिया है?).<br />
कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सवॅमिदं विज्ञातं भवतीती । (मुंडकोपनिषद-1/1/3)<br />
हे भगवान अेवुं शुं छे जे जाणी लेवाथी बधुंज जाणीलीधेलुं थइ जायछे ।<br />
&#8220;Oh Lord, what is that which if known, then what is unknown, also becomes known&#8221;?<br />
अन्यविद्यापरिज्ञानमवश्यं नश्वरं भवेत्।<br />
ब्रह्मविद्यापरिज्ञानं ब्रह्मप्राप्तिकरं स्थितम्।। (शुकरहस्योपनिषद-44)<br />
(अन्य विद्याका अच्छी तरहसे प्राप्त किया हुआ ज्ञान, अवश्य नश्वर है; किंतु ब्रह्मविद्याका अच्छी तरह प्राप्त किया हुआ ज्ञान ब्रह्म प्राप्तिमें समर्थ है।)<br />
PARMATMA CANNOT BE REALISED THROUGH EPHEMERAL APPLICATIONS.<br />
न ह्यध्रृवै: प्राप्यते हि ध्रुवं तत्। (कठोपनिषद-1/2/10) ( नश्वर साधनोसे उस अनश्वरकी प्राप्ति नहि हो शक्ती)<br />
&#8220;What is immortal can’t be achieved by the mortal applications&#8221;. (Katha Upanishad-1/2/10.)<br />
PARMATMA LIVES IN MURDHANI, BRAHMRANDHRA.<br />
प्रत्यगानन्दरुपात्मा मूध्निॅ स्थाने परे पदे । (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/9)<br />
(प्रत्यक आनन्दमय आत्मानु परम पद मूर्धा स्थानछे ।)<br />
स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत। सैषाविदृतिर्नाम द्वारस्तदेतन्नान्दनम्। तस्य त्रय आवसथास्त्रय:स्वप्ना अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथइति।। (ऐतरयोपनिषद-1/3/12)<br />
(वह परमात्मा मानव शरीरकी सीमा मूर्धा (ब्रह्मरंध्र)कोचीरकर (विदीर्ण करके) उसमें प्रवेश हो गये। विदीर्णकरनेसे उसको विदृति नामका द्वार कहा जाता है, यहद्वार आनंदरुप परमात्माकी प्राप्ति कराता है। उसपरमात्माके तीन आश्रय स्थान है और तीन स्वप्न है।यही उसका आवास स्थल है यही उसका आवासस्थल है यही उसका आवास स्थल है)<br />
(Three places: Body, Nature, Inexhibitive)<br />
(शरीर। प्रकृति। अव्यक्त)<br />
(Three dreams: make efforts through body, get tuned with the Nature, and prepare for the voyage to inexplicable)<br />
ब्रह्मांडब्रह्मरन्ध्राणि समस्तव्यष्टिमस्तकान्विदार्य तदेवानुप्राविशत्। (पेंगलोपनिषद-1/11).<br />
(वह (ब्रह्म) समस्त व्यष्टिके मस्तकको चिरके ब्रह्मांड-ब्रह्मरंध्रसे उसमें ही प्रवेश कर गये।)</p>
<p>PARMATMA RULES OVER THE ENTIRE NATURE<br />
य एको जालवानीशत ईशनीभि: सर्वांल्लोकानीशत ईशनीभि:।<br />
य एवैक उद्भवे संभवे च य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति।। (श्वेताश्वतरोपनिषद-3/1)<br />
( जो एक मायापति, अपनी प्रभुता संपन्न शक्तियोंद्वारा संपूर्ण लोकोंपर शासन करता है, जो अकेला ही सृष्टिकी उत्पत्ति और विकासके लिये समर्थ है, उस (परम पुरुष)को जो विद्वान जान लेता है वह अमर हो जाते है।)<br />
भीषाऽस्माद्वातः पवते । भीषोदेति सूयॅ:।भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पंचम इति । (तैत्तिरीयोपनिषद-2/8/1)<br />
(उसके भयसे वायु वाता है, उसके ही भयसे सूर्य निकलता है, और उनके ही भयसे अग्नि, इन्द्र और पाँचवा मृत्यु दौड़ता है।)<br />
भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्य:।<br />
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पंचम:।। (कठोपनिषद-2/3/3)<br />
PRAKRUTI, NATURE<br />
ल्लोहितशुक्लकृष्णगुणमयी गुणसाम्यानिर्वाच्या मूलप्रकृतिरासीत्। (पेंगलोपनिषद-1/3)<br />
(जिसका वर्णन नहीं हो सक्ता है, जिसमें सत्त्व, रजस और तमस तीनों गुण की साम्यावस्था (बनाये रखने का तंत्र) है वैसी मूलप्रकृति (ब्रह्ममेंसे) उत्पन्न हुइ।) “This primordial Nature, which is beyond the description in the words, which has (a System that maintains) the equanimity of Sattva, Rajas, and Tamas Gunas; was born (from the Parmatma)”. (Pengal Upanishad-1/3).<br />
प्रकृतित्वं तत: सृष्टं सत्त्वादिगुणसाम्यत:। (सरस्वती रहस्योपनिषद-47) (तत् पच्याद् सत्त्व, रजस, तमस गुणके साम्यावस्था (बनाये रखने का तंत्र) वाली यह प्रकृतिकी रचना संपन्न हुई।). “Then the creation of this Nature was accomplished, which has (a System that maintains) the equanimity of Sattva, Rajas, and Tamas”. (Saraswati Rahasya Upanishad-47)<br />
सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृति:।। (सांख्यदर्शन-1/61). (प्रकृति; (तीनों गुण) सत्त्व, रजस और तमसकी साम्यावस्था (बनाये रखने का तंत्र) है।) (The Nature (is a System that maintains) the equality of (Three Gunas) Sattva, Rajas, and Tamas). (Sankhyadarshan-1/61.).<br />
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तुमहेश्वरम्।<br />
तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत्।।(श्वेताश्वतरोपनिषद-4/10)<br />
(प्रकृतिको तुम माया समजो और महेश्वरको मायापति। उसकेही अंगभूतोंसे यह समग्र विश्व व्याप्त है।) (श्वेताश्वतरोपनिषद-4/10)<br />
(You should find the Nature as Maya (illusion) and Maheshwar as conjurer. This entire universe prevails with their components.) (Shwetashwatar Upanishad-4/10.)<br />
माया नाम अनादिरन्तवती प्रमाणाप्रमाणसाधारणा न सती नासती न सदसती स्वयमधिका विकाररहिता निरुप्यमाणा सतीतरलक्षनशून्या सा मायेत्युच्यते।अज्ञानं तुच्छाप्यसती कालत्रयेऽपि पामराणां वास्तवी च सत्त्वबुद्धिर्लौकिकानामिदमित्यनिवॅचनीया वक्तुं न शक्यते।। (सवॅसारोपनिषद-15)<br />
(माया नाम अनादि है, विनष्टप्राय है। वह न सत है, न असत है और नहीं सतअसत है। वह स्वयं ही अधिका है, विकार रहिता है।जैसे कि अन्य लक्षणों से रहित है ऐसा निरुपण हो सकता है, उसे माया ऐसा कहा जाता है। यह मायाशक्ति तुच्छ, अज्ञानरुप और मिथ्या भी है, फिर भी मूढ़ों को जैसे कि वह तीनों कालों में (हंमेशा) वास्तविक है, ऐसी दिखती है।अत: “वह इस प्रकारकी है”, ऐसा सुनिश्चितया बताना शक्य नहीं है।) (सवॅसारोपनिषद-15)<br />
सा पुनर्विकृतिं प्राप्य सत्त्वोद्रित्त्काऽव्यक्ताख्यावरणशक्त्तिरासीत्। तत्प्रतिबिम्बितं यत्तदीश्वरचैतन्यमासीत्।<br />
प्राणीकर्मवशादेष पटो यद्वत् प्रसारित: प्राणीकर्मक्षयात् पुनस्तिरोभावयति। (पेंगलोपनिषद-1/4)<br />
( जब वह ( प्रकृति) फिरसे विकार युक्त हो गइ तो उसे स्त्त्वगुणयुक्त अव्यक्त आवरण शक्ति कहा जाने लगा। उसमें जो चैतन्य प्रतिबिम्बित हुआ वह ईश्वर है। वह ईश्वर प्राणीओंके कर्मानुसार (फल देने हेतु जरुरत पडनेपर) यह विश्वरुपी पटको वस्त्रकी तरह प्रसारते है, और कर्म नष्ट होनेपर (जरुरत न रहनेपर यह विश्वरुपी पटको वस्त्रकी तरह ) सिमट भी लेते है।)<br />
स्त्रष्टुकामो सूक्ष्मतन्मात्राणि भूतानि स्थूलीकर्तुं सोऽकामयत। (पेंगलोपनिषद-1/7)<br />
(सृष्टिकी रचना हेतु (ईश्वरने) सूक्ष्म तन्मात्राओंको स्थूल पंतत्त्वोंमें स्थापित करनेकी कामना कि।)<br />
चैतन्यं ब्रह्म । ब्रह्मैव स्वशक्तिं प्रकृत्यभिधेयामाश्रित्य लोकान्सृष्टवा प्रविश्यान्तर्यामीत्वेन ब्रह्मादिनां बुद्धिन्द्रियनियन्तृत्वादीश्वरः। (निरालंबोपनिषद-4)<br />
(चैतन्य ब्रह्म है । यह ब्रह्म जब अपनी प्रकृति (शक्ति)के सहारे लोकोंका सजॅन करते है अौर अंतर्यामीरुपे इसमें प्रवेश करके ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा बुद्धि और इन्द्रियोंको वशमें करते है, तब ईश्वर कहलाते है ।)<br />
प्रकृतिरिति च ब्रह्मण: सकाशान्नाविचित्रजगन्निर्माणसामर्थ्यबुद्धिरुपा ब्रह्मशक्तिरेव प्रकृति:।। (निरालंबोपनिषद-6)<br />
(प्रकृति इसको कहते है, जो ब्रह्मके सान्निध्य मात्रसे भिन्न-भिन्न विचित्र जगतके निर्माणके सामर्थ्यकलारुप है। ब्रह्मकी जो शक्ति है, वही प्रकृति है।)<br />
अष्टप्रकृतिरुपा सा कुण्डली मुनिसत्तम।। (जाबालदर्शनोपनिषद-4/11)<br />
(हे मुनि कुंडलिनीको अष्ट प्रकृति रुपा (पृथ्वी, जल, तेज़, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार युक्त) कही जाती है।)<br />
शरीरं षण्णवत्यगुंलात्मकं भवति। शरीरात्प्राणो द्वादशांगुलाधिको भवति।। (शाण्डिल्योपनिषद-1/4/2).<br />
(शरीर छीया नब्बे अंगुली प्रमाणका है। प्राण शरीरसे बारह अंगुली प्रमाण ज़्यादा बड़ा होता है।)<br />
(The length of human body is 96 fingers and the measurement of Vital forces or Pranas from body is 12 fingers.)(Shandilya Upanishad-1/4/2)<br />
देहमानं स्वांगुलिभि: षण्णवत्यअंगुलायतम्। प्राण: शरीरादधिको द्वादशाअंगुलमानत:। । (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/54)<br />
(मनुष्य देहका माप अपनी 96 अंगुलीओं के बराबर होता है।शरीरसे 12 अंगुलीओं ज़्यादा माप प्राणका होता है)<br />
(The length of human body is 96 fingers and the measurement of Vital forces or Pranas from body is 12 fingers.) (Trishikh Brahman Upanishad-2/54)<br />
नाभेस्तिर्यगध ऊर्ध्वं कुण्डलिनी स्थानम्। अष्टप्रकृतिरुपाऽष्टधा कुण्डलीकृता कुण्डलिनी शक्तिर्भवति।। (शाण्डिल्योपनिषद-1/4/8).<br />
(नाभीसे तीरछी नीचे उपर कुण्डलिनी क्षेत्र आया हुआ है। अष्ट प्रकृतिरुपा कुण्डलिनीशक्ति आठ कुंडली बनाकर रही हुइ है।)<br />
तस्योर्ध्वे कुण्डलीस्थानं नाभेस्तिर्यगथोर्ध्वत:।। अष्टप्रकृतिरुपा सा चाष्टधा कुण्डलीकृता।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/62-63)<br />
योगकालेन मरुता साग्निना बोधिता सती।<br />
(त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद-2/65)<br />
सुषुम्नाया: सव्यभागे इड़ा तिष्ठति। दक्षिणभागे पिंगला। इडाया चन्द्रचरति। पिंगलाया रवि:। तमोरुपश्चंन्द्र:। रजोरुप रवि:।। (शाण्डिल्योपनिषद-1/4/11).<br />
(सुषुम्णा नाड़ीके बाँयी और इड़ा नामकी और दाहिनी और पिंगला नामकी नाडी रही है। इड़ामें चन्द्र और पिंगलामें सूर्य संचरित होता है। चन्द्र तमोरुप और सूर्य रजोरुप है।)<br />
प्रकृत्यष्टकरुपं च स्थानं गच्छति कुण्डली। (योगकुण्डल्युपनिषद-1/74)<br />
(और इसतरह यह अष्टधारुप (पंच तत्त्वों और मन, बुद्धि अहंकार) कुंडलिनी शक्ति स्थानकी और गती करती है।)<br />
सुषुम्नाया इड़ा सव्ये दक्षिणे पिंगला स्थिता। (जाबालदर्शनोपनिषद-4/13)<br />
(सुषुम्नाके बांये भागमें इड़ा और दाहिने भागमें पिंगला रही हुइ है।)<br />
सुषुम्नाया: शिवो देव उड़ाया देवता हरि: पिंगलाया विरंचि। (जाबालदर्शनोपनिषद-4/36)<br />
अग्निं विद्धि त्वमेतन्निहितं गुहायाम्।। (कठोपनिषद-1/1/14)<br />
((नचिकेत संसारकी आधाररुप) इस अग्निको तुम गुफ़ामें (गुप्त) रही हुइ समजो)<br />
चित्तका स्थान नाभी है। नाभीको गुफ़ाभी कहा जाता है। कुंडलीनीका स्थान भी नाभी कहा जाता है जो विश्वउर्जा का रुप कही जाती है। यहाँ यम नचिकेतको यह कुंडलिनी विद्या दे रहे है।<br />
ल्लिंगशरीरं ह्रदयग्रन्थिरित्युच्यते। (सवॅसारोपनिषद-7) (लिंग शरीरको ही ह्रदयग्रंथी कहते है।)<br />
बुद्धिकर्मेन्द्रियप्राणपंचकैर्मनसा धिया। शरीरं सप्तदशभि: सुसूक्ष्मं लिंगमुच्यते।। (शारीरकोपनिषद-16)<br />
(ज्ञानेन्द्रिय (पाँच), कर्मेन्द्रि (पाँच), पांच प्राण, मन और बुद्धि यहसतरहका सत्रहका समूह सूक्ष्म शरीर लींग शरीर कहलाता है)<br />
पृथिव्यादिमहाभूतानां समवायं शरीरं। (शारीरकोपनिषद-1)<br />
(पृथ्वि आदी पाँच महाभूतोनो समुदाय आ शरीरछे । )<br />
तदेव स्थूलशरीरम्। कर्मेन्द्रियै: सह प्राणादिपंचकं प्राणमयकोश:। ज्ञानेन्द्रियै: सह मनो मनोमयकोश:। ज्ञानेन्द्रियै: सह बुद्धिर्विज्ञानमयकोश:। एतत्कोशत्रयं लिंगशरीरम्। स्वरुपाज्ञानमानन्दमयकोश:। तत् कारणशरीरम्।। (पेंगलोपनिषद-2/4)<br />
(यही स्थूल शरीर है। कर्मेन्द्रियोंके साथ पाँच प्राण मिलकर प्राणमयकोश, ज्ञानेन्द्रियोंके साथ मन मिलकर मनोमयकोश, और ज्ञानेन्द्रियोंके साथ बुद्धि मिलकर विज्ञानमयकोश बनता है। यही तीनों कोश मिलकर लिंग शरीर बनता है। जहाँ अपनेका बोध नहीं रहता वह आनन्दमयकोश है, उसको ही कारण शरीर कहते है।)<br />
मनोबुद्धिरहंकारश्चित्तमित्यन्तःकरणचतुष्टयम् । (शारीरकोपनिषद-4)<br />
(मन बुद्धि चित और अहंकार यह चारोंका समूह अंतःकरण कहलाता है। )<br />
मनःस्थानं गलान्तं बुद्धेवॅदनमहंकारस्य ह्रदयं चित्तस्यनाभिरिति । (शारीरकोपनिषद-4)<br />
(मननुं स्थान गलानो छेल्लो भाग बुद्धिनुं स्थान मुख चित्तनुंस्थान नाभी अने अहंकारनुं स्थान ह्रदय कहेवायछे । )<br />
प्रकृतित्वं तत: सृष्टं सत्त्वादिगुणसाम्यत:। (सरस्वती रहस्योपनिषद-47) (तत् पच्याद् सत्त्व, रजस, तमस गुणके साम्यावस्था वाली यह प्रकृतिकी रचना संपन्न हुई।). (सरस्वती रहस्योपनिषद-47) (Then the creation of Nature, which has the equanimity of Sattva (existence or Neutron), Rajas (procreation or Proton), and Tamas (eliminating or Electron); was completed). (Saraswati Rahasya Upanishad-47)<br />
जगत्कर्तुमकर्तु वा चान्यथा कर्तुमीशते। (सरस्वतीरहस्योपनिषद-51)<br />
(परमात्मा जगतकी रचना करने न करने और उनसे अलग कुछभी करने समर्थ है)<br />
शक्तिद्वयं हि मायाया विक्षेपावृतिरुपकम्। विक्षेपशक्तिर्लिंगादि ब्रह्माण्डान्तं जगत्सृजेत्।।<br />
अन्तर्द्रृग्दृश्ययोर्भेदं बहिश्च ब्रह्मसर्गयो:। आवृणोत्यपरा शक्ति: सा संसारस्य कारणम्।।<br />
(सरस्वतीरहस्योपनिषद-52-53)<br />
(विक्षेप और आवरण नामक मायाकी दो शक्तियाँ है। विक्षेप शक्ति लींगदेहसे ब्रह्मांड पर्यन्त जगतकी संरचना करती है। आवरण नामक अपरा शक्ति अंदरके दृष्टा-दृश्यके भेदको और बहारके परमात्मा-सृष्टिके भेदको आवृत करती है। यह आवरण शक्ति ही संसारके बंधनका कारण है।)<br />
अस्ति भाति प्रियं रुपं नाम चेत्यंशपंचकम् ।<br />
आद्यत्रयं ब्रह्मरुपं जगद्रूपं ततो द्वयम् । (सरस्वतीरहस्योपनिषद-58)<br />
(अस्ति (है), भाति (आभास होता है), प्रिय (आनंदस्वरुप) , रुप अौर नाम यह पाँच अंश कहे गये है । पहेले तीन ब्रह्म रुप अौर पीछले दो जगतरुप कहे गये है । )<br />
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तुमहेश्वरम्।<br />
तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत्।।(श्वेताश्वतरोपनिषद-4/10)<br />
(प्रकृतिको तुम माया समजो और महेश्वरको मायापति। उसकेही अंगभूतोंसे यह समग्र विश्व व्याप्त है।)<br />
तमोमायात्मको रुद्र: सात्विकमायात्मको विष्णू राजसमायात्मको ब्रह्मा।<br />
(पाशुपतब्राह्मणोपनिषद-पूर्वकांड-10)<br />
(रुद्र तमोगुणी मायारुप है, विष्णु सत्त्वगुणी मायारुप है और ब्रह्मा रजोगुणी मायारुप है।)<br />
(The Shiva is Tamas part of Nature, Vishnu is Sattva part of Nature and Brahma is Rajas part of Nature.)<br />
राजसोंअशोअसौ ब्रह्मा: तामसोंअशोअसौ रुद्र: सात्त्विकोंअशोअसौ स एव विष्णुः । (मैत्रायण्युपनिषद-4/5)(<br />
(उस परमात्माके रजोगुण अंशको ब्रह्मा, तमोगुण अंशको रुद्र और सत्त्वगुण अंशको विष्णु कहते है।) (मैत्राण्युपनिषद-4/5)<br />
(The Parmatma’s Rajas part is known as Brahma, Tamas part is known as Shiva and Satva part is known as Vishnu- Meitrannyyu Upanishad-4/5).<br />
(अे परमात्माना रजोगुण अंशने ब्रह्मा तमोगुण अंशने रुद्रसत्वगुण अंशने विष्णु कहेवायछे । )<br />
सर्वदाऽनविच्छिन्नं परं ब्रह्म तस्माज्जाता परा शक्ति: स्वयंज्योतिरात्मिका।आत्मन आकाश: संभूत:।आकाशाद्वायु:।वायोरग्नि:।आग्नेराप:।अद्भय: पृथिवि।।(योगचूडामण्युपनिषद-72)<br />
राजसो ब्रह्मा सात्विको विष्णुस्तामसो रुद्र इति एते त्रयो गुणयुक्ता:।।(योगचूडामण्युपनिषद-72)<br />
(मैत्राण्युपनिषद-4/5)(पाशुपतब्राह्मणोपनिषद-पूर्वकांड-10)</p>
<p>RICE AND PADDY<br />
तुषेण बद्धो व्रिहि: स्यात्तुषाभावेन तन्डुल: । (स्कंदोपनिषद-6)<br />
(फोतराथी बद्धछेतो डांगर अने जो फोतरानो अभावछेतोचोखा । )<br />
तांडुलस्य यथा चमॅ पुरुषस्य तथा मलं सहजम् ।नश्यति क्रियया न संदेह ।। (महोपनिषद-5/185-186)<br />
(जेवीरीते चोखाने फोतरुं होयछे तेम माणसने अविद्यासहजज होयछे । योग्य क्रियाथी तेनो नाश थइ शकेछेतेमां संदेह नथी । )</p>
<p>SUBTLE BODY ETC<br />
तदेव स्थूलशरीरम्। कर्मेन्द्रियै: सह प्राणादिपंचकं प्राणमयकोश:। ज्ञानेन्द्रियै: सह मनो मनोमयकोश:। ज्ञानेन्द्रियै: सह बुद्धिर्विज्ञानमयकोश:। एतत्कोशत्रयं लिंगशरीरम्। स्वरुपाज्ञानमानन्दमयकोश:। तत् कारणशरीरम्।। (पेंगलोपनिषद-2/4)<br />
(यही स्थूल शरीर है। कर्मेन्द्रियोंके साथ पाँच प्राण मिलकर प्राणमयकोश, ज्ञानेन्द्रियोंके साथ मन मिलकर मनोमयकोश, और ज्ञानेन्द्रियोंके साथ बुद्धि मिलकर विज्ञानमयकोश बनता है। यही तीनों कोश मिलकर लिंग शरीर बनता है। जहाँ अपनेका बोध नहीं रहता वह आनन्दमयकोश है, उसको ही कारण शरीर कहते है।)<br />
बुद्धिकर्मेन्द्रियप्राणपंचकैर्मनसा धिया। शरीरं सप्तदशभि: सुसूक्ष्मं लिंगमुच्यते।। (शारीरकोपनिषद-16)<br />
(ज्ञानेन्द्रिय (पाँच), कर्मेन्द्रि (पाँच), पांच प्राण, मन और बुद्धि यह सतरह का समूह सूक्ष्म शरीर या लिंग शरीर कहलाता है)(शारीरकोपनिषद-16)<br />
(The (five) Gyaanendriyas, (five) Karmendriyas, five Pranas, the Mind and the Intellect; this collection of 17, together form the subtle body or Linga body.) (शारीरकोपनिषद-16)<br />
ल्लिंगशरीरं ह्रदयग्रन्थिरित्युच्यते। (सवॅसारोपनिषद-7)<br />
(लिंग शरीरको ही ह्रदयग्रंथी कहते है।)<br />
भिद्यते ह्रदयग्रन्थिछिद्यन्ते सवॅसंशया: ।<br />
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ।। (सरस्वतीरहस्योपनिषद-67)<br />
(महोपनिषद-4/82)(मुंडकोपनिषद-2/2/8)<br />
( ते परातपर ने जाणी लीधा पछी ह्रदयनी गांठ खूली जाय छे अने बधा संशयो नाश पामेछे अने बधा कर्मो नाश पामे छे)<br />
SUBTLEBODY’S TRAVEL AFTER DEATH<br />
यथेतमाकाशमाकाशाद्वायुं वायुर्भूत्वा धूमो भवति धूमोभूत्वाभ्रं भवति। अभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वाप्रवर्षति त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलमाषा इतिजायन्ते। यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेत: सिंचति तद्भूय एव भवति। (छांदोग्योपनिषद-5/10/5-6)<br />
(वहांसे वह (सूक्ष्मशरीर) प्रथम आकाशको प्राप्त होता है, आकाशसे वायुको प्राप्त करने के बाद वायुमे से धूम्र होता है, धूम्र में से बादल बन जाता है। बादल में से जब वर्षा बनकर बरसता है, तब सभी प्राणीओं इस लोकमें डांगर, जव, औषधि, वनस्पति, उड़द और तील बनकर प्रादुर्भूत होते है। (कर्मानुसार) जो जो इस अन्नको खाता है, और उनसे उत्पन्न विर्यका सिंचन करनेसे जो जीव बनता है, वह वैसा बन जाता है।) (छांदोग्योपनिषद-5/10/5-6)<br />
[From there the Jiva (subtle body) transforms into the sky, from sky into air, from air into smoke, from smoke into cloud, when it rains from the cloud; then all the Jivas are born into paddy, barley, herbs, plants, sesame, pulses, etc. (According to the actions) whoever eats this grain, etc and procreates (species) through the semen that is produced out of said (grain, etc), those (species) are identical to those (eaters)] (Chhandogya Upanishad-5/10/5-6).<br />
सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाँगमनसि संपद्यते मन:प्राणेप्राणस्तेजसि तेज:परस्यां देवतायाम् । (छांदोग्योपनिषद-6/8/6)<br />
(हे सौम्य! अंत काले मनुष्यकी वाणी मनमां, मन प्राणमां, प्राण तेजमां और तेज़ परम देवमां लीन होताहै। )<br />
WHEN PERSON BECOMES PARMATMA?<br />
यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येव हि पश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ब्रह्म संपद्यते तदा।।<br />
(जाबालदर्शनोपनिषद-10/10)<br />
(जब (योगी) सब प्राणिओंको अपनेमें देखता है और अपनेको सब प्राणिओंमें देखता है, तब वह स्वयं ब्रह्म ही बन जाता है।)<br />
अज्ञस्यार्धप्रबुद्धस्य सर्वं ब्रह्मेति यो वदेत्।<br />
महानरकजालेषु स तेन विनियोजित:।। (महोपनिषद-5/105)<br />
(अपरिपकव बुद्धिवालेको और अज्ञानीको &#8220;यह सब ब्रह्ममय है&#8221; , ऐसा कहना उनको जैसे नरकमें हडसेलना जैसा है।)<br />
चितो रुपमिदं ब्रह्मन्क्षेत्रज्ञ इति कथ्यते।<br />
वासना: कल्पयन्सोऽपि यात्यहंकारतां पुन:।। 124<br />
अहंकारो विनिर्णेता कलंकी बुद्धिरुच्यते।<br />
बुद्धि: संकल्पिताकारा प्रयाति मननास्पदम्।। 125<br />
मनो धनविकल्पं तु गच्छतीन्द्रियतां शने:।<br />
पाणिपादमयं देहमिन्द्रियाणि विदुर्बुधा:।। 126 (महोपनिषद-5/124-126)<br />
(हे ब्रह्मन! चेतनशक्ति जब नाम (रुप, देश, काल) विगेरे प्राप्त करती है, तो क्षेत्रज्ञ कहलाती है। वह (क्षेत्रज्ञ) फिरसे जब वासनाकी कल्पना करता है तो वह अहंकार हो जाता है। जब अहंकार निश्चयात्मक और दोषयुक्त होता है तब वह बुद्धि कहलाता है। बुद्धि जब संकल्प और मनन करने लगती है तो मनरुप हो जाती है। मन जब गहरे विकल्पमें डूबता है तो धीरे-धीरे इन्द्रियत्वको प्राप्त करता है। मेधावी पुरुषों (भी) अपनेको हस्तपादयुक्त इन्द्रियोंवाला शरीर ही मानते है.) (महोपनिषद-5/124-126)<br />
चिदचैत्या किलात्मेति सर्वसिद्धान्तसंग्रह:। (महोनिपषद-6/78)<br />
चित् अचैत्या किल आत्मा इति (किल=खरेखर)<br />
(निश्चयपूर्वक विषयरहित हुआ चित्तकोही आत्मा कहागया है।यह समग्र वेदोंके सिद्धान्तों का सार है)<br />
अहं ब्रह्मास्मीति वाक्यार्थविचार: श्रवणं भवति। एकान्तेन श्रवणार्थानुसंधानं मननं भवति। श्रवणमनननिर्विचिकित्स्येऽर्थे वस्तुन्येकतानवत्तया चेत:स्थापनं निदिध्यासनं भवति। ध्यातृध्याने विहाय निवातस्थितदीपवद्ध्येयैकगोचरं चित्तं समाधिर्भवति।। (पेंगलोपनिषद-3/4)<br />
(अहं ब्रह्मास्मि यह महावाक्यके अर्थ पर विचार करना वह श्रवण कहलाता है। श्रवण किये हुए विषयके अर्थपर एकांतमें अनुसंधान करना वह मनन कहलाता है। श्रवण और मनन द्वारा निश्चित किये हुए अर्थरुप वस्तुमें एकाग्रतापूर्वक चित्तका स्थापन करना वह निदिध्यासन कहलाता है। जब चित्तवृत्ति ध्याता और ध्यानके भावको छोड़कर, वायु विहीन स्थानमें रखे दीपककी ज्योतकी भांती केवल ध्येयमें ही स्थिर हो जाती है, तब उस अवस्थाको समाधि कहा जाता है।)<br />
श्रवणं तु गुरो: पूर्वं मननं तदनन्तरम्।<br />
निदिध्यासनमित्येतत् पूर्णबोधस्य कारणम्।। (शुकरहस्योपनिषद-43)<br />
(साधकको पूर्ण बोध तब हो सकता है, जब वह पहेले गुरुका उपदेश सूनें, बाद मनन करें और बाद निदिध्यासन (अनुभूतिकी साधना) करें।)<br />
आत्मा वा अरे द्रष्टव्य: श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो दर्शनेन श्रवणेन मत्वा विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम्।। (बृहदारण्यकोपनिषद-2/4/5, 4/5/6).<br />
(हे मैत्रेयी! यह आत्मा ही दर्शन करवा योग्य, श्रवण करवा योग्य, मनन करवा योग्य, निदिध्यासन (अनुभव, ध्यान) करवा योग्य है। यह आत्माके दर्शन, श्रवण, मनन और ज्ञानसे सबका ज्ञान हो जाता है।)<br />
हरिः ॐ तत्सत्।</p>
<p>Acharya Vrujlal</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com/upanishads-coordinated/">UPANISHADS COORDINATED</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com">VEDA VICHAR</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://vedavichar.com/upanishads-coordinated/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>22</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>ASHTAVAKRA GITA</title>
		<link>https://vedavichar.com/ashtavakra-gita/</link>
					<comments>https://vedavichar.com/ashtavakra-gita/#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Acharya Vrujlal]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 07 Oct 2019 11:15:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ASHTAVAKRA GITA]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://vedavichar.com/?p=6083</guid>

					<description><![CDATA[<p>जनक उवाच कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिभॅविष्यति । वैराग्यं च कथं प्राप्तमेतद् ब्रुहि मम प्रभो । 1/1 (जनक कहते है भगवन! आत्मज्ञान कैसे प्राप्त किया जाता है? मुक्ति कैसे होती है,...</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com/ashtavakra-gita/">ASHTAVAKRA GITA</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com">VEDA VICHAR</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>जनक उवाच<br />
कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिभॅविष्यति ।<br />
वैराग्यं च कथं प्राप्तमेतद् ब्रुहि मम प्रभो । 1/1<br />
(जनक कहते है भगवन! आत्मज्ञान कैसे प्राप्त किया जाता है? मुक्ति कैसे होती है, और वैराग्य कैसे प्राप्त होता है? वह मुजे कहे ।<br />
अष्टावक्र<br />
मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत्त्यज<br />
क्षमाजॅवदयातोषसत्यं पीयुषवद् भज । 1/2<br />
(हे राजन! यदि तुम मुक्ति चाहता है तो विषयोंको विष समजके छेडदो और क्षमा, सरलता, दया, संतोष और सत्यका सेवन अमृतकी तरह करो । )<br />
यदि देहं पृथक्कृत्य चिति विश्रम्य तिष्ठसि ।<br />
अधुनैव सुखी शान्तो बन्धमुक्तो भविष्यसि। (अष्टावक्र संहिता-1/4)<br />
(यदि देहको अलग करके “अपने होने” में तु विश्राम करेगा तो तुम शिध्रही अपने को सुखी, शांत और बंधनसे मुक्त पायेगा) (अष्टावक्र संहिता-1/4)<br />
(If only you will remain resting in your “Own Being”, seeing yourself as distinct from the body, then even now you will find yourself happy, peaceful and free from bonds). ( Ashtavakra Sanhita-1/4)<br />
न कताॅसि न भोक्तासि मुक्त एवासि सवॅदा । 1/6<br />
(एको द्रष्टासि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा।) अयमेव हि ते बन्धो द्रष्टारं पश्यसीतरम्॥1/7 ( अष्टावक्र संहिता-1/7)<br />
(जो कुछ भी यहाँ है, तुम अकेले ही उनका दृष्टा हो।तुम्हारा बन्धन ही यह है कि तुम (अपने के अतिरिक्त) किसी अन्य को दृष्टा समजते हो।)<br />
(अष्टावक्र संहिता-1/7)<br />
(You are the solitary witness of all that exists, and you are always Liberated. Your only bondage is understanding the seer to be someone other (than you). (Ashtavakra Gita-1/7).<br />
यत्र विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसपॅवत् । 1/10<br />
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि ।<br />
किंवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिभॅवेत् ।1/11<br />
(यह कहावत सत्य ही है की जैसी मती वैसी ही गती। वैसे ही जो मानता है की &#8220;मैं मूक्त हुँ&#8221; वह मूक्त ही है, और वह बंदी है जो अपनेको बंदी मानता है&#8221;)<br />
निःसंगो निष्क्रियोअसि त्वं स्वप्रकाशो निरंजनः ।<br />
अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठसि । 1/15<br />
जनक<br />
अतो मम जगत्सवॅमथवा न च किंचन।। (अष्टावक्र संहिता-2/2)<br />
(अतः यातो समग्र जगत मेरा है अथवा कुछ भी मेरा नहिं है।)(अष्टावक्र संहिता-2/2)<br />
(Therefore either the whole universe is mine or nothing is mine.). (Ashtavakra Gita-2/2).<br />
यथा न तोयतो भिन्नास्तरंगाः फेनबुदबुदाः ।<br />
आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिगॅतम् । 2/4<br />
जेम पाणी मांथी उत्पन्न तरंगों फीण अने परपोटा पाणीथी भिन्न नथी तेम आत्मामांथी निकणेल जगत आत्माथी भिन्न नथी ।<br />
आत्माज्ञानाज्जगद्भासति आत्मज्ञानान्न भासते।2/7<br />
(आत्माना (स्वरुपना) अज्ञाननेलइने ज जगत भासछे, आत्म ज्ञान थतां भासतुं नथी । )<br />
अहो विकल्पितं विश्वमज्ञानान्मयि भासते ।<br />
रुप्यं शुक्तौ फणी रज्जो वारि सूयॅ करे यथा । 2/9<br />
(जेम अज्ञानथी कल्पायेलुं रुपु छीपमां भासेछे, सपॅ दोरडामां भासेछे अने (मृग) जल सूयॅना किरणो मां भालेछे, तेम अरेरे अज्ञानथी कल्पायेलुं जगत माराथी जोवाय छे । )<br />
मत्तो विनिगॅतं विश्वं मय्येव लयमेष्यति ।<br />
मृदि कुम्भो जले विचिः कनके कटकं यथा । 2/10<br />
(जेम घडो माटीमां तरंग पाणीमां अने कडुं सोनामां लय पामेछे, तेम मारा (अहं) मांथी उद्भव पामेल विश्व मारामांज लय पामशे । )<br />
ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवम् ।<br />
अज्ञानाद्भाति यत्रेदं सोअहमस्मि निरंजन । 2/15<br />
(ज्ञान ज्ञेय अने ज्ञाता अे त्रिपुटी ज्यां वास्तविक रीते नथी, परंतु अे ज्यां अज्ञानने लइने भासेछे, ते हुं निरंजन छुं । )<br />
अहो जनसमूहेअपि न द्वैतं पश्यतो मम् । 2/21<br />
(अरे जन समूहमां पण मने द्वैत जोवातुं नथी ।<br />
नाहं देहो न मे देहो जीवो नाहमहं हि चित् । २/२२<br />
हुं देह नथी, देह मारो नथी, हुं जीव नथी, कारण हुं चैतन्य छुं । )<br />
सवॅभूतेषु चात्मानं सवॅभूतानि चात्मनि । 3/5<br />
स्वभावादेव जानानो दृश्यमेतन्न किंचन ।<br />
इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः । 3/13<br />
आकाशवदनन्तोअहं घटवत् प्राकृतं जगत् ।<br />
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः । 6/1<br />
यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बन्धनं तदा ।<br />
मत्वेति हेलया किंचित् मा गृहाण विमुच्य मा । 8/4<br />
कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा ।<br />
एवं ज्ञात्वेह निवेॅदाद्भव त्यागपरोअव्रति । 9/1<br />
(कृत्य अकृत्यमां अने द्वद्वोमां कोने क्यारे शांति मलीछे? अेवुं जाणीने अहिं अनाशक्त, त्यागपरायण अने अनाग्रही बन)<br />
क्स्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात् ।<br />
जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमं गताः । 9/2<br />
(हे प्रिय कोइ धन्य व्यकतीज लोकोनो व्यवहार (चेस्टाओ) जोइने ज जीववानी इच्छा, भोगनी इच्छा अने जाणवानी इच्छाथी मूक्त थइ जायछे।)<br />
पश्य भूतविकारांस्त्वं भूतमात्रान् यथाथॅतः ।<br />
तत्क्षणाद्बन्धनिमुॅक्तः स्वरुपस्थो भविष्यसि । (अष्टावक्र संहिता-9/7)<br />
(जब तुम यथार्थरुप से यह समझ पाओगे कि; तमाम प्राणिओं और पदार्थों और कुछ भी नहीं बल्कि मूलभूत तत्त्वों का रुपांतरन हि है; उसी क्षण तुम बंधन से मूक्त होकर अपने नीज स्वरुप में स्थित हो जाओगे।)(अष्टावक्र संहिता-9/7)<br />
(If you would genuinely realize that all the creatures and substances are nothing but the transformations of the basic elements only, then at that very moment you would be freed from all the bonds and would get established in your own Being. )(Ashtaavakra Sanhita-9/7)<br />
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।<br />
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा।। (Gita-13/29.)<br />
[जब (मनुष्य) पृथक महाभूतों हि (शरीरों, पदार्थों, आदि रुपों में) एकत्र होकर स्थित है; और उन (पृथक महाभूतों) से हि (इस सृष्टिका) विस्तार है; ऐसा विवेकसे समझ लेता है; उसी क्षण (वह) ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।] (Gita-13/29.)<br />
(When a man perceives with discernment that the diversified basic elements are rooted in one (body or substance), and (also perceives this creation as) proceeding from them, then at that very moment he becomes one with the Brahmn.) (Gita-13/29.)<br />
कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा।<br />
दु:खमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम् ॥ (अष्टावक्र संहिता-10/8).<br />
(कितने ही जन्मों में तुमने शरीर, मन और वाणि से परिश्रमयुक्त कष्टमय कर्म नहीं किया है? (फिरभी उन्हों ने मोक्ष नहीं दिलाया) तो अब तो विश्रामित हो जा।). (अष्टावक्र संहिता-10/8).<br />
(Have you not done assiduously toilsome work with body, mind and speech in so many lives? (Yet they not availed you Salvation,) hence now get quiescence.) (Ashtaavakra Sanhita-10/8).<br />
वासनात्यागात् स्थितिरद्य यथा तथा । 9/8<br />
(वासनानो त्याग करीने तुं ज्यां छो त्यां स्थिर था)<br />
यत्र यत्र भवेत्तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै । 10/3<br />
(जहाँ जहाँ तृष्णा है वहाँ संसार है ऐसा समज)<br />
राज्यं सुताः कलत्राणि शरीराणि सुखानि च ।<br />
संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि । 10/6<br />
(राज्य, पुत्रो, पत्नियाँ शरीरों और सुखों तुम्हारे आसक्त होते हुएभी हर जन्ममें नाश पामे है ।)<br />
कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा।<br />
दु:खमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम्।। (अष्टावक्र संहिता-10/8)<br />
(कौनसे जन्मोंमें तुने (साधनाके नाम पर) मन, वाणि और कायासे परिश्रमयुक्त दु:खजनक कर्म नहीं किया है? (फिरभी मोक्ष मिला क्या?) तो अब तो (अपने होनेमें) विश्रामित हो जा।) (अष्टावक्र संहिता-10/8)<br />
(Have you not done in each your life the laborious painful deeds by the way of body, Mind and speech (in the name of Sadhnaa)? (Yet have you availed Salvation?) Then now you must get rested (in your Being). (Ashtaavakra Sanhita-10/8).<br />
ईश्वरः सवॅनिर्माता नेहान्य इति निश्चयी ।<br />
अन्तगॅलितसवॅाशः शांतः क्वापि न सज्जते । 11/2<br />
(अहिं सवॅका निमाॅण करनार ईश्वर ही है और दूसरा कोई नहिं है अैसा जीसका निश्चय हुआहै और जीसकी सभी इच्छायें अंतःकरणमें नाश पामी है अैसा शांत मनुष्य कहीं भी आसक्त नहिं होता।)<br />
कुवॅन्नपि न लिप्यते । 11/5<br />
(कमॅ करता हुआ भी लिप्यमान नहिं होता । )<br />
नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी।<br />
कैवल्यमिव संप्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतं।।(अष्टावक्र संहिता-11/6)<br />
( “मैं शरीर नहीं हुँ (और) नहीं शरीर मेरा है, मैं बोधरुप हुँ” ऐसा जिसका निश्चय हुआ है वह मोक्ष को उपलब्ध हुआ (साधक), नहीं किये हुए और किये हुए (कर्मों) के प्रति ध्यान नहीं देता है)(अष्टावक्र संहिता-11/6).<br />
(One who is resolved that “I am not body nor the body is mine, I am the awareness”, that (seeker) already availed to the Salvation, doesn’t become mindful of (the action) not done or already done.). (Ashtaavakra Sanhita-11/6).<br />
समाध्यासनादिविक्षिप्तौ व्यवहारः समाधये ।<br />
एवं विलोक्य नियममेवमेवाहमास्थितः । 12/3<br />
(जो विक्षेप दशामें है उनके लिये समाधि आसनादि और जो समाधिमें है उनके लिये व्यवहार एेसा (उलटा सुलटा ) नियम देखकर मैं जैसा हुं वहाँ स्थित हुं।)<br />
कृतं किमपि नैव स्यादिति संचिन्त्य तत्त्वतः।<br />
यदा यत्कतुॅमायाति तत्कृत्वाआसे यथासुखम् ।। (अष्टावक्र संहिता-13/3)<br />
(“किया तो कुछ भी जाता ही नहिं है”, ऐसा तत्वदृष्टिसे विचार करके जो वक़्त जो कर्म करने को सहज आपडता है, वह करके मैं आनंद में रहता हुं) (अष्टावक्र संहिता-13/3)<br />
(Intrinsically realizing that “nothing is ever being done”; I abide in bliss by doing that whatsoever presents itself to be done at that time.) (Ashtaavakra Sanhita-13/3).<br />
यथातथोपदेशेन कृताथॅ सत्त्वबुद्धिमान् । 15/1<br />
(सत्व एवं बुद्धिमान पुरुष जैसा भी हो वैसा उपदेशसे कृताथॅ होजाता है । )<br />
ज्ञानस्वरुपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः । 15/8<br />
(तुम ज्ञानस्वरुप, भगवान, आत्मा, प्रकृति से पर हो। )<br />
अयं सोअहमयं नाहं विभागमिति संत्यज।<br />
सवॅमात्मेति निश्चित्य निःसंकल्पः सुखी भव।। 15/15<br />
(यह मैं हुं और यह मैं नहिं हुं ऐसे भेदभावको छोडदो। सब आत्मा ही है अैसा निश्चय करके, संकल्प रहीत होकर सुखी हो)<br />
त्यजैव ध्यानं सवॅत्र। 15/20<br />
(घ्यानका तो सवॅत्र त्याग करो)<br />
आयासात्सकलो दुःखी नैनं जानाति कश्चन।<br />
अनेनैवोपदेशेन धन्यः प्राप्नोति निवृॅतिम्।। 16/3<br />
(परिश्रम से सभी मनुष्यों दुःखको प्राप्त होतेहै लेकिन यह कोइ नहिं जानता। धन्य पुरुष उपदेश से ही निवाॅणरुप परमसुखको प्राप्त होता है।)<br />
तस्यालस्यधुरीणस्य सुखं नान्यस्य कस्यचित्।।16/4<br />
(आलसीओके सरदारको ही सुख प्राप्त होता है, अन्य कीसीको नहिं)<br />
हरो यद्युपदेष्टा ते हरिः कमलजोअपि वा।<br />
तथापि न तव स्वास्थ्यं सवॅविस्मरणादृते।। 16/11<br />
(यदि शंकर तेरा उपदेशक होता है या विष्णु या कमलमेंसे जन्मे ब्रह्मा, फीरभी बीना सब भूले तुजे शांति होने वाली नहिं है।)<br />
तेन ज्ञानफलं प्राप्तं योगाभ्यासफलं तथा।<br />
तृप्त: स्वच्छेन्द्रियो नित्यमेकाकी रमते तु य:।।<br />
(अष्टावक्र संहिता-17/9)<br />
(संतोषी, शुद्ध इन्द्रियों वाला और हंमेशा अकेला ही आनंद में रहनेवाला है, उसने ही ज्ञान का फल तथा योगाभ्यास का फल प्राप्त किया हुआ है।)<br />
(अष्टावक्र संहिता-17/9)<br />
(He who is content, is with purified senses, and who always remains in bliss even in solitude, has gained the fruit of knowledge and the fruit of the practice of yoga too.)<br />
(Ashtaavakra Sanhita-17/9).<br />
शून्या दृष्टिवृॅथा चेष्टा विकलानीन्द्रियाणि च।<br />
न स्पृहा न विरक्तिवाॅ क्षीणसंसारसागरे।। (अष्टावक्र संहिता-17/9)<br />
((जब) संसार का मोह नष्ट हो जाता है तो, दृष्टि शून्य, क्रियाएँ निरथॅक और ईन्दियाँ क्षुब्ध हो जाती है; (फिर उसमें पदार्थों के लिए) आसक्ति या विरक्ति भी नहिं रहेती) (अष्टावक्र संहिता-17/9)<br />
[(When) the fascination of Sansaar gets waned, then the gaze becomes emptied, the performance becomes purposeless and the sense organs become maimed; (then) there neither remains attachment nor aversion (for substances in him.)](Ashtaavakra Sanhita-17/9).<br />
समस्तवासनामुक्तो मुक्तः सवॅत्र राजते। 17/11<br />
(सभी वासनाओंसे मुक्त हुआ मुक्त पुरुष सवॅत्र शोभायमान होता है)<br />
सानुरागां स्त्रियं दृष्टवा मृत्युं वा समुपस्थितम्।<br />
अविह्वलमनाः स्वस्थो मुक्त एव महाशयः।।17/14<br />
(प्रितियुक्त स्त्री या समीप आया हुआ मृत्युको देखकर भी जो महात्मा अविह्वल मनवाला और स्वस्थ रहता है वह मुक्त ही है)<br />
निर्ममो निरहंकारो न किंचिदिति निश्चित:।<br />
अन्तर्गलितसर्वाश: कुर्वन्नपि करोति न।।<br />
(अष्टावक्र संहिता-17/9)<br />
(ममतारहित, अहंकाररहित, कुछ है ही नहीं ऐसा जिसका निश्चय हुआ है और जिसके भीतर सब कामनाएँ नष्ट हो गई है; सब कुछ करते हुए भी वह कुछ भी नहीं करता है।)(अष्टावक्र संहिता-17/9)<br />
(One without sense of attachment, without conception of one’s individuality, resolved that nothing exists, whose all desires within have perished, does nothing even though doing everything.)<br />
(Ashtaavakra Sanhita-17/9).<br />
भवोअयं भावनामात्रो। 18/4<br />
(यह संसार कल्पना मात्र है)<br />
यथा जीवनमेवेह (जीवनम् इव इह) योगिनः।18/13<br />
(योगी यहाँ यथा प्राप्त जीवन (जीता है))<br />
Jesus: Let thy wish prevail.<br />
द्वितियं यो न पश्यति। 18/16<br />
(उसे दुसरा दिखता नहिं)<br />
प्रवृतौ वा निवृतौ वा नैव धिरस्य दुग्रॅहः ।<br />
यदा यत्कतुॅमायाति तत्कृत्वा तिष्ठतः सुखम्।।18/20<br />
(जीस वक़्त जो करनेका आजाता है उसको करके आनंदमय रहता ज्ञानीको प्रवृतिमें या निवृत्तिमें दुराग्रह होता ही नहीं )<br />
चेष्टते शुष्कपणॅवत्। 18/21<br />
(सूके पणॅकी तरह चेष्टा करते है)<br />
Sage Ashtavakra says to king Janak: नाप्नोति कर्मणा मोक्षं विमूढोऽभ्यासरूपिणा। धन्योविज्ञानमात्रेण मुक्तस्तिष्ठत्यविक्रियः18/36 (Ashtavakra Gita 18/36). &#8220;The stupid does not achieve Liberation even through regular Sadhna, but the fortunate remains Liberated even through actionlessness; simply by their wisdom. (Ashtavakra Gita 18/36).<br />
नाप्नोति कमॅणा मोक्षं विमूढोअभ्यासरुपिणा। 18/36<br />
( मूढ़ पुरुष अभ्यासरुप कमॅसे भी मोक्षको प्राप्त नहिं कर शक्ता)<br />
निराधाराग्रहव्यग्रा मूढाः संसारपोषका:। 18/38<br />
((सद्गुणोंके)आधार रहित (और शास्त्र पढ़े) दुराग्रही मूढ़ों ही संसारका पोषण करनेवाले है)<br />
कतॅव्यतैव संसारो । 18/57<br />
(करनेकी भावना ही संसार है)<br />
हरिः ॐ तत्सत् ।हरिः ॐ तत्सत्। हरिः ॐ तत्सत्।</p>
<p>Acharya Vrujlal</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com/ashtavakra-gita/">ASHTAVAKRA GITA</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com">VEDA VICHAR</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://vedavichar.com/ashtavakra-gita/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>8</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>SAANKHYASHASTRA</title>
		<link>https://vedavichar.com/saankhyashastra/</link>
					<comments>https://vedavichar.com/saankhyashastra/#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Acharya Vrujlal]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 07 Oct 2019 11:14:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[SAANKHYASHASTRA]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://vedavichar.com/?p=6090</guid>

					<description><![CDATA[<p>सांख्यशास्त्र कपिल मुनि। न दृष्टात्तत्सिद्धि:। (सांख्यदर्शन-1/2) (दृश्य (नश्वर उपाय) से उस (त्रिविध ताप) की (निवृत्तिकी) सिद्धि नहीं (हो सकती) है।) (सांख्यदर्शन-1/2). (The accomplishment of (cessation of) that (affliction of Three...</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com/saankhyashastra/">SAANKHYASHASTRA</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com">VEDA VICHAR</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>सांख्यशास्त्र कपिल मुनि।</p>
<p>न दृष्टात्तत्सिद्धि:। (सांख्यदर्शन-1/2)<br />
(दृश्य (नश्वर उपाय) से उस (त्रिविध ताप) की (निवृत्तिकी) सिद्धि नहीं (हो सकती) है।) (सांख्यदर्शन-1/2).<br />
(The accomplishment of (cessation of) that (affliction of Three Type) is not (possible) by the visible (ephemeral means). (सांख्यदर्शन-1/2).(Sankhyashastra-1/2).<br />
अविशेषश्चोभयो:।। (सांख्यदर्शन-1/6)<br />
(धनादि दृष्ट साधनों और उसका उपभोग; तथा वैदिक क्रियाओं और तज्जनित पुण्य द्वारा जो उपभोग होता है, वे दोनों समान ही है।)। (इसलिये दोनों हि त्रिविध तापकी निवृत्ति हेतु अयोग्य है।)<br />
न कर्मणाऽन्यधर्मत्वादतिप्रसक्त्तेश्च।।(सांख्यदर्शन-1/16)<br />
(कर्म अन्य से संबंधित होने के कारण (कर्म से आत्मा को) बन्धन नहीं है; उपाय रहित हो जाता है।) (सांख्यदर्शन-1/16)<br />
कर्म शरीर का धर्म है, तो जो शरीर करता है, उसकी असर आत्मा पर नहीं पड़ सकती। अगर एक का बन्धन दुसरे के लिए शक्य हो जाता तो बन्धनवालों का बन्धन मुक्तों कों लग जाता।तो मोक्ष का कोई उपाय हि नहीं बचता।<br />
प्रकृतिनिबन्धनाच्चेन्न तस्या अपि पारतन्त्र्यम्।।<br />
(सांख्यदर्शन-1/18)<br />
(प्रकृति के निमित्त से भी बन्धन नहीं हो सक्ता, क्यों कि (व्यक्ति में चित्तवृत्ति के अभाव में) प्रकृति परतंत्र है।)<br />
युगपज्जायमानयोर्न कार्यकारणभाव:।। (सांख्यदर्शन-1/38)<br />
(जो एक साथ पेदा होते है वे दोनों (एक दूसरे के) कार्य कारण नहीं हो सकते।)<br />
निष्क्रियस्य तदसंभवात्।।(सांख्यदर्शन-1/49)<br />
(निष्क्रिय (आत्मा) की ते (गति) असंभव होनेसे ( आत्माका शरीरमें प्रवेश या बहार निकलना भी असंभव है।)<br />
तद्योगोऽप्यविवेकान्न समानत्वम्।। (सांख्यदर्शन-1/55)<br />
(उस (प्रकृति और पुरुष) का संयोग अविवेकसे ही (अविवेकीमें ही दिखता) है, (मूक्त पुरुषमें) वैसा ही नहीं (दिखता)।)<br />
प्रधानाविवेकादन्याविवेकस्य तद्धाने हानम्।।(सांख्यदर्शन-1/57)<br />
[(अगर) प्रकृति के विषयमें अविद्या पैदा हो जाती है, तो अन्यों के विषयमें भी अविद्या पैदा हो जाती है। उस (प्रकृति की अविद्या)के नाश से कैवल्य।](सांख्यदर्शन-1/57)<br />
[(If) the Ignorance about the Nature is born, then the Ignorance about the others also gets born. The destruction of (Ignorance about Nature) avails Keivalya]. (Sankhyadarshan-1/57).<br />
भिद्यते ह्रदयग्रन्थि छिद्यन्ते सवॅसंशया: ।<br />
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ।।(मुंडकोपनिषद-2/2/8)(महोपनिषद-4/82)(सरस्वतीरहस्योपनिषद-67)<br />
(जब साधक प्रकृतिविषयक समझ को आत्मसात कर लेता है, तो उसके सब संशयों का निराकरण हो जाता है, उसके सब कर्मों क्षीण हो जाते है, उसका सूक्ष्म शरीर का विभाजन हो जाता है, (जो तुरन्त हि उसको कैवल्य को उपलब्ध करा देता है।)(मुंडकोपनिषद-2/2/8)(महोपनिषद-4/82)(सरस्वतीरहस्योपनिषद-67)<br />
[When the seeker assimilates the understanding about the Nature, then all his doubts get allayed, all his actions get waned, his Subtle Body gets disunited, (which instantly avails him to Keivalya)]
(Mundaka Upanishad-2/2/8).<br />
(Maha Upanishad-4/82). (Saraswatirahasya Upanishad-67)<br />
वांमात्रं न तु तत्त्वं चित्तस्थिते। (सांख्यदर्शन-1/58)<br />
(पुरुषमां बंध) कथन मात्र है, वास्तविक नहीं है। उसकी चित्तकी स्थिति से दिखता है) जैसे सफ़ेद स्फटिक लाल जासूदके पास लाल दिखता है, वैसे ही चित्तके सुख-दु:खादि पुरुषमें दिखते है।<br />
युक्तितोऽपि न बाध्यते दिंमूढवदपरोक्षादृते। (सांख्यदर्शन-1/59)<br />
(दिंगमूढनी पेठे प्रत्क्षविना मात्र युक्तिथी (अविवेकनो) नाश नहीं थाय)<br />
दिशाभ्रम होनेके बाद जैसे बिना दिशाके साक्षात्कार हुए युक्तिद्वारा दिशाभ्रमका नाश वहीं होता वैसे मनुष्यके अविवेकका नाश भी प्रकृति-पुरुषके साक्षात्कार बिना मात्र युक्तिसे नहीं होता। युक्ति और उपदेशका अवलंबन करके निदिध्यासनसे अविवेकका नाश हो सकेगा।<br />
अचाक्षुषाणामनुमानेन बोधो धूमादिभिरिव वह्ने:।।(सांख्यदर्शन-1/60)<br />
(अप्त्यक्षोंका अनुमान से बोध होता है, जैसे धूमादि से अग्निका (होता है।))<br />
सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृति:।। (सांख्यदर्शन-1/61). (सत्त्व, रजस, तमसकी साम्यावस्था वह प्रकृति है।) (सांख्यदर्शन-1/61). (The Nature has the equanimity of Sattva (existence or Neutron), Rajas (procreation or Proton), and Tamas (eliminating or Electron). (Sankhyashashtra-1/61.).<br />
सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृति; प्रकृतेर्महान्महतोऽहंकारोऽहंकारात्पंचतन्मात्राण्युभयमिन्द्रियं, तन्मात्रेभ्य: स्थूलभूतानि, पुरुष इति पंचविंशतिरगण:।। (सांख्यदर्शन-1/61)<br />
(सत्त्व, रजस, तमसकी साम्यावस्था वह प्रकृति है।)<br />
स्थूलात्पंचतन्मात्रस्य।। (सांख्यदर्शन-1/62)<br />
बाह्याभ्यन्तराभ्यां तैश्च्चाहंकारस्य।।(सांख्यदर्शन-1/63)<br />
तेनान्त:करणस्य:।। (सांख्यदर्शन-1/64)<br />
तत: प्रकृते:।। (सांख्यदर्शन-1/65)<br />
संहतपरार्थत्वात्पुरुषस्य।।(सांख्यदर्शन-1/66)<br />
(स्थूलों से पाँच तन्मात्राका, बाह्याभ्यंतर और तन्मात्राओंसे अहंकार का, उससे महत्तत्त्वका, उससे प्रकृति का, और जो मीला हुआ है उसके परार्थपने से पुरुषका (अनुमान) होता है।)<br />
मूले मूलाभावादमूलं मूलं। (सांख्यदर्शन-1/67)<br />
(मूलमें मूलके अभावसे अमूल ही मूल है)<br />
(प्रकृति हि महत्तत्त्वादि सब कार्योंका मूल (कारण) है। यह अंतिम कारण प्रकृति का कोई उपादान कारण न होनेसे वह अमूल (कारण रहित) प्रकृति हि सब का मूल (कारण) है।)<br />
प्रकृति अदृश्य है। प्रकृति शब्द निर्जीव पदार्थोंके आदिकारणका है, इसके सिवा और कुछ सूचित नहीं करता<br />
अधिकारित्रैविध्यान्न नियम:। (सांख्यदर्शन-1/70)<br />
(अधिकारीके तीन प्रकार होनेसे (विवेकज्ञान मात्र श्रवणसे हो जाता है ऐसा) नियम नहीं है)(सांख्यदर्शन-1/70)<br />
(As there are three types of rightful claimants, there cannot be a rule (that all will be enlightened only by hearing.) (Sankhyadarshan-1/70).<br />
उत्तमअधिकारीको श्रवणसे, मध्यमको श्रवण और मननसे और कनिष्ठको श्रवण, मनन और निदिध्यासन से विवेकज्ञान होता है<br />
अधिकारिप्रभेदान्न नियम:।।(सांख्यदर्शन-3/76)<br />
अधिकारीके (भी) प्रभेद होनेके कारण (विवेककी सिद्धिमें समय मर्यादाका) नियम नहीं है।<br />
नावस्तुनो वस्तुसिद्धि । (सांख्यदर्शन-1/78)<br />
(अभावसे भावकी उत्पत्ति (संभव) नहीं है।)<br />
(Existence can&#8217;t come out of in-existence.)<br />
अबाधाददुष्टकारणजन्यत्वाच्च नावस्तुत्वम्। (सांख्यदर्शन-1/79)<br />
(बाध नहीं होता है और दुष्टकारणजन्य भी नहीं है जीससे (जगतका मिथ्या होना) संभव नहीं है)<br />
काम्येऽकाम्येऽपि साध्यत्वाविशेषात्।।(सांख्यदर्शन-1/85)<br />
[सकाम (कर्म और) निष्काम (कर्म दोनों) समान हि सिद्धि दिलाते होने के कारण ( उनमें से किसी से भी मोक्ष नहीं हो सकता)] (सांख्यदर्शन-1/85)<br />
[(As) Sakam Karma (action for satisfying desires and) Nishkam Karma (desireless action) both brings about similar accomplishment, (none of them can avail Salvation)]
तत्सन्धिनिधानादधिष्ठातृत्वं मणिवत्।।<br />
(सांख्यदर्शन-1/96)<br />
(उस (ईश्वर) के संनिधान (सान्निध्य) से ही (प्रकृति के उपर) अधिष्ठातापना है, लोहचूंबककी तरह।)<br />
(ईश्वरकी संनिधिसे ही प्रकृतिमें गती आ जाती है, ईश्वरको कुछ करना नहीं पड़ता। परमात्माकी समीपतासे हि प्रकृतिमें सृष्टिका सृजन कर लेती है।)<br />
विशेषकार्येष्वपि जीवानाम्।।(सांख्यदर्शन-1/97)<br />
[(आहारादि) विशेष कार्योंमें भी जीवभाव का हि (कर्तृत्व होता है)] (सांख्यदर्शन-1/97)।<br />
[It is Jivabhav that has (doership) in special deeds (like feeding, etc)](Sankhyadarshan-1/97).<br />
(वायुयुक्तो बुद्ध्यादिर्जीव: न त्वात्माजीव:। आहारादिविशेषकार्येऽपि जीवानामेव कर्तृत्वं आत्मनोऽपरिणामित्वात्।)<br />
પ્રાણ સાથેની બુદ્ધિને જીવ કહેવાય છે. પ્રાણોની સાથે બુદ્ધિ જ્યાં સુધી શરીરમાં છે ત્યાં સુધી જ શરીર આહાર વિગેરે વિશેષ કાર્યો કરવા સમર્થ રહે છે. એને જ જીવ કહેવાય છે. મૃત શરીરના સાન્નિધ્ય મા બ્રહ્મ હોય છે, પરંતુ જીવ હોતો નથી તેથી મૃત શરીર આહારાદિ વિશેષ કાર્યો કરવા સક્ષમ રહેતા નથી.<br />
आप्तोपदेश: शब्द:।। (सांख्यदर्शन-1/101)<br />
आप्तका उपदेश (वह) शब्द (प्रमाण कहलाता है। जिस मनुष्यमें भ्रांति, प्रमाद, ठगनेकी इच्छा या सिथिल बुद्धि नहीं होती वह आप्त पुरुष कहलाता है।)<br />
कार्यदर्शनात्तदुपलब्धे।।(सांख्यदर्शन-1/110)<br />
(कार्यके दर्शनसे उस (कारण) का (बोध) मिलता है।)<br />
त्रिविधविरोधापत्तेश्च।। (सांख्यदर्शन-1/113)<br />
(तीन प्रकारके विरोधकी प्राप्ति से (भी प्रकृति जगतका कारण) है।)<br />
यह जगत जब सुख, दु:ख और मोह के द्वारा सत्त्व, रजस और तमस वाला प्रतीत होता है, तब उसका कारण भी त्रिगुणात्मक प्रकृति हि हो सकती है।<br />
नाश: कारणलय:।। (सांख्यदर्शन-1/121)<br />
(कारणमें लय होना नाश (कहलाता) है।)<br />
किसीका आत्यन्तिक नाश नहीं है।<br />
हेतुमदनित्यमव्यापि सक्रियमनेकमाश्रितं लिंगम्।।(सांख्यदर्शन-1/124)<br />
[(अव्यक्त प्रकृति के शरीरादि व्यक्त सभी कार्यों) कारण वाले, अनित्य, अव्यापक, क्रियाशील, (सजातीय विजातीय भेदवाले) अनेकरुप, (अपने कारणरुप प्रकृति के) आश्रित रहनेवाले, (और अपने कारणमें लय होकर) सूक्ष्म (हो जानेके स्वभाव वाले) है।]
प्रीत्यप्रीतिविषादाद्यैर्गुणानामन्योऽन्यं वैधर्म्यम्।।(सांख्यदर्शन-1/127)<br />
(प्रीति (सुख भाव, सत्त्व), अप्रीति (दु:ख भाव, रजस), विषाद (मोह भाव, तमस) आदि (गुण) द्वारा (तीनों) गुणोंका परस्पर विरोधात्मक भाव है।<br />
कैवल्यार्थं प्रवृतेश्च। (सांख्यदर्शन-1/144)<br />
(पुरुषके कैवल्यके लिये ही (प्रकृतिकी) प्रवृति है।)<br />
विमुक्तमोक्षार्थं स्वार्थं वा प्रधानस्य।।(सांख्यदर्शन-2/1)<br />
[(प्रधान की प्रवृत्ति) आत्माके मोक्ष के लिए अथवा प्रधान के स्वार्थ के लिए होती है।](सांख्यदर्शन-2/1)<br />
जडप्रकाशायोगात् प्रकाश:।। (सांख्यदर्शन-1/145)<br />
(जडमें ज्ञानके असंभवसे (आत्मा) ज्ञानस्वरुप है।)<br />
जन्मादिव्यवस्थात: पुरुषबहुत्वम्।। (सांख्यदर्शन-1/149)<br />
(जन्म (मरण) आदिकी व्यवस्थाको देखते हुए आत्माका बहुत होना (सिद्ध होता) है।)<br />
पुरुषबहुत्वमं व्यवस्थात्।।(सांख्यदर्शन-6/45)<br />
(पुरुष (आत्मा) का अनेक पना है, (जन्म, मरण आदि की) व्यवस्था के कारण।)<br />
अगर आत्मा एक होती तो कंई बातों की स्पष्टता नहीं हो सकती है, जैसे एक स्वर्गमें जाता है दूसरा नर्कमें, एकको मोक्ष है दूसरेको बन्ध है, एक हि आत्मा होता तो एकको मोक्ष मिलनेसे सबको मोक्ष मिल जाता, आत्मा केवल चेतन है और जीव विशिष्ट चेतन है ऐसा माननेसे विशिष्ट चेतन अनात्म हि होगा और आत्म रहा केवल चेतन फिर एक हो जायेगा और इससे मोक्ष और बन्धकी व्यवस्था नहीं हो सकेगी, एक हि आत्मामें विरुद्ध धर्मके भाव जैसे उत्पन्न होना विनाश होना आरोपित नहीं हो सकते, इसलिये आत्मायें अनंत है, एक नहीं है।<br />
इदानीमिव सर्वत्र नात्यन्तोच्छेद:।। (सांख्यदर्शन-1/159)<br />
(वर्तमानकी तरह सर्वकाले (संसार रहेगा हि। उसका) अत्यन्त उच्छेद नहीं होगा।)<br />
व्यावृत्तोभयरुप:।।(सांख्यदर्शन-1/160)<br />
[(जीव अविवेक से) आवृत्त होने के कारण (पुरुष बन्ध और मोक्ष ऐसे) उभयरुप (दिखता) है।]
साक्षात्सम्बन्धात्साक्षित्वम्। (सांख्यदर्शन-1/161)<br />
(अक्ष (इन्द्रियों) के साथके संबंधोसे (आत्माका) साक्षित्व है।)<br />
नित्यमुक्तत्वम्।। (सांख्यदर्शन-1/162)<br />
((पुरुषका) नित्यमूक्तपना है।)<br />
औदासीन्यं चेति।।(सांख्यदर्शन-1/163)<br />
((पुरुषका नित्य) उदासीन (अकर्ता) पना भी है।)<br />
विमुक्तमोक्षार्थं स्वार्थं वा प्रधानस्य। (सांख्यदर्शन-2/1)<br />
[मुक्त के मोक्ष के लिए अथवा प्रकृति के स्वार्थ के लिए (सृष्टि की उत्पत्ति है)] (सांख्यदर्शन-2/1)<br />
[(The making of the Creation) is for the Salvation of liberated or for Nature’s own sake]. (Sankhyadarshan-2/1).<br />
(प्रकृतिकी प्रवृतियाँ (ज्ञानी के) मोक्षके लिये या प्रधानके (प्रकृतिके) स्वार्थके लिये है।)<br />
बहुभृत्यवद्वा प्रत्येकम्।।(सांख्यदर्शन-2/4)<br />
[अथवा (जैसे मालिक) बहु दास (में से उसकी योग्यता को देखकर किसी एक को मूक्त करता है, तो दूसरे को उसकी अयोग्यता को देखकर उसको सज़ा करता है इसी) तरह (प्रकृति) प्रत्येक को (मोक्ष या भोग प्रदान करती है)]
चेतनोदृेशान्नियम: कण्टकमोक्षवत्।।(सांख्यदर्शन-2/7)(see3/63 also)<br />
(जिसे) विवेकज्ञान (हो गया है उस) के उदेशसे नियम है (कि उसे प्रकृति दु:ख नहीं दे सकती) जैसे (जिसने रास्तेमें रहे) कंटक (देख लिये है उसे कंटक) से मूक्ति मील जाती है।<br />
अन्ययोगेऽपि तत्सिद्धिर्नांजस्येनायोदाहवत्।। (सांख्यदर्शन-2/8)<br />
(अन्यके संयोगसे (पुरुषमें) बन्धन, अग्नि के संयोग से लोहेमें रही दाहकता की भाँति दिखता है, पर वास्तविक वहीं है।)<br />
अध्यवसायो बुद्धि:।। (सांख्यदर्शन-2/13)<br />
(बुद्धि निश्चयरुप है।<br />
तत्कार्यं धर्मादि:।। (सांख्यदर्शन-2/14)<br />
(धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य वह बुद्धिके कार्य है।)<br />
अतीन्द्रियमिन्द्रियं भ्रान्तानामधिषिठाने।। (सांख्यदर्शन-2/23)<br />
(इन्द्रिय अंदरुनी है, भ्रांतमतीवालोंको गोलकमें दिखती है।)<br />
सामान्यकपणवृत्ति: प्राणाद्या वायव: पंच।।<br />
(सांख्यदर्शन-2/31)<br />
(प्राण, अपान आदि पाँच प्राणों अंत:करणकी साधारण (सामान्य) वत्ति है।)<br />
वृतय: पंचतय्य: क्लिष्टाक्लिष्टा:।। (पातंजलयोगदर्शन-1/5)(सांख्यशास्त्र-2/33)<br />
(वृतियां पाँच प्रकारकी है, वे क्लिष्ट तथा अक्लिष्टरुप है)<br />
पुरुषार्थं करणोद्भवोऽप्यदृष्टोल्लासात्।। (सांख्यदर्शन-2/36)<br />
[(जीवात्माकी) प्रवृति अंत:करणमेंसे पैदा होती है, फिर भी वह अतीतके संस्कारोंसे प्रेरित होकर हि उद्भवती है।)<br />
अविशेषाद्विशेषारम्भ:। (सांख्यदर्शन-3/1)<br />
(अविशेषसे (पंच तन्मात्राओंसे) विशेषकी (पंच महाभूतोंकी) उत्पत्ति होती है।)<br />
तस्माच्छरीरस्य।। (सांख्यदर्शन-3/2)<br />
उस (पंच महाभूतों) से शरीर की (उत्पत्ति होती है।)<br />
तद्बिजात्संसृति:।। (सांख्यदर्शन-3/3)<br />
(उस (संस्काररुप) बीज के कारण (सूक्ष्म शरीर का) आवागमन होता है।) (सांख्यदर्शन-3/3).<br />
(Because of that seed (in the form of Sanskaar) the trafficking (of Subtle Body) continues). (Sankhyadarshan-3/3)<br />
अविवेकाच्च प्रवर्तनमविशेषाणाम्।।(सांख्यदर्शन-3/4)<br />
[(व्यक्ति में) विवेकज्ञान नहीं हो जाता है, तबतक हि अविशेषों (शब्दादि पाँच तन्मात्राओं की स्थूल, सूक्ष्म शरीरों पैदा करने) की प्रवृति शक्य बनती है।)(सांख्यदर्शन-3/4)<br />
(The activity of (creating Gross and Subtle Bodies by sound, etc) rudimentary elements becomes possible till the Knowledge of Discernment has not taken place(in a person)].(Sankhyadarshan-3/4)<br />
जब विवेकज्ञान होता है तो, शब्द, स्पर्श, रुप, रस और गंध की अपने कार्यमें प्रवृति बंध हो जाती है; जिससे पंच महाभूत नहीं बनते और इससे ऐसे ज्ञानीका शरीर भी नही बनता और इससे शरीरका आवागमन बंध हो जाता है, जिसे हम मोक्ष कहते है।<br />
मातापितृजं स्थूलं प्रायश इतरन्न तथा।। (सांख्यदर्शन-3/7)<br />
(स्थूल (शरीर हि) बहुधा मातापितासे पैदा हुआ होता है, अन्य (सूक्ष्म) उस तरह (मातापितासे पैदा हुआ) नहीं है।)<br />
पूर्वोत्पत्तेस्तत्कार्यत्वं भोगादेकस्य नेतरस्य।।(सांख्यदर्शन-3/8)<br />
[पूर्वोत्पत्ति के कारण एक (सूक्ष्म शरीर) का हि कर्तृत्व, भोक्तृत्व, आदि होता है; अन्य (स्थूल शरीर) का नहीं।](सांख्यदर्शन-3/8)<br />
[As the (subtle body) has born priorly, that one has the doership and enjoying and not the other (gross body)]. (Sankhyadarshan-3/8).<br />
पुरुषार्थं करणोद्भवोऽप्यदृष्टोल्लासात्।।(सांख्यदर्शन-3/36)<br />
(पुरुषार्थ का उद्भव अंत:करणसे होते हुए भी वह अतीत के संस्कारोंसे प्रेरित होकर हि उद्भव होते है।)<br />
ज्ञानान्मुक्ति:।। (सांख्यदर्शन-3/23)<br />
(ज्ञानसे ही मुक्ति (महेसूस होती) है।) (सांख्यदर्शन-3/23)<br />
(The Liberation (is realized) through the Knowledge only.)(Sankhyadarshan-3/23).<br />
प्रधानसृस्टि: परार्थं स्वतोऽप्यभोक्त्तृत्वादुष्ट्रकुम्कुम वहनवत्।। (सांख्यदर्शन-3/58) (6/40)<br />
(जैसे उँट (को अपनेको खाना नहीं है फीरभी स्वामिके लिये) केसरका वहन करता है, वैसे ही (प्रकृतिका) अपना अभोक्त्तृत्व होनेपर भी (जीवात्माके भोग और मोक्षके) परोपकारके लिये प्रकृति सृष्टि (का निर्माण करती है।)<br />
પ્રકૃતિ સૃષ્ટિનું સર્જન કરે છે. આના પરથી એટલું સ્પષ્ટ થાય છે કે પ્રકૃતિ અને સૃષ્ટિ બંને અલગ અલગ છે.<br />
नैरपेक्ष्येऽपि प्रकृत्युपकारेऽविवेको निमित्तम्।।<br />
(सांख्यदर्शन-3/68)<br />
(निरपेक्षतासे सोचनेपर भी प्रकृतिके (सृष्टिके सर्जनादि) उपकारमेभी (जीवात्माके) अविवेक (का निवारण ही) निमित्त (कारण) है।)<br />
अविशेषाद्विशेषारम्भ:। (सांख्यदर्शन-3/1)<br />
(अविशेष (पंच तन्मात्रा या पंच सूक्ष्म भूतों) द्वारा विशेष (पंच महाभूत) उत्पन्न होते है।)<br />
तद्बीजात्संसृति।। (सांख्यदर्शन-3/3)<br />
(उस (धर्माधर्मरुप संस्कार) बीजसे (स्थूल और सूक्ष्म शरीरका) गमनागमन (होता रहता है।)<br />
पुरुषार्थं संसृतिर्लिंगानां सूपकारवद्राज्ञ:।।<br />
(सांख्यदर्शन-3/16)<br />
(पुरुषके लिये सूक्ष्म (शरीर)का गमनागमन राजाके रसोयाकी तरह (होता रहता) है।)<br />
ज्ञानान्मुक्ति:। (सांख्यदर्शन-3/23)<br />
((प्रकृति और पुरुषका विवेक) ज्ञानसे मुक्ति होती है)<br />
बन्धो विपर्ययात्। (सांख्यदर्शन-3/24)<br />
(अज्ञानसे बंन्धन होता है।)<br />
नियतकारणत्वान्न समुच्चयविकल्पौ।। (सांख्यदर्शन-3/25)<br />
[(ज्ञान से मुक्ति, कर्म से संसार; यह) नियत कारण होने के कारण, (ज्ञान और कर्म दोनों ऐसा) समुच्चय या (कदाचित ज्ञान या कदाचित कर्म ऐसा) विकल्प भी (मोक्ष में हेतु) नहीं है](सांख्यदर्शन-3/25)<br />
[As there is set rule (that the Knowledge results in Salvation and the action results in Sansaar); neither the aggregation (of Knowledge and action) nor alternative (as sometime Knowledge or sometime action) is the way (to Salvation).](Sankhyadarshan-3/25)<br />
रागोपहतिर्ध्यानम्। (सांख्यदर्शन-3/30)<br />
(रागका नाश ही ध्यान है।)<br />
वृत्तिनिरोधात्तत्सिद्धि।। (सांख्यदर्शन-3/31)<br />
(वृत्तिके निरोध से उस (ध्यान) की सिद्धि होती है।)<br />
वैराग्यादभ्यासाच्च।।<br />
(सांख्यदर्शन-3/36)<br />
(वैराग्यसे तथा अभ्याससे (चित्त निरुद्ध होता है।)<br />
विविक्तबोधात्सृष्टिनिवृति: प्रधानस्य सूदवत्पाके।। (सांख्यदर्शन-3/63)(pl see 2/7 also)<br />
[(विवेक ज्ञान द्वारा पुरुष और प्रकृति की) भिन्नता का बोध हो जानेसे (उस विवेक ज्ञानी के प्रति) प्रकृति की सृष्टि की निवृत्ति (हो जाती है।) जैसे (रसोई हो जाने से) रसोया की होती है।)]
द्वयोरेकतस्य वौदासीन्यमपवर्ग:।।(सांख्यदर्शन-3/65)<br />
[(प्रकृति और पुरुष) दोनोंके अथवा (दोनों में से) एकका उदासीनपना मोक्ष है।)]
अन्यसृष्ट्युपराग्ऽपि न विरज्यते प्रबुद्धरज्जु तत्त्वस्यैवोरग:।। (सांख्यदर्शन-3/66)<br />
तत्त्वस्य इव उरग: (सर्प)<br />
अन्य (विवेकी) के प्रति (प्रकृति) उपराम होती है, फिर भी (अविवेकी के प्रति) निवृत्त नहीं होती है। जिसने दोरडीका स्वरुप जानलिया है, उसका ही सर्प (दूर होता है।)<br />
कर्मनिमित्तायोगाच्च।।(सांख्यदर्शन-3/67)<br />
[(विवेकी पुरुषके लिये शरीरकी उत्पत्ति के लिये आवश्यक) कर्मरूप (धर्माधर्म संस्कार रुप) निमित्तरुप कारण न रहता होनेके कारण (विवेकज्ञानी को मोक्ष हो जाता है।)]
नैरपेक्ष्येऽपि प्रकृत्युपकारेऽविवेको निमित्तम्।।(सांख्यदर्शन-3/68)<br />
[(धर्माधर्म संस्कार) ही प्रकृति (की प्रवृति) में निरपेक्ष कारण है, (जब कि) अविवेक निमित्त (सहकारी कारण) है।<br />
दोषबोधेऽपि नोपसर्पणं प्रधानस्य कुलवधूवत्।। (सांख्यदर्शन-3/70)<br />
[(विवेकिन पुरुष को मेरे) दोष का बोध हो गया है इस कारण से प्रकृति की प्रवृति (विवेकिन के प्रति) नहीं होती, जैसे कुलीन पुत्रवधू ( अपने दोषों का बोध पति को हो जानेसे उसके पास नहीं जाती)]
नैकान्ततो बन्धमोक्षौ पुरुषस्याविवेकादृते।।(सांख्यदर्शन-3/71)<br />
अविवेकके अलावा (दूसरा कोई) स्वाभाविक बन्धमोक्ष पुरुषको नहीं है।<br />
प्रकृतेरांजस्यात्ससंगत्वात्पशुवत्।।(सांख्यदर्शन-3/72)<br />
प्रकृतिको वस्तुत: (गुणोंके) ससंगपणासे (बंधन) होता है, जैसे पशुको (दोरडीसे बंधन होता है।)<br />
ત્રણે ગુણોની સામ્યાવસ્થા એટલે મૂળ પ્રકૃતિ. મૂળ પ્રકૃતિ એટલે પ્રકૃતિ નું બંધન રહિતપણું, પ્રકૃતિનો મોક્ષ. સાથે સાથે ત્રણે ગુણોની સામ્યાવસ્થા એટલે સૃષ્ટિ લય. પદાર્થોમાં ત્રણે ગુણો સમાન જ રહે છે. માનવ ચિત્તોમાં જ ચિત્તવૃત્તિ નિર્માણ થવાથી ગુણોની વધઘટ થવાથી પ્રકૃતિમાં રહેલ ત્રણે ગુણોની સામ્યાવસ્થાનો ભંગ થાય છે અને આવા અવિવેકી ભણી પ્રકૃતિ ની સૃષ્ટિના સર્જન ની કાર્યવાહી શરુ થાય છે. આને જ પ્રકૃતિનો બંધ અને પુરુષ (જીવ) નો પણ બંધ કહેવાય. અવિવેક જનના કારણે પ્રકૃતિ મા જે ગુણનો સંગ થયો તેજ વાસ્તવ મા પ્રકૃતિનું બંધન છે. જ્યારે ચિત્તવૃત્તિ નિરોધ થવાથી વ્યક્તિ ગુણાતીત બની જાય ત્યારે તેવા વિવેકી પ્રત્યે પ્રકૃતિની પ્રવૃત્તિ અટકી જાય, આનેજ વ્યક્તિનો મોક્ષ અને પ્રકૃતિ ની નિવૃત્તિ કહેવાય.<br />
तत्त्वाभ्यासान्नेति नेतीति त्यागाद्विवेकसिद्धि:।।(सांख्यदर्शन-3/75)<br />
(मैं) यह नहीं (हुँ। मैं) यह नहीं (हुँ।) ऐसा (वारं वार) अभ्यास द्वारा तत्त्वसे (निश्चित करके उसका) त्याग करनेसे विवेकज्ञान प्राप्त होता है।<br />
अधिकारित्रैविध्यान्न नियम:। (सांख्यदर्शन-1/70)<br />
(अधिकारीके तीन प्रकार होनेसे (विवेकज्ञान मात्र श्रवणसे हो जाता है ऐसा) नियम नहीं है)<br />
उत्तमअधिकारीको श्रवणसे, मध्यमको श्रवण और मननसे और कनिष्ठको श्रवण, मनन और निदिध्यासन से विवेकज्ञान होता है<br />
अधिकारिप्रभेदान्न नियम:।।(सांख्यदर्शन-3/76)<br />
अधिकारीके (भी) प्रभेद होनेके कारण (विवेककी सिद्धिमें समय मर्यादाका) नियम नहीं है।<br />
संस्कारलेशतस्तत्सिद्धि:।। (सांख्यदर्शन-3/83)<br />
(संस्कार समाप्त हो जाने से उस (शरीर धारण न करने) की सिद्धि (मिलती है)।)<br />
विवेकान्नि:शेषदु:खनिवृत्तौ कृतकृत्यता नेतरान्नेतरात्।।(सांख्यदर्शन-3/84)<br />
(विवेकज्ञानसे नि:शेष दु:ख निवृत्ति और कृतकृत्यता होती है; अन्य किसीसे नहीं, अन्य किसीसे नहीं।)<br />
अध्यस्तरुपोपासनात्पारम्मर्येण यज्ञोपासकानामिव।।(सांख्यदर्शन-4/21)<br />
(ब्रह्मा, विष्णु, शिवादिकी) अध्यस्तरुप उपासना से (उपास्य मिलनेसे भी विवेकज्ञान नहीं मिलता, लेकिन) परंपरासे (विवेकज्ञान होता है।) यज्ञके उपासकोंकी तरह।<br />
न मलिनचेतस्युपदेशबीजप्ररोहोऽजवत्। (सांख्यदर्शन-4/29)<br />
(मलीन चित्तमें उपदेशरुप बीजका उगना संभव नहीं, अज राजाकी तरह।)<br />
પત્નિના મરણના શોકને કારણે મલિન ચિત્ત થયેલ અજ રાજાને વસિષ્ઠ ભગવાનનો ઉપદેશ સ્થિર થઇ શક્યો નહોતો.<br />
न भूतियोगेऽपि कृतकृत्यता।।(सांख्यदर्शन-4/32)<br />
(योगीओंको अणिमादि) विभूतियोंकी प्राप्तिमें भी कृतकृत्यता (मुक्तिलाभ) नहीं है।<br />
नेश्वराधिष्ठिते फलनिष्पत्ति: कर्मणा तत्सिद्धे:।। (सांख्यदर्शन-5/2) (तस्मात्कमैव जगत्कारणमस्तु।)<br />
(ईश्वरके कार्यक्षेत्रमें (कर्म) फल प्रदान करना नहीं आता, (क्यों कि) उस की प्राप्ति तो कर्मों से ही होती है।)<br />
नाविद्याशक्तियोगो नि:संगस्य।। (सांख्यदर्शन-5/13)<br />
[असंग (आत्मा) का अविद्याशक्ति से योग नहीं है।]
न धर्मापलाप: प्रकृतिकार्यवैचित्र्यात्।। (सांख्यदर्शन-5/20)<br />
[(जगत का निमित्त कारण) धर्माधर्मरुप संस्कार नहीं है ऐसा नहीं है, (क्यों कि धर्माधर्मरुप संस्कार जैसे विचित्र (विविध) है वैसा हि) प्रकृति का कार्य (विविध) विचित्र होनेके कारण।]
ध्यानं निर्विषयं मन:। (सांख्यदर्शन-5/25)<br />
न नित्यत्वं वेदानां कार्यत्वश्रुते:।। (सांख्यदर्शन-5/45)<br />
(वेदों) कार्य है, ऐसी श्रुति के कारण वेदों का नित्यपना नहीं है।)<br />
[स तपोऽतप्यत तस्मात्तपस्तपनात्त्रयो वेदा अजायन्त।।]श्रुति<br />
नाद्वैतमात्मनो लिंगात्तद्भेदप्रतीते:।। (सांख्यदर्शन-5/61)<br />
(लिंगसे उस (आत्मा) के भेदकी प्रतीति से आत्मा का अद्वैत नहीं है।)<br />
અનેક આત્માઓ છે, એકજ આત્મા છે એવું નથી.<br />
प्रकृतिपुरुषयोरन्यत्सर्वमनित्यम्।। (सांख्यदर्शन-5/72)<br />
(प्रकृति और पुरुष से भिन्न सर्व अनित्य है।)<br />
न भागीयोगो भागस्य।। (सांख्यदर्शन-5/81)<br />
(अंशका अंशी में लय (भी मोक्ष) नहीं है।<br />
જીવનો ઈશ્વર મા લય તે મોક્ષ નથી. કારણ બ્રહ્મ ના ભાગ પડી શકે નહી તેથી જીવ પરમાત્મા નો અંશ ન હોઇ શકે.<br />
न विशेषगतिर्निष्क्रियस्य। (सांख्यदर्शन-5/76)<br />
(निष्क्रिय (आत्माकी उर्ध्व वगेरह) विशेषगति संभव नहीं है।)<br />
न रुपनिबन्धनात्प्रत्यक्षनियम:।। (सांख्यदर्शन-5/89)<br />
[(जिसका) रुप होता है (उसको हि) प्रत्यक्ष (देख) सकते है ऐसा नियम नहीं है। (योगी समाधि में अरुपको देख सकता है।)]
न स्थूलमिति नियम अातिवाहिकस्याऽपि विद्यमानत्वात्।।(सांख्यदर्शन-6/103)<br />
(केवल) स्थूल शरीर (ही) है, ऐसा नियम नहीं है; (क्यों कि) सूक्ष्म शरीरको ले जाने वाला देखागया (विद्यमान) है।) [(पुरि (स्थूलशरीरे) शेत इति पुरुष:।(सूक्ष्मशरीर:) (इति श्रुति:)]
મૃત્યુ થતા નિરાધાર મનમાં ગતિનો અભાવ જોવા મળત. પણ મન બીજા દેહને પ્રાપ્ત કરે છે, બીજા દેહ સુધી ગતિ કરે છે એવું જોવા મળે છે, એટલે મનને આધાર છે એવું પુરવાર થાય છે. આ આધાર જ સૂક્ષ્મ દેહનો છે.<br />
अनादिरविवेकोऽन्यथा दोषद्वयप्रसक्ते:।। (सांख्यदर्शन-6/12)<br />
(अविवेक अनादि है।अन्यथा (आदि माननेसे) दो प्रकारके दोष की प्राप्ति होगी।)<br />
प्रतिनियतकारणनाश्यत्वमस्य ध्वान्तवत्।। (सांख्यदर्शन-6/14)<br />
((अविवेककी) प्रतिनियत कारण (विवेक) से ही नाश हो सकता है, अंधकार (का जैसे प्रकाश से होता है, उस) की तरह)<br />
न मुक्तस्य पुनर्बन्धयोगोऽप्यनावृत्तिश्रुत्तै:।। (सांख्यदर्शन-6/17)<br />
[(न स पुनरावर्तते। ऐसी) अनावृत्तिकी श्रुति के कारण मुक्तको फिरसे बंधन नहीं होता)]
ध्यानं निर्विषयं मन:।। (सांख्यदर्शन-6/25)<br />
(विषय रहित मन ध्यान है।)<br />
नि:संगेऽप्युपरागोऽविवेकात्।। (सांख्यदर्शन-6/27)<br />
(असंग (आत्मा) में भी अविवेक से उपराग (है ऐसा प्रतित होता) है।)<br />
गतियोगेऽप्याद्यकारणताहानिरणुवत्।। (सांख्यदर्शन-6/37)<br />
((प्रकृतिमें) गति के स्विकार से उसके (सृष्टि के) आदिकारण होनेमें हानि होती है, अणु की तरह।)<br />
ગતિ એટલે ક્રિયા. જેનામાં ગતિ હોય તે ક્રિયાશીલ કહેવાય અને ક્રિયા હોય તે અવ્યાપક હોય. જો સર્વવ્યાપક હોય તો તેને ક્યાંય જવાની જરુર જ ન હોય, કારણ એ બધેજ હોય. પ્રકૃતિ મા ગતિ છે એવું સ્વિકારવાથી પ્રકૃતિ કોઈ (વ્યાપક) નું કાર્ય છે એવું સાબિત થાય અને તેથી તે સૃષ્ટિનું આદિકારણ નથી એવું સાબિત થઇ જાય.<br />
सत्त्वादिनामतद्धर्मत्वं तद्रूपत्वात्। (सांख्यदर्शन-6/39)<br />
((प्रकृति तीनों गुणरुप है लेकिन) सत्त्वादि गुणों प्रकृतिका धर्मरुप नहीं है, तद्रुपपणा से)<br />
अनुपभोगेऽपि पुमर्थं सृष्टि: प्रधानस्योष्ट्रकुम्कुम वहनवत्। (सांख्यदर्शन-6/40) (6/58)<br />
(जैसा ऊँटका (अपने स्वामिके लिये) केसरका वहन करना है, वैसे ही (पुरुषका) उपभोग न होनेपर भी मूलप्रकृतिकी सृष्टि पुरुषके (मोक्षके) लिये है।)<br />
પ્રકૃતિ સૃષ્ટિનું સર્જન કરે છે. આના પરથી એટલું સ્પષ્ટ થાય છે કે પ્રકૃતિ અને સૃષ્ટિ બંને અલગ અલગ છે.<br />
साम्यवैषम्याभ्यां कार्यद्वयम्। (सांख्यदर्शन-6/42)<br />
((तीनों गुणोंके) साम्यपणासे (प्रकृति) और विषमपणासे (सृष्टिकी उत्पत्ति) प्रकृतिके दो कार्य है।)<br />
(साम्यात्प्रकृते: सदृशपरिणामात् प्रलय:। वैषम्यात्प्रकृतेर्महदादिभावेन विसदृशपरिणामात्सृष्टि:।।)<br />
સત્ત્વ, રજસ અને તમસ ની સામ્યાવસ્થા એટલે પ્રકૃતિ. ત્રણેના સમાન પરિણામ થી પ્રલય થાય છે. ત્રણે ગુણોની વિષમાવસ્થા થવાથી પ્રકૃતિ મહત્ આદિ રુપ થી (શરુ કરી) વિવિધરુપે પરિણામ પામી સૃષ્ટિનું સર્જન કરે છે.<br />
જગતમાં બનતો દરેક બનાવ એ પ્રકૃતિદ્વારા ત્રણે ગુણોની સામ્યાવસ્થા જાળવવાનો પ્રયાસ છે, જેનાથી વિવિધરુરે સૃષ્ટિ વિકાસ પામ છે.<br />
विमुक्तोबोधान्न सृष्टि: प्रधानस्य। (सांख्यदर्शन-6/43)<br />
(जीसको मोक्षप्राप्ति हुइ है उनके लिये प्रधान (प्रकृति) की सृष्टि (बांधनेवाली न रहकर) निवृत हो जाती है।)<br />
जन्मादिव्यवस्थात: पुरुषबहुत्वम्।। (सांख्यदर्शन-1/149)<br />
(जन्म (मरण) आदिकी व्यवस्थाको देखते हुए आत्माका बहुत होना (सिद्ध होता) है।)<br />
पुरुषबहुत्वमं व्यवस्थात्।।(सांख्यदर्शन-6/45)<br />
(पुरुष (आत्मा) का अनेक पना है, (जन्म, मरण आदि की) व्यवस्था के कारण।)<br />
अगर आत्मा एक होती तो कंई बातों की स्पष्टता नहीं हो सकती है, जैसे एक स्वर्गमें जाता है दूसरा नर्कमें, एकको मोक्ष है दूसरेको बन्ध है, एक हि आत्मा होता तो एकको मोक्ष मिलनेसे सबको मोक्ष मिल जाता, आत्मा केवल चेतन है और जीव विशिष्ट चेतन है ऐसा माननेसे विशिष्ट चेतन अनात्म हि होगा और आत्म रहा केवल चेतन फिर एक हो जायेगा और इससे मोक्ष और बन्धकी व्यवस्था नहीं हो सकेगी, एक हि आत्मामें विरुद्ध धर्मके भाव जैसे उत्पन्न होना विनाश होना आरोपित नहीं हो सकते, इसलिये आत्मायें अनंत है, एक नहीं है।<br />
अहंकार: कर्ता न पुरुष:। (सांख्यदर्शन-6/54)<br />
(अहंकार ही कर्ता है, पुरुष नहीं।)<br />
अभिमान वृत्ति की उत्पत्ति के बाद ही सब की कार्य में प्रवृत्ति देखने मिलती है. पुरुष अपरिणामी होनेके कारण पुरुष कर्ता नहीं बन सकता।<br />
चिदवसाना भुक्तिस्तत्कर्मार्जितत्वात्।।(सांख्यदर्शन-6/55)<br />
चित्तका नाश होनेसे भोग (कर्मफल) का (भी नाश हो जाता है, क्योंकि भोग) उस (चित्त) के कर्मसे अर्जित किया होने के कारण।<br />
निर्गुणत्वात्तदसम्भवादहंकारधर्मा ह्येते।।(सांख्यदर्शन-6/62)<br />
(निर्गुण होनेके कारण उस (आत्मा) के (कोई धर्म होना) संभव नहीं होनेके कारण वह (धर्माधर्मरुप संस्कार) अहंकारके ही धर्म है।)<br />
विशिष्टस्य जीवत्वमन्वयव्यतिरेकात्।। (सांख्यदर्शन-6/63)<br />
(जीवत्व विशिष्ट (अंत:करण) का होता है, अन्वय व्यतिरेक के कारण)<br />
आत्मा असंग होनेके कारण उसमें जीवत् व( जीवरुप पना नहीं हो सकता। अंत:करण होता है तब ही जीवत्व होता है (अन्वय) और अंत:करण न रहने से जीवत्व भी नहीं रहता (व्यतिरेक)। इससे सिद्ध होता है कि अंत:करणविशिष्ट चेतन में ही जीवत्व संभव है।<br />
अहंकारकर्त्रधीना कार्यसिद्धिर्नेश्वराधीना प्रमाणाभावात्।।(सांख्यदर्शन-6/64)<br />
अहंकाररुप कर्ता (के संस्कार) के आधिन कर्मसिद्धि है, ईश्वर के आधिन नहीं है; (ईश्वर होनेके कोई) प्रमाणके अभाव से)<br />
अदृष्टोद्भूतिवत्समानत्वम्।।(सांख्यदर्शन-6/65)</p>
<p>हरिः ॐ तत्सत्। हरिः ॐ तत्सत्। हरिः ॐ तत्सत्।</p>
<p>Acharya Vrujlal</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com/saankhyashastra/">SAANKHYASHASTRA</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://vedavichar.com">VEDA VICHAR</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://vedavichar.com/saankhyashastra/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>9</slash:comments>
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>
